Pyasi aunty ki bus chudai kahani: मेरा नाम सुनीता है। मैं तीस वर्ष की साधारण सी दिखने वाली एक घरेलू महिला हूं। घर में मेरे पति हैं जो बहुत सौम्य हैं और मुझे प्रेम करते हैं। साथ में हमारी एक तेरह साल की बेटी है। हम लोग मुंबई के मलाड इलाके में रहते हैं।
मेरे पति जिनका नाम संजीव है करीब छत्तीस साल के हैं और एक बैंक में मैनेजर पद पर काम करते हैं। संजीव स्वभाव से बिलकुल भी दकियानूसी नहीं हैं। अन्य मध्यमवर्गीय मर्दों की तरह उन्हें मेरे पुरुष मित्रों और कॉलेज के जमाने के दोस्तों से बात करने पर कोई एतराज नहीं है।
मैं रोज अपनी बेटी को ऑटो रिक्शा से स्कूल छोड़ती हूं। फिर सब्जी और बाजार का काम करते हुए दोपहर तक घर वापस आ जाती हूं। एक दिन मैंने अपनी बिटिया को स्कूल छोड़ा और लौटने में मुझे ऑटो रिक्शा नहीं मिला। जो मिल भी रहे थे वो बड़े अनाप शनाप किराया बता रहे थे।
बीस मिनट इंतजार के बाद भी जब मुझे कोई कायदे का रिक्शे वाला नहीं मिला तब मैंने बस पकड़ने की सोची जिसका स्टॉपेज मेरे घर के पास ही था। थोड़ी देर में बस आ गई और जब बस देखी तो भीड़ देखकर एक बार मैंने न चढ़ने का फैसला किया लेकिन कोई और चारा न देखकर मैं उस पर चढ़ गई।
मुझे बस पर चलने की कोई आदत नहीं थी और उस समय दोनों हाथों में घर का सामान था। मैं घुस तो गई लेकिन अब कोई और चारा भी नहीं था। मैं सामान को दोनों हाथों में साधे हुए उस भरी बस में किसी तरह बीच में खड़ी रही।
मेरे सामने एक बुजुर्ग आदमी खड़े थे और मेरे पीछे एक कॉलेज जाने वाला लड़का खड़ा था। उस हिचकोले खाती बस में मैं उन दोनों के बीच फंसी थी और किसी तरह मैं अपने को संभाले हुए थी।
थोड़ी देर बस चलने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरे पिछवाड़े पर कुछ लग रहा है। मैंने पीछे मुड़कर देखा और खड़े हुए लड़के को भौं चढ़ाकर देखा। उस लड़के ने कंधे उचका दिए जैसे बता रहा हो कि जानबूझकर उससे नहीं हुआ है।
बस की भीड़ देखते हुए मुझे भी यही लगा कि उसने जानबूझकर नहीं किया होगा। आखिर मैं एक चालीस साल की औरत थी और कोई उन्नीस बीस साल का लड़का मेरे जैसी उम्रदराज औरत के साथ ऐसा नहीं करेगा।
थोड़ी देर बाद मुझे फिर लगा कि मेरे चूतड़ में कुछ रगड़ रहा है। और एक झटका सा लगा जब यह समझ में आया कि वो दबाव उस लड़के के लंड से हो रहा था जो कड़ा हो गया था।
उसके रगड़ने से जहां मुझे एकदम से गुस्सा आया वही एक अजीब सी अनुभूति भी हुई। उसके लंड का मेरे चूतड़ में दबना कहीं न कहीं मुझे एक मीठा सा सुख भी दे रहा था।
मैं बस की भीड़ में एक तरह से फंसी हुई थी और हालात को देखते हुए मैंने कोई भी अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी।
मेरे चुप रहने से उस लड़के की हिम्मत थोड़ी खुल गई थी। बस के हिचकोले लेने पर वह और मेरे पीछे आकर सट गया। उसका कड़ा लंड अब मेरे चूतड़ों में पहले से ज्यादा करीब से रगड़ खाने लगा था।
उसका लंड जब मेरे चूतड़ों में पूरी तरह रगड़ा तो मेरे शरीर में एक सनसनी सी दौड़ गई और मेरी सांसें भारी चलने लगी। मैं खुद पर विश्वास नहीं कर पा रही थी कि उस लड़के का अपना लंड मेरे चूतड़ों में रगड़ना मुझे अंदर से सुख दे रहा है।
उस अनजाने सुख की तलब इस तरह मेरे अंदर घर कर गई थी कि मुझे यह एहसास ही नहीं हुआ कि मैं उसके लंड को और अपने पीछे महसूस करने के लिए मैंने अपने शरीर को और पीछे की तरफ धकेल दिया था।
उस लड़के ने इस बात का एहसास कर लिया था कि मुझे उसके लंड का स्पर्श अच्छा लग रहा है और उसने अपना लंड और कसके मेरे चूतड़ों पर रगड़ने लगा। यहां तक कि मेरे दोनों चूतड़ों के फांक के बीच भी उसमें धंसने लगा था।
मेरी सांसें बहुत भारी चलने लगी थीं। मेरी आंखें भी अधमुंदी हो गई थीं और मैं पूरे एहसास का मौन लुत्फ लेने लगी। मैंने अपनी कमर को थोड़ा इस तरह से कर लिया कि उसका लंड मेरे चूतड़ों के बीच की दरार को भी महसूस कर सके।
मेरे इस तरह से अपने शरीर को करने से उस लड़के ने मेरा स्वागत ही समझा और उसने पहली बार मेरे चूतड़ों को छुआ। अपने हाथों से मेरे चूतड़ सहलाते हुए उसने उन पर चुटकी काट ली।
उसकी इस हरकत से मेरे पैर एकदम से कमजोर हो गए और मेरी चूत गीली हो गई।
बस स्टॉप जैसे ही मैनेजमेंट कॉलेज के पास आकर रुकने लगी उस लड़के ने अपने आप को मेरे पीछे से अलग कर लिया और जब मेरे बगल से आगे की तरफ जाने लगा तब उसने एक शरारती मुस्कान देते हुए मेरी तरफ कनखियों से देखा। लेकिन मैंने अपनी जल्दी से आंखें घुमा ली।
वो लड़का वही उतर गया और मैं अपनी सांसों को संभालते हुए अपने स्टॉप का इंतजार करने लगी जो कि थोड़े ही आगे था।
मेरे स्टॉप आने पर मैं तेजी से बस से उतर गई और तेज कदमों से अपने घर की ओर भागी।
मैं जैसे तैसे घर पहुंची और दरवाजा खोलकर अंदर चली गई। मैंने सिक्योरिटी को फोन करके कहा कि मेरी नौकरानी को थोड़ी देर से आने का संदेश दे दे।
उसके बाद मैं सारा सामान ड्रॉइंग रूम में छोड़कर अपने बेडरूम में चली गई और अपने को अपनी ड्रेसिंग टेबल में लगे शीशे में निहारने लगी।
मैंने बहुत दिनों के बाद अपने आप को इस तरह निहारा था और महसूस किया कि चालीस साल की उम्र के बाद भी मेरा शरीर खराब नहीं हुआ था। थोड़ा सा वजन जरूर बढ़ा हुआ था लेकिन मैं अपने आपको एक आकर्षक महिला के रूप में देख रही थी।
मैं आज बस में हुई घटना उस लड़के की हरकत को याद करने लगी और एक यह सोचकर गर्म होने लगी कि मुझसे आधे उम्र का लड़का मेरी ऐसी अधेड़ औरत पर आकर्षित हो गया था।
मैंने अपने सारे कपड़े वहीं खड़े खड़े शीशे के सामने उतार दिए और अपने चूतड़ों के उन हिस्सों को छूने लगी जहां उस बांके छोरे के लंड ने उन्हें सहलाया था।
दूसरे हाथ से मैं अपनी चूचियों को पकड़कर सहलाने लगी और मेरी उंगलियां उनकी घुंडियों से खेलने लगी जो मेरे हर स्पर्श से और तनी और बड़ी होती जा रही थीं।
मैं अपने ही स्पर्श से बेहद उत्तेजित हो रही थी। मेरा दूसरा हाथ चूतड़ों से हटकर सामने चूत पर आ गया जो लड़के की हरकत से पहले से ही गीली थी और उसको सहलाने लगी।
मेरी उंगली क्लिट को आहिस्ता आहिस्ता रगड़ने लगी। मेरी आंखें अब बंद हो गईं और मैं वासना की उत्तेजना में हिचकोले खाने लगी थी।
उस लंड की याद करते करते मेरे शरीर में एक झनझनाहट हुई और मुझे ऑर्गेज्म हो गया। वह बड़ा तेज ऑर्गेज्म था। मेरी चूत ने पानी बाहर फेंक दिया था।
मैं एकदम से अपने को निढाल महसूस करते हुए वैसे ही अपने बिस्तर पर गिर गई। मेरी सांसें अब भी भारी चल रही थीं और मैं हैरान थी कि मुझे इतनी जल्दी ऑर्गेज्म हो गया जबकि मुझे पंद्रह बीस मिनट लग जाते थे।
मैं उसी हालत में ही सो गई लेकिन बस में हुई घटना मेरे दिमाग से नहीं उतर पा रही थी। वास्तव में उस घटना ने मुझे हिला दिया था और मुझे वह सब अंदर से अच्छा लगा था।
हर औरत मर्दों की आंखों में आकर्षक लगना चाहती है और खास तौर पर जब वो अधेड़ उम्र की हो जाती है। मैं समझती हूं इसके कई कारण होते हैं। एक तो ढलती उम्र उसको अपनी जवानी के खत्म होने का एहसास देती है। दूसरा उस उम्र में पति अपने काम और करियर में व्यस्त होता है कि वो अपनी पत्नी पर ध्यान ही नहीं दे पाता है और इन सबका असर सेक्स पर पड़ता है।
मुझे उन दिनों की अच्छी तरह याद है जब मेरी नई शादी हुई थी। मेरे पति मुझे हर रात चोदते थे। मुझे बिल्कुल अपनी रानी बनाकर रखा हुआ था। हर बात का ख्याल रखते थे।
अब समय के साथ साथ हमारे अंदर की काम इच्छा खत्म होने लगी थी और जो मेरे अंदर थी वो शायद उनकी नजर से ओझल हो गई थी और उन्होंने मेरे अंदर की औरत को महसूस करना भी बंद कर दिया था।
हमारी चुदाई अब बहुत कम हो गई थी। कभी कभी वो मुझे बांहों में लेते और एक काम की तरह मेरी टांगें फैलाकर मेरी चूत में लंड डालकर चोदते और झड़ने के बाद चादर ओढ़कर सो जाते थे।
कितनी ही बार मैं बिना ऑर्गेज्म के ही रह जाती और तड़पती रहती थी लेकिन फिर मैं मास्टरबेशन का सहारा लेने लगी और मैं अपनी उलझन को उससे शांत करने लगी।
मुझे तो अब यह भी याद नहीं कि कब हम लोगों ने आखिरी बार मिशनरी के अलावा किसी और तरीके से चुदाई की थी।
अगले दिन मैंने अपनी बेटी को स्कूल में छोड़ा और लौटने के लिए ऑटो रिक्शा को जैसे रोकने के लिए बढ़ी तभी मुझे बस आती दिखी और मेरे कदम अपने आप बस स्टैंड की तरफ बढ़ लिए।
मेरे हर बढ़ते कदम पर अपने से ही सवाल था कि सुनीता क्या कर रही है। जब मैं स्टैंड पर पहुंची तो वह मुझे कल वाला लड़का खड़ा दिखा। मेरा दिल मेरे मुंह को आ गया। दिल बेहद तेजी से धड़कने लगा और मैंने अपनी नजर उससे हटा ली और आती हुई बस को देखने लगी।
बस में भीड़ थी मैं कुछ रुककर उस पर चढ़ गई। मैंने यह देख लिया था कि वह लड़का तब तक नहीं चढ़ा जब तक मैं बस में नहीं चढ़ गई। मेरे चढ़ते ही वह भी बस में मेरे पीछे चढ़ गया।
एक अजीब सी संतुष्टि मिली जब लड़का मेरा इंतजार में बस में चढ़ने से रुका रहा। मैं बीच में ही खड़ी हो गई थी और लड़का भी ठीक मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया।
उसको मैं अपने पीछे खड़ा महसूस कर रही थी और तुरंत ही मैंने उसके हाथ को अपने चूतड़ों पर महसूस किया। वह मेरे चूतड़ों को अपनी हथेली से सहला रहा था।
आज वह लड़का बहुत आत्मविश्वास में लग रहा था। उसके छूने का ढंग में पूरा अधिकार था। उसके हाथ रास्ते भर मेरे चूतड़ों को सहलाते रहे। दबाते रहे और बीच बीच में उसकी उंगलियां मेरे चूतड़ों की दरार को भी महसूस करते रहे।
मैं सब कुछ सांस रोके होने दे रही थी। मैं उसकी हर हरकत से अंदर ही अंदर उत्तेजित होती जाती थी। बड़ी मुश्किल से मैं अपनी सांसों पर काबू कर पा रही थी।
उसके स्टॉप पर वह लड़का मुझसे रगड़ता हुआ आगे निकला और उतर गया।
उस दिन के बाद से यह रोजाना की बात हो गई। मैं रोजाना अब बस ही पकड़ने लगी। पहले मैं ही चढ़ती थी और वह लड़का चाहे कितनी ही भीड़ हो मेरे बाद ही चढ़ता और धक्का मुक्की करता हुआ मेरे पीछे आकर खड़ा हो जाता और मेरे चूतड़ों को मसलता था।
मैं हमेशा ही सलवार कमीज पहना करती थी लेकिन एक दिन मैंने साड़ी पहनने का फैसला किया जिसको देखकर मेरी बेटी भी बड़ी चौंकी क्योंकि मैं हमेशा उसको सलवार कमीज में ही छोड़ने जाती थी।
मैंने उसको समझाया कि मेरी साड़ियां रखे रखे खराब हो रही थीं इसलिए अब मैंने साड़ी ज्यादा पहनने का फैसला किया है। मैंने जानबूझकर साड़ी का फैसला लिया था। मैं उस लड़के को अपनी नंगी कमर का एहसास देना चाहती थी। मैं उसे वहां अपने को छुआना चाहती थी।
जैसा मैंने सोचा था वैसे ही उस लड़के ने किया। उस दिन उसके हाथ मेरे चूतड़ों को सहलाने के बजाय मेरे ब्लाउज और साड़ी के बीच में कमर पर रेंगने लगे। उसके मेरे नंगे अंग पर हाथ रखते ही मुझमें करंट सा दौड़ गया और मेरी चूत एकदम से गीली हो गई।
बस में सब अपनी अपनी दुनिया में इतना व्यस्त थे कि किसी को यह ख्याल भी नहीं था कि बस में वह लड़का क्या कर रहा था और मैं उसे आजादी दे रही थी।
बस ने एक जगह कसके ब्रेक लगाया तो लड़का मेरे ऊपर पीछे से झूल गया और बड़े आत्मविश्वास से पीछे से हाथ डालकर साड़ी के पल्लू के नीचे से मेरी चूची पर हाथ रख दिया।
मेरा दिल धक् कर गया और पकड़े जाने के डर से मैं उससे आगे खिसकके आ गई। वह बात को समझ गया और उसने अपने हाथ मेरे चूतड़ों पर रख दिए और जब तक उसका स्टॉप नहीं आया वह मेरे चूतड़ों को दबाता रहा और मेरी नंगी कमर को हथेली से सहलाता रहा।
उसके स्टॉप आने पर हमेशा की तरह वह मुझसे रगड़ता हुआ आगे जाकर उतरने लगा लेकिन इसी दौरान उसने मेरे हाथ को नीचे थपथपाया और एक छोटी सी कागज की चिट मेरी हथेली में डाल दी।
मैंने उस चिट को अपनी मुट्ठी में कसके दबा लिया और यह जानते हुए भी उस चिट में क्या होगा मैं उसे पढ़ने की हिम्मत न कर सकी। मैं भौचक्की और एक अनजाने डर से डरी हुई थी।
बस में मैं उसके छूने का मजा तो ले रही थी लेकिन मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि वह ऐसी कोई हरकत करेगा। मैंने उस चिट को अपने पर्स में डाल दिया।
घर में मैं पूरे समय उस लड़के के बारे में ही सोचती रही। उसका छूना उसका मुझे दबाना उसका मेरी चूची पर हाथ रखना सब कुछ मुझे अंदर से जलाता रहा।
उस रात मेरे पति जब बिस्तर पर आए तो मैंने अपना हाथ बढ़ाकर उनसे लिपट गई। उन्होंने चौंकते हुए मुझे देखा और मुस्कराते हुए मुझे बांहों में जकड़ लिया।
उनके हाथ मेरी नाइटी को खिसकते हुए मेरी चूचियों पर पहुंच गए और उसे दबाने लगे। उस वक्त मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वह लड़का मेरी चूचियों को दबा रहा है।
जब वह मेरी नाइटी ऊपर कर रहे थे तो मैंने अपने आप ही उसको पूरी तरह से अपने से अलग कर दिया और बहुत दिनों बाद मैं नंगी उनसे चिपट गई। मैं बहुत ही गर्म थी।
मैंने आंख बंद कर रखी थी और मुझे उनकी हर हरकत में उस लड़के का होने का एहसास हो रहा था। उन्होंने जैसे ही मेरी टांगें फैलाकर मेरी चूत में अपना लंड डाला वो फचाक से मेरी चूत में घुस गया।
उनको मेरी चूत के गीलेपन का एहसास हो गया था। वह मुझे चोद रहे थे और कह रहे थे सुनीता आज तो बिलकुल ही तुम गर्माई हुई लग रही हो इतनी जल्दी चूत ने पानी छोड़ रखा है।
उनका हर धक्का मुझे उस लड़के के लंड का धक्का लग रहा था और मैं तेजी से कमर उठा उठाकर उनके लंड से चुद रही थी। मैंने उनसे कसके धक्के मारने को कहा और वह भी गरमा कर तेजी से मुझे चोदने लगे।
वह थोड़ी देर में झड़ भी गए लेकिन मैं बहुत दिनों बाद चुदाई के दौरान झड़ी थी। मुझे चोदने के बाद वह अपने हिस्से पर जाकर सो गए लेकिन खूब चुदने के बाद भी मेरी आंखों में नींद नहीं थी।
मुझे तो सिर्फ उस लड़के की शक्ल सामने घूमती नजर आ रही थी। एक बारगी उठकर अपने पर्स से उस चिट को निकलकर देखने की इच्छा भी हुई लेकिन मैं अपने से बार बार पूछ रही थी सुनीता उस चिट में लड़के ने अपना नंबर दिया है क्या तू उसे कॉल करेगी।
लेकिन मेरी अंतरात्मा ने मुझे रोक दिया यह सही नहीं है एक सीमा के बाद बात बिगड़ सकती है।
अगले दिन रोजाना की तरह मैं बस स्टैंड पहुंची लेकिन वहां वह लड़का नहीं दिख रहा था। थोड़ी देर में बस आई और चली गई लेकिन वह नहीं आया और मैं उसके इंतजार में खड़ी रही।
दूसरी बस भी आकर चली गई लेकिन मैं बस पर नहीं बैठी। मैंने ऑटो रिक्शा किया और घर चल दी। मुझे बिना उस लड़के के बस में चढ़ने की कोई इच्छा नहीं थी।
मैं रास्ते भर परेशान रही कि आज क्या हो गया आज वह क्यों नहीं आया। उसका न होना ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जिंदगी से कुछ चला गया हो।
उस लड़के के साथ बस का सफर मेरी रोजाना की जिंदगी में इस तरह शामिल हो चुका था कि उसके आज न होने से सब कुछ खाली खाली लग रहा था और परेशान भी हो रही थी कि क्या हुआ उसको।
मेरी इतनी बेचैनी बढ़ गई कि मैंने अपना पर्स खोलके उस चिट को ढूंढ निकाला जो उस लड़के ने मुझे दी थी। उस पर मोबाइल नंबर लिखा था।
एक बार मन आया कि उसको कॉल करूं और पता करूं कि क्यों नहीं आया लेकिन हिम्मत नहीं हुई।
घर आकर मैं सुस्त सी कमरे में लेट गई। ध्यान बटाने के लिए मैंने टीवी चालू कर दिया लेकिन मेरा दिमाग उस लड़के में ही लगा हुआ था।
इसी उलझन में मैंने अपना मोबाइल हाथ में ले लिया और उस लड़के का नंबर मिला दिया। कॉल जाती देख मेरी हिम्मत जवाब दे गई और मैंने झट से मोबाइल काट दिया।
मेरे हाथ कांप रहे थे मैंने मोबाइल सामने बिस्तर पर फेंक दिया। मेरे मोबाइल फेंकते ही मेरा मोबाइल बज उठा। मैंने उसको उठाकर देखा तो कॉल उसी लड़के की थी उसने कॉल बैक की थी।
मैंने कॉल बजने दी अजीब दुविधा में थी। सोचती रही कि क्या करूं क्या न करूं तब तक मेरा मोबाइल अपने आप बजना बंद हो गया।
मोबाइल मेरे हाथ में ही था कि उसने दोबारा कॉल किया इस बार मैंने धड़कते दिल से कॉल उठा ली।
मैंने मोबाइल कान पर लगा लिया और उधर से हाय की आवाज आई आवाज बड़ी खुश्की भरी थी। मैं चुप रही।
फिर उसने कहा मैं जानता हूं कि यह कॉल आपने की है।
मैंने रुककर पूछा कौन है।
उसने हलके हंसते हुए कहा आपको मालूम है कि मैं कौन हूं।
उसकी आवाज में शरारत थी। अब तक मैंने अपनी बदहवासी पर काबू कर लिया था मैंने सपाट और तल्ख लहजे में कहा क्या चाहिए मुझसे मैं एक औरत हूं और तुमसे बहुत बड़ी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है क्या।
उसने तपाक से कहा आप मेरी गर्लफ्रेंड हो आंटी जी।
मैंने भी तुरंत उसे डपटते कहा मुझे आंटी वांटी मत कहो।
उस पर उसने कहा आप अपने आप को बड़ी समझती हो इसलिए आपको आदर में मैंने आपको आंटी कहा।
लड़का तेज था तपाक से जवाब दे रहा था मैंने उसको छेड़ते हुए कहा तुमको आदर यही दिखाना था बस में आदर नहीं दिखा सकते थे।
आप जो है और मुझे जो लगती है मैं उसका आदर करता हूं आपकी उम्र का नहीं।
मैं क्या हूं मैं क्या लगती हूं।
आप में एक सेक्स अपील है जो मुझे और किसी औरत में नहीं दिखाई देता।
मैंने शरारत भरे अंदाज में उससे कहा तुम मेरी सेक्स अपील के बारे में क्या जानते हो तुमने तो सिर्फ मेरे बम्स को ही नोचा है।
आपकी गदराई चूतड़ों को छूकर ही मुझे बाकी सबका अंदाजा लग गया है। इसके साथ ही मुझे चूमने की आवाज सुनाई दी।
मैंने पूछा यह क्या है।
उसने कहा किस था मेरी नई गर्लफ्रेंड के लिए।
मैंने हंसते हुए कहा तुम मुझे अपनी गर्लफ्रेंड कह रहे हो मैं एक शादीशुदा तेरह साल की बच्ची की मां हूं।
उस पर उसने बेफिक्री से कहा छोड़िए इन बातों को आप मेरी दिलरुबा हो।
मैंने बात टालते हुए उससे पूछा आज तुम क्यों नहीं आए।
उसने सवाल मुझ पर ही दाग दिया आपने मुझे मिस किया।
मैंने तेजी से जवाब दिया नहीं पागल हो क्या।
उधर से उसने तंज लेते हुए कहा अच्छा फिर मुझे कॉल क्यों किया।
मैंने भी कह दिया तुमने नंबर दिया था इसलिए कॉल मैंने किया था।
मेरे जवाब पर उसने बड़े आहिस्ता से कहा मैं आज यह जानने के लिए नहीं आया कि आप मुझे मिस करती हो या नहीं मेरा ख्याल सही था मेरी दिलरुबा मुझे मिस करती है। यह कहकर वो बच्चों की तरह हंसने लगा।
मैं बात कर रही थी और बात किस तरफ जा रही है मुझे कोई भी ख्याल नहीं था मैं बस उससे बात करके मस्ती लेने लगी थी।
हमारी आगे की बातचीत कुछ इस तरह से हुई।
मैं तुम क्या करना चाहते हो।
वो मैं मिलना चाहता हूं और आपको बांहों में लेना चाहता हूं।
मैं तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो तुमको तो मुझे ज्यादा सेक्सी और जवान लड़की मिल जाएगी।
वो मुझे लड़कियां अच्छी नहीं लगती मुझे मैच्योर औरतें पसंद हैं।
मैं कितनी मैच्योर औरतों को अब तक जानते हो।
वो किसी भी को नहीं केवल फंतासी में महसूस किया है आज तक मैं इतने करीब से किसी को भी नहीं जाना है जितना मैंने आपको जाना है और किया है।
मैं सुनो मैं तुमसे नहीं मिलूंगी समझे मेरी खुशहाल शादीशुदा जिंदगी है और उसको मैं तुम्हारे लिए खराब नहीं करूंगी।
वो ठीक है मैं आपके हां का इंतजार करूंगा।
मैं कोई बात नहीं तुम कल आ रहे हो।
वो कहां तुम्हारे घर।
मैं नहीं बेवकूफ बस पर।
वो बिल्कुल चूतड़ों की मालिश के लिए तैयार रहना।
हम दोनों ही इस बात पर हंसने लगे।
वो सुनो कल पैंटी मत पहनना।
मैं क्या।
वो ओह हो कल साड़ी के अंदर पैंटी मत पहनना।
मैं पागल हो क्या।
यह कहकर मैंने मोबाइल काट दिया।
कहानी आगे जारी रहेगी।
कहानी का अगला भाग: कॉलेज के लड़के ने भरी बस में मेरी चूत गीली की – 2
Related Posts