भाई ने दीदी की चूत फाड़ी बीवी समझकर

Bahen bhai sex story, Didi chudai sex story, Andhere me chudai sex story: मेरी उम्र 23 वर्ष हो रही है। मेरे परिवार में मात्र तीन लोग रहते हैं, मैं, मेरी माँ और मेरी पत्नी। और हाँ, एक और सदस्य आज ही आया जो हमारे ही बीच का है पर आज से ठीक दो साल पहले ही उसकी शादी हो चुकी है, जो अपने ससुराल में रहती है, वह है मेरी दीदी। जिसके पति तीन दिन पहले अरब देश जा चुके हैं, जिसके चलते वह हमारे यहाँ रहने आ गई है।

पर आते ही मेरे कमरे और मेरी बीवी पर पहला अधिकार जमा लिया। सबकी दुलारी होने से कोई कुछ नहीं मना करता और किसी काम को करने से नहीं रोकता है। माँ की दुलारी तथा मेरी भी बड़ी दीदी होकर भी साथ साथ पले बढ़े हैं क्योंकि मुझसे मात्र दो साल ही बड़ी है।

हम लोग उनकी सेवा में लगे हुए थे और देखते-देखते शाम, फिर रात भी हो गई, परन्तु दीदी मेरे कमरे में जमी रही। अंत में मुझे दूसरे कमरे में यह सोच कर सोना पड़ा कि शायद आज ही आई है तो सो गई, कल से दूसरे कमरे में सोयेंगी। दूसरे कमरे में आकर मैंने सोने की कोशिश की मगर नींद नहीं आई तो टी.वी. चला लिया। शनिवार होने से चैनल बदलते हुए मेरा हाथ रैन टी.वी. पर रुक गया जहाँ गर्म फिल्म आ रही थी।

अब तो मेरी नींद भी जाती रही, एक तो बीवी से डेढ़ साल में पहली बार रात में अलग सोना, उस पर से रैन टी.वी. का कहर। स्क्रीन पर नंगी औरतें पुरुषों के लंड को मुंह में लेकर चूस रही थीं, उनकी जीभ लंड की नसों पर सरक रही थी, पुरुषों के मुंह से सिसकारियां निकल रही थीं। मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया, पैंट के अंदर फड़फड़ा उठा। मैंने पैंट का नाड़ा खींचकर ढीला किया और अपना सख्त, गर्म लंड बाहर निकाला। उसकी चमड़ी पीछे खिंच गई थी, गुलाबी सुपारा चमक रहा था और उसकी नोक से पहले ही पारदर्शी रस की बूंद टपक रही थी।

मैंने दाहिने हाथ से लंड को जड़ से पकड़ा, ऊपर-नीचे करने लगा। बाएं हाथ से अपने अंडकोष को हल्के-हल्के दबाता रहा। टी.वी. पर एक दृश्य आया जिसमें औरत घुटनों के बल बैठकर पुरुष का लंड गले तक अंदर ले रही थी, गला फुलाकर चूस रही थी। मेरी सांसें तेज हो गईं। मैंने लंड की चमड़ी को तेजी से ऊपर-नीचे किया, सुपारे पर अंगूठे से रगड़ा। कमरे में सिर्फ मेरी सांसों की आवाज और टी.वी. की हल्की आवाज गूंज रही थी।

मैंने कल्पना की कि मेरी बीवी आरती मेरे सामने घुटनों पर है, उसका मुंह मेरा लंड निगल रहा है, उसकी जीभ मेरे सुपारे को चाट रही है। मेरी कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी। मैंने लंड को और जोर से मसलना शुरू किया, हाथ की गति बढ़ा दी। अंडकोष सिकुड़ने लगे, पूरा शरीर तन गया। टी.वी. पर पुरुष ने औरत के मुंह में झड़ना शुरू किया, गाढ़ा वीर्य उसके होंठों से टपक रहा था। उसी क्षण मेरे लंड से भी गरम-गरम वीर्य की धार निकली, पहले जोर का फुहार मेरे पेट पर पड़ा, फिर दूसरा, तीसरा। मैंने दांत भींच लिए, सिसकारी दबाकर रोका ताकि आवाज बाहर न जाए। वीर्य मेरी उंगलियों पर, पेट पर, पैंट पर फैल गया। सांसें तेज थीं, दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

मैंने कुछ देर ऐसे ही लेटे रहकर सांस संभाली, फिर टीशू से साफ किया। मगर मन टी.वी. बिना देखे मान ही नहीं रहा था। मैंने फिर चैनल पर वही फिल्म लगाई और दूसरी बार भी पूरा मुठ मार डाला, इस बार और लंबे समय तक, और ज्यादा जोर से। किसी तरह मुठ मारते पूरी रात काटनी पड़ी। पता नहीं कब नींद लग गई।

सुबह काफी देर तक सोता रहा। जब उठा तब मेरी बीवी नाश्ता बना रही थी। मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोली, “लगता है कि काफी निश्चिंत होकर रात में सोये हैं जनाब!” मेरा नाराजगी भरा चेहरा देख कर और कुछ न बोल कर चाय का प्याला मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैं भी कुछ कहे बिना चुपचाप से चाय पीने लगा।

दिन भर सभी अपने अपने काम में लग गए, मैं भी अपने ब्रोकिंग एजेंसी को देखने चला। दिन भर तो काम में लगा रहा, शाम को घर आने पर चाय और नाश्ता देकर बीवी फिर दीदी के पास जाकर बैठ गई जो मेरे ही सामने के कुर्सी पर बैठी नाश्ता ले रही थी। अब मैंने थोड़ा ध्यान दीदी की तरफ दिया, सोचने लगा कि क्या दीदी आज भी मेरे ही कमरे में सोयेंगी? और बातों बातों में पता लगा कि वे आज भी नहीं जान छोड़ने वाली!

फिर वही कहानी पिछली रात वाली। मुझे आज फिर अकेले दूसरे कमरे में सोना था! पर आज मुझे दीदी पर बहुत गुस्सा आ रहा था और बकबकाते हुए मैं बाहर आ गया। पिछली पूरी रात खराब कर के रख दी थी! रात होते ही मेरा मुठ मारना शुरु हो गया और आज न जाने कैसे रात कट गई, पता नहीं कब नींद लग गई! सुबह जगा तो पूरे सात बज रहे थे।

मैंने सोच रखा था चाहे कुछ भी हो आज रात आरती को नहीं छोड़ना है, या तो मेरे कमरे में या रसोई में, कहीं भी चुदाई होगी तो होगी! जैसे ही दीदी ने नहाने के लिए स्नानघर में प्रवेश किया, मैं मौका देख कर रसोई में घुस गया और पीछे से आरती को पकड़ लिया। मेरे दोनों हाथ सीधे उसके स्तनों पर गए। मैंने उसकी कमीज के ऊपर से ही दोनों बोबों को जोर से दबाया, हथेलियों में भरकर मसलने लगा। उसकी निप्पल्स पहले से ही सख्त थीं, कपड़े के ऊपर से ही महसूस हो रही थीं। मैंने अपनी हथेलियों से उन्हें रगड़ा, अंगूठों से निप्पल्स को दबाकर घुमाया।

साथ ही मैंने अपना कमर उसकी कमर से सटाया, अपना फनफनाता हुआ, पूरी तरह खड़ा लंड उसके चूतड़ों की दरार में जोर से दबा दिया। पैंट और साड़ी के बीच भी उसकी गर्माहट और नरमी साफ महसूस हो रही थी। मैंने उसके दोनों गालों को पीछे से जोर से चूम लिया, होंठ उसके गालों पर दबाकर चूसा, जीभ से चाटा। आरती ने हल्की सिसकारी भरी और कांपते हुए बोली, “कोई देख लेगा! क्या करते हो?”

मैंने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, “दो रातों में ही अकड़ू महराज पायजामा से बाहर हो रहे हैं। अगर दो रातें और बिता ली तो पायजामा से निकल किसी बिल में ही घुस जाएंगे तो ढूंढना मुश्किल हो जाएगा!”

आरती हल्के से हंसी, उसका शरीर मेरे स्पर्श से और गर्म हो रहा था। मैंने कहा, “देखो आरती, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा! आज रात कुछ करो यार! यह दीदी अपने तो अकेली रहने की सजा कट रही हैं, साथ में हमें भी मार रही हैं! या तो तुम मेरे कमरे में आ जाना या रात को यहीं रसोई में ही चुदाई करेंगे!”

आरती भी थोड़ी उत्तेजित हो चुकी थी, उसकी सांसें तेज थीं। वह बोली, “नहीं, रसोई में ठीक नहीं होगा! मैं तुम्हारे कमरे में भी नहीं आ सकती क्योंकि दीदी सोचेगी कि दो रात में जवानी काबू में न रही जो मराने चली गई।”

मैंने कहा, “तो मैं मुठ मार कर सोता रहूं? नहीं जी!”

आरती ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैंने ऐसा कब कहा? अगर यह समस्या सदा के लिए टालनी है तो हम अपने कमरे में ही करेंगे। अगर दीदी जाग गई तो शरमा कर कल से नहीं सोयेंगी और न जगी तो रोज ऐसे ही चलेगा!”

आरती का जवाब सुन कर मैंने कहा, “पर इसमें तो दीदी के जागने का ज्यादा चांस है, जागने पर क्या सोचेंगी?”

आरती ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, “मैं तो चाहती हूं कि रात को दीदी जग जाए जिससे कल से यह समस्या खत्म हो जाए! समझे बुद्धू?”

मैं समझने की कोशिश करता हुआ काम बनता देख ज्यादा न पूछा पर जानना चाहा, “पर रात में मैं तुझे पहचानूंगा कैसे?”

वह बोली, “मैं बेड के इसी किनारे सोऊंगी और दरवाजा खुला रखूंगी! तुम धीरे से आ जाना बस!”

मैं कुछ और पूछता, इससे पहले दीदी नहाकर निकलने जा रही थी।

तो मैं धीरे से निकल चला और रात के इंतजार में जल्दी से तैयार हो कर अपने काम पर चल दिया। और आज तो तीसरी रात होने के कारण उसमें और खूबसूरती आ गई है। अब मुझे केवल रात का इन्तजार था। आखिर शाम हुई, फिर रात हुई और सबने खाना खाकर अपने अपने बिछावन को पकड़ लिया पर दीदी मेरे ही कमरे में डेरा जमाये हुए थी।

इन्तजार करते करते लगभग रात के ग्यारह बज चुके थे। सम्पूर्ण अंधेरा था क्योंकि बिजली भी नहीं थी, मकान में एकदम सन्नाटा छाया था, माँ के कमरे से खर्राटों की आवाज आ रही थी। सुनने में ऐसा लगा कि वह गहरी नींद में होगी। मैंने निश्चिन्त होने के लिये पांच मिनट का इन्तजार किया।

अब लगभग अपने कमरे के पास पहुँच मैंने अपना दायां हाथ इस प्रकार से दरवाजे के तरफ़ बढ़ाया कि कोई हलचल न होने पाये। दरवाजा पहले से ही हल्का-सा खुला था, जैसा आरती ने कहा था। मैंने जूते उतारे, नंगे पैर धीरे-धीरे कमरे के अन्दर कदम रखा। फर्श ठंडा था, मेरे तलवों को छूकर एक सिहरन सी दौड़ गई। कमरे के अन्दर अपने बेड के पास आकर देखने की कोशिश करने लगा पर कुछ साफ न दिखने से अन्दाजा लगाया कि आरती ने कहा था कि वह बेड के इसी तरफ़ सोयेगी।

आज पहली बार मुझे अपने ही घर में अपने कमरे में चोरों की तरह घुसना पड़ रहा था। धड़कते दिल से मैं बिछावन के पास पहुँचा। हल्की चाँदनी खिड़की से आ रही थी, जिससे आरती की आकृति धुंधली-सी दिख रही थी। मैंने मध्यम रोशनी के सहारे इस तरफ़ की आकृति को छुआ। मेरा हाथ सबसे पहले उसके गोल, मुलायम चूतड़ पर लगा। उसकी पैंटी के ऊपर से भी उसकी गर्माहट और नरमी महसूस हुई। मैंने कुछ देर रुककर अपनी सांसें नियंत्रित कीं, फिर अपना हाथ धीरे-धीरे आगे उसकी पेट की ओर बढ़ाया। मेरी उंगलियां उसके नाभि के गड्ढे को छूकर आगे सरकीं और आहिस्ता से उसके उन्नत, भरे हुए स्तनों की ओर खिसक गईं।

मेरा हाथ का पंजा उसके स्तनों के पास पहुँच कर पूरे पंजे से उसके बोबे दबाने लगा। वे इतने मुलायम और भारी थे कि मेरी हथेली में पूरी तरह समा नहीं रहे थे। मैंने हल्के-हल्के दबाव बढ़ाया, उंगलियों से उनकी निचोड़ ली, फिर अंगूठे से उसकी सख्त हो चुकी निप्पल्स को कपड़े के ऊपर से रगड़ा। आरती की सांसें थोड़ी तेज हुईं, लेकिन वह अभी भी आँखें बंद किए लेटी रही।

अब मैंने उसके खुले गले के ब्लाउज के गले के अंदर हाथ डाला। मेरा पहला स्पर्श उसकी सिल्की, पतली ब्रा का हुआ, जो उसकी त्वचा से चिपकी हुई थी। पर इससे मुझे संतुष्टि नहीं हुई। मैंने और धीरे से अपना हाथ उसके स्तनों के बीच की गहरी घाटी में प्रविष्ट करा दिया। वहाँ की गर्मी और नमी ने मुझे और उत्तेजित कर दिया। आहिस्ता-आहिस्ता मैंने अपने हाथ को उसके दोनों स्तनों पर घुमाना शुरू किया, हथेली से उन्हें नीचे से ऊपर उठाते हुए मसलता रहा। फिर मैंने ब्रा को थोड़ा सा ऊपर सरकाया और सीधे उसकी नंगी त्वचा पर हाथ फेरा। उसकी निप्पल्स अब पूरी तरह खड़ी और सख्त थीं। मैंने उन्हें अंगूठे और तर्जनी के बीच पकड़कर हल्के से मरोड़ा, फिर दोनों दूध की डोडियों को बारी-बारी से दबाया, खींचा और रगड़ा। आरती के मुंह से हल्की-सी सिसकारी निकली, जो दबी हुई थी।

अब मेरे दिमाग ने काम करना बिल्कुल बंद कर दिया। मैं बिल्कुल कामातुर हो चुका था। मैं यह भूल चुका था कि यदि दीदी ने जागकर देख लिया तो पता नहीं क्या सोचने लगेगी! अब मैं आरती के स्तनों के साथ उसकी चूत को भी मसलना चाहता था।

मैंने आहिस्ता से उसका साया ऊपर खींचा और उसकी मखमली पैंटी पर हाथ रख दिया। पैंटी पहले से ही गीली हो चुकी थी, बीच में एक गोल गीला धब्बा साफ महसूस हो रहा था। कोई प्रतिक्रिया न देखकर मैंने पैंटी के किनारे से हाथ अंदर डाला और सीधे उसकी चूत को सहलाने लगा। मेरा हाथ उसके छोटे, मुलायम भगनासा के दाने से टकराया। मैंने उंगलियों से उन छोटी-छोटी मखमली झांटों को सहलाया, फिर दाने को हल्के-हल्के गोल-गोल घुमाने लगा। आरती की कमर हल्की-सी उठी, उसकी सांसें और तेज हो गईं।

अब लगा मेरे दोनों हाथों में जन्नत है। मेरा बायां हाथ तो उसके वक्षों से खेल रहा था, निप्पल्स को मसल रहा था, दबा रहा था, जबकि दायां हाथ उसके वस्ति-क्षेत्र का भ्रमण कर रहा था। मैंने दाने को और तेजी से रगड़ा, फिर दो उंगलियों से उसके होंठों को अलग करके बीच में सरकाया। वहाँ पहले से ही रस भरा हुआ था, गर्म और चिपचिपा।

अब मुझे यह तो सुनिश्चित हो चुका था कि वह नींद में नहीं है। मैंने हौले से उसके भगनासा के दाने को सहलाकर उत्तेजित करने की कोशिश की। पर वह भी आँखें मींचकर पड़ी हुई थी, शायद अभी भी नाटक कर रही थी। मैंने सोचा कि अब यह गर्म है तो समय भी तेजी से खिसक जा रहा है, इसके लिए दूसरा उपाय करना होगा। इधर उसके सिर के तरफ़ मैंने अपना लंड का रुख करके उसके मुंह के ऊपर रख दिया। मेरा लंड पहले से ही पूरी तरह खड़ा, नसों से फूला हुआ और सुपारे से रस टपकता हुआ था। जैसे ही मैंने उसे उसके होंठों पर रखा, आरती ने मुंह खोल लिया और मेरे लंड को धीरे-धीरे चूसना शुरू कर दिया। उसकी जीभ पहले सुपारे पर गोल-गोल घूमी, फिर पूरी लंबाई पर सरकी।

अब मैंने अपनी लुंगी खोलकर कमर से हटाते हुए उसे उसके मुंह से पूरा सटा दिया। लंड उसके मुंह में गहराई तक चला गया, उसकी गर्म, गीली जीभ और गालों की नरमी ने मुझे पागल कर दिया। उसमें से चिपचिपाहट भी निकल रही थी जो उसके होंठों को गीला कर रही थी, कुछ बूंदें उसके ठोड़ी पर भी टपकीं। अब दोबारा मैंने अपने दोनों हाथों को व्यस्त रखते हुए उसकी चूत में अपनी उंगली प्रविष्ट कराई। दो उंगलियां एक साथ अंदर गईं, वहाँ गीला-गीला और गरम था, मतलब वह पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी। उसकी चूत की दीवारें मेरी उंगलियों को जकड़ रही थीं।

स्तन मर्दन के साथ जैसे ही मैंने उंगली चूत में अंदर-बाहर करनी शुरू की, तेज-तेज धक्के देने लगा, तो आरती छटपटाने लगी। उसने अपनी नींद का नाटक छोड़ दिया और मेरी तरफ करवट बदलकर मेरे चूतड़ों पर हाथ फिराने के बाद मेरे लंड को अपने मुंह में तेजी से चूसना शुरू कर लिया। वह पूरी ताकत से लंड को मुंह में अंदर-बाहर कर रही थी, जीभ से सुपारे को चाट रही थी, होंठों से जड़ तक चूस रही थी। कभी गले तक ले जाती, कभी बाहर निकालकर सुपारे को चाटती। मैं तो अपने होशोहवास खो चुका था, वह भी पागलों की तरह लंड मुंह में अंदर-बाहर कर रही थी। उधर मैं भी उसे अपने दोनों हाथों से बराबर उत्तेजित कर रहा था, एक हाथ से उसके बोबों को मसलते हुए, दूसरा हाथ से चूत में उंगलियां तेजी से घुमा रहा था।

मैंने कमरे में अपने बगल की तरफ देखा, दीदी आराम से सोई हुई थी और सम्पूर्ण अंधेरा था, तो कोई डर नहीं था कि देख लेंगी। हम दोनों किसी भी किस्म की आवाज नहीं निकाल रहे थे क्योंकि दीदी जाग सकती थी। अब आरती की लगातार मेहनत के कारण दस मिनट में ही मेरा लंड स्खलित होने की कगार पर पहुँच गया। मेरा लंड उसके मुंह में पूरी तरह गहराई तक था, उसकी जीभ सुपारे को तेज-तेज चाट रही थी, गाल अंदर खींचकर चूस रही थी, और होंठ जड़ तक दबा रही थी। मेरे अंडकोष सिकुड़ गए, कमर कांपने लगी, पूरा शरीर तन गया। मैंने उसे हाथ के इशारे से समझाने की कोशिश की कि रुक जा, बाहर निकालूँ, पर उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। उसने और तेजी से मुंह चलाया, लंड को गले तक ले जाकर चूसा।

तो मैं भी क्या करता, मैंने भी वीर्य का फव्वारा उसके मुंह में छोड़ दिया। पहली धार जोर से उसके गले में गई, फिर दूसरी, तीसरी, गाढ़ा, गरम वीर्य उसके मुंह में भर गया। उसने भी हिम्मत दिखाते हुए पूरा का पूरा गटक लिया, जीभ से साफ करते हुए, कुछ बूंदें उसके होंठों के किनारे से टपकीं जिन्हें उसने जीभ से चाट लिया। अब मैं तो खाली हो गया, लंड धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा, किन्तु उसकी उत्तेजना शांत नहीं हुई थी। वह मेरे निर्जीव पड़े लंड को फिर से खड़ा करने की कोशिश करने लगी। उसने मुंह से निकालकर हाथ में पकड़ा, हल्के-हल्के मसलने लगी, सुपारे पर जीभ फेरती रही, अंडकोष को चाटा, फिर मुंह में लेकर धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। मात्र पाँच मिनट में ही हम दोनों सफल हो गए। मेरा लंड फिर कड़क होकर फुंफकारने लगा, नसें फूल गईं, सुपारा चमक उठा।

फिर एक दूसरे के शरीर को चूमने-सहलाने लगे। मैंने उसके होंठ चूमे, जीभ अंदर डालकर चूसी, उसकी जीभ मेरी जीभ से लिपट गई। हम दोनों पागलों की तरह लिपट गए और एक दूसरे के शरीर को टटोल कर आनंद लेने लग गए। मैंने उसकी चोली के बटन खोल दिए, ब्रा ऊपर सरकाई और उसके नंगे, भरे हुए स्तनों को दोनों हाथों से पकड़ लिया। निप्पल्स सख्त थीं, मैंने उन्हें मुंह में लेकर चूसा, जीभ से गोल-गोल घुमाया, हल्के से काटा। फिर उसकी पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया और उतार दिया। अब उसके तन और मेरे बीच में कोई कपड़ा नहीं था। उसकी चूत गीली और गरम थी, झांटें मुलायम।

मैं अब बेड पर बैठ गया, वह मेरी गोद में दोनों टांगों को बीच में लेकर अपने टाँगों को मोड़ कर इस प्रकार बैठी कि उसकी चूत मेरे लंड के सुपारे को स्पर्श करने लगी। मैंने अपना लंड पकड़कर उसके चूत के होंठों पर रगड़ा, फिर धीरे से अंदर डाला। उसकी चूत तंग और गीली थी, लंड अंदर जाता हुआ महसूस हुआ। वह मेरे सीने को हाथ से सहला रही थी, नीचे चुदाई चालू थी। वह भी हिलकर अपने शरीर को ऊपर-नीचे कर रही थी, मेरे लंड को पूरी तरह अंदर ले रही थी। मैंने उसके कूल्हों को पकड़कर ऊपर-नीचे करने में मदद की। फिर मैं बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों पर अपनी जीभ फिराने लगा। निप्पल्स को चाटा, चूसा, हल्के से दांतों से दबाया। उसके बाद मैंने उसकी गर्दन की दोनों तरफ कामुकता बढ़ाने वाली नसों पर जीभ फेरी, कान की लौ को चूसा, जीभ अंदर डालकर चाटा, फिर आँखों की भौंहों पर भी जीभ फिराई। वह मदमस्त होकर पागल हो उठी, उसकी सांसें तेज हो गईं, शरीर कांपने लगा।

दोनों की सांसें एक दूसरे में विलीन हो रही थीं। यदि हम किसी एकान्त कमरे में होते तो पागलपन में न जाने कितनी आवाजें निकालते, सिसकारियां, कराहें, लेकिन जगह और समय का ध्यान रखते हुए बिल्कुल खामोश रहने की कोशिश करते रहे। अब इस मदहोश करने वाली अनवरत चुदाई को लगभग आधा घण्टा हो चुका था। हमारी गति कभी तेज, कभी धीमी, लेकिन लगातार चल रही थी।

अब एक ही आसन में चोदते हुए थकान होने लगी थी। तभी आरती ने मुझसे गति बढ़ाने का इशारा दिया। मैंने उसके कूल्हों को और जोर से पकड़ा और तेज-तेज धक्के मारने लगा। लंड पूरी तरह अंदर-बाहर हो रहा था, उसकी चूत की दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं। कुछ ही क्षण में हांफते हुए वह चरमसीमा पर पहुँच गई। उसका शरीर कांप उठा, चूत सिकुड़ गई, मेरे लंड पर दबाव बढ़ा, वह पस्त होकर ढीली पड़ कर लेट गई। मैं तो अभी तक भरा बैठा था। मैंने कुछ समय रुककर इशारा किया कि अब मैं भी पिचकारी छोड़ना चाहता हूँ। तो उसने इशारे से कहा- रुको! वह खड़ी हुई और बेड पर हाथ रखकर सिर झुकाकर खड़ी हो गई, कूल्हे पीछे करके।

मैंने भी पीछे से उसकी चूत में लंड पेल दिया। एक झटके में पूरा अंदर चला गया। मैंने अपने दोनों हाथों से उसके उन्नत स्तनों को मसलते हुए उसे चोदने लगा। स्तनों को जोर-जोर से दबाया, निप्पल्स को मरोड़ा। फिर जन्नत की यात्रा शुरू हुई। मैं तेज-तेज धक्के मार रहा था, लंड उसकी चूत की गहराई तक जा रहा था। वह भी मदमस्त होकर आगे-पीछे होकर मुझे सहयोग देने लगी, कूल्हे घुमाकर लंड को और गहरा ले रही थी। हम दोनों ने अपनी गति और बढ़ा दी और लगभग दस मिनट बाद मेरी पिचकारी छुट गई। गरम वीर्य की धारें उसके अंदर गईं, मैंने आखिरी धक्के मारकर पूरा खाली कर दिया। हम दोनों पस्त हो गए।

वह कुछ समय रुक कर सफाई करने बाथरूम में जाकर वापिस अपनी बिछावन पर आ गई। भगवान का लाख-लाख शुक्र था कि दीदी अब तक सोई हुई थी और उनको इस चुदाई के बारे में शक भी नहीं हुआ।

अब मैं अपने कमरे में आकर आराम से सो गया। आज सुबह मेरा मन काफी खुश था। मैंने रसोई में बीवी को जब अकेले देखा तब उसके पास जाकर पीछे से बाहों में भर चूमना शुरू कर दिया। आरती मुझे मनाने के लिये मेरे बालों में उंगली फिराते बोली- “सॉरी जी! मैं रात में सो गई पर आप भी नहीं आए?”

मेरे कान में इतना पड़ना था कि मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। तो क्या मेरे साथ रात में दीदी थी? अब मैं समझ गया! यह घटना मेरे मन-मस्तिष्क पर एक चलचित्र की तरह स्पष्ट चल रही थी। हालांकि मैं भ्रम में रह गया लेकिन जब जान ही गया तो दोनों की तुलना करने लगा तो पाया कि वाकई में आरती से ज्यादा मजा तो दीदी को चोदने में आया!

अब वह अलग कमरे में भी सो कर मुझसे हर दो दिन बाद चुदती है, नैहर (मेरे घर) अब अकसर आती है मेरे साथ चुदाई के लिये और फिर उसके पास मैं भी अक्सर जाने लगा हूँ। वह आज भी मेरी बहुत अच्छी दोस्त है। आरती आज तक न जान पाई और ना मैंने उसे बताया। वह भी एक अद्वितीय अनुभव था।

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