Incest mom son sex story – Desi horny mom sex story – long night sex story: प्रतिमा फोन रख देती है, उसके पति से हुई पूरी बातचीत के दौरान उसकी नजर रिशु से एक पल को भी नहीं हटी थी, दोनों माँ-बेटे उसी हालत में लेटे हुए थे जैसे फोन आने से पहले थे, प्रतिमा अब भी कोहनी पर सिर टिकाए रिशु की ओर झाँक रही थी, जबकि रिशु छत को घूर रहा था।
कहानी का पिछला भाग: बेटे की लुल्ली को लौड़ा बनाया माँ ने 2
उसके लंड की हालत प्रतिमा उसके पैंट में बने तंबू से साफ देख सकती थी, जब उसने पति से खुले शब्दों में बात शुरू की थी तब उसने साफ देखा था कि रिशु का बदन काँप रहा था, अब भी उसमें हल्की-हल्की कंपकंपी महसूस हो रही थी, उसकी साँसें तेज थीं, गर्म हवाएँ उसके चेहरे पर महसूस हो रही थीं।
“लोहा पूरा गर्म है, अब चोट करने का वक्त आ गया है”, प्रतिमा मन ही मन खुद से बोली।
“रिशु… बेटा…”, प्रतिमा धीमे से फुसफुसाई, उसकी आवाज में हवस की मिठास घुली हुई थी।
“हाँ मम्मी”, इस बार रिशु ने तुरंत जवाब दिया, उसकी आवाज में पहले वाली नाराजगी पूरी तरह गायब हो चुकी थी, अब सिर्फ उतावलापन था।
“सोये नहीं क्या अब तक?”
“नींद… नींद नहीं आ रही मम्मी”।
“नींद क्यों नहीं आ रही बेटा… कोई दिक्कत तो नहीं”।
“नहीं मम्मी बस मालूम नहीं क्यों…”।
रिशु किसी तरह बात को उस दिशा में ले जाना चाहता था, मगर उसे शब्द नहीं सूझ रहे थे, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
“बेटा कहीं तुम्हें दर्द तो नहीं हो रहा… वो सुबह की तरह…”, प्रतिमा ने बेटे को मुसीबत से निकालते हुए कहा, उसकी आँखों में शरारत चमक रही थी।
“नहीं मम्मी… अब दर्द नहीं है”, रिशु ने उत्तेजना में ख्यालों में खोए हुए बिना सोचे जवाब दे दिया, और उसके हाथ से सुनहरा मौका निकल गया।
“ठीक है बेटा… सोने की कोशिश करो… नींद आ जाएगी… मुझे भी नींद आ रही है… अगर कुछ प्रॉब्लम हो तो जगा लेना बेटा… ओके”, प्रतिमा कहकर पीठ के बल लेट गई, कोहनी पर इतनी देर बल देने से उसकी बाँह में दर्द होने लगा था।
रिशु पछतावे से भर उठा, उसकी माँ ने उसे इतना अच्छा मौका दिया था और उस बेवकूफ ने गँवा दिया, अब वो क्या करे, अगर माँ सच में सो गई तो, नहीं, उसे कुछ करना होगा, कुछ सोचना होगा।
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रिशु समझ नहीं पा रहा था कि ड्राइंग रूम में माँ अचानक क्यों भागी थी, गुस्से से उसका लंड मुरझा गया था, सेक्स की इच्छा कम हो गई थी, मगर जब माँ ने बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए उसके सामने जानबूझकर पति से फोन सेक्स किया तो रिशु की कामाग्नि भड़क उठी।
माँ के मुँह से निकले एक-एक शब्द उसे जला रहे थे, वो खुद को इतना उत्तेजित कभी नहीं पाया था, बदन काँपने लगा था, वो जानता था कि माँ उसके पापा को नहीं बल्कि उसे सुना रही थी, उसे बता रही थी कि वो चूत में उँगली कर रही है जबकि उसने छुआ तक नहीं था।
अब समस्या ये थी कि अब वो क्या करे, माँ सोने जा रही थी, हालाँकि उसके हिलने-डुलने से लग रहा था कि वो अभी जाग रही है, मगर वो सच में सो सकती थी, अब उसके पास एक ही रास्ता था, वो हिम्मत बाँधने लगा, “मुझे कहना ही होगा”, वो खुद को समझा रहा था।
उसके होंठ काँप रहे थे, मुँह सूख रहा था, एक मिनट, दो मिनट, तीन, चार, आखिरकार दस मिनट बीत गए मगर बात होंठों तक नहीं आई, अचानक माँ करवट लेने लगी, वो घबरा उठा।
“मम्मी… मम्मी”।
“हाँ बेटा… क्या हुआ… कुछ चाहिए क्या”, प्रतिमा के होंठों पर मुस्कान दौड़ गई, वो तो निराश हो चुकी थी।
“मम्मी वो मुझे… वो मुझे…”।
“क्या हुआ बता ना…”।
“मम्मी वो मुझे… मुझे वहाँ दर्द हो रहा है”, रिशु ने हिम्मत जुटाकर कह ही दिया।
“दर्द हो रहा है… कहाँ दर्द हो रहा है…”, प्रतिमा ने भोले बनते हुए पूछा, उसकी आँखों में चमक थी।
“वो यहाँ सुबह… सुबह… जब आपने चूसा था”।
“सुबह… उफ्फ़… ये क्या पहेलियाँ बुझा रहा है… बोल ना दर्द कहाँ हो रहा है”।
“वो मम्मी वो मेरी लू… वो सुबह जब पैंट की जिप में… वो मेरी… मेरी लुल्ली में मम्मी”, रिशु का दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था जैसे फटने वाला हो।
“ओह तो ये बात है… तो बोला क्यों नहीं पहले… इधर आ”, प्रतिमा बेड से उठ खड़ी हुई।
रिशु भी उठकर खड़ा हो गया, प्रतिमा ने दीवार का स्विच ऑन किया और कमरा रोशनी से भर गया, रिशु एक पल को शर्मा उठा, प्रतिमा बेड के सिरे पर आने का इशारा किया, रिशु आगे आया तो प्रतिमा ने उसे बेड के किनारे पर घुटनों के बल खड़ा होने को कहा।
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दोनों माँ-बेटे के दिल की धड़कनें पूरी रफ्तार से चल रही थीं, कमरे में उनकी साँसों की आवाजें गूँज रही थीं, हवा में हवस की गर्मी फैली हुई थी, प्रतिमा फर्श पर खड़ी थी और रिशु बेड पर घुटनों के बल।
प्रतिमा ने रिशु की टी-शर्ट पकड़ी और ऊपर उठाई, रिशु की बाहें खुद-ब-खुद ऊपर उठ गईं, प्रतिमा ने टी-शर्ट निकालकर फर्श पर फेंक दी, फिर उसकी पैंट नीचे खिसकाने लगी मगर फूला हुआ लंड उसे नीचे नहीं जाने दे रहा था।
प्रतिमा ने पैंट की इलास्टिक में हाथ डाला, लंड को रिशु के पेट से दबाया और दूसरे हाथ से पैंट नीचे खींच दी, इस दौरान उसकी नजर कई बार रिशु से टकराई जो उत्तेजना के बावजूद शर्मा रहा था।
पैंट निकलते ही प्रतिमा ने उसे फिर घुटनों के बल खड़ा होने को कहा, पैंट दूर फेंक दी, अब बेटा माँ के सामने पूरी तरह नंगा था, उसका लंड तना हुआ था, इतना अकड़ा हुआ कि झटके भी नहीं मार पा रहा था, लोहे की रॉड सा लग रहा था, उस भयंकर रूप को देख प्रतिमा भी सिहर उठी।
“उफ्फ़… ये तूने इसका क्या हाल बना रखा है… देख तो… और तू इसे अब भी लुल्ली कहता है… उफ्फ़… मैंने तुझे सुबह ही कहा था ना कि तेरी लुल्ली अब लौड़ा बन गई है”, प्रतिमा की बात का रिशु कोई जवाब नहीं दे पाया।
प्रतिमा ने उसके लंड को सहलाया तो रिशु की सिसकी निकल गई, “आह्ह…”, लंड और अकड़ने लगा, अकड़न से दर्द होने लगा।
“अब बोल मैं क्या करूँ इसके साथ… बता ना… तेरा दर्द कैसे कम होगा”, प्रतिमा बेटे की आँखों में झाँकती हुई होंठ काटते बोली।
“मम्मी वो सुबह जैसे आपने… अपने मुँह से… किया था… वैसे ही अब भी”, रिशु हकलाते हुए बोला।
“ओह… तो तू चाहता है… मैं तेरे लौड़े को मुँह में लेकर चूसूँ… यही कहना चाहता है ना तू”, प्रतिमा बेटे से सुनना चाहती थी।
रिशु झिझका तो प्रतिमा ने मुँह नीचे किया और उसकी छाती पर छोटे निप्पल को जीभ से सहलाने लगी, दूसरे को नाखून से कुरेदती रही।
“हाँ मम्मी… हाँ”।
“तो बोल ना… जब तक तू बोलेगा नहीं… मुझे क्या पता तू क्या चाहता है”, प्रतिमा निप्पल को दाँतों में दबाते बोली, दूसरे को नाखून से कुरेदती रही, उसके हाथ लंड और अंडकोशों को सहला रहे थे।
“मम्मी मेरा… मेरा लौड़ा चूसो”, रिशु उत्तेजना में डूबकर बोल उठा।
“फिर से बोल ना एक बार…”, प्रतिमा छाती से मुँह हटाकर बोली और बेड पर टाँगें लटकाकर बैठने का इशारा किया।
रिशु बेड के किनारे टाँगें लटकाकर बैठ गया।
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“मम्मी मेरा लौड़ा चूसो ना”, इस बार रिशु सहजता से बोला।
प्रतिमा मुस्कराई और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई, लंड हाथ में पकड़ लिया।
“एक बार और”, प्रतिमा याचना भरे स्वर में बोली।
“मम्मी मेरा लौड़ा चूसो ना”, रिशु कामोत्तेजना में खुद बोल उठा और माँ के सिर को हाथों में थामकर लौड़े पर झुका दिया।
प्रतिमा ने लंड के लाल सुपाड़े पर होंठ रख दिए, घुटनों के बल बैठी अपने बेटे की जाँघों पर हाथ रखकर मुँह लंड के सामने लाई।
“माँ मेरा लौड़ा चूसो ना”, रिशु बिना उकसावे के खुद बोल उठा और माँ के सिर पर हाथ रखकर उसे लंड पर झुकाया।
प्रतिमा बेटे की आँखों में झाँकते चेहरा लंड पर झुकाती गई, जैसे ही उसके होंठ लंड की संवेदनशील त्वचा पर स्पर्श किए, रिशु के मुँह से आह निकल गई, “आअह्ह…”।
प्रतिमा ने धीमे-धीमे, कोमलता से सुपाड़े को जगह-जगह चूमा, खूब चुम्बन अंकित किए, फिर होंठ लंड के पिछले भाग की ओर बढ़ाए, तपते होंठ लंड को जला रहे थे।
अचानक प्रतिमा ने चुम्बन रोक दिया और चेहरा पीछे खींच लिया।
“थोड़ा सा आगे आ जाओ… ऐसे मुझसे सही से नहीं हो रहा”, प्रतिमा बोली।
रिशु आगे को हुआ, अब उसके कूल्हों का ज्यादातर हिस्सा बेड से बाहर था, वो किनारे पर बैठा था, प्रतिमा ने इशारा किया तो रिशु ने टाँगें चौड़ी कर लीं, प्रतिमा उसकी टाँगों के बीच घुटनों के बल खड़ी हो गई, जाँघों पर हाथ रखे और चेहरा आगे बढ़ाया, लपलपाती जीभ बाहर आई।
“आआह्ह्ह… मम्म्म्ममी”, सुपाड़े पर खुरदरी जीभ का एहसास पाकर रिशु सीत्कार भर उठा।
प्रतिमा की जीभ पूरे सुपाड़े पर घूमने लगी, उसे चाटते हुए रगड़ रही थी, एक हाथ जाँघ से हटाकर लंड पकड़ा और ऊपर उठाकर नीचे का हिस्सा चाटने लगी।
जल्द ही हाथ लंड को ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ घुमाने लगा और वो पूरे लंड को चाटने लगी, जब भी जीभ सुपाड़े पर पहुँचती रिशु आह्ह… उफ्फ़… करने लगता।
लंड को खूब चाट-चाटकर प्रतिमा ने मुँह एक पल को हटाया, फिर होंठ सुपाड़े के गिर्द कसे और जीभ चलाते हुए चूसने लगी, “गी… गी… गों… गों…”।
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रिशु से दोतरफा प्रहार बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने सिसकते हुए हाथ मम्मी के सिर पर रख दिए, प्रतिमा ने होंठ जड़ की तरफ बढ़ाते चूसना जारी रखा, जीभ से सुपाड़े को सहलाती रही।
“मम्म्म्ममी… आअह्ह्ह…”, प्रतिमा ने एक हाथ से अंडकोश पकड़े और सहलाने लगी, दूसरे हाथ से जाँघें सहलाती धीरे-धीरे मुँह आगे-पीछे करने लगी, “ग्ग्ग्ग… ग्ग्ग्ग… गी… गी…”।
“मम्मम्मम्मम्मम्मी… उफ्फ्फ्फ़…”, रिशु से बर्दाश्त मुश्किल हो रहा था, मुँह की गर्माहट, मुखरस की फिसलन, कोमलता और जीभ का खुरदरापन उसे जोश दिला रहा था।
उसने माँ के बाल मुट्ठियों में भरे और लंड मुँह में पेलने लगा, कुछ पलों तक प्रतिमा ने जाँघों पर हाथ रखकर मुँह चुदवाया, फिर जोर से जाँघों पर दबाव डाला और मुँह पीछे खींच लिया, लंड मुँह से बाहर निकला, मुखरस से भीगा चमक रहा था, सुपाड़े से जैसे खून छलक रहा हो, लंड इतना हार्ड कि हिलडुल नहीं रहा था।
“क्या हुआ मम्मी… आओ ना प्लीज…”, रिशु माँ का सिर थामने की कोशिश करने लगा।
प्रतिमा ने हाथ झटक दिए और उठ खड़ी हुई, रिशु भी खड़ा हो गया, अब दोनों एक-दूसरे के सामने थे, इतनी दूरी कि प्रतिमा के मुम्मे रिशु के सीने में चुभ रहे थे।
“मम्मी कीजिए ना प्लीज… चूसिए ना…”, रिशु रुआँसी आवाज में बोला।
“तू चूसने दे तब ना… तू तो झट से मेरे मुँह में धक्के मारने लग जाता है… जैसे ये मेरा मुँह नहीं मेरी चूत हो”, प्रतिमा ने पहली बार सीधे चूत शब्द इस्तेमाल किया।
“नहीं मम्मी… अब नहीं मारूँगा धक्के… प्लीज… आओ ना मम्मी”।
“नहीं तुझसे कंट्रोल नहीं होता… सुबह भी नहीं हुआ था… इसे मुँह में डालकर चूसा जाता है… धक्के मारने हों तो इसे कहीं और घुसाना पड़ता है… अब तू फैसला कर ले… तू लंड चुसवाना चाहता है या धक्के मारना चाहता है…”।
प्रतिमा रिशु की आँखों में देखती बोली, रिशु जवाब नहीं दे पाया, हाँ वो धक्के मारना चाहता था मगर कहे कैसे।
“मैं सारी रात इंतजार नहीं कर सकती… जल्दी फैसला कर ले…”, प्रतिमा पीछे हटी और बेड पर चढ़ गई, बीचोबीच पीठ के बल लेट गई, नाइटी जाँघों तक चढ़ गई थी।
प्रतिमा लेटकर रिशु की ओर देखी जो फैसला सुनाने के लिए शब्द ढूँढ रहा था, उसका एक हाथ नाइटी की गांठ के सिरे से खेल रहा था, “वैसे तुझे मालूम है ना अगर धक्के लगाने हों तो इसे कहाँ डाला जाता है…”।
रिशु एक पल माँ की आँखों में देखा फिर नजर हाथों पर गई, बेड पर चढ़ा और कमर के पास पहुँचा, प्रतिमा ने सर हिलाकर अनुमति दी।
रिशु के काँपते हाथ आगे बढ़े, प्रतिमा के हाथ छुए और गांठ के सिरे थाम लिए, धीरे से खींचा तो गांठ खुल गई, प्रतिमा ने हाथ बगलों पर रख लिए, नाइटी के पल्लू हल्के से खुल गए, मुम्मों की घाटी नजर आने लगी, ब्रा नहीं थी।
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रिशु ने पल्लू पूरी तरह फैला दिए, प्रतिमा मात्र लाल पैंटी में कमर के ऊपर पूरी नंगी थी, गोल मटोल मुम्मे, नुकीले निप्पल छत की ओर तने हुए थे।
रिशु की नजर मुम्मों से हट नहीं रही थी, दूधिया रंगत, मोटाई, गहरे गुलाबी घेरा, हल्के गुलाबी निप्पल अकड़े हुए, रिशु आगे होकर हाथ बढ़ाया, दोनों के बदन काँप रहे थे।
“उन्न्न्ग्ग्गह्ह्ह… उफ्फ़…”, प्रतिमा के गले से घुटी आवाज निकली, रिशु भी मुम्मे छूते ही सिसक पड़ा।
नर्म मुलायम मुम्मे और सख्त निप्पल का स्पर्श दोनों में झुरझुरी दौड़ा गया, ऊँगली निप्पल को छेड़ती, सहलाती, फिर पूरे मुम्मे को हथेली में भरा, कितना नर्म, मुलायम, कोमल एहसास, हल्के से दबाया।
“उन्न्न्ग्ग्गह्ह्ह…”, प्रतिमा फिर सीत्कार भरी, सीना उठाकर मुम्मा बेटे के हाथ में धकेला।
रिशु मुम्मे की भारी कोमलता और कठोरता से स्तब्ध था, तने निप्पल को घूरते चेहरा नीचे लाया, प्रतिमा ने तीखी साँस ली।
“आअह्ह्ह्ह…”, होंठ निप्पल छूते ही प्रतिमा लम्बी सिसकी ली।
रिशु निप्पल चूमने लगा, फिर चेहरा हटाकर घूरा और फिर झुकाया, जीभ बाहर आई और निप्पल चाटा।
“आआह्ह्ह… उन्न्नन्न्गग्ग्गह्ह्ह…”, प्रतिमा का बदन तेज झटका खाया।
रिशु निप्पल चाटता रहा, फिर होंठों में दबोचकर बच्चे की तरह चूसने लगा, “चुप… चुप… चुप…”।
प्रतिमा सीना ऊपर उठाकर मुम्मा मुँह में धकेल रही थी, सिसकियाँ तेज हो गईं जब रिशु ने एक मुम्मा चूसते दूसरे पर हाथ रख मसलना शुरू किया, निप्पल को अंगूठे-ऊँगली से मसला।
धीरे-धीरे दाँतों से काटा भी, दाँत भींचते ही प्रतिमा सर झटकती, बेटे के सिर पर हाथ रख बालों में उँगलियाँ फेरने लगी।
रिशु उत्साहित होकर जोर से चूसने लगा, कभी पूरा मुम्मा मुँह में भरने की कोशिश करता मगर सफल नहीं होता क्योंकि मुम्मे मोटे थे।
“दूसरे को भी… दूसरे को भी चूसो बेटा…”, प्रतिमा ने रिशु का मुँह एक से हटाकर दूसरे पर ले गई।
रिशु झट से निप्पल होंठों में भर चूसने लगा, हाथ दूसरे को सहलाने लगा।
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“उन्न्नन्न्गग्ग्गह्ह्ह… आआह्ह्ह…”, प्रतिमा की सिसकियाँ ऊँची हो गईं।
रिशु जोर से चूस रहा था, प्रतिमा सिर दबा रही थी, रिशु मुँह हटाकर दोनों मुम्मों को जड़ से हाथों में भरा, निप्पल उभर आए, फिर बदल-बदल कर चूसने, चाटने, जीभ की नोक से चुभलाने लगा।
मुँह मुम्मों की घाटी में घूमने लगा, चूमता, चाटता, धीरे-धीरे नीचे पेट पर, जीभ पूरे पेट पर घुमाती, होंठ हर हिस्से को चूमते।
प्रतिमा की आहें ऊँची होती जा रही थीं, चूत की आग उसे जला रही थी, बेटा आग में तेल डाल रहा था।
रिशु की जीभ नाभि तक पहुँची, दस-बारह चक्कर लगाए, फिर जीभ नाभि में घुसाई, होंठ नाभि पर जम गए, चाटा चूसा।
प्रतिमा कमर कमान की तरह तान रही थी, कमरे में सिसकियाँ और भारी साँसें गूँज रही थीं।
रिशु होंठ सटाए नाभि से नीचे लाया, पैंटी की इलास्टिक छुई, प्रतिमा का बदन काँपा, बेटे के होंठ चूत से इंचों दूर थे।
रिशु ने जीभ इलास्टिक में घुसाकर कमर पर रगड़ी, फिर चेहरा हटाया, मुम्मों से हाथ हटाए, मुम्मे लाल हो चुके थे।
अब ध्यान भीगी लाल पैंटी में झाँकती चूत पर था, हरकतों से चूत ने पानी बहाकर पैंटी गीली कर दी थी, चूत के होंठ और दरार साफ नजर आ रही थी।
प्रतिमा बेताबी से इंतजार कर रही थी, रिशु भाँप गया, चेहरा नीचे लाया, प्रतिमा तीखी साँस ली।
रिशु चेहरा चूत को छूने तक नीचे किया, चूत की मादक खुशबू सूँघी, गहरी साँस खींची।
“उन्न्न्ग्ग्गह्ह्ह…”, प्रतिमा कराह उठी।
खुशबू से रिशु का अंग-अंग उत्तेजना से भर गया, होंठ चूत पर लगा दिए।
“हाएएएए… ओह्ह्ह…”, प्रतिमा में झुरझुरी दौड़ी।
“आअह्ह्ह…”, जीभ से सिहर उठी।
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रिशु ने जीभ लकीर पर ऊपर-नीचे फेरी, फिर दरार में घुसाकर फेरा।
“रिशुशु… रिरिरिशुशु…”, प्रतिमा चीखने लगी।
रिशु ने मुँह चूत पर दबाया, होंठ चूत के होंठों पर, जीभ गहराई तक घुमाई।
“आआअह्ह्ह… बेटाआआअह्ह्ह…”, प्रतिमा को ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ।
रिशु जितनी गहराई तक जीभ घुसा सका घुसाता रहा, रस चाटता रहा, घुटने पकड़ टाँगें चौड़ी कीं, चूत खुल गई, दाना थरथराया।
रिशु होंठ अंदर घुसाते चूसने चाटने लगा।
“बेटा… उन्घ्ह्ह… बे…टा…”, प्रतिमा चादर मुट्ठियों में भर चीखी।
रिशु ने दाने को होंठों में दबोचा, जीभ रगड़ी।
“रिशुशु… नहीईई… नहीईईई… बेटाआआअह्ह्ह… उफ्फ़… बेटा… आआआअह्ह…”, बदन काँपने, झटके मारने लगा।
रिशु जोश में आया, दाने को जोर से चूसने लगा।
“बेटाआआअह्ह्ह… नहीईईई… प्लीज… उफ्फ़… रिशु…”, प्रतिमा सर पटकने लगी, कमकंपी हुई, गांड हवा में उठाकर चूत मुँह पर दबाई, हाथ मुम्मों पर खुद मसलने लगी।
रिशु जान गया था कि दाना सबसे संवेदनशील है, पूरे दबाव से चूसा, सहलाया, रगड़ा।
अचानक प्रतिमा ने कमर तान ली, टाँगें गर्दन पर लपेटीं, सर पटका।
“रिशु… बेटा… उन्न्ग्गग्घ्ह… बेटाआ… ऊह्ह्ह…”, चूत रस उगलने लगी, देह तेज झटके खाने लगी।
रिशु रस चूसने लगा, पूरी चूत मुँह में भर चूसी, माँ झड़ रही थी, चूत चाटकर झड़ा दिया था।
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“रिरिरिशुशु… बे…एएए…टा… हाएएए… भगवान… आअह्ह्ह…”, चूत लगातार रस बहाती रही, रिशु पीता रहा।
झटके कम हुए, सिसकियाँ मंद पड़ीं, कमर बेड पर लौटी, हाथ-जाँघें ढीली पड़ीं।
“बेटा… बेटा… बेटा…”, प्रतिमा बुदबुदाई।
प्रतिमा शांत पड़ गई तो रिशु ने गांड के नीचे हाथ डाल ऊपर उठाया, चूत उभरी, अंदरूनी हिस्से साफ किए, बाहर चाटा चूसा, जाँघें चूमी।
“बेटा… बेटा… ओह्ह्ह… बेटा…”, प्रतिमा के होंठ बुदबुदाए।
जाँघों के बाद कमर चूमते ऊपर गया, नाभि से मुम्मों पर पहुँचा, प्रतिमा ने हाथ हटाए, रिशु निप्पल बदल-बदल चूता।
प्रतिमा बालों में उँगलियाँ फेर रही थी, सुस्ती के बाद जिस्म में हरकत महसूस हुई।
नजरें मिलीं, प्रतिमा ने चेहरा थामा और मुँह पर खींचा, होंठ जुड़ गए, प्रेमियों की तरह चूमे, कभी प्रतिमा रिशु के होंठ चूसी, कभी रिशु प्रतिमा के।
जाँघों पर लंड की ठोकरें महसूस हुईं, चूत के करीब होने से कामोत्तेजना लौटी, साँसें गहरी हुईं।
प्रतिमा की जीभ होंठ चाटी और मुँह में धकेली, रिशु ने मुँह खोला, जीभ चूसी।
“उन्न्न्गग्घ्ह्ह…”, प्रतिमा सिसकी, कमर हिलाने लगी।
रिशु समझ गया, कमर हिलाई, दोनों सिसक उठे, लंड चूत पर था, रस भिगो रहा था।
प्रतिमा चेहरा दबाती तो रिशु जीभ जोर से चूसता, कमरें रगड़ने लगीं, लंड चूत को सहलाता घूमता।
प्रतिमा जीभ चूसने लगी।
“आआह्ह्ह… हाएएएईए…”, अचानक झटका, चेहरा हटा।
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“मम्म्म्ममी… उफ्फ्फ्फ़…”, लंड चूत के होंठ फैलाकर थोड़ा अंदर घुस गया था।
प्रतिमा ठिठक गई, नजरें मिलीं, प्रतिमा ने सर हिलाया।
रिशु उठा, जाँघों के बीच बैठा, टाँगें ऊपर उठाईं, प्रतिमा ने घुटनों से मोड़कर खड़ी कीं, रिशु ने फैलाईं, चूत खुल गई, छेद नजर आया।
फिर नजर उठाई, प्रतिमा ने सर हिलाया, रिशु ने कमर थामी, उचककर आगे बढ़ा, लंड करीब।
प्रतिमा कुहनियों पर उचकी, चूत पर लंड देख रही थी, रिशु आगे हुआ, लंड छेद पर फिट।
“ईइइइइस्सस्ससह्ह्ह्ह…”, प्रतिमा होंठ काट सिसकी।
रिशु ने कुल्हे धकेले, सुपाड़ा छेद खोलता ऊपर फिसला।
फिर धकेला, सुपाड़ा हल्का अंदर गया फिर बाहर।
चूत गीली थी, फिसलन ज्यादा, रिशु को मुश्किल हो रही थी।
“एक मिनट रुक”, प्रतिमा ने रोका, हाथ से लंड पकड़ा, छेद पर फिट किया, “अब घुसाओ बेटा”।
प्रतिमा उचककर देख रही थी, रिशु ने धकेला, प्रतिमा ने टिकाए रखा, सुपाड़ा छल्ला खोलता अंदर गया।
“ओह्ह्ह… रिशु… रिशु… रिशु…”, प्रतिमा सिसकी।
हाथ हटा, रिशु ने और धकेला, चूत तंग कस रही थी।
“आआह्ह्ह… ऊफ्फ़… बेटा धीरे… धीरे…”, चूत फैलती महसूस हुई।
रिशु जोश में आया, जोरदार धक्का मारा।
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“ओह्ह्ह… आह्ह… हाएएए… रिशु… प्लीज… बेटा धीरे… उफ्फ़…”, प्रतिमा चीखी।
रिशु नहीं सुना, फिर करारा धक्का, पूरा लंड घुसेड़ दिया।
“आईईईईए… आउच… हे भगवान… उफ्फ़ शैतान… हाएएए… मार डालेगा क्या”।
“मम्मी… ओह्ह गॉड… मम्मी… हाए…”, रिशु जलती चूत में लंड पेलकर पीड़ादायक आनंद महसूस कर रहा था।
प्रतिमा देख रही थी, लंड पूरा घुस चुका था, चूत के होंठ कसकर चूम रहे थे।
“उफ्फ़… मम्मी कितनी टाइट है तुम्हारी और कितनी गर्म… अंदर से… मेरा जल रहा है मम्मी”।
“ये गर्मी तेरे लंड को नहीं मुझे दिन रात जलाती है… अब तुझे ही बुझानी है मेरे बेटे…”, प्रतिमा पीठ के बल लेट गई, अर्थपूर्ण नजरें डाली।
रिशु ने कमर थामी, लंड पीछे खींचा फिर अंदर डाला।
“आअह्ह्ह… आराम से… बेटा… आराम से…”।
प्रतिमा शुक्र मना रही थी कि चूत गीली थी वरना मोटा लंड तकलीफ देता, रिशु गदगद था, आनंद कल्पनाओं से बढ़कर था।
फिर बाहर निकाला, अंदर घुसेड़ा, प्रतिमा सीत्कार भरी, तीसरा, चौथा, हर धक्के पर जोश दोगुना।
कुछ देर आराम से धक्के मारने के बाद जोर से पेला।
“आआआअउच… आउच…”, रिशु माँ की सिसकियों से और जोश में, जोर-जोर से पेलने लगा।
“आईईईए… बेटा… आराम से…”, प्रतिमा चीखी, रिशु ने खींचकर ऐसा धक्का मारा कि साँस अटक गई।
“हाए मार डाला… धीरे… मेरे लाल… धीरे मार… उफ्फ़… आअह्ह… आउच… ऊउच… धीरे से कर ना… आऊऊउच्च्च्घ… बेटा… हाए तेरा लौड़ा… उइफ़्फ़… हाए जान निकाल दी… हाए धीरे चोद… धीरे चोद अपनी मम्मी को…”।
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रिशु खुद को पूर्ण मर्द महसूस कर रहा था, माँ ठीक वैसी सिसक रही थी जैसी कल्पना की थी, चूत में रगड़ से जबरदस्त मजा।
रिशु ने सुपाड़े तक खींचा, कुल्हों का जोर लगाकर पेला।
“आआईईएईईए… हाए मेरी चूत… हाए मर गयीईई… उउउफफफ़फफ़… धीरे… धीरे मारो बेटा…”।
रिशु पूरा लंड खींच-खींचकर धक्के मार रहा था, प्रतिमा हर धक्के पर चीखती।
रिशु ने गति बढ़ाई, तेज गति से सुपाड़े तक खींचते लंड बाहर आ गया।
फट से अंदर घुसाया, प्रतिमा चिहुँक पड़ी, दो-तीन धक्के बाद स्पीड बढ़ाई तो फिर बाहर।
“क्या कर रहा है… क्यों बार-बार बाहर निकाल रहा है…”।
“सॉरी मम्मी… वो फिसलन बहुत है…”।
फिर बाहर, फिर तेजी से अंदर, फिर फिसलकर ऊपर।
प्रतिमा घूर रही थी, रिशु घबरा गया, हाथ काँपे, लंड फिसला।
अचानक प्रतिमा खिलखिलाकर हँस पड़ी, रिशु का मासूम भाव प्यारा लगा।
रिशु रुक गया, चेहरा लाल, शर्मिंदगी छा गई।
प्रतिमा ने इशारे से बुलाया, होंठ चूमे।
“अब बताओ इतनी तेजी क्यों पकड़ रहे हो कि बार-बार बाहर निकाल लेते हो?”।
“वो मैंने पढ़ा था कि तेज करने से औरतों को बहुत मजा आता है, इसलिए…”।
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“पढ़ा था? कहाँ? कब?”।
“आज शाम को… जब आप कपड़े धो रही थीं”।
“ओह अब समझी… सोचा होगा माँ चोदने को मिलेगी… थोड़ी जानकारी ले लूँ… हूँ क्या बोलते हो?”।
रिशु शर्म से चेहरा मोड़ लिया।
“इधर देखो मुझे…”, प्रतिमा ने चेहरा घुमाया।
“मुझे इंप्रेस करने की कोशिश कर रहे थे”, रिशु ने हाँ में सिर हिलाया।
प्रतिमा ठंडी आह भरी, होंठ चूमे।
“बेवकूफ… तूने मुझे सुबह ही इंप्रेस कर दिया था… तेरे लंड पर सुबह ही मर मिटी थी… याद नहीं मुँह में लेकर चूसा था… तेरा वीर्य पिया था… अगर इंप्रेस ना होती तो तेरे नीचे ना लेटी होती… तेरा लंड मेरी चूत में ना घुसता”।
रिशु को तसल्ली हुई और आग भड़की।
“देखो बेटा सेक्स नेचुरल चीज है… खुद-ब-खुद सीखते जाओगे… अभी आराम से करो… खुद समझ जाओगे कितना खींचना है कि बाहर ना निकले… एक्सपीरियंस हो जाएगा तो स्पीड से चोद पाओगे… नेट से सीखने की जरूरत नहीं… दो बार चुदाई करके सीख जाओगे… मैं सिखाऊँगी… वैसे जिस तरह चूत चाटी लगता नहीं सिखाना पड़ेगा… चलो अपना लंड मेरी चूत में घुसाओ और चोदो”।
रिशु ने हाथ साइड में रख बदन ऊपर उठाया, लंड चूत पर रखा, प्रतिमा ने पकड़कर फिट किया, “अब घुसा दो”।
रिशु ने धकेला, लंड अंदर समा गया, प्रतिमा सिसकी।
प्रतिमा ने कंधे पकड़े, टाँगें कमर पर लपेटीं, रिशु को ऊपर लेटा लिया।
“हाययईई… अब देर मत कर… चोद मुझे… हाए चोद अपनी मम्मी को”, कान में फुसफुसाई।
रिशु कमर हिलाने लगा, लंड अंदर-बाहर होने लगा, प्रतिमा ऊँची सिसकियाँ भरने लगी।
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रिशु डर रहा था बाहर ना निकले इसलिए आधा खींचता, स्पीड बढ़ी।
“आआअहह… ऊऊुऊउक्ककचह… ऊओह रिशु… राहहुउउल्ल… चोदो मुझे… हाएयय… ई… ऐसे ही मारो बेटा… हाअययययईई… ऊऊऊफफफफफफफ़फ्ड…”।
रिशु जोर से खींच-खींचकर पेलने लगा, एहसास नहीं रहा कि सुपाड़े तक बाहर आ रहा था।
“मम्मी मजा आ रहा है ना…”।
“पूछ मत… ऊऊऊऊुऊउक्ककच… हायय… ईई… बस चोदता रह… मैं झड़ने वाली हूँ… हाए अब तेरी माँ हर रोज तुझसे चुदेगी… हर दिन हर रात… आआहह…”।
“मैं भी मम्मी… मैं भी…”।
रिशु फुल स्पीड में चोद रहा था, टट्टों में वीर्य उबल रहा था।
प्रतिमा कमर उछालकर जवाब देने लगी, रिशु कंधे थाम खींच-खींचकर पेलता।
“रिशु मेरे बेटा… हे भगवान…”।
प्रतिमा ने होंठ रख दिए, जीभ मुँह में घुसेड़ी, रिशु ने चूसी, कसकर धक्के लगाता रहा।
अचानक प्रतिमा ऐंठने लगी, धक्के बंद, टाँगें कसीं।
“बेटा… बेटा… मेरे लाल… मेरे लाल…”।
प्रतिमा झड़ रही थी, रिशु ने कमर पकड़ी, पूरी शक्ति से धक्के लगाए, पाँच-सात धक्कों में हुंकार भरी।
“मम्मी… आहह… मम्मी…”।
लंड से वीर्य की पिचकारियाँ चूत भरने लगीं।
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“मेरे लाल… आआहह… उउउन्न्ननज्ग्घह… भर दे मेरी चूत अपने रस से… हइईए… भर दे”।
प्रतिमा का स्खलन तीव्र हुआ।
“ऊऊहह… उूउउफफफफफफ्फ़… बेटा… बेटा… बेटा…”।
स्खलन मंद पड़ा, रिशु माँ पर लेट गया, प्रतिमा ने बाहें गर्दन में डालीं।
“मेरा बेटा… मेरा लाल…”।
कमरा शांत था, सिर्फ साँसें गूँज रही थीं, दोनों जाग रहे थे मगर जिस्म स्थिर, रिशु ने पहली बार नारी भोगी, प्रतिमा को जबरदस्त स्खलन मिला, जैसे शीतल जल डाला गया हो, आनंद की लहरें दौड़ रही थीं।
प्रतिमा ने पीठ सहलानी शुरू की।
“रिशु… बेटा…”।
“हुं…”।
“मुझे लगा शायद तुम सो गए…”।
“कैसा महसूस हो रहा है मेरे बेटे को”।
“उम्म्म्म… बहुत अच्छा मम्मी… जैसे वजन उतर गया… हवा सा हल्का… बहुत बहुत अच्छा”।
रिशु गर्दन पर चूमा।
“गुड… इतना अच्छा होना चाहिए… आखिर तूने अपनी मम्मी चोदी है”।
“म्म्मम्म्मी…”।
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“क्या मम्मी… गलत कह रही हूँ? अभी अपनी मम्मी की चूत में लंड नहीं पेल रहे थे? अभी भी है… अगर मजा नहीं आया तो क्या फायदा”।
“हाए… मुझे देखो… अभी तक बदन में रोमांच… नस-नस में आनंद”।
“मम्मी आप भी ना…”।
रिशु शर्मा गया मगर लंड में सुरसुराहट हुई।
प्रतिमा हँसी, कंधे से गर्दन चूमती मुख की ओर बढ़ी, हाथ पीठ से नितम्बों तक सहलाने लगे।
रिशु कान की लौ होंठों में भर जीभ से सहलाने लगा।
“उउउम्म्म्म…”।
प्रतिमा सिसकी, हाथ कुल्हों की घाटी में गए, रिशु गाल तेज चूसने लगा, जिस्म में झुरझुरी।
उँगलियाँ छेद स्पर्श कीं, रिशु झटका खाया, गाल काटा, लंड जागा।
प्रतिमा ने उँगली रगड़ी, बड़ी उँगली दबाई।
“उउउन्न्नहह…”।
रिशु चिंहुक उठा, चेहरा थामा, होंठ मिले, प्रतिमा जीभ धकेली।
उँगली दबाव बनाती अंदर घुसती गई।
रिशु जीभ चूसी, मुँह में सिसके।
मुँह अलग हुए, साँसें उखड़ीं।
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“आहह… रिशु… बेटा देखो मेरी चूत में कुछ हिल रहा है… हाएए… ये तो झटके मारने लगा… हाए कितना लंबा मोटा… देखो तो तुम्हारी मम्मी की चूत में क्या घुस आया…”।
लंड जोर से झटके मारने लगा।
“हे भगवान… रिशु बेटा… आआअहह… देखो ना… हाए तुम्हे अपनी मम्मी की फिक्र नहीं… उउउफफफफफफ्फ़ इतना लंबा मोटा मेरी चूत में…”।
रिशु ने होंठ चिपका दिए, तेज चूसने, काटने लगा।
उँगली आधी से ज्यादा अंदर, आगे-पीछे करने लगी, गांड तंग थी मगर जितना मुमकिन उतना।
चूत लंड को चूमती सहलाती।
रिशु कमर हिलाने लगा, माँ गांड चोद रही थी, बेटा माँ को।
रफ्तार बढ़ी।
मुँह जुदा हुए, साँसें बुरी।
प्रतिमा उँगली तेज करने लगी।
“ओह… मम्म्ममी… मम्म्ममममी…”।
गांड के पट्ठे ढीले पड़े, आसानी हुई।
प्रतिमा टाँगें लपेट कसीं, हाथ हटाकर मुम्मों पर रखे।
“मेरे मुम्मे पकड़ो… हाए… मेरे मुम्मे मसल मसल कर चोदो मुझे”।
फिर होंठ दबोचे।
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रिशु मुम्मे समेटे, कमर उछाली, जोरदार धक्के।
“आआईईईईई… आाईईईए… धीरे… धीरे… उउफफफफफ्फ़…”।
रिशु नहीं रुका, और तेज।
“उउउक्चकचह… ऊउक्ककचह… रूको… धीरे… बेटाआआ… हायययययईई…”।
प्रतिमा जाँघें कसकर लॉक कर दीं, रिशु पीछे नहीं खींच पाया।
जोर लगाया मगर नहीं।
“हाययइईई… हाअयययययईए…”।
“क्या कर रहा है… क्यों इतनी जोर से ठोक रहा है… उउफफ़फ़गगग… जान निकाल दी… बेटा अभी मेरी चूत तुम्हारे मोटे लंड के लिए इतनी खुली नहीं… इतने जोर से पेलोगे तो मेरा क्या हाल होगा…”।
रिशु मिन्नत भरे स्वर में, “हाए मम्मी कितना मजा आ रहा था… प्लीज करने दीजिए ना… जोर जोर से”।
प्रतिमा उँगली बाहर निकाल अंगूठा दबाया, जोर से धकेला, अंगूठा घुसता गया।
“मम्म्मममममी… यू…उ… मम्म… ऊऊउ…म्म्म्ममी… निकालो… निकालो… प्लीज मम्मय्यययी… उउउफफफफफ्फ़… बहुत दर्द…”।
रिशु बदन झटके खाता, कमर हिलाता मगर प्रतिमा ने रोके रखा, आखिर अंगूठा निकाला।
“उउफफफफफफ्फ़… ऊओह गॉड!”।
“आप मेरी मम्मी नहीं दुश्मन हो… कोई बेटे को ऐसा तकलीफ देता है?”।
“अब पता चला जब कुछ अंदर घुसता है तो कितनी तकलीफ… मम्मी कितना मजा आ रहा था… अब मालूम चला… तुझसे अंगूठा बर्दाश्त नहीं और तूने मेरी चूत में मूसल घुसेड़ा…”।
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प्रतिमा नाराजगी जताई, टाँगें ढीली कीं मगर रिशु नहीं चोदा, मुँह लटका, नजर झुकी।
प्रतिमा ने चेहरा थामा, कोमल चूमा।
“जानते हो तुम्हारा लौड़ा कितना लंबा मोटा है… खासकर तुम्हारे पिता से तुलना में… और मेरी चूत में सिर्फ उनके अलावा किसी का नहीं घुसा… इसलिए तकलीफ होगी ना… उपर से ताबड़तोड़ धक्के”।
प्रतिमा समझाती रही, रिशु समझ रहा था मगर करता भी क्या, माँ की ज्वानी बड़े-बड़ों के होश उड़ा सकती थी।
प्रतिमा को प्यार आया, फिर चूमा।
“मेरे लाल मैं तेरे पास हूँ… बस एक बार मेरी टाइट चूत खुल जाने दे… फिर पूरी रात चढ़े रहना… जैसा दिल करे चूत मारना…”।
रिशु सहमति में सिर हिलाया।
“तो शुरू हो जाओ… लेकिन आराम से… प्यार से… मैं चाहती हूँ तू खूब लंबे समय तक चुदाई करे… आआअहह… और ऐसा तभी होगा जब धीरे छोड़ेगा… ऊऊहह… हाए कितने दिनों से तरस रही हूँ… आज राहत मिली… उउफफफ़फ़गग बस ऐसे ही…”।
प्रतिमा टाँगें लपेट कसीं, हाथ गांड पर, उँगली फिर घुस गई।
उँगली घुसते ही रिशु तीखी सिसकी भरी, मुम्मे कसकर मसले।
“बस ऐसे ही… आआहह… आराम से… आराम से चोद मेरे लाल अपनी मम्मी को… हाए तेरी मम्मी की चूत… आहह… उउउफफफफ़फ्ग… बहुत नाजुक है… और तेरा लंड बहुत मोटा… उफफफफफफफफ्फ़… सच में बहुत मोटा… देख कैसे फँस रहा… देख कैसे रगड़ रहा…”।
रिशु कंट्रोल की कोशिश करता, प्रतिमा की बातें आग भड़कातीं।
“मजा आ रहा है बेटा… अपनी मम्मी को चोदने में मजा आ रहा है ना मेरे लाल”।
“आ रहा है मम्मी… हाए बहुत मजा… उफफफफफ़फ्ग कितनी नरम मुलायम… मक्खन की तरह… और कितनी टाइट… सच बहुत मजा”।
प्रतिमा तारीफ सुन खुश।
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“आआहह… आराम से… तेज नहीं… उउफफफफफफ्फ़… हाए मुझे नहीं मालूम मेरी चूत इतनी टाइट है… उउउन्न्नज्ग्घह… लगता है तेरा लौड़ा ही मोटा है कि भर दिया… “।
“नहीं मम्मी आपकी चूत सच बहुत टाइट…”।
“हाए तो मजा ले… लूट ले… उउफफफफफफ्फ़… आराम से कम्बखत… मुझे अभी देर तक चुदवाना है… आआआहह धीरे धीरे चोद मेरे लाल… जितना देर तक चोद सकता है चोद… ऐसे ही मुम्मे मसलकर पेलता रह… तेरा लौड़ा बहुत मजा दे रहा… उउफफफफफफफफ्फ़… हाए तूने मुझे पहले क्यों नहीं चोदा”।
प्रतिमा गांड में उँगली पेलती, गांड उछालकर लंड लेती।
उस रात माँ-बेटे ने वो आनंद हासिल किया जो जीवन में नहीं मिला था, प्रतिमा काबू में रखकर चुदवाती रही।
पूरे दो घंटे रिशु माँ पर चढ़ा लंड पेलता रहा, इस बीच प्रतिमा तीन बार झड़ी मगर रिशु को नहीं झड़ने दिया, करीब आने पर रोक देती, चूमने-चूसने लगते।
आखिर रहम आई, रिशु बैचेन था, कामोन्माद से काँप रहा था।
दो घंटे बाद करीब आने पर नहीं रोका, स्पीड बढ़ने पर भी नहीं, पूरा लंड बाहर निकाल ठोकने पर भी नहीं, झड़ते हुए मुम्मे चूसते निप्पल काटते भी नहीं, प्रतिमा खुद शोर मचा रही थी।
रिशु ने इतना रोका था कि होश नहीं रहा, बेरहमी से ठोकता रहा।
माँ-बेटे थककर पस्त, झड़ते ही नींद आ गई, एक-दूसरे की बाहों में समाए सो गए।