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बेटी को चोदने में पापा ने कोई कसर नहीं छोड़ी

Papa Beti Sex Story, Pita ji sex story: हाय फ्रेंड्स, मैं थोर आपके लिए बाप-बेटी सेक्स कहानी लेकर आया हूं। उम्मीद है आपको मेरी पिछली सेक्स स्टोरीज की तरह ये भी पसंद आएगी। ये कहानी मुझे यूपी से नीलम ने भेजी है। चलिए अब बिना टाइम वेस्ट किए सीधे कहानी पर आते हैं।

दोस्तों मेरा नाम नीलम है। मैं 20 साल की हूं, और यूपी में रहती हूं। मेरी हाइट 5’5″ है, और रंग हल्का गोरा है। मेरा फिगर 34-28-34 है। मैं ज्यादातर पजामी-कुरती पहनती हूं, ताकि मेरी बॉडी की शेप पूरी नजर आए। मेरी बॉडी देखकर लड़के मुझ पर लाइन मारते हैं, और मुझे खा जाने वाली नजरों से देखते हैं।

यूपी में मैं कॉलेज से डिग्री कर रही हूं। ये कहानी 2 महीने पहले की है, जब ट्रेन में एक सफर के दौरान मेरे पापा ने मुझे चोदा था। चलिए बताती हूं सब कैसे हुआ।

19 साल में मैं कॉलेज में आई थी। स्कूल में मैं एक शरीफ लड़की थी। लेकिन कॉलेज जाते ही मेरी कंपनी में कुछ रंडी टाइप लड़कियां शामिल हो गईं। वो हमेशा लड़कों और सेक्स की बातें करती थीं। उनकी बातें सुनकर मैं भी उत्तेजित होने लगी, और मेरी चूत में चुदाई की प्यास जागने लगी।

फिर मैंने भी कॉलेज में ही एक लड़के को बॉयफ्रेंड बना लिया। फिर हम दोनों रात-रात भर बातें करने लगे। देखते-देखते हम नॉर्मल बातों से सेक्स चैट पर आ गए, और न्यूड वीडियो कॉल भी करने लगे। जब से मैंने उसका लंड देखा था, मैंने फिंगरिंग करनी शुरू कर दी थी। लेकिन कुछ वक्त बाद मेरा फिंगरिंग से भी कुछ नहीं बनता था। मैं चुदना चाहती थी, लेकिन मौका नहीं मिल रहा था।

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फिर एक दिन हमारे घर एक पोस्ट आई। एक जॉब के लिए मैंने ऑनलाइन फॉर्म भरा था। उसका रोल नंबर आया था, और एक हफ्ते बाद एग्जाम था। एग्जाम दूसरे शहर में था। ये देखकर मैं खुश हो गई कि शायद मुझे बॉयफ्रेंड से मिलने का मौका मिल जाए।

जब मैंने घर पर बताया, तो पापा ने कहा कि वो मेरे साथ जाएंगे। इससे मैं दुखी हो गई। जब मैंने बॉयफ्रेंड को ये बताया तो उसने कहा कि वो भी सेम ट्रेन में ही रहेगा, और मौका देखते ही हम जो सकेंगे वो कर लेंगे। मैंने उसको मना किया, लेकिन वो माना नहीं।

फिर वो दिन आया जब हम ट्रेन में जाने वाले थे। रात का सफर था, तो हमने स्लीपर सीट्स ले रखी थीं। मैंने सीट पर बैठते ही अपने बीएफ को मैसेज कर दिया। वो भी उसी बोगी में चढ़ गया।

मेरी सीट ऊपर वाली थी, और पापा की बीच वाली। हम दोनों अपनी-अपनी सीट्स पर जाकर लेट गए। मेरा बीएफ साथ वाले डिब्बे में आकर बैठ गया। वो पासेज सीट पर था, और मुझे अपनी सीट से दिख रहा था। जब तक पापा जागते रहे, उसने मुझे नहीं देखा। लेकिन जब वो सो गए, तो वो मुझे स्माइल पास करने लगा।

फिर उसने मुझे इशारा किया नीचे आने का। मैंने मना किया तो उसने कहा कि मेरे पापा सो चुके थे, और मैं सिस्टर के बहाने बाथरूम की तरफ जाऊं। मेरी भी चूत में खुजली बहुत थी, तो मैं उतरी, और बाथरूम की तरफ चल दी। वो भी पीछे आ गया।

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मैं बाथरूम में गई, और वो भी मेरे साथ अंदर आ गया। हम दोनों के चेहरे पर हल्की-सी शरारती मुस्कान थी। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, उसने मुझे दीवार की तरफ धकेला और होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैंने भी उसका जवाब दिया, अपनी जीभ से उसकी जीभ को सहलाया। किस गहरा होता गया। उसके हाथ मेरी कमर पर रेंगने लगे, फिर धीरे-धीरे पीठ पर। उसने मेरी पीठ को सहलाया, फिर नीचे की तरफ आकर मेरे चूतड़ों को दोनों हाथों से दबाया। उसकी उंगलियां मेरे चूतड़ों की गहराई में दब गईं। मैं सिहर उठी। मेरी सांसें तेज हो गईं। मैं बहुत उत्तेजित हो चुकी थी, मेरी चूत में गर्माहट फैल रही थी।

तभी किसी ने दरवाजे पर जोर से खटखटाया। हम दोनों एकदम सन्न रह गए। दिल की धड़कनें तेज हो गईं। हमने कुछ नहीं बोला। फिर दोबारा खटखटाहट हुई, इस बार और जोर से। मेरे बॉयफ्रेंड ने हल्की, कांपती आवाज में पूछा, “कौन है?”

बाहर से पापा की गंभीर, ठंडी आवाज आई – पापा: मैं वो हूं जिसकी बेटी अंदर तेरे साथ है।

हम दोनों की सांस अटक गई। मेरी तो जैसे पूरी दुनिया थम सी गई। हमने फौरन दरवाजा खोला। पापा का चेहरा गुस्से से लाल था। उन्होंने मेरे बॉयफ्रेंड को एक जोरदार थप्पड़ मारा। आवाज पूरे डिब्बे में गूंज गई। फिर उन्होंने उसे दूसरे डिब्बे में जाने को कहा। वो बिना कुछ बोले, सिर झुकाकर चला गया।

पापा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और मुझे वापस हमारी सीट की तरफ ले आए। मैं चुपचाप उनकी तरफ देख रही थी, मन में डर और शर्म का तूफान चल रहा था। सीट पर पहुंचते ही मैंने जूते उतारे और सीट पर चढ़कर लेट गई। पापा भी मेरे ठीक बगल में लेट गए। अब तक उन्होंने एक भी शब्द नहीं बोला था। उनकी खामोशी मुझे और डरा रही थी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि उनके मन में क्या चल रहा है।

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मैं एक तरफ मुंह करके लेटी हुई थी, पीठ पापा की तरफ। मुझे अभी भी बहुत डर लग रहा था। नींद कहीं दूर भाग चुकी थी। तभी मैंने महसूस किया कि पापा का हाथ धीरे से मेरी जांघ पर रखा गया। पहले तो मुझे लगा कि सोते हुए गलती से रख दिया होगा। लेकिन कुछ ही पल बाद उनका हाथ सरकने लगा। ऊपर की तरफ, धीरे-धीरे, मेरी जांघ के अंदरूनी हिस्से को छूते हुए। फिर अचानक उनका हाथ सीधे मेरी चूत पर आकर रुक गया। हथेली पूरी तरह मेरे यौनांग पर थी। मैं सिहर उठी। सांस रुक सी गई।

मैं कुछ समझ पाती, इससे पहले ही पापा ने मेरी पजामी की नाड़ी खोल दी और पजामी के साथ-साथ पैंटी में भी हाथ डाल दिया। उनकी उंगलियां मेरी चूत की मुलायम त्वचा पर फिरने लगीं। मेरी चूत पहले से ही गीली हो चुकी थी, बॉयफ्रेंड के साथ हुई हरकत की वजह से। पापा ने अपनी मध्यमा उंगली से मेरे क्लिटोरिस को ढूंढ लिया और उसे धीरे-धीरे रगड़ना शुरू कर दिया। गोल-गोल, फिर ऊपर-नीचे। मैं कांप रही थी। मेरी सांसें तेज और अनियमित हो गईं।

तभी मैंने पीछे मुड़कर देखा। पापा मेरी तरफ ही देख रहे थे। उनकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि कुछ और था – भूख। मैंने कांपती आवाज में कहा, मैं: पापा… ये आप क्या कर रहे हो?

पापा ने मेरे कान के पास मुंह ले जाकर धीरे से कहा, पापा: जो काम तू उसके साथ करने गई थी, वो अब तू मेरे साथ करेगी।

मैं: लेकिन… मैं आपकी बेटी हूं।

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पापा ने ठंडे लहजे में जवाब दिया, पापा: अभी तो तू सिर्फ एक लंड की प्यासी रंडी है।

ये सुनते ही मेरे शरीर में एक अजीब सी कंपकंपी दौड़ गई। पापा ने फौरन हमारे ऊपर चादर ओढ़ ली। फिर उन्होंने मेरी पजामी को पूरी तरह नीचे खींच दिया। पैंटी भी घुटनों तक सरक गई। डिब्बे में ज्यादा सवारियां नहीं थीं। जो थीं, वो नीचे वाली बर्थों पर सो रही थीं। रोशनी भी मद्धिम थी। किसी को कुछ पता चलने का ज्यादा खतरा नहीं था।

पापा अब मेरी चूत को और तेजी से सहलाने लगे। उनकी दो उंगलियां मेरी चूत के मुंह पर रगड़ रही थीं, फिर धीरे-धीरे अंदर सरकने लगीं। पहले एक उंगली, फिर दूसरी। वे अंदर-बाहर होने लगीं। मेरी चूत से रस टपक रहा था। उनकी हथेली से मेरे क्लिटोरिस पर दबाव पड़ रहा था। मैं पागल होने लगी थी। होंठ काट रही थी ताकि कोई आवाज न निकले।

तभी पापा थोड़ा सा हिले। मैंने महसूस किया कि उनकी पैंट खुल गई है। उनका सख्त, गर्म लंड मेरी नंगी गांड पर टच हो रहा था। उसकी गर्माहट मेरे पूरे शरीर में फैल गई। मैं और उत्तेजित हो गई।

मन ही मन मैंने सोचा – मुझे तो बस एक लंड चाहिए था। अब वो किसी का भी हो, क्या फर्क पड़ता है। ये सोचकर मैंने धीरे से अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेला।

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पापा को समझते देर नहीं लगी कि मैं तैयार हूं। उन्होंने अपना लंड मेरी गीली चूत के मुंह पर सेट किया। लंड का सुपारा मेरी चूत की सिलवटों को चीरते हुए आगे बढ़ा। उन्होंने हल्का सा प्रेशर डाला। चूंकि मेरी चूत में पहले कभी पूरी चुदाई नहीं हुई थी, वह बहुत टाइट थी। लंड का सिरा अंदर गया, लेकिन आगे बढ़ने में दिक्कत हो रही थी। मुझे तेज दर्द होने लगा। मैंने दांत भींच लिए। आंखों से आंसू छलक आए। लेकिन चिल्ला नहीं सकती थी।

पापा रुके नहीं। धीरे-धीरे, धक्के देकर लंड को और अंदर धकेलते गए।

धीरे-धीरे उन्होंने अपना पूरा लंड मेरी चूत में घुसा दिया। लंड की मोटाई और लंबाई से मेरी चूत पूरी तरह फैल गई थी। मैं दांत भींचे हुए थी, आंखें बंद करके दर्द सह रही थी। पापा रुक गए। उनका लंड मेरे अंदर पूरी तरह समाया हुआ था, बिल्कुल जड़ तक। उनकी सांसें मेरी गर्दन पर पड़ रही थीं। कुछ पल तक वे ऐसे ही स्थिर रहे, मुझे दर्द कम होने का मौका दिया।

धीरे-धीरे मेरा दर्द कम होने लगा। चूत की दीवारें लंड के आकार के अभ्यस्त होने लगीं। अब दर्द की जगह एक अजीब सी भरी हुई तृप्ति महसूस हो रही थी। पापा ने महसूस किया कि मैं अब तैयार हूं। उन्होंने बहुत धीरे से लंड को पीछे खींचा, फिर फिर से अंदर धकेला। पहला धक्का हल्का था, लेकिन उसमें ही एक गहरी खुजली सी महसूस हुई।

अब वो नियमित रूप से लंड अंदर-बाहर करने लगे। हर धक्का धीमा, लेकिन गहरा। सीट की तंग जगह और आसपास सोते लोगों की वजह से तेज हरकत नहीं कर सकते थे। बस लंबे, सुस्त धक्के। लंड हर बार बाहर निकलते वक्त मेरी चूत के मुंह को खींचता, फिर अंदर जाते वक्त क्लिटोरिस पर दबाव डालता। मैंने अपनी आहें दबाने की कोशिश की, लेकिन होंठों से छोटी-छोटी सिसकारियां निकलने लगीं।

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मेरा शरीर अब पूरी तरह उनके साथ तालमेल बिठा रहा था। मैंने अपनी गांड हल्का-हल्का पीछे करके उनके धक्कों का जवाब देना शुरू कर दिया। पापा की एक हाथ मेरी कमर पर थी, दूसरी मेरे मुंह पर हल्के से रखी हुई ताकि कोई आवाज ज्यादा न निकले। उनकी उंगलियां मेरे होंठों को सहला रही थीं।

करीब आधा घंटा तक वो मुझे इसी स्लो, गहरे स्पीड में चोदते रहे। हर धक्के के साथ मेरी चूत और गीली होती गई। रस इतना था कि लंड अंदर-बाहर होने पर चिकचिक की हल्की आवाज आ रही थी, लेकिन चादर के नीचे दबकर वो आवाज बाहर नहीं जा रही थी।

पहला ऑर्गेज्म मुझे बहुत जल्दी आ गया। मेरी चूत सिकुड़ने लगी, लंड को कसकर जकड़ लिया। मैंने होंठ काट लिए, आंखें बंद करके सिहर उठी। पूरा शरीर कांप गया। पापा ने धक्का देना जारी रखा, मेरे झटकों को महसूस करते हुए।

दूसरा ऑर्गेज्म थोड़ी देर बाद आया। इस बार ज्यादा तेज। मेरी सांसें रुक-रुक कर चलने लगीं। चूत के अंदर से गर्म तरल निकला, लंड पर बहकर उनकी जांघों तक पहुंच गया। मैं बेसुध होकर उनके सीने से सट गई।

तीसरा ऑर्गेज्म सबसे लंबा और गहरा था। मेरी पूरी बॉडी में कंपन दौड़ गया। चूत बार-बार सिकुड़ रही थी, लंड को इतनी जोर से पकड़ रही थी कि पापा भी हल्के से कराह उठे।

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अब पापा का रफ्तार थोड़ा बढ़ा, लेकिन अभी भी कंट्रोल में। उनके सांसें तेज हो गईं। मैं समझ गई कि वो झड़ने वाले हैं। कुछ ही धक्कों बाद उन्होंने अपना लंड मेरी चूत के सबसे गहरे हिस्से में दबाया और रुक गए। फिर गर्म-गर्म माल की धार मेरी चूत की दीवारों पर पड़ी। एक के बाद एक फुहार। मैंने महसूस किया कि उनका माल मेरे अंदर भर रहा है, गर्माहट पूरे निचले हिस्से में फैल रही है। उन्होंने तीन-चार जोरदार झटके दिए, फिर पूरी तरह रुक गए।

कुछ देर तक वो ऐसे ही मेरे अंदर रहे। लंड धीरे-धीरे नरम होने लगा। फिर उन्होंने धीरे से लंड बाहर निकाला। मेरी चूत से उनका माल और मेरा रस मिलकर बहने लगा। मैंने पैंटी ऊपर खींच ली, लेकिन सब कुछ गीला हो चुका था।

पापा ने मेरी पजामी ठीक की, चादर सीधी की, और फिर मेरे पीछे लेट गए। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मैं अभी भी सांसें संभाल रही थी, शरीर में कंपकंपी बाकी थी।

उस रात के बाद से पापा को मौका मिलते ही वो मुझे चोद लेते हैं। कभी ट्रेन में, कभी घर पर जब मां बाहर होती है, कभी होटल में। अब मेरी चूत उनके लंड की आदी हो चुकी है।

1989
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Note : यहां पोस्ट की गई हर कहानी सिर्फ मनोरंजन के लिए है,कृपया वास्तव जीवन में कहानी में घटित कोई भी चित्र प्रयोग करना घातक हो सकता है और इसका जिम्मेदारी कहानी के लेखक या फिर कहानी प्रस्तुतकर्ता नहीं होंगे,तो कृपया इस सबको अपने निजी जिंदगी के साथ मत जोड़ें और अपने बुद्धि,विवेक के साथ काम लें।

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