sasur ka lund sex story: मेरा नाम नेहा है। उम्र छब्बीस साल है। शादी को ढाई साल हो चुके हैं। मेरे पति का नाम विक्रम है। हम दिल्ली के एक अच्छे मध्यमवर्गीय परिवार में रहते हैं।
विक्रम एक अच्छा इंसान है और वह अच्छी नौकरी भी करता है। लेकिन बेडरूम में वह हमेशा जल्दबाजी में रहता है। पांच-सात मिनट में पूरा काम खत्म कर वह करवट लेकर सो जाता है। शुरुआती दिनों में मैं सोचती थी कि शायद नई-नई शादी है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। लेकिन ढाई साल बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। मेरी चूत अब भी हर बार अधूरी और भूखी रह जाती है।
रात को अकेले लेटे-लेटे मैं अपनी उंगलियों से अपनी चूत को सहलाती हूं। मेरी उंगलियां अपनी गीली और गर्म फांकों के बीच घुसती हैं। लेकिन वह खालीपन और भूख कभी पूरी नहीं होती। मेरी सांसें तेज हो जाती हैं, शरीर में गुदगुदाहट फैलती है, फिर भी संतोष नहीं मिलता।
ससुर जी का नाम सुरेश चंद है। उनकी उम्र अड़तालीस साल है। उनकी पत्नी यानी मेरी सास तीन साल पहले गुजर चुकी हैं। ससुर जी अभी भी बहुत फिट और तंदुरुस्त हैं। उनका लंबा कद, चौड़ी छाती, मजबूत बाहें और खेती-बाड़ी तथा जिम की वजह से तना हुआ बदन देखकर कोई भी प्रभावित हो सकता है। घर में वे कम बोलते हैं लेकिन उनकी नजरें बहुत तेज और पैनी हैं।
शादी के बाद पहले छह महीने तो सब कुछ सामान्य था। लेकिन फिर धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा। ससुर जी मुझे “बेटी” कहकर बुलाते थे। लेकिन उनकी नजरें अब मेरी कमर, मेरी भरी-भरी चूचियों और मेरी गोल-मटोल गांड पर ज्यादा देर तक रुकने लगी थीं।
मैंने कई बार महसूस किया कि जब मैं नहाकर निकलती हूं या साड़ी बदलती हूं तो वे दरवाजे के पास से गुजरते हुए मुझे देख लेते हैं। शुरू में मुझे गुस्सा आता था। लेकिन अंदर कहीं एक अजीब-सी गुदगुदी और रोमांच भी होने लगा था। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ जाती थी।
एक शाम की बात है। विक्रम ऑफिस के काम से पुणे गया हुआ था। वह तीन दिन बाद लौटने वाला था। घर में सिर्फ मैं और ससुर जी थे।
मैं रसोई में खाना बना रही थी। साड़ी का पल्लू थोड़ा सरका हुआ था जिससे मेरी नाभि और कमर का निचला हिस्सा हल्का-हल्का दिख रहा था। ससुर जी पीछे से चुपचाप आए और बोले, “बेटी आज कमर में बहुत दर्द हो रहा है। थोड़ा तेल लगाकर मालिश कर दोगी?”
मैं चौंक गई। मेरा हाथ रसोई के बर्तन पर रुक गया। “ससुर जी… मैं… कैसे?”
“अरे बेटी शर्मा क्यों रही है? तू मेरी बहू है। सास के जाने के बाद मैं अकेला पड़ गया हूँ। बस थोड़ी देर…” उनकी आवाज में एक गहरी, भारी सी गर्माहट थी जो मेरे अंदर कुछ हिला गई। उनकी पैनी नजरें मेरी कमर और साड़ी के ऊपर वाले हिस्से पर ठहर गई थीं।
मैंने हाँ कर दी। ससुर जी लेट गए। मैं उनके पैरों के पास फर्श पर बैठ गई और तेल की बोतल लेकर उनकी मालिश शुरू कर दी। उनके पैर बहुत मजबूत थे, मोटी-मोटी पिंडलियाँ, लंबे समय की मेहनत और जिम से बनी हुई मांसपेशियाँ मेरी हथेलियों के नीचे सख्त महसूस हो रही थीं। तेल की चिकनी गरमाहट उनकी त्वचा पर फैल रही थी।
धीरे-धीरे मैं उनकी जाँघों तक पहुँच गई। मेरी उंगलियाँ उनकी मोटी जाँघों की मांसपेशियों को दबाती हुई ऊपर की ओर बढ़ रही थीं। ससुर जी की साँसें तेज हो गईं। उनकी छाती ऊपर-नीचे होने लगी।
“नेहा… तू बहुत अच्छी बहू है… और ऊपर कर… कमर तक…”
मैंने हिम्मत करके उनकी कमर की मालिश शुरू कर दी। मेरी उंगलियां उनकी कमर की मजबूत मांसपेशियों पर तेल लगाकर दबाती हुई ऊपर-नीचे घूम रही थीं। तेल की चिकनी गरमाहट उनकी त्वचा पर फैल रही थी। उनकी लूंगी थोड़ी सरक गई। अचानक मैंने देखा कि उनके लंड का उभार साफ दिख रहा था। बहुत मोटा, लंबा और पूरी तरह खड़ा हो चुका था। कपड़े के ऊपर से भी उसकी मोटाई और लंबाई साफ झलक रही थी। विक्रम का लंड उससे कहीं छोटा और पतला था। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। मेरी चूत में गर्मी फैल गई।
ससुर जी ने अचानक मेरी कलाई पकड़ ली और मेरे हाथ को अपने लंड पर रख दिया। उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी।
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“नेहा… देख… कितना तड़प रहा है सालों से। तू तो जानती है विक्रम कितना कमजोर है बेडरूम में। मुझे सब पता है।”
मैं शर्मा गई। हाथ हटाने की कोशिश की लेकिन ससुर जी ने उसे मजबूती से पकड़ रखा था। “ससुर जी… ये गलत है… मैं आपकी बहू हूँ…”
“गलत तो वो है जो तुझे हर रात अधूरी छोड़ देता है। तू जवान है तेरी चूत को पूरी ताकत चाहिए।” उन्होंने धीरे से कहा और मेरी साड़ी का पल्लू सरका दिया।
मैं विरोध नहीं कर पाई। उनकी मजबूत उंगलियां मेरी चूचियों पर घूमने लगीं। वे धीरे-धीरे मेरी नरम चूचियों को सहलाते हुए उनकी गोलाई को महसूस कर रहे थे। उनकी हथेलियों की गर्मी मेरी त्वचा में समा रही थी। उन्होंने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए। हर हुक खुलते ही मेरी भरी-भरी चूचियां थोड़ी-थोड़ी आजाद होती गईं। आखिर में ब्लाउज पूरी तरह खुल गया और मेरी दोनों चूचियां बाहर आ गईं। उनकी हथेलियां मेरी नरम और गर्म चूचियों को दबाने लगीं। वे उन्हें अच्छी तरह मसल रहे थे। मेरी निप्पल्स सख्त होकर खड़ी हो गईं। उन पर हल्की-हल्की कंपकंपी दौड़ रही थी।
ससुर जी ने उन्हें मुंह में लिया और जोर-जोर से चूसने लगे। उनकी गरम जीभ मेरी निप्पल्स को चारों ओर घुमाती हुई चाट रही थी। वे कभी हल्का काटते तो कभी जोर से चूसते। मेरे मुंह से सिसकारी निकल गई। “आह… ससुर जी… धीरे…”
उन्होंने मुझे उठाकर बेडरूम में ले गए। अपना लूंगी उतारी। उनका लंड बाहर आया। मोटा लंबा, नसें फूली हुईं, सिर चमक रहा था।
विक्रम का लंड उसका मुकाबला नहीं कर सकता था। मैं घुटनों पर बैठ गई और उसे मुंह में ले लिया। स्वाद गर्माहट मोटाई सब कुछ अलग था। उनका लंड मेरे मुंह में पूरी तरह भर गया। उसकी मोटाई से मेरे होंठ फैल गए। मैंने अपनी जीभ से उसके चमकते सिर को धीरे-धीरे चाटा। गर्म और थोड़ा नमकीन स्वाद मेरे मुंह में फैल गया। मैंने धीरे से चूसना शुरू किया। मेरे होंठ उसके मोटे लंड को जकड़े हुए ऊपर-नीचे हिलने लगे।
ससुर जी मेरे बाल पकड़कर मेरे मुंह में धक्के मारने लगे। उनके कूल्हे आगे-पीछे हो रहे थे। लंड मेरे मुंह के अंदर गहराई तक जा रहा था। कभी-कभी वह मेरे गले तक टकराता तो मेरी आंखों में पानी आ जाता। मैं जोर से चूसती रही। अपनी जीभ को उसके नीचे की नसों पर घुमाती हुई। उनके मुंह से हल्की-हल्की कराह निकल रही थी।
“नेहा… तू बहुत अच्छी चूसती है… सालों बाद मजा आ रहा है…”
फिर उन्होंने मुझे उठाकर बेड पर लिटाया। उनकी मजबूत बाहों में मेरे शरीर का वजन कुछ भी नहीं था। उन्होंने मेरी साड़ी को पूरी तरह खोलकर अलग कर दिया। फिर पेटीकोट की नाड़ी खोलकर उसे नीचे सरका दिया। आखिर में मेरी भीगी हुई पैंटी को भी उतारकर फेंक दिया। मेरी चूत पहले से ही गीली थी। उसकी गर्माहट और चिपचिपाहट हवा में महसूस हो रही थी।
ससुर जी ने झुककर चाटना शुरू किया। उनकी गरम और मोटी जीभ मेरी चूत की बाहरी फांकों को पहले धीरे-धीरे चाट रही थी। फिर उन्होंने दोनों फांकों को अपनी उंगलियों से अलग किया और अंदर की गुलाबी हिस्से पर जीभ फेरनी शुरू कर दी। उनकी जीभ मेरी चूत के हर कोने को छू रही थी। वे मेरी clit को जोर से चूसते और जीभ अंदर डालकर हिलाते। मैं कमर उठा-उठाकर चीख रही थी। “आह… ससुर जी… और चाटिए… आह्ह… मेरी चूत को चूसिए… उफ्फ… कितना अच्छा लग रहा है…” मेरी सांसें तेज हो गईं। शरीर में झुरझुरी दौड़ रही थी।
जब मैं पहली बार झड़ गई तो मेरी चूत उनके मुंह पर सिकुड़ती हुई रस निकाल रही थी। मेरी टांगें कांप रही थीं और मैं जोर से कराह उठी। “आआह… ससुर जी… मैं झड़ गई… हां…” ससुर जी मुस्कुराए। “अब असली मजा शुरू होता है बेटी। तेरी चूत को अब असली मर्द का लंड चाहिए।”
उन्होंने अपना मोटा लंड मेरी चूत पर रखा और धीरे से दबाया। उसका चमकता सिर मेरी भीगी फांकों को चीरता हुआ अंदर गया। फिर एक जोरदार धक्का। पूरा लंड मेरी चूत में समा गया। उसकी मोटाई से मेरी चूत के दीवारें पूरी तरह फैल गईं। “आआह… फट गई… ससुर जी… इतना मोटा… विक्रम का कभी नहीं भरता था… उफ्फ… दर्द हो रहा है पर मजा भी आ रहा है…” दर्द और मजा दोनों साथ हो रहा था।
ससुर जी धीरे-धीरे धक्के मारने लगे। हर धक्के पर उनका मोटा लंड मेरी चूत के अंदर तक जाता और निकलता। उनकी भारी गेंदें मेरी गांड से टकरा रही थीं। हर धक्के पर मुझे लग रहा था जैसे मेरी चूत पहली बार पूरी हो रही हो। मेरी चूचियां ऊपर-नीचे हिल रही थीं। मैं कराह रही थी। “हां… और जोर से… ससुर जी… चोदिए मुझे… आह्ह…”
वो मेरी चूचियाँ दबाते, होंठ चूसते, कभी कान में फुसफुसाते। “नेहा… अब तू मेरी हो गई… पति का लंड भूल जा… ससुर का लंड तेरी चूत का मालिक है… बोल… तेरी चूत किसकी है?” उनकी गर्म सांसें मेरे कान पर पड़ रही थीं। मैं सिसकते हुए बोली, “आह… आपकी… ससुर जी… मेरी चूत आपकी है… जोर से चोदिए… आह्ह… फाड़ दीजिए अपनी बहू की चूत को…”
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रात भर सिलसिला चला। उन्होंने मुझे कई पोजिशन में चोदा। मिशनरी में लेटे-लेटे गहरे धक्के। हर धक्के के साथ उनका मोटा लंड मेरी चूत की गहराई तक टकराता। मेरी चूचियां उनके सीने से रगड़ खा रही थीं। डॉगी में पीछे से मेरी कमर पकड़कर जोरदार चोदाई। उनकी भारी गेंदें मेरी गांड से जोर-जोर से टकरा रही थीं। मुझे गोद में उठाकर दीवार से सटाकर। मेरी टांगें उनकी कमर के चारों ओर लिपटी हुई थीं और वे ऊपर से तेजी से धक्के मार रहे थे।
हर बार वो लंबे समय तक चोदते। मुझे कई बार झड़ने देते। हर झड़ने के समय मेरी चूत उनके लंड को जकड़ लेती। मैं चीखती, “आह… ससुर जी… फिर हो गया… मैं निकल गई… हां… और चोदिए…” मेरी चूत का रस उनके लंड और जांघों पर बह रहा था। जब वो आखिर में मेरी चूत में पानी छोड़ रहे थे तो उनका लंड फड़क रहा था। गर्म-गर्म मोटी धारें मेरी चूत की गहराई में भर रही थीं। मैं रो रही थी खुशी के आँसू। “ससुर जी… अब पति का लंड मुझे अच्छा नहीं लगेगा… आपका ही चाहिए…”
उस रात के बाद मेरी जिंदगी बदल गई। विक्रम जब घर होता है तो मैं सामान्य व्यवहार करती हूँ लेकिन जैसे ही वो ऑफिस चला जाता है ससुर जी मुझे बुलाते हैं। कभी “नेहा मेरी कमर दर्द कर रही है” कभी “आज रात अकेलापन बहुत सता रहा है”। और मैं बिना किसी बहाने के उनके कमरे में चली जाती हूँ।
अब मेरी चूत ससुर जी के मोटे लंड की आदी हो चुकी है। विक्रम जब मुझे छूता है तो मुझे कुछ नहीं लगता।
मैं मन ही मन सोचती हूँ, “तुम्हारा लंड तो अब मेरी चूत को भर भी नहीं पाता।” ससुर जी की ताकत, उनकी स्टैमिना, उनका अनुभव सब कुछ विक्रम से बिल्कुल अलग है। विक्रम के छोटे और पतले लंड से मेरी चूत अब तृप्त नहीं होती। जबकि ससुर जी का मोटा, नसों वाला, लंबा लंड मेरी चूत को पूरी तरह फैलाकर गहराई तक भर देता है। मैं सोचती हूँ कि अब तो विक्रम का लंड मेरी चूत में डालते ही लगता है जैसे कुछ डाला ही नहीं। ससुर जी का लंड ही मेरी भूखी चूत का असली मालिक है।
कभी-कभी ससुर जी मुझे दिन में भी बुला लेते हैं। रसोई में खड़े-खड़े, बालकनी में या बाथरूम में। रसोई में बर्तन धोते हुए अचानक वे पीछे से आकर मेरी साड़ी ऊपर कर देते और अपनी उंगलियां मेरी भीगी चूत में घुसा देते। मैं काउंटर पकड़कर सिसकारती रहती। बालकनी में पौधों को पानी देते समय वे मुझे झुकाकर पीछे से चोदते। बाथरूम में नहाते हुए वे मुझे दीवार से सटाकर खड़े-खड़े ही अपना मोटा लंड मेरी चूत में ठेल देते।
एक बार तो उन्होंने मुझे फोन पर बात करते हुए पीछे से चोदा था जबकि विक्रम दूसरी तरफ फोन पर था। मैं मुश्किल से “हां… हां विक्रम…” बोल पा रही थी। ससुर जी मेरी कमर पकड़े हुए धीरे-धीरे गहरे धक्के मार रहे थे। उनका मोटा लंड मेरी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। मैं अपने होंठ काटकर कराह को दबा रही थी। वो खतरा, वो गुप्त संबंध, वो प्यास सब कुछ मुझे और ज्यादा उत्तेजित करता है। मन में बार-बार गंदी बातें घूमती रहती हैं कि ससुर जी का लंड मेरी चूत में डालकर मुझे विक्रम के सामने भी चोद दें।
अब मैं जानती हूँ कि मैं ससुर से फंस गई हूँ। पति का लंड मुझे अब अच्छा नहीं लगता।
मैं हर रात ससुर जी के बेड पर लेटकर सोचती हूँ कि काश विक्रम कभी न लौटे। लेकिन ये राज सिर्फ हम दोनों का है।
घर की दीवारें चुप हैं लेकिन मेरी चूत हर रोज ससुर जी के मोटे लंड से भरती है और पूरी होती है।
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