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शादी से पहले दीदी ने भाई से ली पूरी ट्रेनिंग

Didi ki training sex story, Virgin Didi Bhai sex story: ये कहानी शुरू होती है जब मैं सिर्फ 18 साल का था और मेरी कज़िन (मेरे मामा की बेटी) 32 साल की थी। तीन बच्चों की माँ, भरपूर चूचियाँ, उछलते नितंब, भरे होंठ, चिकना सपाट और मांसल गोरा पेट। जब वो चलती तो मेरे पैंट के अंदर खलबली मच जाती।

कहानी चूत और उसके नशीले लिसलिसे पानी की है। चूत से पानी यूँ ही नहीं निकलता। चूत को सहलाकर, चाटकर, जीभ फिराकर, उंगलियों से मसलकर उसे इस अवस्था में लाना पड़ता है। अगर थोड़े शब्दों में कहें तो पृष्ठभूमि तैयार करनी पड़ती है।

मेरी कज़िन काजल की चूत से भी पानी निकले और लगातार निकले, इसकी भी पृष्ठभूमि तैयार करनी पड़ेगी। तो चलिए कुछ साल पहले चलते हैं और देखते हैं हमारी तैयारी।

मैं एक बहुत सुशील, सीधा-सादा, माँ-बाप का लाड़ला एकलौता संतान था। बड़े प्यार और स्नेह से मुझे रखा जाता। किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं होती।

काजल मेरे मामा की इकलौती संतान थी। बड़ी नटखट, शरारती और सारे घर को सर पर उठाने वाली। मेरे मामा भी हमारे साथ ही रहते थे। उनकी नौकरी भी हमारे ही शहर में थी। हमारा घर काफी बड़ा था। माँ ने ज़िद करके मामा को भी अपने साथ रहने को मजबूर कर दिया।

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काजल दीदी भले शरारती और नटखट हों, पर मेरे साथ बड़े स्नेह और प्यार से रहतीं। हमारी उम्र में काफी अंतर था। वो मुझे नंदू बुलातीं। मुझे अपने हाथों से खिलातीं। मेरे स्कूल का बस्ता तैयार करतीं। पढ़ाई में मदद करतीं।

हम दोनों का एक-दूसरे के बिना रहना मुश्किल हो जाता। मैं स्कूल से आता तो मेरी आँखें काजल दीदी को ढूँढतीं। घर के चारों ओर उन्हें ढूंढता। जब वो सामने दिखतीं तो मेरे सांस में सांस आता। मैं सीधा उनकी गोद में बैठ जाता। वो प्यार से मेरे बाल सहलातीं। दिन भर की थकान उनके स्पर्श से गायब हो जाती। मैं खिल उठता।

उन दिनों काजल दीदी 20-22 साल की थीं। एकदम जवानी के नशे में झूमती-लहराती रहतीं। मामा उनकी शादी की चिंता में डूबे रहते। हाई स्कूल के बाद वो घर में ही रहतीं। घर के काम में हाथ बटाना तो दूर, अपने में ही खोई रहतीं। कहानियाँ पढ़तीं, फिल्मी मैगज़ीन पढ़तीं।

मामा-मामी की डाँट का उन पर कोई असर नहीं होता। “अरे कुछ तो शर्म कर, कल को तेरी शादी होगी, ससुराल में हमारी नाक कटेगी ये लड़की।” मामी के इन तकिये के कलाम को काजल दीदी अनसुना कर देतीं। मुझे अपने बगल चिपकाते हुए बोलतीं, “नंदू, तेरी पढ़ाई हो गई?”

“हाँ दीदी।”

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“तो चल लुडो खेलते हैं।”

मेरे लिए ये शब्द जादू का काम करते। मैं फटाफट बिस्तर पर लुडो का बोर्ड बिछा देता। हम दोनों आमने-सामने बैठ जाते। इतने पास कि दीदी की गर्म साँसें मेरे चेहरे को छूतीं। इसमें स्नेह की गर्मी, निश्छल प्यार का स्पर्श और उनकी मदमस्त जवानी का झोंका भी शामिल रहता। मुझे बहुत भाता।

उन दिनों टीवी नहीं था, रेडियो का प्रचलन था। मेरे अलावा काजल दीदी का ये दूसरा चहेता था। उस समय की फिल्मों का एक-एक गाना उनकी ज़ुबान पर होता। हमेशा गुनगुनाती रहतीं अपनी सुरीली और मीठी आवाज़ में। दिन गुज़रते गए और मैं काजल दीदी के स्नेह और प्यार के बंधन में जकड़ता गया।

हम दोनों के बीच एक अटूट आकर्षण, बंधन, प्यार और स्नेह पनपता गया। फिर एक दिन जब मैं स्कूल से लौटा तो दीदी ने दरवाज़ा नहीं खोला। दरवाज़ा भिड़ा था। मेरे धक्का देते ही खुल गया। पर दीदी की जगह सन्नाटे ने स्वागत किया।

मैं तड़प उठा। दीदी कहाँ गईं? मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ा। अंदर झाँका। दीदी पलंग पर लेटी थीं। मैं और नज़दीक गया। वो पेट के बल लेटी थीं। सिर तकिए पर रखे सुबक-सुबक कर रो रही थीं।

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उनका चेहरा मेरी ओर था। गुलाबी गाल आँसुओं से सराबोर थे। तकिया गीला था। आखिर क्या बात हो गई? मैं उनके बगल बैठ गया और पूछा, “दीदी क्या हुआ? आप रो क्यों रही हैं?”

मेरी आवाज़ भी रुआँसी थी। दीदी ने मेरी तरफ चेहरा किया। उठकर बैठ गईं। मुझे अपनी छाती से लगाया। मुझे भींच लिया और फिर सुबक-सुबक कर रोने लगीं। मैं हैरान-परेशान था। पर उनकी छाती की गर्मी और स्तनों की नर्मी से अच्छा भी लगा। मैं एक अलग अनुभूति में डूबा था।

उनके साथ चिपके रहने का आनंद, पर उनके रोने से परेशान। दो अलग अनुभव। उनकी शरीर की सुगंध, आँसू और पसीने की नमकीन खूशबू। मेरा मुँह उनकी छाती से चिपका था कि मेरी नाक उनकी आर्मपिट की तरफ था। वहाँ से भी मादक खूशबू आ रही थी।

मेरी उधेड़बुन का हल दीदी ने निकाला। उन्होंने मुझे छाती से अलग किया। मेरे चेहरे को नर्म हथेलियों से थामा और बेतहाशा चूमने लगीं। गालों पर मुलायम होंठों से चुंबनों की बौछार कर दी। उनका रोना अब हिचकियों में बदल गया था। बीच-बीच में पूछतीं, “नंदू, मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी?”

तभी मामी कमरे में आईं। भाई-बहन का प्यार और दीदी का रोना देखकर बोलीं, “वाह रे काजल रानी, अभी शादी पक्की हुई और इतना रोना-धोना। बस बहुत हो गया। अब चुप कर। देख बेचारा नंदू स्कूल से कब का आ चुका है। उठ और उसे कुछ खिला।”

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तो ये बात थी। काजल दीदी शादी की वजह से रो रही थीं। मामी की बातों ने जादू किया। उनका रोना रुक गया। उन्होंने मुझे अलग किया। आँचल से चेहरा पोंछा और बोलीं, “अरे मेरा बच्चा अभी तक भूखा है। मैं पाँच मिनट में नाश्ता लाती हूँ।”

वो रसोई की तरफ भागीं। मैंने मामी से पूछा, “मामी, दीदी शादी से क्यों रो रही थीं? शादी की बात से तो सब खुश होते हैं ना?”

मामी ने झल्लाकर कहा, “नंदू बेटा, अब मैं क्या जानूँ इस पागल के दिमाग में क्या है। तू ही पूछ ले उससे।”

मैं दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए इंतज़ार कर रहा था। अब तक भूख-प्यास भूल चुका था। दीदी थाली और ग्लास लिए आईं। उस दिन वो बदली-बदली लग रही थीं। चाल में अल्हड़पन नहीं था। चेहरा सीरियस था।

वो मेरे बगल बैठीं। थाली रखी। कौर बढ़ाया। मैंने मुँह नहीं खोला। दीदी ने पूछा, “क्या हुआ नंदू? आज खाएगा नहीं? मुझसे नाराज़ है?”

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“नहीं दीदी। आज तक मैंने आपसे अलग बैठकर खाया है क्या?”

उनकी आँखों से फिर आँसू टपके। उन्होंने मुझे अपनी जांघों पर खींच लिया। “देख नंदू आज मुझे क्या हो गया है। इतनी सी बात भी भूल रही हूँ।”

उनकी गोद में बैठते ही शांति मिली। मैंने पूछा, “दीदी, शादी की बात से आप इतनी परेशान क्यों हैं? क्या आप खुश नहीं?”

उन्होंने आँचल से आँखें पोंछीं। मुस्कान लाने की कोशिश की। कौर खिलाया और बोलीं, “अरे नहीं नंदू। शादी की खुशी से ज्यादा मुझे तुमसे बिछड़ने का गम है। देखो ना, एक दिन नाश्ता कराने में देर हुई तो तुम्हें कितना बुरा लगा। जब मैं नहीं रहूँगी तो क्या होगा? क्या तू मेरे बिना रह पाएगा?”

इस सवाल ने मुझे झकझोर दिया। मुझे एहसास हुआ कि शादी के बाद दीदी किसी और की पत्नी होंगी। उसी पल उनका नज़रिया बदल गया। वो अब बहन नहीं, एक खूबसूरत औरत लग रही थीं।

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मैं उनकी गोद में बैठा था। उनके मुलायम जांघों में बैठने का अजीब मजा आ रहा था। उनकी गर्मी, साँसों का स्पर्श, मादक खुशबू। मैं इस आनंद में खो गया।

खाना खत्म हुआ। दीदी बोलीं, “हाथ-मुँह धो ले और मेरे कमरे में आ जाना।”

मैं उनके कमरे में गया। वो सामने बैठीं। साँसें एक-दूसरे को छू रही थीं। थोड़ी देर बाद बोलीं, “तू आज शाम को जब मैं तेरे कमरे में आई, उसके पहले क्या कर रहा था?”

मैं सकते में आ गया। क्या मूठ मारते देख लिया? मैंने कहा, “कुछ नहीं दीदी, होमवर्क कर रहा था।”

दीदी हँस पड़ीं। “हाँ होमवर्क कर रहा था। पर हाथ में कलम की बजाय कुछ और था ना?”

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मैं चुप रहा। दीदी बोलीं, “घबराओ मत। इस उम्र में ये नॉर्मल है। मुझे खुशी हुई कि मेरा नंदू नॉर्मल है।”

मैंने पूछा, “पर आपको कैसे पता?”

“तेरे कमरे में आई थी। तू हिल रहा था, काँप रहा था। हाथ जोरों से ऊपर-नीचे कर रहा था। मैं समझ गई। मज़े में डिस्टर्ब नहीं करना चाहा।”

मैं आश्वस्त हुआ। पूछा, “पर दीदी जब से आपकी शादी की बात सुनी है, आप मुझे ऐसी लग रही हैं जैसे अब मेरी बहन नहीं।”

“अरे मैं तो वही काजल रहूँगी।”

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“नहीं दीदी, अब बहन वाला प्यार नहीं। आप मुझे अच्छी लगने लगी हो।”

दीदी चौंकीं। मैंने कहा, “मुझे आपसे प्यार हो गया है।”

उनकी हथेली मेरे गाल पर पड़ी। पर थप्पड़ नहीं, प्यार भरी चपत थी। उनकी आँखों में भी वही भूख थी जो मेरी आँखों में।

हम एक-दूसरे को भूखी निगाहों से देख रहे थे। झिझक थी। भाई-बहन का रिश्ता हावी था। तभी दीदी चीखीं, “अरे बेवकूफ, सिर्फ तकता रहेगा या कुछ करेगा भी? मैंने कहा था ना जो करना है कर ले। क्या चाहता है मैं नंगी होकर खड़ी हो जाऊँ?”

उनके थप्पड़ ने झिझक दूर कर दी। मैंने उन्हें जकड़ लिया। चिपका लिया। उनके स्तन मेरे सीने से चिपके। लगा जैसे सपाट हो गए हों।

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फिर मैंने उन्हें अलग किया। चेहरा सामने किया। गालों, गर्दन, सीने पर चूमने-चाटने लगा। दीदी हाँफ रही थीं। बोलीं, “अरे बेवकूफ, दरवाज़ा बंद कर ले।”

मैंने दरवाज़ा बंद किया। वापस लौटा। दीदी लेटी थीं। आँचल नीचे लटक रहा था। साड़ी घुटनों तक उठी हुई। मैं उनकी पिंडलियाँ चूमने-चाटने लगा। वो सिहर उठीं। मुझे ऊपर लिटाया। छाती से चिपकाया। होंठ चूसने लगीं।

हम पागलों की तरह चूम रहे थे। थोड़ी देर बाद शांत हुए। अगल-बगल लेटे थे। दीदी बोलीं, “नंदू, दर्द हुआ क्या?” मेरा गाल सहलाने लगीं।

मैंने कहा, “आपका थप्पड़ सही वक़्त पर था।”

फिर बातें हुईं। मैंने बताया कि शादी की बात से उनका दूसरा रूप दिखा। वो किसी की पत्नी बनेंगी। मुझे प्यार हो गया।

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दीदी बोलीं, “जब माँ ने शादी पक्की होने की बात बताई तो मुझे धक्का लगा। सोचा जब तक यहाँ हूँ, तुझे कोई कमी नहीं होने दूँगी।”

उन्होंने टाँग मेरी जांघ पर रखी। हाथ से सीने पर सहलाना शुरू किया। मैं सिहर रहा था। उनका घुटना मेरे पैंट पर घिस रहा था।

दीदी बोलीं, “मैं चाहती हूँ शादी से पहले खुद को तैयार कर लूँ। अपने पति को इतना खुश कर दूँ कि वो मेरे लिए पागल हो जाए। और दूसरी बात तुझसे जुड़ी है। मैं तुझ पर ये सब आज़माऊँगी। जब मैं तेरे सामने हूँ तो हाथ हिलाने की क्या ज़रूरत। कर ले जी भर के मुझे प्यार।”

उन्होंने मेरे पैंट की बटन खोली। लंड थामा। गालों से लगाया। सुपाड़े को चूमा। फिर जांघों के बीच दबाया।

फिर साड़ी-पेटीकोट खोल दिया। नीचे नंगी। ब्लाउज़-ब्रा भी उतार दिया। मैं उन्हें नंगा देखता रहा। सुडौल स्तन, गुलाबी निपल्स, सपाट पेट, भारी जांघें। जांघों के बीच काले बालों में चीरती फाँक। चूत से रस टपक रहा था।

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मैंने उन्हें ऊपर लिया। चिपका लिया। उनकी चूत मेरे लंड पर घिसने लगी। मैं सिहर उठा। उनका घिसना तेज़ हुआ। मैं चिल्लाया। झड़ गया। दीदी भी झड़ीं। दोनों चिपके पड़े रहे।

फिर मैंने उनकी आर्मपिट चाटी। पसीने का स्वाद लिया। दीदी हँसीं। बोलीं, “अरे वहाँ गंदा है।”

फिर उनकी चूचियाँ चूसीं। दबाईं। वो सिसकारियाँ ले रही थीं। फिर मैंने उनकी चूत चाटी। जीभ से फाँकें खोलीं। रस पिया। वो फिर झड़ीं।

फिर दीदी ने मेरा लंड मुँह में लिया। चूसा। जीभ फिराई। मैं उनके बदन पर झड़ा। उस रात हम तीन-तीन बार झड़े। हर बार खाली होकर लेटे।

ये अनुभव कभी नहीं भूल सकता। दीदी का कामुक रूप पहली बार देखा।

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