Didi uncle sex story, Bhai ne didi chudai dekhi sex story, Kunwari didi chudai sex story: दोस्तों आज, मैं आज आप सभी के लिए एक ऐसी कहानी को लिखने जा रहा हूँ जिसको पढ़ने के बाद आप सभी को पता चलेगा कि किस तरह से एक जवान कुंवारी लड़की अपनी चूत की आग से इतना मजबूर हो जाती है कि वो अपने शरीर की भूख को शांत करने के लिए किसी भी दूसरे मर्द के साथ सोकर उसके साथ अपनी चुदाई करने के लिए तैयार हो जाती है।
दोस्तों इससे पहले कि मैं अपनी इस कहानी को सुनाना शुरू करूं मैं सबसे पहले आप सभी का परिचय अपने परिवार के लोगों से करा देता हूँ।
मेरे परिवार में हम चार लोग हैं, मेरे पापा, मम्मी, मैं और मेरी दीदी।
मेरे पापा बाहर दूसरे देश में रहते हैं क्योंकि उनकी वहाँ पर नौकरी है इसलिए उनको हम सभी से दूर रहना पड़ता है और वो एक साल में एक या दो बार ही हम लोगों से मिलने हमारे घर आते हैं।
मेरी दीदी मुंबई में रहती है और मैं भी उनके साथ ही मुंबई में रहता हूँ और अपनी पढ़ाई को पूरा कर रहा हूँ।
जब कभी मेरी छुट्टियाँ होती हैं तब हम दोनों भाई-बहन अपने घर चले आते हैं।
अब मैं आप सभी को उस दिन की घटना के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसको देखकर मुझे बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ और मेरे पैरों के नीचे से जमीन सरक गई।
दोस्तों मैं आज जो कहानी आप सभी को सुनाने जा रहा हूँ, वो मेरी दीदी की और मेरे एक दूर के अंकल के साथ की गई चुदाई की है।
दोस्तों उस चुदाई को मैंने खुद अपनी आँखों से अपने सामने होता हुआ देखा था और उसके बाद मुझे पता चला कि मैं अपनी जिस बड़ी बहन को इतना सीधा समझता था वो बहुत बड़ी रंडी निकली।
उसके उस काम को देखकर कुछ देर तक मेरी साँसें ऊपर-नीचे होने लगी थीं।
दोस्तों यह कहानी आज से चार साल पहले की है।
दोस्तों उन दिनों मैं अपनी दीदी के साथ एक छोटे से शहर में चार कमरों का एक मकान लेकर उसमें रहता था।
वैसे तो मेरे वो अंकल हमारे यहाँ तभी आते थे जब मेरे पापा हमारे घर आते थे, लेकिन उस दिन शाम को मेरे वो अंकल हमारे यहाँ अचानक शाम को आए।
फिर मुझे उनको देखकर कुछ अजीब सा लगा, लेकिन उनके यहाँ आने का असली मतलब मुझे उस रात को पूरी तरह से पता चला।
दोस्तों रात को खाना खाने के बाद जब मैं अपने कमरे में चला गया और फिर मैंने अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और पढ़ने के लिए अपनी मेज पर बैठ गया और मैं अपनी पढ़ाई में बहुत गहराई से व्यस्त हो गया था।
फिर करीब आधे घंटे के बाद मैंने अपने सामने वाले कमरे से, जिसमें मेरे वो अंकल थे, किसी के बाहर निकलने की हल्की-सी आवाज़ सुनी। मैंने तुरंत अपनी नज़र उठाई और देखा कि एक परछाई धीरे-धीरे मेरी दीदी के कमरे की तरफ बढ़ रही थी। उस पल में मैं तुरंत समझ गया कि अब जो कुछ भी होने वाला था, वो बिल्कुल सामान्य नहीं था, बल्कि कुछ बहुत ही गहरा और छिपा हुआ था। बिना एक पल भी गँवाए मैं अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, टेबल पर चढ़ गया और अपने कमरे के रोशनदान में लगी कांच की छोटी-सी खिड़की से झुककर मेरी दीदी के कमरे के अंदर झाँकने लगा।
जैसे ही मेरे वो अंकल दीदी के कमरे के अंदर दाखिल हुए, दीदी तुरंत बेड से उठ खड़ी हुईं। उन्होंने जल्दी से अपने सिर पर पल्लू को ठीक किया, फिर धीरे से मुड़कर अपनी पीठ अंकल की तरफ कर लीं और शर्माते हुए खड़ी हो गईं। अंकल बिना रुके उनके बहुत करीब आ गए, इतने करीब कि उनका शरीर दीदी के शरीर से लगभग सट गया। दीदी ने एक छोटा-सा कदम आगे बढ़ाया, और तभी अंकल ने अपनी दाहिनी हथेली को दीदी की पतली कमर पर रख दिया। उन्होंने धीरे से लेकिन मज़बूती से दीदी को अपनी तरफ खींच लिया। अब दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह चिपक गए थे।
अंकल ने अपना बायाँ हाथ उठाकर दीदी के सिर से आँचल को बहुत आराम से खींचा और उसे ज़मीन पर गिरा दिया। अब दीदी का ब्लाउज़ पूरी तरह से नज़र आ रहा था। अंकल ने अपना दायाँ हाथ दीदी के बाएँ बूब्स पर रख दिया और बहुत धीरे-धीरे, प्यार से उसे दबाना शुरू कर दिया। हर दबाव के साथ दीदी का शरीर हल्का-सा काँप रहा था। उन्होंने करीब पाँच-छह बार ऐसे ही नरमी से दबाया, फिर अपना हाथ ब्लाउज़ के हुकों की तरफ ले गए। एक-एक करके उन्होंने सारे हुक खोल दिए—पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा—सब धीरे-धीरे, बिना जल्दबाज़ी के।
जब सारे हुक खुल गए, तो अंकल ने ब्लाउज़ को दोनों कंधों से उतारा और उसे ज़मीन पर पटक दिया। अब दीदी के नंगे, गोल और भरे हुए बूब्स पूरी तरह से खुले हुए थे, जिनके गुलाबी निप्पल्स पहले से ही सख्त हो चुके थे। अंकल ने अब अपनी उँगलियों से दीदी की साड़ी की पेटीकोट को पकड़ा और धीरे-धीरे साड़ी को खोलना शुरू किया। साड़ी की लहरें नीचे सरकती गईं, और कुछ ही पलों में वो पूरी तरह से ज़मीन पर गिर गई।
अंकल ने दीदी के दोनों हाथों को अपने दोनों हाथों में कसकर जकड़ लिया। फिर एक झटके में उन्होंने दीदी के पेटीकोट के नाड़े को खींचकर खोल दिया। पेटीकोट फौरन सरककर ज़मीन पर जा गिरा। अब दीदी पूरी तरह नंगी खड़ी थीं—न ब्लाउज़, न ब्रा, न पेटीकोट, न पैंटी—कुछ भी नहीं। उनका गोरा, मुलायम शरीर रोशनी में चमक रहा था, और उनकी चूत के ऊपर हल्के-हल्के बालों की पतली लकीर साफ दिख रही थी।
अंकल ने अपना चेहरा दीदी के कंधे के पास ले जाकर उनके बालों को उँगलियों से हटाया। फिर उन्होंने अपने गर्म होंठों को दीदी के दोनों कंधों और गर्दन के बीच धीरे-धीरे रगड़ना शुरू किया। उनकी साँसें गरम-गरम थीं, और हर रगड़ के साथ दीदी का शरीर सिहर उठता था। अब अंकल ने अपना एक हाथ दीदी के बूब्स पर रखकर उन्हें फिर से दबाना शुरू किया—इस बार थोड़ा ज़ोर से, निप्पल को उँगलियों से हल्का-सा मसलते हुए। दूसरा हाथ नीचे की तरफ सरका और उन्होंने दीदी की चूत को सहलाना शुरू कर दिया। उनकी उँगलियाँ धीरे-धीरे चूत की दोनों फुंदियों के बीच सरक रही थीं, क्लिटोरिस को छूते हुए हल्का-सा दबाव दे रही थीं।
जैसे ही अंकल की उँगलियाँ दीदी की चूत पर रगड़ने लगीं, दीदी खुद को और नहीं रोक पाईं। वो तुरंत घूम गईं और अंकल से जोर से लिपट गईं। उनका नंगा शरीर अंकल के कपड़ों से सट गया। अंकल ने दोनों हाथों से दीदी को गोद में उठा लिया, उनकी कमर और जाँघों को मज़बूती से पकड़ा, और उन्हें बेड की तरफ ले गए। उन्होंने दीदी को धीरे से बेड पर लिटा दिया। फिर अंकल ने मुड़कर कमरे के दरवाजे की तरफ देखा और उसे धीरे से बंद कर दिया।
फिर दरवाजा बंद करने के बाद अंकल धीरे-धीरे दीदी के पास वापस आए। उनके हाथ में एक छोटा सा तेल का डब्बा था, जिसे उन्होंने बेडसाइड टेबल पर रख दिया। अब अंकल ने दीदी की दोनों जाँघों को अपने हाथों से हल्के से पकड़ा और उन्हें थोड़ा-थोड़ा फैलाना शुरू किया। उस समय तक दीदी की जाँघें पूरी तरह सटी हुई थीं, लेकिन जैसे ही उन्होंने उन्हें अलग किया, दीदी की नंगी, गीली और कामुक चूत पूरी तरह से खुलकर साफ-साफ नजर आने लगी। उसकी दोनों फुंदियाँ हल्की-हल्की लाल हो चुकी थीं और बीच में क्लिटोरिस छोटा-सा उभरा हुआ था, जो पहले से ही सूजकर खड़ा हो गया था।
अंकल ने डब्बे का ढक्कन खोला और उसमें से सरसों का तेल अपनी उँगलियों पर लिया। उन्होंने तेल को दीदी की चूत पर धीरे-धीरे लगाना शुरू किया—पहले दोनों फुंदियों के बाहर, फिर बीच की दरार में, और अंत में क्लिटोरिस पर हल्का-सा दबाव देकर गोल-गोल घुमाने लगे। तेल की चिकनाहट से दीदी की चूत चमक उठी और उनकी साँसें तेज हो गईं। उसी समय दीदी ने जोश में आकर अपना हाथ अंकल की लूँगी की तरफ बढ़ाया। उन्होंने लूँगी का नाड़ा खींचा और लूँगी को नीचे सरका दिया। अंकल का लंड बाहर आ गया—करीब आठ इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ और एकदम तनकर सीधा खड़ा हुआ हुआ। उसका टोपा गहरा गुलाबी था और पहले से ही थोड़ा गीला हो चुका था। दीदी ने उसे अपने नरम हाथ में पकड़ा, ऊपर-नीचे सहलाना शुरू किया और उँगलियों से उसके टोपे को हल्के-हल्के मसलने लगीं।
करीब दो मिनट तक दोनों ऐसे ही एक-दूसरे के अंगों को सहलाते रहे—अंकल दीदी की चूत पर तेल लगाते और उँगलियाँ अंदर-बाहर करते, जबकि दीदी उनके लंड को मुठ्ठी में जकड़कर जोर-जोर से हिलाती रहीं। दोनों के चेहरे पर खुशी और कामुकता साफ झलक रही थी। फिर अंकल दीदी की जाँघों के बीच में बैठ गए। उन्होंने अपना लंड पकड़ा और उसके टोपे को दीदी की चूत की दरार पर सटा दिया। जैसे ही लंड का टोपा चूत की फुंदियों को छूया, दीदी ने तुरंत अपने दोनों हाथों से अपनी चूत की दोनों फुंदियों को फैलाकर खोल दिया, ताकि अंदर का गुलाबी रास्ता पूरी तरह खुल जाए।
अंकल ने अपनी कमर को बहुत धीरे-धीरे आगे धकेला। उनका लंड का टोपा धीरे-धीरे चूत के मुंह में सरकने लगा। दीदी ने अपनी साँसें तेज खींचनी शुरू कर दीं और उनका शरीर हल्का-सा काँप उठा। अंकल ने थोड़ा और दबाव दिया तो टोपा पूरी तरह अंदर चला गया। अब अंकल दीदी के ऊपर पूरी तरह लेट गए, अपनी छाती को उनकी छाती से सटाया और कमर को हिलाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे धक्के देने लगे। दीदी के मुंह से आवाजें निकलने लगीं—“आअह्ह्हह… ऊऊओह्ह्ह… आह्ह्हह… उूम्मम्म…” हर धक्के के साथ उनकी आवाजें और तेज होती गईं।
कभी-कभी अंकल जोर से झटका लगाते, जिससे दीदी का पूरा शरीर हिल जाता और बेड की चादरें सरकने लगतीं। दीदी ने अपने दोनों हाथ अंकल की पीठ पर रख दिए और उनकी पीठ को सहलाने लगीं—नाखूनों से हल्का-सा खरोंचते हुए। अंकल अब दीदी के गालों को चूमने लगे, उनके होंठों को चाटते हुए। अपने दोनों हाथों से उन्होंने दीदी के दोनों बूब्स को मज़बूती से पकड़ लिया और उन्हें जोर-जोर से दबाने लगे, निप्पल्स को उँगलियों से मसलते हुए। दीदी मस्ती में आकर—“आअह्ह… ऊऊओह्ह्ह… ऊफ्फ्फ…”—बड़ी अजीब और कामुक आवाजें निकाल रही थीं।
कुछ देर बाद अंकल ने अपना लंड आधा तक दीदी की चूत में डाल दिया। अब उन्होंने दीदी के दोनों पैरों को पकड़ा, उन्हें घुमाकर मोड़ा और जाँघों को पूरी तरह फैला दिया। दीदी ने उनकी मदद की और अपने पैरों को और चौड़ा कर लिया। अंकल खुद को दीदी के दोनों पैरों के बीच फंसाकर पूरी तरह सेट हो गए। अब उन्होंने लंड को फिर से झटके देने शुरू किए। दीदी ने अपनी गर्दन को ऊपर उठा-उठाकर आहें भरनी शुरू कर दीं—“आह्ह… ओह्ह… उफ्फ…”।
अंकल ने बीच में रुककर पूछा, “क्या तुम्हें ज्यादा तेज दर्द हो रहा है?” दीदी ने कराहते हुए, अजीब सी कामुक आवाज में जवाब दिया, “उफ्फ्फ… नहीं… ऊऊईईईई… आह्ह… ओह्ह्ह…”। सुनते ही अंकल ने अपनी कमर को आगे-पीछे करके धक्कों की स्पीड बढ़ा दी। हर धक्का पहले से ज्यादा गहरा और तेज था। कुछ ही देर में अंकल का पूरा आठ इंच का लंड दीदी की चूत के अंदर पूरी तरह समा गया। अब दीदी भी साथ देने लगीं—उन्होंने अपने कूल्हों को ऊपर-नीचे करके हल्के-हल्के धक्के देने शुरू कर दिए। उनके कूल्हों का लगातार ऊपर-नीचे होना देखकर साफ पता चल रहा था कि वो उस समय पूरे जोश में थीं और अंकल के लंड को अपनी चूत में अंदर-बाहर होने में उन्हें भारी मज़ा आ रहा था।
फिर कुछ देर बाद अंकल ने दीदी के नरम, गुलाबी होंठों को अपने होंठों में दबा लिया। उन्होंने गहरा चुंबन करना शुरू किया, जीभों को एक-दूसरे में घुमाते हुए। साथ ही अब वो अपने लंड को दीदी की चूत में पहले से भी ज्यादा ज़ोर-ज़ोर से धक्के देकर अंदर-बाहर करने लगे थे—तेज, गहरे और लगातार।
दोस्तों अब उन दोनों की तरफ से बराबर लगते हुए धक्कों को देखकर मुझे साफ पता चलने लगा था कि वो दोनों अपने उस खेल में अब उसकी चरम सीमा पर पहुंच चुके थे।
अंकल की कमर हर बार जोर-शोर से आगे-पीछे हो रही थी। उनके मोटे, लंबे और पूरी तरह खड़े लंड का सिरा दीदी की चूत की गहराई तक हर धक्के के साथ पूरी ताकत से जा रहा था।
दीदी भी अपनी कमर को ऊपर उठाकर हर धक्के का जवाब दे रही थीं। उनकी दोनों जांघें फैली हुई थीं। पांवों की उंगलियां सिकुड़कर चादर को कसकर पकड़ रही थीं।
उनकी चूत की भीतरी दीवारें अंकल के लंड को इतनी कसकर जकड़ रही थीं कि हर बार बाहर निकलते वक्त एक चिपचिपी, गीली आवाज कमरे में गूंज रही थी।
मैंने यह सारा धक्के देने का चुदाई का सिलसिला पूरे आधे घंटे तक लगातार देखा।
कभी अंकल रुक जाते। उनकी सांसें तेज-तेज चलतीं। पसीने से उनका बदन चमक रहा होता।
फिर दीदी ही अपनी कमर हिलाकर उन्हें फिर से अंदर खींच लेतीं।
कभी अंकल रुकते ही दीदी थोड़ा रुककर सांस लेतीं और तुरंत अंकल फिर से जोरदार धक्के मारने लगते।
कई बार तो वो दोनों एक साथ ही बराबरी से धक्के दे रहे थे। अंकल नीचे से ऊपर की ओर पूरी ताकत से लंड अंदर डालते।
दीदी ऊपर से नीचे की ओर अपनी चूत को उनके लंड पर पटकतीं। जिससे उनके दोनों शरीरों के टकराने की थप्पड़ जैसी आवाज हर बार कमरे में भर जाती।
दीदी की चूत से निकलता रस अब इतना ज्यादा हो चुका था कि हर धक्के के साथ सफेद झाग बनकर उनकी जांघों पर और चादर पर फैल रहा था।
फिर आखिरकार दोनों बारी-बारी से झड़ गए।
पहले अंकल का शरीर अचानक सख्त हो गया। उनकी कमर कुछ सेकंड के लिए रुक गई।
फिर एक लंबी, गहरी सिसकारी के साथ उन्होंने दीदी की चूत के अंदर जोर-जोर से लंड को दबाया।
गरम-गरम वीर्य की मोटी-मोटी धारें छोड़नी शुरू कर दीं। मैंने साफ देखा कि उनकी गांड की मांसपेशियां बार-बार सिकुड़ रही थीं।
हर सिकुड़न के साथ वो दीदी की चूत के सबसे गहरे हिस्से में और वीर्य भर रहे थे।
दीदी भी उसी वक्त झड़ गईं। उनकी पूरी देह कांप उठी।
उनकी चूत की दीवारें अंकल के लंड को इतनी जोर से निचोड़ने लगीं कि अंकल की सिसकारी और भी तेज हो गई।
दीदी के मुंह से एक लंबी, दबी हुई कराह निकली। उनकी आंखें बंद हो गईं।
उनके निप्पल सख्त होकर सीधे खड़े हो गए।
दोनों के झड़ने के बाद कुछ पल तक वे ऐसे ही जुड़े रहे। सांसें तेज-तेज चल रही थीं।
पसीने से तर बदन आपस में चिपके हुए थे।
फिर अंकल झड़ जाने के बाद भी कई मिनट तक दीदी के ऊपर ऐसे ही लेटे रहे।
उनका भारी शरीर धीरे-धीरे ढीला पड़ता गया। उनका लंड अभी भी आधा अंदर ही था और धीरे-धीरे नरम हो रहा था।
दीदी की चूत से अब वीर्य और उनका अपना रस मिलकर धीरे-धीरे बाहर रिसने लगा था।
एक पतली सफेद धारा बनकर उनकी गांड की दरार की ओर बह रही थी।
आखिरकार अंकल ने धीरे से अपनी कमर पीछे खींची।
अपना अब नरम हो चुका, चिपचिपा लंड दीदी की चूत से बाहर निकाला।
लंड के सिरे से अभी भी एक लंबी, सफेद डोर लटक रही थी जो टूटकर दीदी की चूत के होंठों पर जा गिरी।
जैसे ही लंड पूरी तरह बाहर आया, दीदी ने अपनी दोनों आंखें धीरे-धीरे खोलीं।
शर्म से लाल होकर मुस्कुराते हुए अपने चेहरे को दोनों हाथों से ढक लिया।
अब अंकल ने भी हंसते हुए उनसे कहा, “अब इस तरह से चेहरा क्या ढकना है? देखने दो मुझे यह सुंदर मुखड़ा जिसके लिए मैं पागल हो चुका हूँ।
ऐसा सुंदर गोरा बदन, गोल चेहरा और इतना कामुक बदन मैंने पहले कभी नहीं देखा। इसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ।”
फिर अंकल ने धीरे से दीदी के दोनों हाथों को उनके चेहरे से हटाया।
उनकी आंखों में देखते हुए पूछा, “क्या तुम्हें मेरे साथ यह खेल खेलने में मज़ा नहीं आया?”
तुरंत ही दीदी ने अपना सिर हिलाते हुए जवाब दिया, “हाँ, मुझे बहुत मज़ा आया।”
अंकल ने मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथों से दीदी के गोल, भरे हुए, दूधिया बूब्स को पकड़ा।
धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाने लगे। उनकी हथेलियां बूब्स की नरम, गर्म त्वचा पर फिसल रही थीं।
निप्पल्स को बीच-बीच में अंगूठे से रगड़ रहे थे।
कुछ देर बाद उन्होंने दोनों निप्पल्स को अपनी उंगलियों से पकड़कर हल्का सा दबाया।
जिससे दीदी के मुंह से एक छोटी-सी सिसकारी निकल गई।
फिर अंकल ने अपना मुंह नीचे करके एक बूब को पूरी तरह अपने मुंह में भर लिया।
जोर-जोर से चूसने लगे। उनकी जीभ निप्पल के चारों ओर गोल-गोल घूम रही थी।
कभी हल्का सा काटते, कभी चाटते, और कभी पूरी ताकत से खींचते।
दीदी जोश में आ गईं। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अंकल के सिर को अपनी छाती पर और जोर से दबा दिया।
जैसे चाह रही हों कि वो और गहराई से चूसे।
उनकी सांसें फिर से तेज हो गईं। छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।
कुछ देर यह सब करने के बाद अंकल धीरे से दीदी के ऊपर से हट गए।
उन्होंने बिस्तर के किनारे बैठकर अपनी लुंगी उठाई।
उसे वापस अपने कमर पर लपेट लिया।
फिर बिस्तर से नीचे उतरकर कमरे का दरवाजा खोला।
चुपचाप अपने कमरे की ओर चले गए।
अपने कमरे में पहुंचकर उन्होंने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
अब मैंने देखा कि दीदी कुछ देर तक नंगी ऐसी ही लेटी रही।
उनकी सांसें धीमी हो रही थीं। चूत से अभी भी थोड़ा-थोड़ा वीर्य रिस रहा था।
फिर उन्होंने धीरे-धीरे उठकर अपने बिखरे हुए सारे कपड़े इकट्ठे किए।
ब्लाउज, पेटीकोट और साड़ी सब पहन लिए।
दोबारा बिस्तर पर लेटकर सो गईं।
दोस्तों मैं पूरी रात को यह बात जानने के लिए जागता रहा कि क्या अंकल दोबारा से आकर मेरी दीदी के रूम में जाते हैं या नहीं।
हो सकता है कि वो दोनों दोबारा वैसी ही चुदाई के मजे लेने लगें।
इसलिए मैं थोड़ी-थोड़ी देर में उठाकर बार-बार खिड़की से अपनी दीदी के कमरे में झांककर देखता रहा।
दोस्तों जैसा मैंने सोचा था ऐसा, लेकिन अंकल ने नहीं किया।
फिर दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर जब मैंने तुरंत ही अपने कमरे का दरवाजा खोला और मैं अपने कमरे से बाहर आया, तभी मैंने देखा कि अंकल अब वापस अपने घर जाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुके थे।
वे अपने बैग को कंधे पर लटकाए हुए खड़े थे, साफ-सुथरे कपड़े पहने हुए, दाढ़ी साफ की हुई, और चेहरे पर हल्की मुस्कान थी जैसे पिछली रात की यादें अभी भी उनके मन में ताजा हों।
तभी दीदी भी अपने कमरे से बाहर निकलीं। वे हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में थीं, बाल अभी भी थोड़े बिखरे हुए थे, लेकिन चेहरे पर एक नई चमक थी।
वे सीधे मेरे सामने से गुजरकर रसोई में चली गईं।
कुछ ही मिनटों में वे चाय का प्याला लेकर वापस आईं।
चाय की गरम भाप उठ रही थी, और कमरे में हल्की इलायची की खुशबू फैल गई।
अंकल ने चाय को उनके हाथ से लिया, उंगलियों को थोड़ा स्पर्श करते हुए, और धीरे-धीरे पीना शुरू किया।
उनकी नजरें दीदी के चेहरे पर टिकी हुई थीं, जैसे कुछ कहना चाहते हों लेकिन शब्द न निकल रहे हों।
दीदी भी थोड़ा शरमाकर नीचे देख रही थीं, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
फिर अंकल ने चाय खत्म की, प्याला टेबल पर रखा, और मेरी तरफ मुड़कर मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, मैं चलता हूँ।”
उन्होंने दीदी की तरफ देखा और धीरे से बोले, “बाय, अपनी ख्याल रखना।”
दीदी ने बस सिर हिलाकर जवाब दिया, उनकी आंखों में एक चमक थी।
अंकल ने दरवाजा खोला, बाहर निकले, और कुछ ही पलों में उनकी आवाज गली में गूंजती हुई दूर हो गई।
हमारे घर में अब सन्नाटा छा गया।
दोस्तों, मेरी दीदी यह बात मन ही मन सोचकर बहुत खुश थीं कि मैंने पिछली रात को हुई उनके साथ उस चुदाई की घटना, उस खेल को नहीं देखा।
उनके चेहरे पर जो राहत थी, वो साफ दिख रही थी — जैसे कोई बड़ा राज सुरक्षित रह गया हो।
दोस्तों, सच कहूँ तो मैं भी यही चाहता था कि उनको यह सब पता न चले।
हो सकता है कि दोबारा कभी मुझे उनकी वैसी ही चुदाई को देखने का मौका मिले, और इस बार भी वो बिल्कुल अनजान रहें।
दोस्तों, वैसे यह पहला मौका था जब मैंने अपनी दीदी को किसी बड़े आदमी से इस तरह पागलों जैसी, पूरी जोश भरी चुदाई करते देखा था।
उनकी कराहें, उनके शरीर की हरकतें, अंकल की ताकत, सब कुछ इतना जीवंत और उत्तेजक था कि मुझे बहुत ही अच्छा लगा था।
इसलिए मैंने इस सारी घटना को बड़ी मेहनत से लिखकर आप सभी की सेवा में हाजिर किया है।
शायद यह आपको भी अच्छी लगे।
अब मैं जाने की अनुमति चाहता हूँ।
लेकिन दोबारा अगर मेरे साथ कुछ हुआ या मैंने कुछ ऐसा देखा जिसको मैं आपकी सेवा में दोबारा हाजिर कर दूँ, तो यह मेरी अच्छी किस्मत होगी।
धन्यवाद।
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