Summer vacation chudai sex story, Papa ke office junior sex story: मैं गर्मी की छुट्टियों में रतलाम आ गई थी अपने पापा के पास। घर में छुट्टियों में बहुत पाबन्दी रहती थी ना लेकिन इस बार पापा सुबह जल्दी ऑफिस चले जाते थे और शाम को बहुत देर से लौटते थे इसलिए मैं पूरे दिन घर पर बिल्कुल अकेली रहकर बिना किसी रुकावट या डांट के अपनी मर्जी से सब कुछ कर पाती थी और यह स्वतंत्रता मुझे बहुत पसंद आती थी। पापा तो ऑफिस चले जाते थे सो आराम से घर पर आराम करती रहती थी जहां मैं पूरे घर की खामोशी का मजा लेती थी। घर में अकेले रहने में बड़ा आनन्द आता है। एक तो खाली दिमाग शैतान का घर होता है दूसरे यह कि आपको कुछ भी करने से कोई रोकने टोकने वाला नहीं होता है जिससे मैं बिस्तर पर लेटकर बिना किसी शर्म या डर के अपने शरीर को पूरी तरह महसूस कर पाती थी। बिस्तर पर लेटे लेटे एक से एक मनभावन ख्याल आते रहते हैं जहां मेरा मन दूर कहीं सपनों में खो जाता है और शरीर में एक गर्म लहर सी दौड़ने लगती है।
कई ऐसे लड़कों की तस्वीरें मन में उभर आती हैं जिनके साथ मैं वासना का खेल अन्तरंग अवस्था में खेला करती थी जहां हम दोनों पूरी तरह नंगे होकर एक दूसरे के शरीर को छूते सहलाते चूमते और चरम सुख तक पहुंचते थे। मुझे लगता था कि अब भी मेरे साथ वो मुझसे खेल रहे हैं मेरी नर्म नर्म छातियों में अपना मुख लगा कर मेर दूध पीने की कोशिश कर रहे हैं उनकी गर्म और नम जीभ मेरे उभरे हुए निप्पलों को चारों ओर घुमाती है उन्हें कसकर चूसती है और हल्का सा काटती भी है जिससे मेरी छातियां फूल जाती हैं सख्त हो जाती हैं और दूध जैसा मीठा तरल निकलने का एहसास होता है मेरे गुप्तांगों से खेल रहे हैं उनकी उंगलियां मेरी चूत की लेबिया को अलग करती हैं अंदर बाहर घुसती हैं और मेरी क्लिटोरिस को दबाती हैं जिससे मेरी सांसें तेज हो जाती हैं शरीर पसीने से भीगने लगता है और उत्तेजना की लहरें पूरे बदन में दौड़ने लगती हैं।
इसी ताने बाने में उलझ कर मैं अपनी दोनों टांगें ऊपर उठा लेती हूँ और उन्हें घुटनों से मोड़कर पूरी तरह चौड़ा फैला लेती हूँ फिर अपनी एक हाथ को धीरे से नीचे ले जाकर अपनी नर्म और गर्म हो चुकी फ़ुद्दी को सहलाने लगती हूँ मेरी उंगलियां पहले बाहरी नर्म लेबिया पर हल्के हल्के घूमती हैं फिर उन्हें धीरे से अलग करती हैं और अंदर की गर्म नम सतह को छूती हैं शेविंग के कारण मेरी झांट के बाल भी अब कड़े और कांटो की तरह निकल आते हैं पर ये हाथ से सहलाने पर बहुत गुदगुदी करते हैं जिससे मेरा पूरा शरीर सिहर उठता है जितना भी मैं अधिक सहलाती मेरी उत्तेजना और भी बढ़ती जाती मेरी चूत गीली होने लगती थी चिकनाई उभर आती और मेरी उंगलियां उस चिकनाई से पूरी तरह लथपथ हो जाती हैं उसी चिकनाई का सहारा लेकर मैं अपनी गाण्ड का फ़ूल भी चिकना कर के उसे धीरे धीरे रगड़ती जहां मेरी उंगली पहले गुदा के बाहरी किनारे पर घूमती है फिर हल्का दबाव देकर अंदर की ओर बढ़ती है तंग छेद को थोड़ा फैलाती है और अंदर बाहर करने लगती है जिससे मेरा गुदा सिकुड़ता फैलता है शरीर में तीव्र आनंद की लहरें दौड़ने लगती हैं और मेरी सांसें भारी हो जाती हैं।
मेरी पाठक सहेलियो आपने भी कभी ऐसा करके देखा है जरूर किया होगा ऐसा करने से जो मजा आता है वो अविस्मरणीय है इस चिकनाहट का सहारा लेकर आप अपने इस छेद में अंगुली भी डाल सकती हैं। अब ऐसे माहौल में कोई आ जाये तो … आह ! क्या कहने … मैं तो बिना चुदे नहीं रह सकती … जवानी का रस निकाले बिन मजा ही नहीं आयेगा। मजा तो तब और भी ज्यादा हो जाता है जब चोदने वाला आपका ही मन पसन्द साथी हो … कड़क, मोटे लण्ड वाला … है ना !
घर में मैं अकसर एक हल्का रंग बिरंगा पजामा पहनती हूँ जो बहुत पतला और मुलायम कपड़े का होता है और नीचे से पूरी तरह पारदर्शी नहीं पर हल्की रोशनी में सब कुछ साफ़ दिख जाता है साथ ही एक टाईट बनियान पहनती हूँ जो मेरी छातियों को इतनी कसकर दबाती है कि मेरे निप्पल साफ़ उभर आते हैं और बनियान के ऊपर से ही उनके आकार और सख्ती का पता चल जाता है। अन्दर तो कुछ पहनने का सवाल ही नहीं है जिससे मेरी चूत और गुदा बिल्कुल खुली और हवा के संपर्क में रहती है और थोड़ा भी हिलने डुलने पर पजामा मेरे गुप्तांगों पर रगड़ खाता है जिससे हल्की सी उत्तेजना बनी रहती है। मेरी इसी अवस्था में एक दिन पापा का एक जूनियर घर पर आ गया। मैं उसे पहचान गई !
ओह ये तो रवि है …पर क्या करूँ ? यह तो साला तो मुझसे बात ही नहीं करता है बात करो तो पसीना पसीना हो जाता है उसकी शर्मीली आदत मुझे पहले से पता थी पर आज मुझे उसकी यह शर्म बहुत आकर्षक लग रही थी। पर वो है बहुत सुन्दर मस्त सा लड़का है चौड़ी कंधे मजबूत सीना पतली कमर और उसकी आँखें इतनी गहरी कि उनमें डूब जाने का मन करता है मुझे जाने क्यूँ उसमें बहुत आकर्षण नजर आता है शायद उसकी मासूमियत और उसकी छुपी हुई कामुकता का मिश्रण। मैंने उसे प्यार से बैठक में बैठाया मेरी आवाज़ में थोड़ी मिठास और थोड़ी शरारत थी।
“मुझे वर्मा जी से मिलना है अभी तक वो ऑफ़िस नहीं पहुँचे हैं !” वो कुछ सकुचा कर बोला उसकी आवाज़ में हल्की कंपकंपी थी और उसकी नजर तो मेरी तरफ़ उठ ही नहीं रही थी वो बार बार फर्श की तरफ़ देख रहा था पर उसकी आँखें चुपके चुपके मेरे शरीर पर फिसल रही थीं।
“हां जी वो देरी से निकले हैं फिर उन्हें रास्ते में काम भी है पहुँचते ही होंगे चाय तो ले लेंगे आप।” मैंने उसकी हिचक दूर करने में उसकी सहायता की अपनी मुस्कान से उसे थोड़ा सहज करने की कोशिश की।
वो ना नुकुर करता रहा बार बार कहता रहा “नहीं दीदी रहने दीजिए” पर मैंने उसे जिद करके बैठा ही लिया अपनी जिद में थोड़ी नखरेबाजी और थोड़ी मासूमियत डालकर। किचन में से रवि साफ़ नजर आ रहा था क्योंकि बैठक और किचन के बीच सिर्फ़ एक छोटा सा काउंटर था और मैं जानबूझकर ऐसे काम करती रही जिससे मेरा शरीर उसकी नजरों में आए। मेरा पजामा मेरे चूतड़ों में घुसा हुआ था कपड़ा इतना पतला कि मेरे गोल गोल नितंबों का पूरा आकार साफ़ उभर रहा था और बीच में गहराई वाली लकीर साफ़ दिख रही थी जैसे कोई गहरा दरार हो। जब मैं झुकती थी चाय की ट्रे तैयार करने के लिए तो मेरे चूतड़ ऊपर की तरफ़ उठ जाते थे और पजामा और भी गहराई में धंस जाता था जिससे मेरे नितंबों की पूरी गोलाई और बीच की गहरी दरार साफ़ नजर आ रही थी शायद उसकी नजर वहाँ टिक गई थी।
दूर से ही मैंने भांप लिया कि उसकी नजरें मेरे शरीर का ही मुआयना कर रही थीं वो चुपके से मेरी छातियों पर देखता था जहाँ बनियान के ऊपर से मेरे निप्पल सख्त होकर उभरे हुए थे फिर मेरी कमर पर मेरे नितंबों पर और जब मैं मुड़कर कुछ लेने जाती तो मेरी कमर की मटक और नितंबों की हल्की सी लहर उसे और उत्तेजित कर रही थी। उसकी दिलचस्पी मुझमें हो चली थी उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं और वो बार बार अपनी जीभ से होंठ गीले कर रहा था। फिर तो मैंने उससे पन्द्रह मिनट में ही दोस्ती कर ली थोड़ी हँसी मजाक थोड़ी शरारत भरी बातें और थोड़ी खुली नजरों से देखना जिससे उसकी शर्म धीरे धीरे कम हो गई और वो भी मुझसे आँख मिलाने लगा।
अब उसकी झिझक खुल चुकी थी। उसका कहना था कि वह लड़कियों से बात करने में शरमाता है। मैंने उसे फिर समय काटने के लिहाज से अपने पास बुलाया और सोफे पर उसके ठीक बगल में बैठकर अपना एलबम खोला। मैंने धीरे-धीरे पन्ने पलटने शुरू किए, ताकि उसका ध्यान मेरी ओर रहे। मेरी बांह उसकी बांह से हल्के से छू रही थी, और मेरी देह की गर्माहट उसे साफ महसूस हो रही थी। उसे मेरा यह सामीप्य बहुत अच्छा लग रहा था; मैं देख सकती थी कि उसकी सांसें थोड़ी तेज और गहरी हो गई थीं। फिर मैंने उसकी मनःस्थिति का अंदाजा लगाकर, नरमी से उसे जाने के लिए कहा। लेकिन उसका मन बिल्कुल भी जाने का नहीं हो रहा था।
“रवि जी, आप आते रहिएगा, आपका व्यवहार मुझे बहुत अच्छा लगा।” मैंने अपनी आवाज में हल्की मिठास घोलते हुए कहा और थोड़ा आगे की ओर झुककर उसकी ओर अपना झुकाव दर्शाया, जिससे मेरी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया और मेरी छाती का ऊपरी हिस्सा और स्पष्ट हो गया।
“जी जरूर, समय निकालकर जरूर आऊंगा…” वह बोलते हुए बार-बार मुड़कर मुझे देखता रहा। मैं खिड़की के पास खड़ी होकर उसे हाथ हिलाती रही, जब तक उसकी पीठ नजरों से ओझल नहीं हो गई।
वह अगले दिन पापा के ऑफिस जाते ही आ गया। दरवाजे पर खड़े होकर उसने पूछा, “वर्मा जी हैं क्या?”
“जी नहीं, मिस वर्मा है… मिलना हो तो और चाय पीना हो तो मिस वर्मा हाजिर है।” मैंने मुस्कुराते हुए, आंखों में शरारत भरे अंदाज से कहा।
वह हंसता हुआ अंदर आ गया। बातों-बातों में उसने खुलासा कर दिया कि उसे पहले से ही पता था कि मेरे पापा को उसने जाते हुए देख लिया था और वह सिर्फ मुझसे मिलने ही आया था।
“तो रवि जी, तो फिर रोज ऐसे ही पापा के जाने के बाद आ जाया करो, खूब बातें करेंगे।” मैंने उसे और प्रोत्साहित करते हुए कहा, अपनी आवाज को और भी कोमल और आमंत्रित करने वाली बनाते हुए।
आज मैंने सिर्फ एक पतला सूती कुर्ता पहन रखा था, नीचे सलवार नहीं थी। कुर्ते का कपड़ा इतना पतला और ढीला था कि मेरे नंगे स्तनों की आकृति साफ नजर आ रही थी। हर सांस के साथ मेरी चूचियां कुर्ते के अंदर हिल-हिलकर ऊपर-नीचे हो रही थीं, और निप्पल्स कपड़े पर उभरकर सख्त बिंदु की तरह दिख रहे थे। वह बार-बार नजरें नीचे कर रहा था, और उसकी आंखों में भूख साफ झलक रही थी।
मैंने फिर से एक मैगजीन उठाई और उसके ठीक बगल में, इतने पास बैठ गई कि मेरी जांघ उसकी जांघ से सटी हुई थी। मैं पन्ने पलट रही थी, लेकिन उसका ध्यान मैगजीन पर नहीं, बल्कि मेरे कुर्ते के गले से झांकते हुए मेरे गहरे दरार वाले स्तनों पर टिका हुआ था। उसके होंठ सूख रहे थे, और वह बार-बार जीभ से उन्हें गीला कर रहा था।
कहीं निगाहें कहीं निशाना… और नतीजा सामने था। उसके पैंट के बीचों-बीच एक मोटी, सख्त उभार तेजी से उभर रहा था। लंड इतना कड़ा हो चुका था कि पैंट का कपड़ा तनकर चमक रहा था, और उसकी पूरी आकृति साफ दिख रही थी — मोटा सिर, उभरी हुई नसें, सब कुछ।
मैं समझ गई कि अब वह मेरे इतने करीब होने से पूरी तरह उत्तेजित हो चुका है। जैसे ही मैंने अपना चेहरा ऊपर उठाया, उसका चेहरा मेरे चेहरे से बस एक-दो इंच की दूरी पर था। मेरी सांसें रुक-सी गईं। उसकी आंखें मेरी आंखों में गहरे उतर रही थीं, जैसे कुछ ढूंढ रही हों। मेरे हाथों से मैगजीन फिसलकर नीचे गिर गई। मेरे हाथ थरथराने लगे। मेरे माथे और गालों पर पसीने की बूंदें छूटने लगीं। वह मुझे एकटक देखता हुआ और भी पास आ गया, इतना पास कि उसकी गरम, तेज सांसें मेरे होंठों से टकरा रही थीं।
“र…र… रवि…” मैं सच में इस अचानक हुए हमले से बेचैन और कंपकंपी हो गई थी।
“हां नेहा… तुम कितनी सुंदर हो…” उसने मेरे हाथ को अपनी दोनों हथेलियों में कसकर पकड़ते हुए कहा, उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों में फंस गईं।
“रवि, ऐसा मत बोलो…” मैं उसकी आंखों में देखती हुई बोली, लेकिन मेरी आवाज कांप रही थी।
“नेहाऽऽऽऽ…” उसके होंठ धीरे-धीरे मेरे होंठों के इतने करीब आ गए कि पहले तो बस हल्का-सा स्पर्श हुआ, जैसे बिजली का झटका। फिर उसने अपने नरम, गर्म अधर मेरे अधरों पर पूरी तरह रख दिए और धीरे-धीरे चूसने लगा। पहले तो सिर्फ होंठों का दबाव, फिर उसने मेरे निचले होंठ को अपनी जीभ से सहलाया, फिर धीरे से चूसा। मुझे पूरे शरीर में बिजलियां दौड़ गईं। मेरी सांसें तेज हो गईं। मैंने भी अपने होंठों को थोड़ा खोला, और उसकी जीभ मेरे मुंह में प्रवेश कर गई। हम दोनों की जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं, चाटने-चूसने की मधुर आवाज कमरे में गूंजने लगी। मुझे बहुत गहरा सुकून मिल रहा था। मैंने अपने आप को उसके हवाले कर दिया।
उसने मौका देखते ही मुझे और गहराई से चूमना शुरू किया। उसकी जीभ मेरे मुंह के हर कोने को छू रही थी, मेरे दांतों को सहला रही थी। मैं भी उसकी जीभ को अपनी जीभ से लपेट रही थी। हम दोनों के मुंह से लार की मधुर आवाजें निकल रही थीं। तभी उसने एक हाथ मेरी कमर पर रखा और मुझे और पास खींच लिया। मेरा कुर्ता नीचे से ऊपर सरक गया। मेरी चिकनी, मांसल जांघें पूरी तरह खुल गईं। उसकी उंगलियां मेरी जांघों पर फिसलने लगीं, धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ती हुईं।
उसका लंड अब इतना सख्त और बड़ा हो चुका था कि पैंट का कपड़ा फटने की कगार पर था। मैंने भी उसे अपनी दोनों बाहों में कसकर समेट लिया। मैंने अपने कठोर, भरे हुए स्तनों को उसके चौड़ी छाती से जोर-जोर से दबाकर रगड़ना शुरू किया। मेरे निप्पल्स इतने सख्त और उभरे हुए थे कि वे उसके शर्ट के कपड़े में कील की तरह चुभ रहे थे। हर रगड़ के साथ मेरे स्तन और भी उत्तेजित हो रहे थे, और मेरी सांसें तेज-तेज चल रही थीं।
उसके हाथ मेरी पीठ को दबाने और मसलने लगे थे। उसकी हथेलियाँ मेरी नंगी पीठ की मुलायम त्वचा पर जोर-जोर से दबाव डाल रही थीं, उँगलियाँ मेरी रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ नीचे की ओर सरक रही थीं, फिर ऊपर उठकर मेरी कंधों को मसल रही थीं। हर दबाव के साथ मेरी त्वचा पर गर्मी फैल रही थी और मेरी साँसें और तेज़ हो गई थीं। मुझे उठा कर वो अपने लण्ड पर बैठाने की कोशिश कर रहा था। उसकी दोनों बाँहें मेरी कमर के चारों ओर कसकर लिपटी हुई थीं, वो मुझे ऊपर उठाने के लिए अपनी जाँघों पर जोर लगा रहा था, जबकि उसका सख्त, गरम लण्ड मेरी जाँघों के बीच दबाव डाल रहा था, मेरी चूत की गीली त्वचा को छूकर उसमें हल्की सी कंपन पैदा कर रहा था।
तब मैंने उसकी तड़प को और बढ़ा दिया। मैंने अपना हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाकर उसके सख्त लण्ड पर रख दिया और धीरे-धीरे उसे दबाने लगी। मेरी उँगलियाँ उसके मोटे, नसों से भरे लण्ड की गरम, चिकनी त्वचा को महसूस कर रही थीं। मैंने अपनी हथेली से उसे चारों ओर से जकड़ लिया, फिर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे सरकाने लगी, हर बार सुपाड़े के पास जाकर हल्का सा दबाव डालकर उसे और सख्त करने की कोशिश करती हुई। मुझे लण्ड दबाते देख कर उसने मेरी छाती पर हाथ डाल दिया और मेरे कठोर उरोजों को दबाने लगा। उसकी उँगलियाँ मेरे दोनों स्तनों को नीचे से ऊपर की ओर उठाकर मसल रही थीं, निप्पल्स को अँगूठे और तर्जनी से पकड़कर हल्का सा मरोड़ रही थीं। मेरे निप्पल्स पहले से ही कड़े हो चुके थे, हर मरोड़ के साथ बिजली-सी कौंध रही थी और मेरी साँसें रुक-रुक कर आने लगी थीं। मेरी मन की कली खिल उठी। मैं अपना आपा खोने लगी। मैंने जान-बूझकर अपने कुर्ते को और ऊपर कर लिया, ताकि मेरी पूरी छाती और पेट उसकी नज़रों के सामने आ जाए।
“रवि, बस अब नहीं… मैं मर जाऊँगी!” मेरी साँस धौंकनी के समान चल रही थी। मेरी आवाज़ काँप रही थी, गले से निकलते शब्द हाँफते हुए बाहर आ रहे थे। मैं उसके चेहरे पर आते-जाते भावों को देखने लगी। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं, पुतलियाँ फैली हुई थीं, होंठ काँप रहे थे, माथे पर पसीने की बूँदें लुढ़क रही थीं। वो बहुत ही बेताब हो रहा था।
“और मैं! मेरा तो बुरा हाल हो रहा है, अब क्या करूँ?” वो पसीने में नहा चुका था, उसके दिल की धड़कन मेरे कानों तक सुनाई दे रही थी। उसकी छाती तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे हो रही थी, हर साँस के साथ उसकी पसलियाँ साफ़ दिखाई दे रही थीं।
“कुछ नहीं, बस अब तुम जाओ!” मैंने उसे और अधीर करते हुए धकेला। मेरे दोनों हाथ उसकी छाती पर थे, पर वो धक्का इतना कमज़ोर था कि वो और मेरे करीब आ गया।
“नेहा! ऐसा मत कहो… तुम्हारे बिना मैं मर जाऊँगा!” वो मुझसे और लिपटने लगा। उसकी बाँहें मेरी कमर से होकर मेरी नितंबों तक पहुँच गई थीं, उँगलियाँ मेरी नितंबों की गहराई में धँस रही थीं।
“ओह! मरना ही है तो यहाँ नहीं, अन्दर बिस्तर पर चलो!” अब मुझे पता था कि मेरी लाइन साफ़ है। अब तो बस चुदना ही है। उसे भी कहाँ अब चैन था। उसने तो मुझे जल्दी से अपनी बाँहों में उठा लिया और मेरा चेहरा चूमता हुआ बिस्तर पर ले चला। उसके होंठ मेरे गालों, माथे, नाक, होंठों पर बरस रहे थे, हर चुंबन गीला और गरम था। उसने मेरा कुर्ता खींच कर उतार दिया और मुझे पूरी नंगी कर दिया। मेरे स्तन हवा में उछलकर सामने आ गए, निप्पल्स और भी कड़े हो गए। मर्द के सामने नंगी होकर मुझे एक आलौकिक आनन्द सा आने लगा। मेरी त्वचा पर सिहरन दौड़ रही थी, चूत से रस और अधिक टपकने लगा था।
फिर उसने अपने कपड़े भी जल्दी से उतार दिए और नंगा हो गया। उसकी मांसल छाती, पेट की उभरी नसें, और बीच में खड़ा हुआ उसका लण्ड मेरी आँखों के सामने था। बहुत महीनों के बाद मैं चुदने वाली थी और लण्ड भी बहुत दिनों के बाद देखा था इसलिए चुपचाप मैं उसे निहारने लगी। एक मर्द का सुन्दर, सीधा, सख्त लण्ड, मोटा सुपाड़ा लाल-गुलाबी, नसें उभरी हुईं, मेरे दिल को घायल कर रहा था। बस बेचैनी चुदने की थी। वो बिस्तर पर जाकर सीधा लेट गया, उसका लण्ड हवा में सीधा तन्ना कर लहरा रहा था, हर धड़कन के साथ हल्का सा ऊपर-नीचे हो रहा था।
“आ जाओ नेहा, पहला मौका तुम्हारा! अब तुम जो चाहे वो करो।” उसने मुझे ऊपर आ कर चोदने का न्यौता दिया।
मुझे तो एक बार शरम सी आ गई। कैसे तो मैं उसके ऊपर चढ़ूँगी? फिर कैसे अपने शरीर को उसके ऊपर खोल कर लण्ड लूँगी! मुझे लगा कि यह बहुत अधिक बेशर्मी हो जाएगी। सारा शरीर, यानी कि मैं पूरी की पूरी ही अपने जिस्म को…
“रवि, मुझे शरम आती है, तुम ही कुछ करो ना!” मैंने शरमाते हुए कहा।
उसने मेरी एक न सुनी और मेरी बाँह पकड़कर मुझे प्यार से अपनी ओर खींचने लगा। मैं शर्माती सी अपने दोनों पाँव खोल कर उसके लण्ड पर बैठने लगी। मेरी जाँघें फैल गईं, चूत पूरी तरह खुलकर उसके सामने आ गई। वो मेरे पूरे नंगे शरीर को बेशर्मी से देखने लगा। उसकी नज़रें मेरे स्तनों से होती हुई मेरी कमर, नाभि, फिर मेरी चूत पर ठहर गईं। मैंने उसकी आँखों पर अपना कोमल हाथ रख दिया।
“मत देखो ऐसे… मैं तो मर जाऊँगी!” मेरे शरम से बोझिल आँखों को देख कर वो बहुत ही उत्तेजित होने लगा।
मैंने उसके ऊपर बैठ कर लण्ड पर अपनी चूत रख दी। उसका लाल सुपाड़ा मेरी गीली चूत पर आ टिका। मैंने धीरे से नीचे दबाव डाला, मेरी चूत की पतली सी पंखुड़ियाँ उसके सुपाड़े के चारों ओर फैल गईं। चूत की चिकनाई से सुपाड़ा फिसलता हुआ थोड़ा सा अन्दर घुस गया। मैंने अपनी कमर को और नीचे किया, उसका मोटा लण्ड मेरी चूत की दीवारों को दबाता हुआ और अन्दर सरकने लगा। जवान चूत थी, कड़क लण्ड था, दोनों का मिलन हो रहा था। मेरी चूत की अन्दरूनी परतें उसके लण्ड को कसकर जकड़ रही थीं। दोनों ने एक दूसरे का चुम्मा लिया, और वो चूत की चिकनाई से सरकता हुआ अन्दर की ओर बढ़ चला।
मेरे तन में एक मीठी सी ज्वाला जल उठी। तभी रवि का हाथ मेरी चूचियों पर आ चिपका। उसकी हथेली ने मेरे दाएँ स्तन को नीचे से ऊपर की ओर उठाकर कसकर दबाया, उँगलियाँ मेरे निप्पल के चारों ओर घूमकर उसे पकड़ लिया और हल्के-हल्के मरोड़ने लगीं। मेरे निप्पल पहले से ही कड़े और संवेदनशील हो चुके थे, हर मरोड़ के साथ मेरी रीढ़ में बिजली-सी दौड़ गई। मैं अपनी आँखें बंद करके उसके ऊपर पूरी तरह लेट गई। मेरे स्तन उसकी छाती से दब गए, मेरी निप्पल्स उसकी गरम त्वचा पर रगड़ खा रही थीं। उसने भी नीचे से अपनी कमर को जोर से उछाला और लण्ड को एक गहरे, तेज़ धक्के के साथ जड़ तक अन्दर धकेल दिया। उसका मोटा, सख्त लण्ड मेरी चूत की दीवारों को पूरी तरह फैलाते हुए मेरे गर्भाशय के मुहाने तक जा टकराया। गुदगुदी भरी मिठास के कारण मेरी पूरी देह सिहर उठी और मैं उससे और अधिक चिपकने लगी। मेरी बाहें उसकी पीठ पर कस गईं, मेरे नाखून उसकी त्वचा में हल्के से धँस गए।
“नेहा, अब कुछ करो तो… देखो, बहुत मजा आयेगा!” उसकी उतावली, काँपती आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही थी और मुझे भीतर तक तड़पा रही थी। उसकी साँसें मेरे गले पर गरम-गरम पड़ रही थीं।
“नहीं जी, मुझे तो बहुत शरम आयेगी।” मैंने अपनी सादगी उसे दिखाई, अपनी आवाज़ में जान-बूझकर थोड़ी सी मासूमियत घोलकर।
“सुनो, थोड़ा सा ऊपर उठा कर फिर से पटको।” उसने अपनी उत्तेजित, भारी आवाज़ में कहा। उसकी आँखें मेरी आँखों में ठहरी हुई थीं, पूरी तरह भूखी और बेसब्र।
“रवि, प्लीज… मैंने यह कभी किया नहीं है, बताओ तो कैसे?” मैंने उसे और तड़पाते हुए कहा, अपनी आवाज़ को और भी नरम और शरमाती बनाकर।
“बस, अपनी चूत को अन्दर बाहर करो।” उसने मेरी चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर सहलाते हुए कहा। उसकी उँगलियाँ मेरी नितंबों की मुलायम मांसलता में धँस रही थीं, हल्के-हल्के दबा रही थीं और मुझे ऊपर-नीचे करने में मदद कर रही थीं।
“धत्त,… ऐसे क्या?” मैंने जानकर शराफ़त का नाटक किया, अपनी आँखें और नीचे झुकाकर।
“अरे ऐसे नहीं, देखो ऐसे…” उसने नीचे से अपनी कमर को थोड़ा सा उठाकर एक छोटा-सा धक्का देकर मुझे बताया। उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर सरककर बाहर आया, फिर वापस अन्दर गया, चिकनाई से चिकचिक की हल्की आवाज़ हुई। मुझे मन ही मन में हंसी आई, ये लड़के भी कितने भोले होते हैं। मैंने उसी स्टाइल में पहले एक धीमा धक्का दिया, फिर दूसरा थोड़ा तेज़। मेरी चूत उसके लण्ड को कसकर जकड़ रही थी, हर बार नीचे उतरते वक्त सुपाड़ा मेरी चूत की सबसे संवेदनशील जगह को रगड़ता हुआ गुजर रहा था। वो चीख सा उठा।
“आह, नेहा, बस ऐसे ही, जरा जोर से!” वो मारे आनन्द के तड़प सा उठा। उसकी कमर बार-बार उछल रही थी, उसकी साँसें तेज़ और अनियमित हो गई थीं।
“आह! मुझे भी मजा आया, कैसा कैसा लग रहा है ना?” मैंने भी उसे अपनी उत्तेजना बताई। मेरी आवाज़ में अब शरम कम और लालसा अधिक थी। मेरी चूत से रस और अधिक बह रहा था, हर धक्के के साथ चिकचिक की आवाज़ें बढ़ रही थीं।
अब मैं मन ही मन खुश होती हुई चुदाई की क्रिया में पूरी तरह लीन हो गई। बहुत दिनों बाद चुदने से मेरे पूरे शरीर में एक गहरी, मीठी कंपन फैल रही थी। उसका लण्ड भी जानदार था, मोटा, लंबा, नसों से भरा, हर धक्के में मेरी चूत की हर परत को सहेजता हुआ। मैंने भी धीरे-धीरे अपने तरीके से चूत को घुमा-घुमा कर चुदना आरम्भ कर दिया था। मैं अपनी कमर को गोल-गोल घुमाती, फिर आगे-पीछे करती, कभी तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे होती। उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर हर कोण से रगड़ खा रहा था। वो बार-बार अपनी कमर को उछाल कर अपनी उत्सुकता दर्शा रहा था, सिसकारियाँ भर रहा था, “आह… नेहा… ओह…” की आवाज़ें उसके होंठों से निकल रही थीं। मैं भी अपनी प्यास बुझाने में लगी थी। मेरे शरीर में गुदगुदी भरी मीठी-मीठी लहरें चल रही थीं, एक लय में होकर हमारे अंगों का संचालन हो रहा था। मेरी साँसें तेज़ हो गई थीं, मैं हल्की-हल्की चीखों के साथ उसको अपनी खुशी दर्शा रही थी, “आह… रवि… हाय… कितना अच्छा…”।
अब रवि ने अपने से चिपकाए हुए धीरे से पलटी मारी और मेरे ऊपर आ गया। उसकी भारी देह मेरे ऊपर ढह गई, मेरे स्तन उसकी छाती से पूरी तरह दब गए। मुझे लगा कि अब होगी जबरदस्त चुदाई। मेरे ऊपर सवार होकर सच में उसने अपना शॉट जोर से कस कर मारा कि मेरी तो जान ही निकल गई। उसका लण्ड एक ही झटके में मेरी चूत के सबसे गहरे हिस्से तक जा धँसा, सुपाड़ा मेरे गर्भाशय को ठोक रहा था। वो मदहोशी के आलम में मुझे जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्का इतना तेज़ और गहरा था कि मेरी देह बिस्तर पर उछल रही थी। मेरी टाँगें उसकी कमर के चारों ओर कस गईं, मेरी एड़ियाँ उसकी नितंबों पर दब रही थीं। मेरा तन जैसे हवा में उड़ने लगा। मैं आनन्द से सराबोर, दूसरी दुनिया में आनन्द से तड़पने लगी। मेरी चूत उसका लण्ड बार-बार निचोड़ रही थी, हर धक्के के साथ मेरी चूत की दीवारें सिकुड़-फैल रही थीं। फिर मुझे लगा कि मेरा तन मेरा साथ छोड़ रहा है। अत्यन्त तीव्र मादक भरी कसक ने मेरे तन को तोड़ दिया। मेरी चूत में एक तेज़, गहरी कंपन हुई, मेरी पूरी देह काँप उठी, मेरी साँसें रुक गईं। … जैसे एक नदी के उग्र बहाव में शान्ति सी आ गई। मैं झड़ने लगी थी… बहुत अधिक वासना के कारण मैं अपने आप को रोक नहीं पाई।
रवि तो आँखें बंद करके मस्ती में चोदता ही चला गया। उसकी कमर बार-बार तेज़-तेज़ उछल रही थी, हर धक्के के साथ उसका मोटा लण्ड मेरी चूत के अन्दर तक पूरी ताकत से जा धंस रहा था, सुपाड़ा मेरे गर्भाशय के मुहाने को ठोक-ठोक कर पीट रहा था। उसकी साँसें गरम और भारी होकर मेरे गले और कानों पर पड़ रही थीं, उसकी छाती मेरे स्तनों पर दब रही थी। मुझे में फिर से उत्तेजना भरने लगी। इस बार मैं उसका लण्ड दोनों पाँव खोल कर चूत उछाल-उछाल कर ले रही थी। मेरी जाँघें पूरी तरह फैली हुई थीं, मैं अपनी कमर को ऊपर-नीचे करके उसका लण्ड गहराई तक निगल रही थी, हर बार नीचे उतरते वक्त मेरी चूत की पंखुड़ियाँ उसके लण्ड की जड़ तक फैल जातीं और चिकचिक की गीली आवाज़ भर उठती। मेरी चूत को वो कस कर पीट रहा था। अरे! माँ मेरी, वो तो झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसका लण्ड मेरी चूत के अन्दर फूलता-फूलता सा लग रहा था, नसें उभरी हुईं, गरम और सख्त, हर धक्के में मेरी चूत की दीवारों को रगड़ता हुआ। मुझे तो लगा कि मैं तो फिर से झड़ने वाली हूँ। मेरी चूत में एक गहरी, तीव्र कसक उठने लगी, मेरी साँसें रुक-रुक कर आने लगीं, मेरी उँगलियाँ उसकी पीठ पर कसकर नाखून गड़ा रही थीं। तभी उसके मुख से एक धीमी हुंकार सी निकली और उसने अपना लण्ड मेरी चूत में कस कर दबा दिया। उसका पूरा वजन मेरे ऊपर आ गया, लण्ड जड़ तक अन्दर धँसा हुआ, सुपाड़ा मेरे सबसे गहरे हिस्से पर दबाव डाल रहा था। ओह! जैसे ही उसने चूत में लण्ड दबाया, तो जैसे मेरी जान ही निकल गई, मैं दूसरी बार झड़ने लगी। मेरी चूत की दीवारें तेज़-तेज़ सिकुड़ने लगीं, एक गहरी कंपन पूरे शरीर में दौड़ गई, मेरी टाँगें काँप उठीं, मैं जोर से सिसकारी भरकर उसके नीचे तड़प उठी, मेरी चूत से गरम रस की लहरें निकलकर उसके लण्ड को और गीला कर रही थीं।
तभी उसने अपना मोटा सा लण्ड मेरी चूत में से धीरे-धीरे बाहर निकाल लिया। उसका लण्ड सरकता हुआ बाहर आया, मेरी चूत की पंखुड़ियाँ उसके सुपाड़े से चिपककर खिंच रही थीं। जैसे ही उसका लण्ड मेरी भीगी हुई चूत की दीवारों से अलग हुआ, एक गर्म, चिपचिपा खिंचाव महसूस हुआ और फिर अचानक उसने अपने लण्ड को पूरी ताकत से हिलाया। उसकी मुट्ठी लण्ड को ऊपर-नीचे तेज़ी से सरका रही थी। उसके लण्ड ने एक भरपूर, जोरदार पिचकारी मारी। गाढ़ा, गरम वीर्य की पहली फुहार इतनी तेज़ी से निकली कि वह सीधे मेरे नाभि के ऊपर जा गिरी, सफेद, गाढ़ी धार मेरी त्वचा पर फैल गई। फिर दूसरी और तीसरी धार मेरे पेट पर फैल गईं, गरम बूँदें मेरी नाभि में भरकर इधर-उधर बहने लगीं, कुछ बूंदें मेरी दोनों स्तनों के बीच की गहरी खाई में जा गिरीं और कुछ मेरी छाती पर छिटक कर बिखर गईं। वीर्य की गर्माहट मेरी त्वचा पर फैलते ही एक सिहरन सी दौड़ गई, मेरी त्वचा पर छोटे-छोटे रोएँ खड़े हो गए।
फिर रवि मेरे ऊपर पूरी तरह लेट गया। उसका भारी, पसीने से तर शरीर मेरे नंगे बदन पर दब गया, उसकी छाती मेरे स्तनों पर पूरी तरह चिपक गई, उसका पसीना मेरी त्वचा पर मिलकर चिपचिपा हो गया। उसने अपने अभी भी सख्त लण्ड को मेरे नाजुक, मुलायम पेट पर रगड़ा और दबा-दबा कर बाकी बचा हुआ वीर्य बाहर निकालने लगा। हर दबाव के साथ उसके लण्ड की नसें मेरे पेट की चिकनी त्वचा पर साफ़ महसूस हो रही थीं, सुपाड़ा मेरी नाभि के पास दब रहा था। वीर्य की मोटी-मोटी धारें धीरे-धीरे मेरे पेट पर फैल रही थीं और मेरी त्वचा पर चिपक कर ठंडी होने लगी थीं। मैंने प्यार से उसकी ओर देखा। मेरी आँखें उसकी थकी हुई लेकिन संतुष्ट आँखों में डूब गईं। मैंने अपना दायाँ हाथ उठाकर उसके गीले, पसीने से चिपके बालों में उँगलियाँ फेरनी शुरू कीं। मेरी उँगलियाँ धीरे-धीरे उसके सिर के पिछले हिस्से से होते हुए गर्दन तक जातीं और फिर वापस बालों में खो जातीं। इस हालत में भी वह बीच-बीच में मेरे होंठों को चूम लेता। कभी हल्का सा चुम्बन, होंठों को हल्के से दबाकर, कभी जीभ से मेरे अधरों को चाटते हुए गहरा चुम्बन, उसकी जीभ मेरे मुँह में घुसकर मेरी जीभ से खेलती।
“नेहा, तुम तो बला की चीज़ हो, देखो मेरा क्या हाल कर दिया!” उसने मेरी तारीफ के पुल बाँधने शुरू कर दिए। उसकी आवाज में अभी भी उत्तेजना और थकान का मिश्रण था, गला भारी और काँपता हुआ।
“ओह रवि, मुझे तो आज पहली बार कोई तुम जैसा लड़का मिला है, मुझे नहीं पता था कि इसमें इतना मजा आता है!” मैंने मासूमियत से भरी आवाज में कहा और अपनी आँखें थोड़ी नीची कर लीं, जैसे शरम से डूबी हुई हूँ।
“नेहा जी, एक विनती है, पीछे से करवाओगी क्या? वहाँ पर तो अलग तरह का मजा आता है।” उसने बिल्कुल किसी अनुभवी चुदक्कड़ की तरह कहा, जैसे उसे इस काम का पूरा हुनर पता हो।
“सच? पीछे से करोगे?… वहाँ से भी करते हैं क्या?” मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और अपनी भौंहें थोड़ी ऊँची कर लीं।
“अजी आप आज्ञा तो दें!” उसने बड़ी स्टाइल से कहा, जैसे दुनिया में उससे बड़ा कोई अनुभवी ही न हो।
“मजा तो आना है ना, तो फिर क्या पूछना? चलो करते हैं।” मैंने भी अपने आपको मासूम बनाते हुए हामी भर दी। मन ही मन लड्डू फूट रहे थे कि यह खुद ही मान गया गाँड चोदने को, वरना न जाने कितने और बहाने बनाने पड़ते गाँड चुदवाने के लिए।
उसने मुझे फौरन घोड़ी बनने को कहा। मैंने घुटनों और हथेलियों के बल शरीर को टिका लिया। मेरी कमर थोड़ी नीचे की ओर झुकी हुई थी और गाँड ऊपर उठी हुई थी, मेरी दोनों जाँघें थोड़ी फैली हुईं, चूत अभी भी गीली और वीर्य से सनी हुई। रवि ने पीछे से मेरी कमर पकड़ी और पहले अपनी उँगलियों से मेरी गाँड की सुराख को सहलाया। उसकी उँगलियाँ मेरी गाँड के दोनों गालों को अलग-अलग करके बीच की दरार में सरक रही थीं, सुराख के चारों ओर हल्के-हल्के दबाव डाल रही थीं। फिर उसने बिस्तर के पास रखी छोटी डिब्बी से देसी घी का एक बड़ा सा टुकड़ा लिया। उसने घी को अपनी हथेली में पिघलाया और फिर मेरी गाँड के दोनों गालों पर फैलाना शुरू किया। ठंडा घी मेरी गर्म त्वचा पर लगते ही एक अजीब सी सिहरन हुई, मेरी गाँड की त्वचा पर छोटी-छोटी कंपकंपी दौड़ गई। उसने धीरे-धीरे घी को मेरी गाँड की दरार में अंदर तक फैलाया, अपनी उँगली से सुराख के चारों ओर गोल-गोल घुमाते हुए, फिर उँगली को हल्का सा अंदर डालकर घी को अन्दर फैलाया। फिर उसने अपना मुँह मेरी गाँड के पास ले जाकर जीभ से चाटना शुरू किया। उसकी गर्म जीभ मेरी गाँड के छेद पर बार-बार फिसल रही थी, जीभ का नुकीला सिरा सुराख पर दबाव डाल रहा था। वह जीभ को अंदर तक डालने की कोशिश कर रहा था और साथ ही घी चाट-चाट कर मेरी गाँड को और चिकना बना रहा था। शायद काफी सारा घी तो उसने मेरी गाँड में डालकर ही चाट लिया था। मेरी साँसें तेज हो गई थीं।
फिर उसने अपने मोटे लण्ड का सुपारा मेरी गाँड के छेद पर टिकाया। घी की वजह से सुपारा आसानी से फिसल रहा था। उसने धीरे से दबाव डाला। पहले तो सुपारा अंदर घुसा, फिर धीरे-धीरे पूरा लण्ड मेरी तंग गाँड में सरकने लगा। दर्द और मजा दोनों एक साथ हो रहा था। मैंने तकिए में मुँह दबाकर हल्की-हल्की सिसकारी भरी। जब पूरा लण्ड अंदर चला गया तो उसने कुछ पल रुककर मेरी कमर को सहलाया। फिर धीरे-धीरे पीछे-आगे करना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरी गाँड का छेद और खुलता जा रहा था। उसने मेरी गाँड तबियत से मारी। तेज-तेज धक्के देने लगा। कमर पकड़कर जोर-जोर से पीछे से धकेल रहा था। मेरे मुँह से अब लगातार आहें निकल रही थीं। “हाय… रवि… और जोर से… हाँ… ऐसे ही…” मैं बड़बड़ा रही थी।
मुझे अब क्या चाहिए था भला? मेरे तो आगे-पीछे दोनों छेद उससे चुदवाने की तीव्र इच्छा थी। गाँड में लण्ड के आने-जाने से एक अलग तरह का दबाव और आनन्द मिल रहा था। उसने मेरी गाँड को पूरी ताकत से चोदा। कभी तेज, कभी धीमे, कभी गहरे धक्के। मेरी गाँड अब पूरी तरह खुल चुकी थी और घी के साथ उसका लण्ड आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था। अंत में उसके झड़ने से पहले मैं खुद बहुत उत्तेजित हो गई थी। मेरी चूत से रस टपक रहा था। मैंने उससे कहा, “रवि… पहले मुझे फिर से चूत में डाल दो… बस एक बार…” उसने फौरन लण्ड निकाला, मेरी चूत में जोर से डाला और कुछ ही धक्कों में मुझे फिर से झड़वा दिया। मेरी चूत सिकुड़ती रही और मैं जोर-जोर से कराहती रही।
इस घटना के बाद तो अब रोज ही पापा के ऑफिस जाने के बाद वह आ जाया करता था और मुझे चोद जाया करता था। भेद खुलने के डर से अब मैंने उसको सप्ताह में एक या दो बार आने को कह दिया था। उसके साथ मेरी पूरी छुट्टियों में खूब जमी। मैंने उससे खूब चुदाया और खूब मस्ती की। कॉलेज के खुलने का समय पास आ गया था और मुझे वापस इन्दौर भी जाना था…
मेरे जाने के समय वह बहुत उदास हो गया था। मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था। भारी मन से हम दोनों एक दूसरे से अलग हुए…
इन्दौर आने पर मुझे अपने पुराने दोस्त फिर से मिल गए थे, रवि की यादें कम होते-होते समाप्त सी हो गई थी। अब मैं अपने कुछ नए और कुछ पुराने आशिकों से फिर से पहले की तरह चुदने लगी थी, पर रवि जैसी कशिश किसी में नहीं थी।
टेलीग्राम चैनल जॉइन करें - रोज़ाना नई कहानी अपडेट के लिए
Related Posts