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चलिए ये कहानी उन्ही की जुबानी सुनते है।
हैलो दोस्तों मैं अमन हूँ और ये कहानी मेरे और मेरी चचेरी बहन गौरी की है।
हमारा परिवार गाँव में रहता है लेकिन गाँव से २ किलोमीटर दूर हमारे खेत हैं। हमारा घर खेतों में ही बना हुआ है। हम गाँव से २ किलोमीटर दूर खेतों में रहते हैं। हमारे पास लगभग ३० से ३२ एकड़ खेती है और परिवार खेती ही करता है।
बात आज से ४ साल पहले की है। उस समय मैं कॉलेज की पहली कक्षा में उन्नीस साल का था और गौरी अठारह साल की कॉलेज में पढ़ती थी। इस उम्र सबको चुदाई की थोड़ी बहुत जानकारी होती है।
उस समय गाँव में ज्यादातर चुल्हे पर खाना पकता था। अब हर घर में गैस आ गया है। मेरे पापा और चाचा दो भाई हैं और खेती करते हैं। हमने खेत में हवेली जैसा बड़ा घर बनवाया है जिसमें सबके अलग अलग कमरे हैं। चुल्हे का खाना स्वादिष्ट लगता है इसलिए घर में चुल्हे पर ही पकता था।
चुल्हे के लिए लकड़ियाँ लानी पड़ती थीं। कॉलेज से आने के बाद मुझे और गौरी को यह काम दिया गया था। हम दोनों साढ़े तीन बजे घर आ जाते थे क्योंकि कॉलेज प्राइवेट था। सुबह जल्दी जाते और साढ़े तीन तक लौट आते।
लकड़ियाँ लाने के लिए घर से करीब ४०० मीटर दूर नाले के पास जाना पड़ता था। नाला नदी से थोड़ा छोटा होता है। किनारे बड़े बड़े पेड़ और झाड़ियाँ होती हैं। बरसात में ही पानी रहता है। सर्दी में कुछ गड्ढों में ही पानी बचता है।
बरसात की आंधियों से पेड़ों की टहनियाँ टूटकर गिर जाती हैं। सर्दी तक वे अच्छी सूख जाती हैं। आग तापने और चुल्हे के काम आती हैं। नाला ७० से ८० मीटर चौड़ा और १० से १५ मीटर गहरा होता है। गाँव के लोग अक्सर नाले की तरफ ही टट्टी के लिए जाते हैं।
हमारे खेतों में ५ एकड़ गन्ना नाले से सटाकर लगा था। गन्ने वाले खेत में तभी जाते जब पानी लगाना होता। बाकी खेतों में कपास मकई और गेहूँ की खेती होती।
सर्दी के दिन थे। कुछ खेतों को गेहूँ की बुआई के लिए तैयार करना था। पापा और चाचा उधर व्यस्त रहने वाले थे। कुछ खेतों में कपास चुनने का काम चल रहा था। मम्मी और चाची कुछ मजदूर औरतों को लेकर सुबह से काम पर लग गई थीं।
मुझे और गौरी को कह दिया था कि कॉलेज से आने के बाद रात के खाने और आग तापने के लिए लकड़ियाँ ले आना। यह हमारा रोज का काम था। हम साढ़े तीन बजे घर आकर कपड़े बदलकर लकड़ियाँ लेने निकलते। मैं कॉलेज से आने के बाद उसी नाले में टट्टी करने जाता और पिछवाड़ा गड्ढे के पानी से साफ करता।
उस दिन भी हम लकड़ियाँ लेने नाले की ओर चल दिए। लकड़ियाँ इकट्ठा कर लीं तभी गौरी बोली भैया मुझे अर्जेंट टॉयलेट जाना है। गौरी कभी बाहर नहीं जाती थी। घर के बने टॉयलेट में ही जाती।
मैंने कहा उस झाड़ी के पीछे चली जाओ। उसने कहा यहाँ पानी भी नहीं है। मैं ऐसे खुले में पहले कभी नहीं गई। डर लगता है। मैंने कहा झाड़ी के पीछे जाओ। गड्ढों में पानी है उसी का इस्तेमाल कर लो।
उसने कहा बहुत डर लगता है। अगर इतनी जल्दी न होती तो कहती ही नहीं। तुम झाड़ी के बिल्कुल पास खड़े रहो ताकि डर कम लगे। मैंने कहा ठीक है।
वह झाड़ी के पीछे चली गई और बैठ गई होगी। थोड़ा सरकते ही उसकी गाँड़ में कुछ चुभा। गौरी ने जोर से आवाज दी भैया और रोने लगी। मैं घबराकर पीछे गया।
सामने का नजारा देखकर होश उड़ गए और लंड एकदम खड़ा हो गया। गौरी ने एक हाथ से सलवार और एक हाथ से सूट पकड़ रखा था। उसकी चुत और चिकनी जाँघें साफ नजर आ रही थीं। वह रो रही थी। मुझे भी डर लगने लगा।
मैंने चुप कराते हुए पूछा क्या हुआ। जैसे ही उसने मुझे देखा सूट झट से नीचे कर दिया। चुत छिप गई। सलवार वैसे ही पकड़े रखा। हिचकिचाते हुए कुछ कहने लगी।
मैंने धीरे कहा गौरी क्या हुआ। उसने रोते हुए कहा नीचे कुछ चुभा है। बहुत दर्द हो रहा है। मैं भी घबरा गया। कहा चुप हो जाओ अच्छी तरह देखो क्या हुआ। मैं झाड़ी के पीछे जाता हूँ।
गौरी ने मेरा हाथ झट से पकड़ लिया। रोते हुए कहा बहुत तकलीफ हो रही है। हिलूँ तो और ज्यादा होती है। तुम ही कुछ करो। मैं कांपते हुए बोला पैर थोड़े फैलाकर आगे की ओर झुक जाओ। मैं देखता हूँ क्या हुआ है।
गौरी हिचकिचाई। मैंने कहा यहाँ दूर दूर तक कोई नहीं है। हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे। दर्द कम नहीं होगा और घर जाने में देर हो रही है। तब गौरी आगे झुक गई।
उसकी गंदी और गुलाबी गाँड़ साफ दिखाई दे रही थी। चुत पर छोटे छोटे भुरे बाल थे। मैं देखता रह गया। लंड पेंट में पूरी तरह खड़ा हो चुका था। गौरी बोली भैया क्या है जल्दी देखो दर्द हो रहा है।
मैंने ध्यान हटाकर देखा। पेंसिल के साइज की लकड़ी उसकी चुत और गाँड़ के छेद के बिलकुल बीच में काँटे की तरह घुसी हुई थी। मैंने कहा छोटी सी लकड़ी का टुकड़ा चुभ गया है।
गौरी बोली दर्द हो रहा है उसे जल्दी निकाल दो। मैंने एक हाथ से चुतड़ फैलाया और दूसरे से एकदम खींचा। दर्द हुआ और जख्म बन गया। खून निकलने लगा। गौरी फिर रोने लगी। कहा और ज्यादा दर्द हो रहा है।
मैंने समझाया और चुप कराया। जहाँ से खून निकल रहा था वहाँ उँगलियों से दबा दिया। थोड़ी राहत मिली। उसकी गाँड़ और चुत देखकर मेरा हाल बुरा हो रहा था।
गौरी शरमाने लगी। मैंने कहा पानी के गड्ढे के पास बैठ जाओ। मैं गाँड़ धो देता हूँ। वह शर्मा गई। मैंने कहा शरमाओ मत जख्म हो गई है। साफ कर देता हूँ फिर घर जाकर दवाई लगा लेना।
गौरी धीरे से नीचे बैठ गई। मैं गाँड़ धोते हुए सहलाने लगा। उसकी आँखें बंद थीं और गाल लाल हो गए थे। सहलाने से उसे मजा आने लगा था शायद।
देर हो रही थी। पास की झाड़ी से पत्ता तोड़कर अच्छी तरह साफ किया और खून वाली जगह पर लगा दिया। कहा सीधे खड़ी हो जाओ। निकर अच्छी तरह ऊपर खींचकर पहना दी। कहा ऐसे ही रहने दो ताकि पत्ता हिले नहीं और खून बंद हो जाए। घर जाकर दवाई लगाना।
गौरी ने मेरे सामने सलवार बाँधी। बोली मम्मी को मत बताना नहीं तो मारेगी। मैंने कहा मैं क्यों बताऊँगा। हम लकड़ियाँ लेकर निकले। गौरी आह निकालकर बोली बहुत दर्द हो रहा है। मैंने कहा घर तक सह लो। पहुँचते ही मलम लगा लेना।
जैसे तैसे घर आए। लकड़ियाँ रसोई में रख दीं। अभी मम्मी पापा चाचा चाची नहीं आए थे। गौरी बोली अभी घर पर कोई नहीं है। तुम ही मलम लगा दीजिए प्लीज दर्द हो रहा है। मैंने कहा ठीक है अपने कमरे में जाओ मलम लेकर आता हूँ।
डिब्बे में चोट वाली मलम लेकर उसके कमरे गया। कमरे का नजारा देखकर लंड इतना टाइट हो गया कि दर्द होने लगा। गौरी ने सलवार और निकर एक पैर से निकालकर पैर मोड़कर फैलाए लेटी थी। जैसे कह रही हो आओ और चुद जाऊँ। मैं मन ही मन चुदाई की कल्पना करने लगा।
गौरी बोली बहुत दर्द हो रहा है जल्दी मलम लगा दो। मैं होश में आया और बिस्तर पर बैठ गया। पत्ता खून सूखने से चिपक गया था। चुत का आधा हिस्सा पत्ते से छिपा था। गुलाबी गाँड़ और हल्के भूरे बाल बहुत उत्तेजित कर रहे थे।
पत्ते को खींचा तो दर्द हुआ क्योंकि चिपक गया था। हल्के हाथ से मलम लगा दी। कहा अब कपड़े पहन लो। मैं झट से अपने कमरे आया और बाथरूम जाकर गौरी के बारे में सोचकर मुठ मारी। फिर नीचे गाँव चला गया और दोस्तों से गप्पे लड़ाने लगा।
वापस आया तो सब घर आ चुके थे और खाना खाने बैठ गए थे। गौरी भी नीचे आ चुकी थी। लगा दर्द खत्म हो गया है। खाना खाकर अपने अपने कमरे सोने चले गए। मेरा और गौरी का कमरा एकदम सटा है। बीच में एक दरवाजा है जिससे बाहर निकले बिना एक दूसरे के कमरे जा सकते हैं।
खाना खाकर मैं सो गया। रात के साढ़े नौ या दस बजे होंगे। गौरी मेरे कमरे में आकर धीरे से जगाने लगी। उठा तो उसने रानी सूरत बनाकर कहा दर्द कम करने वाली मलम गलत जगह लग गई है। वहाँ जलन हो रही है।
उसने सिर्फ टॉप पहना था नीचे कुछ नहीं। ईश ईश फू फू कर रही थी। सच में जलन लग रही थी। उसे आधा नंगा देखकर शॉक लग गया। नींद पूरी खुल गई। मैं बिस्तर पर बैठ गया तो गौरी टाँगें चौड़ी करके सामने बैठ गई।
चुत दिखाते हुए बोली दर्द हो रहा था तो मलम लगाने लगी लेकिन यहाँ भी लग गई। अब जलन हो रही है। कुछ समझ नहीं आ रहा। तुम्हारे पास कोई उपाय होगा। मैंने सोचा यही सही मौका है चुदाई का।
हम दोनों अभी तक कुंवारे थे। झाँट भर भी नहीं पता था पहली चुदाई कैसे होती है। मैंने पोर्न वीडियो देखे थे इसलिए थोड़ा बहुत पता था। कहा इसे साफ कपड़े से अच्छी तरह पोंछना होगा। रात में साफ कपड़ा कहाँ। कहा अपना टी शर्ट उतार कर दे इससे पोंछता हूँ।
गौरी ने झट से टी शर्ट उतार दी। मैं देखता रह गया। छोटे छोटे संतरे जैसे गुलाबी चूचे। वह पहले से टाँगें चौड़ी किए बैठी थी। हाल और बुरा हो गया। फिर खो गया। गौरी ने टी शर्ट हाथ में दी। मैंने चुत पोंछी। पूछा अब जलन हो रही है। उसने हाँ कहा।
मैंने कहा अच्छी तरह साफ करना होगा। इसके लिए चाटना पड़ेगा। गौरी बोली जो करना है करो इस जलन से छुटकारा चाहिए। मैंने उसे बिस्तर पर अच्छी तरह लिटा लिया। कहा टाँगें चौड़ी कर ले। फिर उसकी चुत चाटने लगा।
गौरी सिसकारियाँ लेने लगी। हा ओ हुम्म आह। करीब १५ मिनट चाटकर उसका पानी निकाल दिया। चेहरा खिला खिला लग रहा था। वैसे ही लेटी हाँफ रही थी। मैंने पूछा अब कैसा लग रहा है। बोली अब ठीक है और बहुत अच्छा लग रहा है।
मैंने कहा देख मैंने तेरी तकलीफ दूर की है तो तुझे भी मेरी तकलीफ दूर करनी होगी। गौरी बोली आपको क्या तकलीफ है भैया। कहा जैसे मैंने तेरी जलन चाटकर कम की तुझे भी मेरे लिए कुछ करना होगा। उसने कहा जरूर करूँगी बताओ क्या करना है।
मैंने पेंट उतार दी। गौरी ने देखा तो आँखें बंद कर लीं और बोली छि भैया ये क्या। मैंने टाइट लंड दिखाया। कहा इसमें भी जलन हो रही है। तुझे इसे चूसकर जलन कम करनी होगी जैसे मैंने तेरी चाटकर की।
गौरी ने आँखें खोलीं और लंड ध्यान से देखा। हिचकिचाई। मैंने कहा बिस्तर पर पेट के बल लेट जा। मैं नीचे खड़ा हो जाता हूँ। दर्द भी नहीं होगा और चूसने में आसानी रहेगी। उसने कहा इसे कैसे चूसूँ। कहा आसान है जैसे लॉलीपॉप चूसते हैं वैसे ही चूसना है।
गौरी मान गई। लंड हाथ में पकड़कर देखने लगी। मैंने नाटक करते हुए ईशश किया। उसने झट से मुँह में ले लिया और चूसने लगी। ऐसा लग रहा था पूछो मत। पूरे लंड को मुँह में लेकर ऐसे चूस रही थी जैसे सचमुच लॉलीपॉप हो।
करीब १६ से १७ मिनट चूसने के बाद वीर्य निकल पड़ा। फिर भी वह चूसती रही। वीर्य पी लिया और चूसकर लंड साफ कर दिया। मैंने रोककर उसके साथ बिस्तर पर लेट गया। गौरी हाँफते हुए बोली अब कैसा लग रहा है। कहा बहुत अच्छा। उसने कहा मुझे भी बहुत अच्छा लगा।
मैंने कहा और भी अच्छा लगेगा लेकिन उसके लिए और कुछ करना होगा। गौरी बोली क्या करना होगा चलो अभी करते हैं। मैंने कहा अभी नहीं होगा। जब तक तुम्हारी जख्म ठीक नहीं होगी तब तक यह नहीं कर सकते। इसके बारे में किसी को मत बताना। गौरी बोली मैं बताती थोड़े ही हूँ।
मैं चाहता तो उसी वक्त उसकी चिपचिपी चुत चोद सकता था। लेकिन नहीं चाहा कि एक बार चुदवाने के बाद दर्द के मारे बाद में इनकार करे। सोचा आराम से करूँगा फिर रोज चुदाई होगी। उसके बाद गौरी की चुत को मैंने और उसने मेरे लंड को आठ दिनों तक चूसा और चाटा।
जैसे ही गौरी की जख्म पूरी तरह ठीक हो गई मैंने उसे कैसे चोदा और कैसे हम रोज चुदाई करते हैं यह सब अगली कहानी में बताऊँगा। फिलहाल यह असली कहानी आपको कैसी लगी जरूर बताना।
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