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ठंडी रात में दीदी ने दी मालिश फिर चुदी अपने भाई से

Chacheri didi ki chudai sex story: मेरी बी.ए. की परीक्षा खत्म हो गई थी। मैं अपनी चचेरी दीदी के यहां घूमने नैनीताल गया। उनसे मिले हुए मुझे कई साल हो गए थे। जब मैं सातवीं में पढ़ता था तभी उनकी शादी फौज के रणवीर सिंह के साथ हो गई। अब वो लोग नैनीताल में रहते थे। मैंने सोचा चलो दीदी से मिलने के साथ-साथ नैनीताल भी घूम लूंगा। वहां पहुंचने पर दीदी बहुत खुश हुई।

बोली – अरे तुम इतने बड़े हो गए। मैंने तुम्हें जब अपनी शादी में देखा था तो तुम सिर्फ ग्यारह साल के थे।

मैंने कहा – जी दीदी अब तो मैं बीस साल का हो गया हूं।

दीदी ने मुझे खूब खिलाया-पिलाया। जीजा जी अभी पिछले तीन महीने से कश्मीर में अपनी ड्यूटी पर थे। दीदी की शादी हुए आठ साल हो गए थे। दीदी की एक मात्र संतान तीन साल की जूही थी जो बहुत ही नटखट थी। वो भी मुझसे बहुत ही घुल-मिल गई। शाम को जीजा जी का फोन आया तो मैंने उनसे बात की। वो भी बहुत खुश थे मेरे आने पर।

बोले – एक महीने से कम रहे तो कोर्ट मार्शल कर दूंगा।

रात को यूं ही बातें करते-करते और पुरानी यादों को ताजा करते-करते मैं अपने कमरे में सोने चला गया। दीदी ने मेरे लिए बिस्तर लगा दिया और बोली – अब आराम से सो जाओ।

मैं आराम से सो गया। किंतु रात के एक बजे नैनीताल की ठंडी हवा से मेरी नींद खुल गई। मुझे ठंड लग रही थी। हालांकि अभी मई का महीना था लेकिन मैं मुंबई का रहने वाला आदमी भला नैनीताल की मई महीने की भी हवा को कैसे बर्दाश्त कर सकता। मेरे पास चादर भी नहीं थी। मैंने दीदी को आवाज लगाई। लेकिन वो शायद गहरी नींद में सो रही थी। थोड़ी देर तो मैं चुप रहा लेकिन जब बहुत ठंड लगने लगी तो मैं उठ कर दीदी के कमरे के पास जा कर उन्हें आवाज लगाई। दीदी मेरी आवाज सुन कर हड़बड़ी से उठ कर मेरे पास चली आई और

कहा – क्या हुआ गुड्डू?

वो सिर्फ एक गंजी और छोटी सी पैंट जो कि औरतों की पैंटी से थोड़ी ही बड़ी थी। गंजी भी सिर्फ छाती को ढंकने की अधूरी सी कोशिश कर रही थी। मैं उनकी ड्रेस को देख के दंग रह गया। दीदी की उम्र अभी उनतीस या तीस की ही होती रही होगी। सारा बदन सोने की तरह चमक रहा था। मैं उनके बदन को एकटक देख ही रहा था कि दीदी ने फिर

कहा- क्या हुआ गुड्डू?

मेरी तंद्रा भंग हुई।

मैंने कहा – दीदी मुझे ठंड लग रही है। मुझे चादर चाहिए।

दीदी ने कहा – अरे मुझे तो गर्मी लग रही है और तुझे ठंड?

मैंने कहा – मुझे यहां के हवाओं की आदत नहीं है ना।

दीदी ने कहा – अच्छा तू रूम में जा, मैं तेरे लिए चादर ले कर आती हूं।

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मैं कमरे में आ कर लेट गया। मेरी आंखों के सामने दीदी का बदन अभी भी घूम रहा था। दीदी का अंग-अंग तराशा हुआ था। थोड़ी ही देर में दीदी एक कंबल ले कर आई और मेरे बिस्तर पर रख दी।

बोली – पता नहीं कैसे तुम्हें ठंड लग रही है। मुझे तो गर्मी लग रही है। खैर, कुछ और चाहिए तुम्हें?

दीदी की आवाज में हल्की सी मुस्कान थी। उनकी नंगी जांघें अभी भी मेरे बिस्तर के पास थीं और कमरे की हल्की रोशनी में उनका गोरा बदन चमक रहा था। मैं उनके शरीर की गर्माहट महसूस कर सकता था जो ठंडी हवा के विपरीत थी।

मैंने कहा- नहीं, लेकिन कोई शरीर दर्द की गोली है क्या?

दीदी बोली- क्यों क्या हुआ?

मैंने कहा – लंबी सफर से आया हूं। बदन टूट सा रहा है।

दीदी ने कहा- गोली तो नहीं है। रुक मैं तेरे लिए कॉफी बना के लाती हूं। इससे तेरा बदन दर्द दूर हो जाएगा।

मैंने कहा- छोड़ दो दीदी, इतनी रात को क्यों कष्ट करोगी?

दीदी ने कहा – इसमें कष्ट कैसा? तुम मेरे यहां आए हो तो तुम्हें कोई कष्ट थोड़े ही होने दूंगी।

कह कर वो चली गई। थोड़ी ही देर में वो दो कप कॉफी बना लाई। रात के डेढ़ बज रहे थे। हम दोनों कॉफी पीने लगे।

कॉफी पीते-पीते वो बोली – ला, मैं तेरा बदन दबा देती हूं। इससे तुम्हें आराम मिलेगा।

मैंने कहा – नहीं दीदी, इसकी कोई जरूरत नहीं है। सुबह तक ठीक हो जाएगा।

लेकिन दीदी मेरे बिस्तर पर चढ़ गई और बोली – तू आराम से लेटा रह मैं अभी तेरी बदन की मालिश कर देती हूं।

कहते-कहते वो मेरे जांघों को अपनी जांघों पर रख कर उसे अपने हाथों से दबाने लगी। मैंने पैजामा पहन रखा था। वो अपनी नंगी जांघों पर मेरे पैर को रख कर उसे दबाने लगी। उनकी मुलायम, गर्म और चिकनी जांघों का स्पर्श मेरे पैरों पर बिजली सा दौड़ रहा था।

दबाते हुए बोली – एक काम कर, पैजामा खोल दे, सारे पैर में अच्छी तरह से तेल मालिश कर दूंगी।

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अब मैं किसी बात का इनकार करने का विचार त्याग दिया। मैंने झट अपना पैजामा खोल दिया। अब मैं अंडरवियर और बनियान में था। दीदी ने फिर से मेरे पैर को अपनी नंगी जांघों पर रख कर तेल लगा कर मालिश करने लगी। जब मेरे पैर उनकी नंगी और चिकनी जांघों पर रखे थे तो मुझे बहुत आनंद आने लगा। दीदी की चूची उनकी ढीली ढीली गंजी से बाहर झांक रही थी। उसकी चूची की निप्पल उनकी पतली गंजी में से साफ दिख रही थी। मैं उनकी चूची को देख-देख के मस्त हुआ जा रहा था। उनकी जांघ इतनी चिकनी थी कि मेरे पैर उस पर फिसल रहे थे। उनका हाथ धीरे-धीरे मेरे अंडरवियर तक आने लगा। उनके हाथ के वहां तक पहुंचने पर मेरे लंड में तनाव आने लगा। मेरा लंड अब पूरी तरह से फनफनाने लगा। मेरा लंड अंडरवियर के अंदर करीब छह इंच ऊंचा हो गया। दीदी ने मेरी पैरों को पकड़ कर मुझे अपनी तरफ खींच लाई और मेरे दोनों पैर को अपने कमर के अगल-बगल करते हुए मेरे लंड को अपने चूत में सटा दी। मुझे दीदी की मंशा गड़बड़ लगने लगी। लेकिन अब मैं भी चाहता था कि कुछ ना कुछ गड़बड़ हो जाने दो।

दीदी ने कहा – गुड्डू, तू अपनी बनियान उतर दो न। छाती की भी मालिश कर दूंगी।

मैंने बिना समय गवाए बनियान भी उतर दिया। अब मैं सिर्फ अंडरवियर में था।

वो जब भी मेरी छाती की मालिश के लिए मेरे सीने पर झुकती तो उनका गर्म और नरम पेट मेरे खड़े लंड से सीधे सट जाता। उनकी मुलायम त्वचा मेरे तने हुए लिंग पर दबाव डाल रही थी। शायद वो जानबूझकर मेरे लंड को अपने पेट से दबा रही थीं। हर झुकाव के साथ उनका पेट मेरे अंडरवियर के ऊपर से मेरे लंड को रगड़ता और दबाता। एक जवान औरत मेरी तेल मालिश कर रही है। यह सोच कर मेरा लिंग महाराज एक इंच और बढ़ गया। इससे थोड़ा-थोड़ा रस निकलने लगा जिससे कि मेरा अंडरवियर पूरी तरह गीला और चिपचिपा हो गया था।

अचानक दीदी ने मेरे लिंग को अपनी नरम हथेली से पकड़ लिया और कहा – ये तो काफी बड़ा हो गया है तेरा।

दीदी ने जब मुझसे यह कहा तो मुझे शर्म सी आ गई कि शायद दीदी को मेरा लंड बड़ा होना अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे लगा शायद वो मेरे सुख के लिए मेरा बदन मालिश कर रही है और मैं उनके बदन को देखकर मस्त हुआ जा रहा हूं और गंदे-गंदे खयाल सोचकर अपना लंड खड़ा किए हुए हूं।

इसलिए मैंने धीमे से कहा- यह मैंने जानबूझकर नहीं किया है। खुद ब खुद हो गया है।

लेकिन दीदी मेरे लंड को हल्के से दबाते हुए मुस्कुराते हुए बोली- बच्चा बड़ा हो गया है। जरा देखूं तो कितना बड़ा है मेरे भाई का लंड।

यह कहते हुए उसने मेरा अंडरवियर को नीचे सरका दिया। मेरा सात इंच का लहलहाता हुआ लंड मेरी दीदी के हाथ में आ गया। अब मैं पूरी तरह से नंगा अपनी दीदी के सामने था। दीदी ने बड़े प्यार से मेरे लिंग को अपने हाथ में लिया। और उसमें तेल लगा कर मालिश करने लगी।

दीदी ने कहा – तेरा लिंग लंबा तो है मगर तेरी तरह दुबला-पतला है। मालिश नहीं करता है इसकी?

मैंने पूछा – जीजा जी का लिंग कैसा है?

दीदी ने कहा- मत पूछो। उनका तो तेरे से भी लंबा और मोटा है।

वो बोली- कभी किसी लड़की को नंगा देखा है?

मैंने कहा – नहीं।

उसने कहा – मुझे नंगा देखेगा?

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मैंने कहा – अगर तुम चाहो तो।

दीदी ने अपनी गंजी एक झटके में उतार दी।

गंजी के नीचे कोई ब्रा नहीं थी। उनकी बड़ी-बड़ी चूची मेरे सामने किसी पर्वत की तरह खड़े हो गए। उनकी दो प्यारी-प्यारी चूची मेरे सामने थीं।

दीदी पूछी- मुठ मारते हो?

मैंने कहा – हां।

दीदी- कितनी बार?

मैंने – एक-दो दिन में एक बार।

दीदी- कभी दूसरे ने तेरी मुठ मारी है?

मैंने -हां।

दीदी- किसने मारी तेरी मुठ?

मैंने- एक बार मैं और मेरा एक दोस्त ने एक दूसरे की मुठ मारी थी।

दीदी – कभी अपने लिंग को किसी से चुसवा कर माल निकाला है तूने?

मैंने- नहीं।

दीदी – रुक, आज मैं तुम्हें बताती हूं कि जब कोई लिंग को चूसता है तो चुसवाने वाले को कितना मजा आता है।

इतना कह के वो मेरे लिंग को अपने मुंह में ले ली। और पूरे लिंग को अपने मुंह में भर ली। मुझे ऐसा लग रहा था कि वो मेरे लिंग को कच्चा ही खा जाएगी। अपने दांतों से मेरे लिंग को चबाने लगी। करीब तीन-चार मिनट तक मेरे लिंग को चबाने के बाद वो मेरे लिंग को अपने मुंह से अंदर-बाहर करने लगी। एक ही मिनट हुआ होगा कि मेरा माल बाहर निकलने को बेताब होने लगा।

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मैंने- दीदी, छोड़ दो, अब माल निकलने वाला है।

दीदी – निकलने दो ना।

उन्होंने मेरे लिंग को अपने मुंह से बाहर नहीं निकाला। उनके गर्म, नम और मुलायम होंठ मेरे लिंग के चारों ओर कसकर लिपटे हुए थे। उनकी जीभ मेरे लिंग के नीचे वाले हिस्से को लगातार तेजी से रगड़ रही थी। मेरे लंड में अचानक जोर का दबाव बढ़ गया। पहली गरम और गाढ़ी धार उनके मुंह के अंदर फूट पड़ी।

दीदी ने पूरी ताकत से चूसना जारी रखा। मेरा माल उनके गले में सीधे उतर रहा था। फिर दूसरी, तीसरी और चौथी धार निकली। मेरे लिंग का माल उनके मुंह से बाहर निकल कर उनके गालों पर भी बहने लगा। गाढ़ा, चिपचिपा और गरम वीर्य उनके होठों के कोनों से रिसता हुआ उनके नरम गालों पर फैल गया।

गाल पर बह रहे मेरे माल को उन्होंने अपनी उंगलियों से पोछा और फिर उस हाथ को चाटते हुए

बोली – अरे, तेरा माल तो एकदम से मीठा है। कैसा लगा आज का मुठ मरवाना?

मैंने – अच्छा लगा।

दीदी – कभी किसी बुर को चोदा है तूने?

मैंने – नहीं, कभी मौका ही नहीं लगा।

फिर बोली- मुझे चोदेगा?

मैंने – हां।

दीदी – ठीक है।

कह कर दीदी खड़ी हो गई और अपनी छोटी सी पैंट को एक झटके में खोल दिया। उसके नीचे भी कोई पैंटी नहीं थी।

उसके नीचे जो था वो मैंने आज तक हकीकत में नहीं देखा था। एकदम बड़ा, चिकना, बिना किसी बाल का, खूबसूरत सा बुर मेरी आंखों के सामने था।

अपनी बुर को मेरी मुंह के सामने ला कर बोली – यह रहा मेरा बुर, कभी देखा है ऐसा बुर? अब देखना यह है कि तुम कैसे मुझे चोदते हो। सारा बुर तुम्हारा है। अब तुम इसका चाहे जो करो।

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मैंने कहा- दीदी, तुम्हारा बुर एकदम चिकना है। तुम रोज शेव करती हो क्या?

दीदी- तुम्हें कैसे पता कि बुर चिकना होता है कि बाल वाला?

मैंने कहा- वो मैंने अपनी नौकरानी का बुर तीन-चार बार देखा है। उसके बुर में एकदम से घने बाल हैं। उसकी बुर तो काली भी है। तुम्हारी तरह सफेद बुर नहीं है उसकी।

दीदी- अच्छा, तो तुमने अपनी नौकरानी की बुर कैसे देख ली है?

मैंने कहा – वो जब भी मेरे कमरे में आती है ना तो अगर मुझे नहीं देखती है तो मेरे शीशे के सामने एकदम से नंगी हो कर अपने आप को निहारा करती है। उसकी यह आदत मैंने एक दिन जान लिया। तब से मैं तीन-चार बार जानबूझ कर छिप जाता हूं और वो सोचती थी कि मैं यहां कमरे में नहीं हूं, वो नंगी हो मेरे शीशे के सामने अपने आप को देखती थी।

दीदी- बड़े शरारती हो तुम।

मैंने कहा- वो तो मैंने दूर से काली सी गंदी सी बुर को देखा था जो कि घने बाल के कारण ठीक से दिखाई भी नहीं देते थे। लेकिन आपकी बुर तो एकदम से संगमरमर की तरह चमक रही है।

दीदी- वो तो मैं हर संडे को इसे साफ करती हूं। कल ही संडे था। कल ही मैंने इसे साफ किया है।

अब मुझसे रहा नहीं जा रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि कहां से शुरू किया जाए। मुझे कुछ नहीं सूझा तो मैंने दीदी को पहले अपनी बाहों से पकड़ कर बिस्तर पर लिटा दिया।

अब वो मेरे सामने एकदम नंगी पड़ी थीं। पहले मैंने उनके खूबसूरत जिस्म का अवलोकन किया। दूध सा सफेद बदन। चुचियों की काया देखते ही बनती थी। लगता था संगमरमर के पत्थर पर किसी ने गुलाब की छोटी कली रख दी हो। उनकी निप्पल एकदम लाल थी।

सपाट पेट। पेट के नीचे मलाईदार सैंडविच की तरह फूली हुई बुर। बुर का रंग एकदम सोने के तरह था। उनके बुर को हाथ से फाड़ कर देखा तो अंदर लाल-लाल तरबूज की तरह नजारा दिखा।

कहीं से भी शुरू करूं तो बिना सब जगह हाथ मारे उपाय नहीं दिखा। सोचा ऊपर से ही शुरू किया जाए। मैंने सबसे पहले उनके रसीले लाल ओठों को अपने ओठों में भर लिया। जी भर के चूमा।

इस दौरान मेरे हाथ दीदी के चुचियों से खेलने लगे। दीदी ने भी मेरा किस का पूरा जवाब दिया। फिर मैं उनके ओठों को छोड़ उनके गले होते हुए उनकी चूची पर आ रुका।

काफी बड़ी और सख्त चूचियां थीं। एक बार में एक चूची को मुंह में दबाया और दूसरे को हाथ से मसलता रहा। थोड़ी देर में दूसरी चूची का स्वाद लिया।

चुचियों का जी भर के रसास्वादन के बाद अब बारी थी उनके महान बुर के दर्शन की। ज्यों ही मैं उनके बुर के पास अपना सर ले गया मुझसे रहा नहीं गया और मैंने अपनी जीभ को उनके बुर के मुंह पर रख दिया।

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स्वाद लेने की कोशिश की तो हल्का सा नमकीन सा लगा। मजेदार स्वाद था। अब मैं पूरी बुर को अपने मुंह में लेने की कोशिश करने लगा। दीदी मस्त हो कर सिसकारी निकालने लगी।

मैं समझ रहा था कि दीदी को मजा आ रहा है। मैं और जोर-जोर से दीदी का बुर चूसना शुरू किया। करीब पंद्रह मिनट तक मैं दीदी का बुर का स्वाद लेता रहा।

अचानक दीदी जोर से आंख बंद कर के कराही और उनके बुर से माल निकल कर उनके बुर की दरार होते हुए गांड की दरार की ओर चल दिए। मैंने जहां तक हो सका उनके बुर का रस का पान किया।

मैंने देखा अब दीदी पहले की अपेक्षा शांत हैं। लेकिन मेरा लिंग महाराज एकदम से तनतना गया। मैंने दीदी के दोनों पैरों को अलग-अलग दिशा में किया और उनके बुर की छिद्र पर अपना लिंग रखा और धीरे-धीरे दीदी के बदन पर लेट गया।

इससे मेरा लिंग दीदी के बुर में प्रवेश कर गया। ज्यों ही मेरा लिंग दीदी के बुर में प्रवेश किया दीदी लगभग छटपटा उठी।

मैंने कहा – क्या हुआ दीदी, जीजा जी का लिंग तो मुझसे भी मोटा है ना तो फिर तुम छटपटा क्यों रही हो?

दीदी – तीन महीने से कोई लिंग बुर में नहीं ली हूं न इसलिए यह बुर थोड़ा सिकुड़ गया है। उफ़…

उनकी आवाज में दर्द और मिठास दोनों थे। दीदी की बुर मेरे सात इंच के लिंग को अंदर कसकर जकड़े हुए थी। हर हल्की सी हरकत पर उनकी दीवारें मेरे लंड को दबा रही थीं।

दीदी बोली – लगता नहीं है कि तुम्हें चुदाई के बारे में पता नहीं है। कितनों की ली है तूने?

मैं बोला- कभी नहीं दीदी, वो तो मैं फिल्मों में देख के और किताबों में पढ़ कर सब जानता हूं।

दीदी बोली- शाबाश गुड्डू, आज प्रैक्टिकल भी कर लो। कोई बात नहीं है। तुम अच्छा कर रहे हो। चालू रहो। मजा आ रहा है।

मैंने दीदी को अपने दोनों हाथों से लपेट लिया। दीदी ने भी अपनी टांगों को मेरे कमर पर लपेट कर अपने हाथों से मेरी पीठ को जकड़ लिया। अब हम दोनों एक दूसरे से बिलकुल गुथे हुए थे। उनकी बड़ी-बड़ी चूचियां मेरी छाती से पूरी तरह दब रही थीं।

मैंने अपनी कमर धीरे से ऊपर उठाई। इससे मेरा लिंग दीदी के बुर से थोड़ा बाहर आया। फिर मैंने कमर को जोर से नीचे किया। मेरा पूरा सात इंच का लंड एक झटके में दीदी की बुर में पूरी तरह समा गया। इस बार दीदी लगभग चीख उठी। उनकी नाखून मेरी पीठ में गड़ गए।

अब मैंने दीदी की चीख और दर्द पर ध्यान देना बंद कर दिया। और उन्हें पूरी प्रेम से चोदना शुरू किया। पहले नौ-दस धक्के में तो दीदी हर धक्के पर जोर-जोर से कराह रही थी। लेकिन दसवें धक्के के बाद उनकी बुर चौड़ी हो गई।

तीस-पैंतीस धक्के के बाद तो उनका बुर पूरी तरह से फैल गया। अब उन्हें आनंद आने लगा था। अब वो मेरे चूतड़ पर हाथ रख के मेरे धक्कों को और भी जोर से अंदर ले रही थी।

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चूंकि थोड़ी देर पहले ही ढेर सारा माल निकल गया था इसलिए जल्दी माल निकालने वाला तो था नहीं। मैं उनकी चुदाई करते-करते थक गया। करीब बीस मिनट तक उनकी बुर चुदाई के बाद भी मेरा माल नहीं निकल रहा था।

दीदी बोली – थोड़ा रुक जाओ।

मैंने दीदी के बुर में अपना सात इंच का लिंग डाले हुए ही थोड़ी देर के लिए रुक गया। मेरी सांसें तेज चल रही थीं। दीदी भी थक गई थी।

मैंने उनकी चूची को मुंह में भर कर चूसना शुरू किया। इस बार मुझे शरारत सूझी। मैंने उनकी चूची में दांत गड़ा दिए। वो चीखी।

बोली- क्या करते हो?

फिर मैंने उनके ओठों को अपने मुंह में भर लिया। दो मिनट के विश्राम के बाद मैंने अपनी कमर को फिर से हरकत में लाया। इस बार मेरी स्पीड काफी बढ़ गई। दीदी का पूरा बदन मेरे धक्के के साथ आगे-पीछे होने लगा।

दीदी बोली- अब छोड़ दो गुड्डू। मेरा माल निकल गया।

मैंने उनकी चुदाई जारी रखते हुए कहा- रुको न। अब मेरा भी निकल जाएगा।

चालीस-पचास धक्के के बाद मेरे लिंग के मुंह से गंगा-जमुना की धारा बह निकली। सारी धारा दीदी के बुर के विशाल कुएं में समा गई। एक बूंद भी बाहर नहीं आई।

बीस मिनट तक हम दोनों को कुछ भी होश नहीं था। मैं उसी तरह से उनके बदन पर पड़ा रहा।

बीस मिनट के बाद वो बोली – गुड्डू, तुम ठीक तो हो न?

मैंने बोला – हां।

दीदी – कैसा लगा बुर की चुदाई करके?

मैंने – मजा आ गया।

दीदी- और करोगे?

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मैंने – अब मेरा माल नहीं निकलेगा।

दीदी हंसी और बोली- धत पगले। माल भी कहीं खत्म होता है। रुको मैं तुम्हारे लिए कॉफी बना के लाती हूं।

दीदी नंगे बदन ही किचन गई और कॉफी बना कर लाई। कॉफी पीने के बाद फिर से ताजगी छा गई। दीदी के जिस्म देख-देख के मुझे फिर गर्मी चढ़ने लगी।

दीदी ने मेरे लिंग को पकड़ कर कहा- क्या हाल है जनाब का?

मैंने कहा – क्यों दीदी, फिर से एक राउंड हो जाए?

दीदी – क्यों नहीं। इस बार आराम से करेंगे।

दीदी बिस्तर पर लेट गई। पहले तो मैंने उनके बुर को चाट-चाट के पनिया दिया। मेरी जीभ उनकी चिकनी, गुलाबी बुर की हर दरार में घुस रही थी। मैं उनके छोटे-छोटे क्लिट को चूसता, फिर पूरी बुर को मुंह में लेकर जोर-जोर से चूसता। दीदी की बुर से लगातार रस निकल रहा था जो मेरे मुंह में मीठा-नमकीन स्वाद भर रहा था।

मेरा लिंग महाराज बड़ी ही मुश्किल से दोबारा तैयार हुआ। लेकिन जैसे ही मैंने उन्हें दीदी के बुर देवी से भेंट करवाया वो तुरंत ही जाग गए। सुबह के चार बज गए थे। उसी समय अपने लिंग महाराज को दीदी के बुर देवी में प्रवेश कराया।

पूरे पैंतालीस मिनट तक दीदी को चोदता रहा। दीदी की बुर ने पांच-छह बार पानी छोड़ दिया। हर बार उनके शरीर में जोर का कंपन आता और बुर की दीवारें मेरे लंड को कसकर दबाती।

वो मुझसे बार-बार कहती रही – गुड्डू छोड़ दो। अब नहीं। कल करना।

लेकिन मैंने कहा नहीं दीदी अब तो जब तक मेरा माल नहीं निकल जाता तब तक तुम्हारे बुर का कल्याण नहीं है।

पैंतालीस मिनट के बाद मेरे लिंग महाराज ने जो धारा निकाली तो मेरे तो जैसे प्राण ही निकल गए। गाढ़ा, गरम वीर्य उनकी बुर के अंदर फूट-फूट कर भर रहा था। जब दीदी को पता चला कि मेरा माल निकल गया है तो जैसे-तैसे अपने ऊपर से मुझे हटाई और अपने कपड़े लिए खड़ी हो गई।

मैं तो बिलकुल निढाल हो बिस्तर पर पड़ा रहा। दीदी ने मेरे ऊपर कंबल रखा और बिना कपड़े पहने ही हाथ में कपड़े लिए अपने कमरे की तरफ चली गई। आंख खुली तो दिन के बारह बज चुके थे। मैं अभी भी नंगा सिर्फ कंबल ओढ़े हुए पड़ा था। किसी तरह उठ कर कपड़े पहना और बाहर आया। देखा दीदी किचन में है।

मुझे देख कर मुस्कुराई और बोली – एक रात में ही यह हाल है, जीजाजी का आर्डर सुना है ना पूरे एक महीने रहना है। हां हां हां हां!!!!

इस प्रकार दीदी की चुदाई से ही मेरा यौवन का प्रारंभ हुआ। मैं वहां एक महीने से भी अधिक रुका जब तक जीजा जी नहीं आ गए। इस एक महीने में कोई भी रात मैंने बिना उनकी चुदाई के नहीं गुजारी। दीदी ने मुझसे इतनी अधिक प्रैक्टिस करवाई कि अब एक रात में पांच बार भी उनकी बुर की चुदाई कर सकता था। उन्होंने मुझे अपनी गांड के दर्शन भी कई बार करवाए। कई बार दिन में हम दोनों ने साथ स्नान भी किया।

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आखिर एक दिन जीजाजी भी आ गए। जब रात हुई और जीजाजी और दीदी अपने कमरे में गए तो थोड़ी ही देर में दीदी की चीख और कराहने की आवाज जोर-जोर से मेरे कमरे में आने लगी। मैं तो डर गया। लगता है कि दीदी की चुदाई का भेद खुल गया है और जीजा जी दीदी की पिटाई कर रहे हैं। रात दस बजे से सुबह चार बजे तक दीदी की कराहने की आवाज आती रही।

सुबह जैसे ही दीदी से मुलाकात हुई तो मैंने पूछा – कल रात को जीजाजी ने तुम्हें पीटा? कल रात भर तुम्हारे कराहने की आवाज आती रही।

दीदी बोली- धत पगले। वो तो रात भर मेरी चुदाई कर रहे थे। चार महीने की गर्मी थी इसलिए कुछ ज्यादा ही उछल-कूद हो रही थी।

मैंने कहा- दीदी अब मैं जाऊंगा।

दीदी ने कहा – कब? मैंने कहा – आज रात ही निकल जाऊंगा।

दीदी बोली- ठीक है। चल रात की खुमारी तो निकाल दे मेरी।

मैंने कहा – जीजाजी घर पर हैं। वो जान जाएंगे तो।

दीदी बोली- वो रात को इतनी बियर पी चुके हैं कि दोपहर से पहले नहीं उठने वाले।

दीदी को मैंने अपने कमरे में ले जा कर इतनी चुदाई की कि आने वाले दो-तीन महीने तक मुझे मुठ मारने की भी जरूरत नहीं हुई। जीजा जी ने जब दीदी को आवाज लगाई तभी दीदी को मुझसे मुक्ति मिली। आखिरी बार मैंने दीदी के बुर को किस किया और वो अपने कपड़े पहनते हुए अपने कमरे में जीजा जी से चुदवाने फिर चली गई। उसी रात को मैंने अपने घर की ट्रेन पकड़ ली।

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⚠️ महत्वपूर्ण अस्वीकरण

ये सभी कहानियाँ केवल काल्पनिक हैं।
इनका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है।

सेक्स हमेशा सहमति पर आधारित होना चाहिए।
बिना सहमति के कोई भी कार्य गलत और दंडनीय है।

इन कहानियों से प्रेरित न हों।
बस पढ़ें, आनंद लें और भूल जाएं।

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