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ट्रेन में चुपके चुपके सेक्स

मेरा नाम हिरा है। आज जो कहानी मैं आप सब को सुनाने जा रही हूँ वो एक अजनबी के साथ सेक्स की कहानी है जो ट्रेन में मेरे साथ पेश आई थी।

मैं पहले भी बता चुकी हूँ कि मैं एबटाबाद के पास एक गाँव की हूँ लेकिन अब कराची में रहती हूँ। मेरी पिछली कहानी मेरे गाँव की ही थी जो मेरा पहला सेक्स भी था। उसके बाद जब तक मैं गाँव में रही और मौका मिलता रहा हसन भाई से सेक्स किया। वो किस्सा बाद में सुनाऊँगी। पहले मेरी ये कहानी सुनो जो एक और वाकिया था जब मैं ट्रेन से कराची आई थी।

हम जब अपने गाँव से कराची जाने के लिए तैयार हुए तो जाहिर है हमारे पास सामान बहुत था। अब्बू तो हमारे साथ नहीं थे क्योंकि वो सिंध में जॉब करते हैं। वो आर्मी में हैं। उन्होंने हमें कहा कि सामान ज्यादा है तो तुम लोग कोच यानी बस की बजाय हज़ारा एक्सप्रेस से कराची आ जाओ क्योंकि वो चलती भी एबटाबाद के करीब एक शहर हवेलियन से थी और हमें कराची कलापुल पहुँचा देती जहाँ हमें उतरना ही था।

अक्सर जब कोई भी बंदा कराची से एबटाबाद या एबटाबाद से कराची जाता है तो वो इसी कोशिश में होता है कि साथ कोई रिश्तेदार चलें जाएँ ताकि सिक्योर भी हो जाएँ और सफर भी अच्छा गुजर जाए। हम भी इसी तलाश में थे। खैर हमें अपने रिश्तेदार मिल ही गए। वो मेरी अम्मी की खाला के बेटे की फैमिली थी। और साथ ही उनके बच्चे भी थे और वो भी हज़ारा एक्सप्रेस से कराची जा रहे थे।

हम लोगों ने एक ही दिन का और एक ही डिब्बे का टिकट ले लिया। हमारी टिकट ग्यारह अक्टूबर दो हजार बारह के दिन दो बजे की हो गई। हज़ारा एक्सप्रेस की जो हवेलियन से कराची जाती थी। मेरे घर से मेरी अम्मी, मेरी दो छोटी सिस्टर्स और मैं थीं। बाकी दूसरे रिश्तेदार थे। मेरा एक बड़ा भाई और एक मुझसे छोटी बहन पहले से ही कराची में ही थे।

ग्यारह अक्टूबर दो हजार बारह को सुबह हमने अपना सामान उठाया और कराची के लिए निकल पड़े। दिल बहुत उदास था। जाहिर है जहाँ सारी लाइफ गुजारी उस जगह से, अपनी फ्रेंड्स, दादा दादी, चाचा, कजन्स और अपने घर से दूर जा रही थी। लेकिन खुशी ये भी थी कि चलो अपने पैरेंट्स के साथ हूँ, भाई बहन हैं। चाचा हैं कराची में और मामू भी तो हैं। और वलीद को तो भूल ही गई थी लेकिन मेरा मंगेतर हिलाल तो वहाँ ही था। उसे भी पहली बार देखना था और ये भी तो सच्चाई है कि शादी के बाद वैसे भी तो मुझे कराची ही सेटल होना था।

उदास दिल के साथ और आँसुओं के साथ हमने अपना गाँव छोड़ा और हवेलियन की तरफ निकल पड़े जहाँ रेलवे स्टेशन था। हवेलियन से पहले एबटाबाद आया तो हसन भाई याद आ गए। उन्हें बाय का मैसेज किया वहाँ से ही और दिल भी खफा हुआ। वो भी खफा थे। खैर फिर हम एबटाबाद से निकलकर हवेलियन पहुँच गए। हवेलियन एबटाबाद का ही हिस्सा है लेकिन एबटाबाद सिटी से ग्यारह किलोमीटर दूर है।

हम डेढ़ बजे हवेलियन रेलवे स्टेशन पर पहुँच गए। लेकिन आप लोगों को तो पता ही है कि पाकिस्तान रेलवे तो तबाह हो चुका है। ना टाइम पर आती है और ना चलती है और ना पहुँचाती है। कभी इंजन खराब तो कभी क्या। खैर जाहिर है पाकिस्तान रेलवे थी तो दो घंटे लेट के बाद चार बजे हवेलियन से चली। हम अपनी सीट पर चले गए।

पाकिस्तान रेलवे में लोगों की सहूलत के लिए अब ये है कि एक बड़ी वाली सीट पर सिर्फ तीन लोग ही बैठते हैं और तीनों के पास बर्थ भी होती है। एक बंदा नीचे वाली लंबी सीट पर सो जाता है। दूसरा उससे ऊपर जो नई बर्थ लगाई गई है उस पर सो जाता है और तीसरा सबसे ऊपर वाली पुरानी बर्थ पर सो जाता है। हमारी भी ऐसी ही सीट थी। हमारे सामने वाली सीट पर हमारे रिश्तेदार थे और बाकी रिश्तेदार उसी डिब्बे में थे लेकिन दूर बैठे हुए थे।

चार बजे ट्रेन चल पड़ी और आहिस्ता-आहिस्ता अपना सफर तय करने लगी। हम सारे बहुत एन्जॉय कर रहे थे। खास तौर पर मैं। क्योंकि ये मेरा पहला रेलवे का सफर था। तकरीबन तीन घंटे के सफर के बाद ट्रेन रावलपिंडी स्टेशन पहुँच गई। मतलब शाम को सात बजे वहाँ पहुँची। हमारी सीट के पीछे जो बड़ी सीट थी वो खाली थी। ये तो सब रेलवे में सफर करने वालों को पता है कि एक बड़ी सीट के पीछे जो दूसरी सीट होती है वो हर जगह से एक दूसरे के साथ जुड़ी होती है ऊपर तक। और सिर्फ एक डंडे का फर्क होता है।

रावलपिंडी में एक अननोन फैमिली आई और उस सीट यानी हमारी सीट के पीछे वाली सीट पर आकर बैठ गई। उस फैमिली में एक औरत थी और एक उसका बेटा और एक भतीजा था। उस औरत का बेटा और भतीजा बहुत प्यारे थे। खास तौर पर उसका भतीजा बहुत ही खूबसूरत था। उसने ब्लू शर्ट और ब्लैक पैंट पहनी हुई थी। उसकी उम्र तेईस चौबीस थी। मैंने ब्लैक शलवार कमीज पहनी हुई थी और बहुत प्यारी लग रही थी। क्योंकि मेरा कलर सफेद है तो ब्लैक कलर सफेद पर बहुत प्यारा लगता है। और मैं तो उस दिन फुल तैयार भी हुई थी।

जो लड़का उस औरत का बेटा था उसका नाम हसीब था और जो उसका कजिन था उसका नाम वजाहत था। जब वो रावलपिंडी स्टेशन से ट्रेन में आए सामान लेकर तो उस वक्त भी हमारी सीट के पास से गुजरकर अंदर आए। क्योंकि हमारी सीट दरवाजे के करीब थी और उन्हें वहाँ से गुजरकर ही अंदर जाना पड़ता था। खैर वो एक दो दफा अंदर बाहर आए तो मैंने उन्हें देखा एक दो दफा और अपनी फैमिली के साथ बिजी हो गई। उन्होंने भी मुझे देखा और कुछ रिएक्ट नहीं किया और अपने काम से काम रखा।

फिर वो अपनी सीट पर जाकर बैठ गए और साढ़े सात पर ट्रेन रावलपिंडी स्टेशन से निकल पड़ी। थोड़ी देर ट्रेन चली तो वो दोनों उठ गए और ट्रेन के गेट पर जाकर खड़े हो गए जो मेरी सीट के सामने था। वो एक दूसरे से गप्पें लगाते और गेट के बाहर देखते। जैसा कि अक्सर ट्रेन में लड़के करते हैं। मैं भी अपने खयालों में घूम थी और फैमिली से बातें कर रही थी। एक दो दफा उन पर नजर पड़ी और फिर अपने खयालों में खो गई। उन दोनों ने भी मुझे देखा और अपनी बातों में लग गए।

फिर मैंने उन्हें देखा तो वजाहत ने भी उसी वक्त मुझे देखा। मैं एकदम दूसरी तरफ देखने लगी। फिर जब दोबारा मेरी नजर पड़ी तो वजाहत ने भी उसी वक्त मुझे देखा तो मैंने एकदम सर नीचे कर लिया। वजाहत खूबसूरत भी था तो उसे कुछ शक हुआ कि मैं बार-बार उसे देख रही हूँ। हालाँकि ऐसा नहीं था। खैर अब वजाहत ने मुझ पर नजर टिका ही ली। वो वहाँ खड़ा होकर मुझे देखता रहा। जब भी मैं ऊपर सर करती और उस तरफ देखती वो मुझे ही देख रहा होता। मुझे शर्म सी आने लगी और घबराहट भी होने लगी कि ये क्या कर रहा है। मैं फिर नजर दूसरी तरफ कर लेती। हसीब भी वहाँ खड़ा था लेकिन वो अपने ही खयालों में था। लेकिन वजाहत तो मुझे ही देखे जा रहा था। और जब मैं देखती तो मुस्कुरा जाता। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मैं बहुत कन्फ्यूज हो रही थी।

खैर उसने फिर हसीब को कुछ कहा तो हसीब भी मेरी तरफ मुड़ा और फिर उसकी तरफ मुड़कर उसे मना किया कि ऐसा ना करो। उसके मना करने पर वजाहत ने मुझे देखना छोड़ दिया। मुझे भी थोड़ा सुकून मिला। फिर थोड़ी देर बाद वो वहाँ से वापस अपनी सीट की तरफ आए तो मेरे पास से गुजरते वक्त फिर वजाहत ने मुझे देखा और मुस्कुराकर चला गया और अपनी सीट पर पहुँच गया। खैर फिर सब कुछ नार्मल हो गया।

रात के नौ बज चुके थे और हमने खाना खाया और गप्पें लगा रहे थे। मैं साथ-साथ बुक भी पढ़ रही और घर वालों को मैसेज भी कर रही थी। आहिस्ता-आहिस्ता सारे लोग सोने लगे। हमारे रिश्तेदार भी सो गए अपनी-अपनी बर्थों पर। तकरीबन दस बजे अम्मी ने कहा कि हिरा अब उठो और सो जाओ। मुझे भी नींद आ रही है। मैंने कहा कि ओके आप कहाँ सोएंगी। तो अम्मी ने कहा कि मैं नीचे वाली सीट पर ही सोती हूँ। माइरा और हानिया को मुझसे ऊपर वाली दूसरी बर्थ पर सुला दो और तुम सबसे ऊपर तीसरी वाली बर्थ पर चली जाओ। मैंने ऐसा ही किया और मैं मोबाइल लेकर ऊपर वाली बर्थ पर चली गई।

तकरीबन ग्यारह बज गए और मैं मोबाइल यूज करती रही। सारी ट्रेन सो गई थी और लाइट्स भी आधी बंद थीं। जो चल रही थीं वो हमसे दूर ही थीं। खैर मैसेज और मोबाइल यूज करते-करते मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब सो गई। मैं थकी हुई थी तो बहुत गहरी नींद सो गई।

रात को एक बजे के करीब मुझे अपने बूब्स पर किसी का हाथ फील हुआ। मेरी आँखें खुलीं तो देखा कि मेरी बर्थ के साथ अटैच्ड ऊपर वाली बर्थ पर वजाहत मौजूद था जो कि लेटा हुआ था लेकिन उसने अपना हाथ मेरी कमीज के अंदर डाला हुआ था और मेरे ब्रेज़ियर को हटाकर मेरे बूब्स को मसल रहा था और रगड़ रहा था। मेरी तो जान ही निकल गई। मेरे पसीने छूटने लगे। मैं बहुत डर गई थी। इतना कि मुझसे साँस नहीं ली जा रही थी।

मेरे सोने के दौरान वजाहत ऊपर आ गया था। और मेरी बर्थ के साथ जुड़ी बर्थ पर लेट गया। ऊपर वाली बर्थें बिल्कुल एक दूसरे के साथ जुड़ी होती हैं। बीच में सिर्फ दो तीन इंच का फासला होता है। खैर कहानी की तरफ आती हूँ। मेरी तो हालत बिगड़ रही थी। मेरी आँखें बंद थीं और वजाहत मेरे बूब्स को जोर-जोर से दबा रहा था। मैं शर्म के मारे बोल भी नहीं पा रही। वो काफी देर मेरे बूब्स को दबाता और मेरी खींचता रहा। मुझे डर लग रहा था लेकिन मजा भी आता जा रहा था।

खैर काफी देर ये करने के बाद वजाहत मेरी शलवार की तरफ आया और मेरी शलवार को थोड़ा सा नीचे कर मेरी चूत पर हाथ फेरने लगा। मेरी तो हालत खराब हो गई। मेरा दिल कर रहा था कि उठकर उसे एक मारूँ और उसके दाँत तोड़ दूँ। लेकिन इज्जत और लोगों की वजह से बोल नहीं पा रही थी। फिर उसने अपनी उंगली पर थूक लगाया और मेरी चूत के ऊपर रगड़ने लगा। फिर उसने आहिस्ता से अपनी उंगली अंदर डाली तो मैं उछल गई। मुझे कुछ हो रहा था लेकिन मैं फिर भी सोने की एक्टिंग कर रही थी कि जैसे मुझे पता ही नहीं है। वो आहिस्ता-आहिस्ता अपनी उंगली मेरी चूत के अंदर बाहर करने लगा। मुझे भी मजा आ रहा था लेकिन मैं कुछ नहीं कर पा रही थी।

वजाहत बहुत रोमांटिक अंदाज में मेरे बूब्स को प्रेस कर रहा था और मेरी चूत में उंगली डाल रहा। बहुत सॉफ्टली और बहुत ही प्यार से। मुझे ऐसा मजा पहले महसूस नहीं हुआ था। वजाहत लड़की को सैटिस्फाइड करने की सलाहियत रखता था। वो काफी देर तक उंगली मेरी चूत के अंदर बाहर करता रहा। मुझे पसीना आ रहा था और मेरी साँसें तेज हो रही थीं। उसे शक हो गया था कि मैं जाग रही हूँ। खैर वजाहत कुछ ना बोला और मेरी चूत में उंगली अंदर बाहर करने लगा। मेरे पसीने निकल रहे थे और मैं मजे से पागल हो रही थी। वजाहत एक हाथ से मेरी चूत में उंगली डाल रहा था और दूसरे से मेरे बूब्स दबा रहा था। मैं तो हवाओं में उड़ रही थी। अजीब सी फीलिंग थी मेरी। डर भी लग रहा था, गुस्सा भी आ रहा था और मजा भी आ रहा था।

वजाहत अब तेज-तेज मेरी चूत में उंगली अंदर बाहर कर रहा था। इतना कि मेरी साँसें बहुत तेज हो रही थीं। फिर अचानक मुझे लगा कि मेरी चूत से पानी निकलने लगा है। मैं मजे से पागल हो रही थी। एकदम मेरी चूत से गर्म पानी निकलने लगा और मेरी शलवार को गीला करने लगा। और साथ ही वजाहत के हाथ को। मैं तो उछल ही पड़ी और मेरे मुँह से आह्ह की छोटी सी आवाज निकली जो कि ट्रेन के शोर में लुप्त हो गई। खैर मेरी शलवार और उसका हाथ गीला हो चुका था। मैं खामोश सोने की एक्टिंग करती रही लेकिन वजाहत को यकीन हो गया था कि मैं जाग रही हूँ।

उसने फिर अपनी उंगली मेरी शलवार से निकाली और उसके हाथ पर लगा जो मेरा पानी था उसे मेरे होंठ और चेहरे पर लगाने लगा और मेरे करीब होकर बोला कि क्यूँ जी मैडम मजा आया। मैं कुछ ना बोली तो वो बोला कि मैडम मुझे पता है कि तुम जाग रही हो और तुमने एन्जॉय किया है। अब मुझे भी एन्जॉय करवाओ ना। ये कहकर वो थोड़ा मेरी तरफ आगे हुआ और मेरे होंठों पर किसिंग करने लगा। वो फिर मेरे पूरे फेस पर किसिंग करने लगा। मैं उसी तरह सोने की एक्टिंग करती रही। फिर वो मेरी कमीज को ऊपर कर के मेरे बूब्स को प्यार से दबाने और उन पर हाथ फेरने लगा। फिर उसने मेरे ब्रेज़ियर को ऊपर किया और आगे हो कर मेरे लेफ्ट निप्पल को मुँह में डाल कर बड़े ही प्यारे अंदाज में चूसने लगा। मुझे बहुत मजा आ रहा था। उसने थोड़ी देर ही ऐसा किया और फिर पीछे हट गया क्योंकि वहाँ लोग भी तो थे। किसी की नजर पड़ जाती तो मसला बन जाता।

खैर वो दोबारा मेरे बूब्स को दबाने लगा और साथ ही अपनी पैंट की जिप को नीचे कर के अपने लंड को बाहर निकाल लिया और उस पर थूक लगा कर उसे मलने लगा और तेज-तेज मस्टर्बेटिंग करने लगा। वो कभी मेरे फेस पर उठ कर किसिंग करता, कभी मेरे बूब्स प्रेस करता और कभी मौका मिलने पर मेरे बूब्स के निप्पल्स को मुँह में डाल कर चूसता। साथ-साथ वो अपने लंड पर भी जोर-जोर से हाथ मार कर मस्टर्बेटिंग कर रहा था। अब उसकी साँसें तेज हो रही थीं और वो अब तेज-तेज मेरे बूब्स को प्रेस कर रहा था। मुझे बहुत मजा आ रहा था। थोड़ी देर बाद वो और तेजी से मेरे बूब्स को मसलने लगा और उसकी साँसें और तेज होने लगीं। और उसकी आहिस्ता-आहिस्ता आह्ह की आवाजें आने लगीं। उसने फिर दम मेरे बूब्स को छोड़ा और पीछे हट गया और उठ कर बैठ गया। और अपना लंड मेरे मुँह के ऊपर ले आया। मुझे उस वक्त पता चला जब मेरे चेहरे पर गर्म पानी गिरता हुआ मुझे महसूस हुआ। मैं एकदम कॉनक गई और अचानक थोड़ी सी आँखें खोलीं तो देखा कि उसका लंड मेरे मुँह के ऊपर था उसके लंड से सफेद गाढ़ा पानी निकल रहा था। मेरी तो हालत खराब हो गई और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था। दिल कर रहा था कि उठ कर उसे मारूँ लेकिन फिर इज्जत की वजह से चुप रही। उसका पानी मेरे चेहरे पर गिर गया था और वो अपनी बर्थ पर लेट गया। उसका सारा पानी मेरे चेहरे पर था। मैं शर्म के मारे उसे साफ भी नहीं कर पा रही थी क्योंकि ऐसा करने से उसे यकीन हो जाता कि मैं जाग रही हूँ और सब कुछ देख रही हूँ। ये मुझे लग रहा था लेकिन हकीकत ये थी कि वजाहत को पता था कि मैं जाग रही हूँ।

खैर वो थोड़ी देर लेटा और फिर उठा और इधर उधर देखने के बाद मेरी तरफ आया और बोला कि थैंक्स जी, मुझे बहुत मजा आया। आई होप कि आपको भी आया होगा। और हाँ सॉरी जी मैंने आपका चेहरा खराब कर दिया। चलो मैं साफ भी कर देता हूँ। ये कहकर उसने टिश्यू पेपर लिया और मेरे पूरे चेहरे को टिश्यू पेपर से साफ करने लगा और थोड़ी देर तक मेरा सारा फेस साफ कर दिया। फिर बोला कि ये लें मैडम, मैंने आपका चेहरा गंदा किया था और मैंने ही साफ कर दिया, वैसे आप बहुत ही खूबसूरत हैं और बहुत ही सेक्सी भी। मुझे बहुत मजा आया। ये कहकर वो पीछे हो गया और अपनी बर्थ पर सो गया। मैं भी आराम से सो गई।

फिर रात को तीन के करीब मुझे फिर अपने बूब्स पर उसका हाथ फील हुआ। मेरी आँख खुल गई। वो दोबारा मेरे बूब्स को प्रेस कर रहा था और साथ ही मुझे चूम रहा था। मुझे मजा आ रहा था। फिर उसने दोबारा मेरी शलवार को नीचे किया और मेरी चूत में उंगली मारने लगा। मैं फिर मजे से पागल होने लगी। वो बहुत ही रोमांटिक अंदाज में मेरी चूत में उंगली मार रहा था और मेरे बूब्स को भी टच कर रहा था। मैं तो मजे से पागल हो गई थी। काफी देर जब वो उंगली मारता रहा तो मैं बहुत ही ज्यादा हॉर्नी हो गई। मेरी साँसें बहुत तेज हो चुकी थीं और मेरा दिल कर रहा था अभी उठूँ और उसके लंड पकड़ कर अपनी चूत में डाल दूँ। मेरी हालत बहुत पागलों जैसी हो चुकी थी। मैं सेक्स की इंतिहा को पहुँच गई थी।

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⚠️ महत्वपूर्ण अस्वीकरण

ये सभी कहानियाँ केवल काल्पनिक हैं।
इनका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है।

सेक्स हमेशा सहमति पर आधारित होना चाहिए।
बिना सहमति के कोई भी कार्य गलत और दंडनीय है।

इन कहानियों से प्रेरित न हों।
बस पढ़ें, आनंद लें और भूल जाएं।