मैं छत पर बैठी हुई अपने ख्यालों में डूबी हुई थी। गर्म दोपहर की धूप मेरे चेहरे पर पड़ रही थी और हल्की सी हवा मेरे बालों को उड़ाती हुई मेरी गर्दन को छू रही थी। छत की ठंडी फर्श पर रखी कुर्सी पर मैं आराम से बैठी थी। मेरे मन में तरह-तरह के विचार घूम रहे थे। कक्षा में कोई भी लड़का मुझे अच्छा नहीं लगता था। ना ही कोई लड़का मेरी ओर ध्यान देता था या देखता था।
अन्तर्वासना की कहानियाँ मुझे बिल्कुल वास्तविक नहीं लगती थीं। उनमें कभी देवर अपनी भाभी को चोद रहा होता, कभी चाची की चुदाई का वर्णन होता। नौकरानियाँ लगातार चुदती रहतीं, लड़के आपस में गांड मारते-मराते दिखाए जाते। समधन को समधी चोद डालता या फिर दामाद से चुदवा लिया जाता। पर यहां मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं था। ना मुझे कोई देखता था और ना ही मुझे कोई ऐसा व्यक्ति लगा जिससे मैं चुद सकूं।
शायद इसी भावना के कारण मैंने कभी चुदाई की तरफ ध्यान नहीं दिया था। मैं बार-बार अपनी उभरी हुई चूचियों को निहारती। उन्हें अपनी हथेलियों से हल्का दबाती। मेरी उंगलियां नरम मांस पर दबाव डालतीं पर मुझे कोई सिहरन या उत्तेजना महसूस नहीं होती थी। फिर मैं अपनी चूत को सहलाती। उंगलियां ऊपर-नीचे घुमाती पर भी चुदवाने की कोई बलवती इच्छा नहीं जागती थी।
हुंह! यह सब बकवास है। मात्र समय बर्बाद करने का एक तरीका है। फिर भी लड़कियां चुदती तो हैं ना! उंह! भला क्या मजा आता होगा।
“क्या बात है… कहां खोई हो…?” चाचा ने मेरी कुर्सी को पीछे शरारत से झुला दिया। “ओह चाचा… कुछ नहीं बस यूँ ही… ईईई… मत करो ना, मैं गिर जाऊँगी!” मैं घबरा कर बोल उठी।
कुर्सी को सीधे रखते हुये वो मुझे नीचे से ऊपर तक निहार कर बोले, “आज तो बहुत सुन्दर लग रही हो?”
चाचा की आँखें मेरे पैरों से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती हुई मेरी जांघों, कमर, उभरी हुई चूचियों और अंत में मेरे चेहरे पर रुक गईं। उनकी नजर में एक अजीब सी चमक थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। गर्म हवा छत पर बह रही थी और मेरे हल्के कपड़ों को चिपकाती हुई मेरी त्वचा को छू रही थी।
“चाचा… आप भी ना… मुझे क्या छेड़ रहे हैं?” मैं शर्माते हुए बोली। मेरे गालों पर हल्की लाली चढ़ गई थी।
“अरे नहीं, सच में…!” चाचा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। उनकी आवाज में एक गहरी गर्माहट थी।
मैंने चाचा को घूर कर देखा। उनकी मजबूत छाती, चौड़े कंधे और कमर के आसपास का आकर्षक आकार देखते हुए जाने क्या मन में आया। फिर मैंने एक तीर मारा, “चाचा, डेशिंग तो आप लग रहे हो… देखो क्या सेक्सी हो?” कहते हुए मैंने उनके पजामे के ऊपर से ही उनके कूल्हों पर अपना एक हाथ मार दिया। मेरी हथेली उनके मांसल कूल्हों को महसूस करते हुए हल्का सा दब गई। गर्म त्वचा और पतले कपड़े के नीचे उनकी मांसपेशियों की कठोरता मुझे स्पष्ट महसूस हुई।
मैंने मन ही मन सोचा कि आज चाचा को आजमा कर देखते हैं। ऐसा-वैसा कुछ होता है या नहीं। मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई थी।
“सच मंजू, यह उमर ही सेक्सी होती है… अपने आप को देख… ऐसा फिगर… क्या मस्त है।” चाचा ने मेरी चूचियों और कमर को निहारते हुए कहा। उनकी नजर मेरे शरीर पर घूम रही थी।
उनके कहते ही मुझे एकदम जैसे सिहरन सी हुई। एक अजीब सी गर्म लहर मेरी रीढ़ की हड्डी से होते हुए पूरे शरीर में फैल गई। मेरी चूचियां हल्की सी सिहर उठीं और निप्पल कड़े होकर कपड़े के अंदर महसूस होने लगे।
मैंने चाचू की तरफ़ देखा… तो उनके चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी। उनकी आँखों में चमक थी और होंठों पर एक मतलबी सी हंसी खेल रही थी।
अरे बाबा! यह तो लाईन मार रहा है।
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“चाचू, लगता है आपकी अब शादी कर देनी चाहिये… अब आपको सभी लड़कियाँ मस्त लगने लगी हैं!” मैंने शरारत से कहा। मेरी आवाज में हल्का सा कांपना था।
“शादी की क्या आवश्यकता है… मस्ती तो बिना शादी के भी की जा सकती है!” चाचा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। उनकी आवाज गहरी और भारी थी।
“वो कैसे भला?” मुझे भी अब शरारत सूझने लगी थी। शायद मजाक ही मजाक में काम बन जाये। मेरे मन में एक रोमांचक उत्तेजना जाग रही थी।
तभी चाचू ने मेरे चूतड़ दबा दिए।
मुझ पर जैसे बिजली सी कड़क गई। उनके मजबूत हाथों की उंगलियां मेरे नरम, गोल चूतड़ों को जोर से पकड़कर दबा रही थीं। मेरा पूरा शरीर एक झटके से सिहर उठा। गर्म सनसनी मेरी रीढ़ से होते हुए चूत तक पहुंच गई। अब मुझे लगा कि सच में यह खेल तो बड़ा ही आनन्द भरा है। मैं जैसे किसी अनजान तड़प से उछल पड़ी। यह इतना आनन्द कैसे आ गया राम!
“चाचू एक बार और दबा दो ना…” मेरे मुख से अपने आप ही निकल पड़ा। मेरी आवाज में शर्म और उत्तेजना दोनों थी।
चाचू को तो जैसे हरी झण्डी मिल गई हो… वो मेरे पीछे आ गये और मेरे दोनों चूतड़ों के मस्त उभार सहलाते हुये दबाने लगे। उनकी हथेलियां मेरी गर्म त्वचा पर घूम रही थीं। उंगलियां गहरे दबाव के साथ मांस को निचोड़ रही थीं। मेरी चूत में फुरफुरी सी होने लगी। गीली गर्माहट फैलने लगी और मेरी चूत की लिप्स हल्की सी फड़क उठीं। आनन्द से मेरी आँखें बन्द होने लगीं। आह तो ये आनन्द आता है!
इसका मतलब यह है कि मर्द के हाथों में जादू होता है।
“बस करो… अब और नहीं… तुम्हारे हाथों में तो जादू है।” मैं हांफते हुए बोली। पर सुनता कौन है, देर हो चुकी थी। तीर हाथ से निकल चुका था। उसने अब हाथ आगे बढ़ा कर मेरी चूचियों को दबा लिया था।
मेरा शरीर मीठी सी गुदगुदी से कसमसा उठा। मुझे यह क्या क्या होने लगा था।
“बस अब छोड़ दो चाचू…” मैं कसमसाई। मेरी आवाज पूरी तरह हांफ रही थी। मेरी चूत अब बुरी तरह भीगी हुई थी और उसकी गर्म चिपचिपी रस टपकने लगा था।
“कैसा लग रहा है मन्जू…” जैसे कहीं दूर से आवाज आई। चाचू की गर्म सांसें मेरी गर्दन पर पड़ रही थीं और उनकी उंगलियां मेरी चूचियों को और भी जोर से निचोड़ रही थीं।
“हाय रे… बस करते ही जाओ… चाहे चोद डालो!” अन्तर्वासना की गंदी भाषा मेरे मुख से निकल पड़ी। मेरी चूत में तेज फड़कन शुरू हो गई थी और उसकी भीगी फुद्दी अब पूरी तरह खुलने को तैयार थी।
“धीरे धीरे आगे बढ़ेंगे… एक दम से चुदाई नहीं… जवानी का मजा तो लो!” चाचू ने मेरी चूचियों को दोनों हाथों से मसलते हुए कहा। उनकी मोटी उंगलियां मेरे निप्पल को पकड़कर खींच रही थीं और हर बार मेरी कमर अनायास ही आगे को झुक जाती थी। मेरी चूत से अब रस की धार निकलने लगी थी।
“सच राजा… मुझे नहीं मालूम था… कि ऐसे करने से दिल में तड़प सी होने लगती है… मसल डालो मेरी चूचियों को!” मुझे अपनी सारी सोच किसी कूड़े दान में जाती नजर आने लगी। मेरी चूचियां उनके हाथों में पूरी तरह निचुड़ रही थीं। हर दबाव के साथ मीठा दर्द और गहरा आनंद पूरे शरीर में लहरें मार रहा था।
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“बड़ी मस्त भाषा बोलती हो… तेरी भेन दी फ़ुद्दी… जब लण्ड से चुदोगी तो चूत में स्वर्ग नजर आयेगा।” चाचू ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए गंदी बात कही।
“आह, तेरा लौड़ा है या आनन्द की खान… ला मुझे हाथ में दे दे… साले को मसल डालूं!” अन्तर्वासना के मधुर डायलॉग मेरी जबान से शहद बन कर टपक रहे थे। मेरी उंगलियां अब उनके पजामे के ऊपर से ही उनके सख्त हो रहे लौड़े को महसूस करने लगी थीं।
उसने मुझे कस कर चिपका लिया और उसके अधर मेरे गालों तक पहुँच गये थे। रात का धुंधलका बढ़ रहा था। मुझे भी वासना भरी मस्ती चढ चुकी थी।
चाचू के रूप में मुझे मस्त, हट्टा-कट्टा जवान मिल गया था, उसका लण्ड जैसे ही हाथ में आया, मुझे लगा कि सारा जमाना मेरी मुट्ठी में है। उसे चाहे जैसे मरोड़ दूँ, चाहे जैसे घुमा दूँ।
मेरी उंगलियां उसके मोटे, गर्म और सख्त लौड़े को जकड़कर ऊपर नीचे करने लगीं। उसकी मोटी नसें मेरी हथेली में उभरी हुई महसूस हो रही थीं। लण्ड की गरमाहट और उसकी छाल की नरम-कठोर बनावट मुझे और भी पागल कर रही थी।
“चाचू, चल नीचे जमीन पर लेटा कर मुझे रगड़ दे… चाहे तो मेरी फ़ुद्दी मार दे!” मेरी आवाज में तड़प साफ झलक रही थी। मेरी चूत अब बुरी तरह भीग चुकी थी और उसमें से रस की धार निकल रही थी।
“नहीं, तेरे गद्दे पर लेट कर मजा लेंगे… उछल उछल कर चुदाई करेंगे।”
“हाय रब्बा, कैसा बोलता है रे तू… अभी तो रगड़ दे… देख कैसी तड़प उठ रही है।” मैं अधीर होकर बोली। मेरी सांसें तेज हो गई थीं।
हम दोनों एक दीवार के कोने में चिपके हुये लेट गये। वो मेरे ऊपर चढ़ गया और मुझे दबा डाला। मुझे उसका भार भी फ़ूल जैसा हल्का लगा। मेरी चूचियाँ उसने दोनों हाथों से जोर-जोर से दबा डालीं। मेरे मुख पर उसने चुम्बनों की बरसात कर दी। उसके लण्ड का कड़ापन मेरी चूत को रगड़ने लगा। गर्म और मोटा लौड़ा मेरी भीगी फुद्दी की लिप्स पर बार-बार दबाव डाल रहा था। मुझे पहली बार छातियाँ दबवाने में इतना कामुक मजा आया था। उसके खुशबूदार चुम्बन मुझे उसके गाल जीभ से चाट चाट कर उसे गीला कर देना चाहते थे।
हाय रे! शहद से भी मीठा, मेरा चाचू!
“चाचा, बस चोद दे अब, नहीं रहा जाता है… घुसा दे लौड़ा… आह!!” मैं कराहते हुए चिल्लाई। मेरी चूत बेतहाशा फड़क रही थी।
मैंने अपनी जींस नीचे सरका दी। चाचू ने भी अपनी जींस उतार दी। जल्दी से हमने अपनी अपनी चड्डियाँ उतार दी और चुदाई के लिये तैयार हो गये।
“जल्दी घुसा डाल, राजा… जल्दी वार कर ना!” मैं अधीर होकर चिल्लाई। मेरी चूत बुरी तरह भीगी हुई थी और उसकी गर्म रस टपक-टपक कर जमीन पर गिर रहा था।
मैंने अपने दोनों पांव ऊपर उठा लिये और पूरी तरह फैला दिए। मेरी फुद्दी पूरी तरह खुल गई थी। चाचू ने अपना मोटा, सख्त लण्ड मेरी चूत के द्वार पर रख कर दबाव डाला। पहले हल्का सा दबाव, फिर एक जोरदार धक्का। लण्ड सीधा अन्दर उतर गया। मुझे तेज मीठी सी गुदगुदी हुई। पूरा मोटा लौड़ा एक ही बार में मेरी चूत में समा गया। मेरी चूत की दीवारें उसके लण्ड को कसकर जकड़ लीं।
जैसे ही अन्दर-बाहर लण्ड ने चाल पकड़ी, मुझे मालूम हो गया कि अन्तर्वासना में लिखी एक एक बात सही है। पर मेरी झिल्ली का क्या हुआ… वो तो फ़टी ही नहीं… कुछ पता ही नहीं चला! कोई दर्द ही नहीं हुआ। बस आनन्द ही आनन्द… मस्ती ही मस्ती…
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मैंने चाचू को जकड़ लिया और मस्ती से चुदाई में लग गई। दोनों ओर से कमर तेजी से चल रही थी।
मेरी चूत उनके मोटे लौड़े को कस-कस कर चूस रही थी। हर धक्के पर चूत से फिच-फिच की आवाज निकल रही थी। मेरा रस उनके लण्ड और अंडकोश पर फैल रहा था।
तभी मैंने पलटी मार कर चाचू को नीचे दबा लिया। जाने मुझमें कहाँ से इतनी ताकत आ गई कि मैंने उसका खड़ा लौड़ा देख कर अपनी गाण्ड का छेद उस पर दबा दिया। अन्तर्वासना में गाण्ड चुदवाने के बारे में भी तो लिखा है। मन में आया कि सब कुछ करके देख लूँ।
तो चल रे मादरचोद लौड़े, अब गाण्ड में घुस जा।
मुझे कोई अधिक महनत नहीं करनी पड़ी। जो दबा कर गाण्ड पर जोर लगाया तो एक बार चाचू ही चीख पड़ा।
“अरे चुप ना, साले मरवायेगा, गाण्ड नहीं मारनी आती है क्या?”
“अरे लगती है यार, तुझे नहीं लगती है?”
उसकी बातें मुझे आश्चर्य में डाल रही थी। मुझे क्यूँ लगेगी भला। उसका लण्ड मेरी गाण्ड में सरलता से सरकता चला गया। पर चाचू था कि दर्द से मरा जा रहा था। मैंने ऊपर से दो तीन मस्त धक्के लगाये तो मुझे अब कुछ दर्द हुआ।
उह! मुझे तो गाण्ड में मजा नहीं आता है। मैंने कुछ ही देर में बाहर निकाल दिया और उसे अपनी चूत में घुसेड़ लिया। आह! दिल में एक ठण्डक सी हुई। लण्ड अब सरलता से मेरी चूत में घुसा हुआ अलौकिक आनन्द दे रहा था। मेरी भीगी फुद्दी उसके मोटे लौड़े को पूरी तरह निगल रही थी।
चाचू को तो जैसे सांस में सांस आई। उस दिन मैंने चाचू को खूब मस्ती से चोदा और दिल की सारी हसरतें निकाल ली। फिर उसका गर्म-गर्म वीर्य मेरी चूत की गहराइयों में उगलने लगा। मुझे एक मस्ती का सा अहसास हुआ उसके झड़ने से। उसके मोटे लौड़े के हर स्पंदन के साथ गरम वीर्य की धार मेरी चूत में भर रही थी। फिर मेरी चूत में से निकलता हुआ उसका गर्म-गर्म वीर्य, उसके पेडू को गीला करने लगा था।
मेरे मात्र एक दो तेज झटकों ने मेरा काम भी पूरा दिया। मैं भी झड़ने लगी।
शायद मुझे जिन्दगी में पहली बार झड़ने से ऐसा लगा कि मैंने मूत दिया हो।
काफ़ी सा पानी निकला मेरी चूत में से।
मैं झट से सीधे खड़ी हो गई। मेरी चूत में से गीलापन नीचे टपकता रहा।
मेरी फुद्दी से चाचू का गाढ़ा, गर्म वीर्य और मेरा अपना रस मिलकर दोनों जांघों के बीच से टपक-टपक कर नीचे गिर रहा था। गर्म चिपचिपा तरल मेरी त्वचा पर बह रहा था।
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नीचे से चाचू निकल कर जल्दी से खड़ा हो गया और अपना लण्ड देखने लगा। शायद उसे कोई चोट लगी थी। पर नही! सब ठीक था। हाँ, उसकी पीठ पर जमीन की रगड़ से खरोंचे जरूर पड़ गई थी। उसकी पीठ जमीन की धूल से भर गई थी। उसने अपना पजामा लेकर मेरे पीठ की धूल भी साफ़ कर दी थी।
“चाचू, मजा आ गया ना?”
“हुंह, साली ने मुझे रगड़ दिया, ऐसे भी कोई करता है क्या!” चाचू ने हांफते हुए कहा।
“अरे चाचू, यार इसमें मजा तो बहुत आता है, अब तो रोज ही रगड़म-पट्टी करेंगे।”
चाचू मुझे देखे जा रहा था। शायद वो मेरी बात समझ नहीं पा रहा था। पर मुझे वो अनोखा अनुभव मिल चुका था जिसके लिये लड़के और लड़कियाँ दीवाने रहते हैं और जिनकी कृपा से अन्तर्वासना की मदद से अपने दिल में आग लगा लेते हैं।
यह दुनिया में बस एक ही सत्य वचन है… यह अनोखा आनन्द!
Superb performance