Sasur bahu sex story – Bahu ko sasur ne choda sex story – Papa ji ka lund bada – Pregnant bahu sex story: मेरी उम्र सत्ताईस वर्ष है। मेरा रंग सांवला जरूर है, लेकिन लोगों का कहना है कि मेरे नयन-नक्श बहुत आकर्षक हैं। मैं इकहरे बदन की दुबली-पतली और लंबी युवती हूं। मेरी पतली कमर ने मुझे सिर से पांव तक इतना सुंदर बना रखा है कि देखने वाले ठहर जाते हैं। मेरे पति ने सुहागरात को बताया था कि जब वे शादी से पहले मुझे देखने गए थे, तो मेरी सूरत देखे बिना ही मेरी कद-काठी पर मोहित हो गए थे। और जब सूरत देखी, तो उनका हाल बेहाल हो गया था। उनकी आंखों में उस दिन जो चमक थी, वह आज भी मुझे याद आती है – एक गर्माहट जो मेरे बदन को छूकर गुजरती थी।
मेरी शादी बीस वर्ष की उम्र में हुई थी। मैं छह वर्षीय एक बेटे की मां भी हूं। उसके बाद मैं गर्भवती नहीं हुई। किसमें क्या खामी आ गई है, यह जानने की हमने कभी कोशिश नहीं की और ना ही कभी विचार-विमर्श किया। मैं कभी अपने पति से और बच्चे के लिए कहती हूं, तो वे यह कहकर टाल जाते हैं कि एक लाड़ला है तो वही बहुत है। और बच्चे नहीं होते तो न हों, क्या करना है? उनकी आवाज में एक ठंडी उदासीनता होती है, जो मेरे दिल को चुभती है।
लेकिन बच्चों के मामले में मैं तृप्त या संतुष्ट नहीं हूं। कम से कम दो-तीन बच्चे तो होने ही चाहिए। इसलिए मैं पति के विचारों से सहमत नहीं हूं। मेरे मन में एक या दो बच्चों की मां बनने की लालसा बनी रहती है – एक गहरी, जलती हुई इच्छा जो रातों को मुझे जगाए रखती है, जब मैं अपने खालीपन को महसूस करती हूं।
मेरी एक पड़ोसन ने मुझे सलाह दी, “तुम अपने पति के साथ अस्पताल जाकर चेक करवाओ। इलाज असंभव नहीं है। पहले एक बच्चा पैदा कर चुकी हो, तो स्पष्ट है कोई छोटी-मोटी खराबी आ गई है। इलाज हो जाएगा, तो फिर गर्भवती हो सकोगी।” उसकी आवाज में उम्मीद थी, जो मेरे अंदर भी एक चिंगारी सी जगा गई।
मैंने पति को बताया, तो उन्होंने डांट पिला दी। “डॉक्टरों के पास चक्कर लगाना मुझे पसंद नहीं है और ना ही मुझे और बच्चों की जरूरत है। तुम्हें क्यों इतनी जरूरत महसूस हो रही है कि पड़ोस में रोना रोती फिर रही हो? भगवान ने एक लड़का दिया है, उसी का अच्छी तरह पालन-पोषण करो और खुश रहो।” उनकी आंखों में गुस्सा था, और मैं चुप हो गई, लेकिन अंदर से एक तूफान सा उठ रहा था।
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यह एक साल पहले की बात है। मेरे पति एक अस्पताल में ही नौकरी करते हैं। कभी दिन की तो कभी रात की ड्यूटी लगती है। मेरे कोई देवर-जेठ नहीं हैं, दो ननदें और ससुर जी हैं। एक ननद की शादी मुझसे भी पहले हो चुकी थी, दूसरी की शादी पिछले साल ही हुई है। अपने लड़के को हमने स्कूल में डाल दिया है। शुरू में ही पता लगने लगा कि वह पढ़ने में तेज निकलेगा। उसे मैं बहुत प्यार करती हूं। उसके खान-पान और पहनावे का भी ध्यान रखती हूं। फिर भी जी नहीं भरता। हर समय सोचती रहती हूं कि एक बच्चा और हो जाता तो अच्छा होता, बेशक चाहे बेटी ही हो जाए। और बच्चा पाने की लालसा लुप्त नहीं हो पा रही थी – वह मेरे बदन में एक गर्माहट की तरह फैलती रहती थी, हर रात मुझे बेचैन करती।
इस लालसा के चलते मेरा मन बहकने लगा। मेरी नीयत खराब होने लगी कि मैं अपने पति के किसी मित्र से शारीरिक संबंध बना कर एकाध बच्चा और पैदा कर लूं। मन बहकने के दौरान मेरी मति भ्रष्ट हो जाती। मैं एक बार भी नहीं सोच पाई कि पति के वीर्य में खराबी है या मेरी बच्चेदानी खराब हो गई है। नहीं सोचा कि अगर मुझमें खराबी आ गई होगी, तो गैर मर्द से संबंध बनाने से भी गर्भवती कैसे हो जाऊंगी? बस लगातार यही सोचती रही कि गैर मर्द से सहवास करूंगी तो मेरी लालसा पूरी हो जाएगी। वह विचार मेरे बदन में एक मीठी सिहरन पैदा करता, जैसे कोई गर्म हवा मेरी त्वचा को छू रही हो।
मेरे पति के कई मित्र हैं। दो तो इतने गहरे मित्र हैं कि अक्सर मिलने घर तक चले आते हैं। जब पतिदेव ने एकदम निराश कर दिया, तो मेरा ध्यान उनके दोनों मित्रों की ओर स्वाभाविक रूप से चला गया। वे दोनों भी शादी-शुदा और दो-दो बच्चों के पिता हैं। उनसे मैं कभी पर्दा नहीं करती थी। पति के सामने भी हंसती-बोलती थी। उनकी नजरों में मेरे यौवन की लालसा सदैव झलकती थी – एक भूखी, गर्म नजर जो मेरे उरोजों पर ठहरती, मेरी कमर को नापती। लेकिन मैं नजरअंदाज कर जाती थी, क्योंकि मुझे उनकी जरूरत महसूस नहीं होती थी। मेरे पति भी हृष्ट-पुष्ट और मेरी पसंद के पुरुष थे। लेकिन चूंकि उन्होंने मुझे निराश किया, इसलिए वे मेरी नजरों में बुरे बन गए थे। और इसलिए मैं उनके मित्रों की ओर आकर्षित हो गई। पहले जब उनके मित्र आते और पति न होते तो लौट जाते थे, लेकिन अब पति नहीं होते तो उनके मित्रों से बैठने, चाय पीने का अनुरोध करती हूं। कभी एक आता, कभी दूसरा। मेरे अनुरोध को वे अपना सौभाग्य समझते, इसलिए बैठ जाते। चाय के बहाने उन्हें कुछ देर के लिए रोकती और मुस्कुरा-मुस्कुरा कर बातें करती। कभी उनकी बीवियों के बारे में पूछती, कभी उनकी प्रेमिकाओं की बातें करके छेड़ती। वे मेरी बातें रस लेकर सुनते और खुद भी मजाक करते। उनकी सांसें मेरे करीब आने पर तेज हो जातीं, उनकी खुशबू मेरे नथुनों में घुसती। वे दोनों ही मेरे रूप-सौंदर्य के आगे नतमस्तक थे। मैं भी उनके पौरुष के आगे झुकने का मन बना चुकी थी। लेकिन मेरी लज्जा हमारे बीच आड़े आ रही थी। इसलिए हम एक-दूसरे की ओर धीरे-धीरे झुक रहे थे, जैसे कोई गर्म लहर धीरे-धीरे बढ़ती हो।
हालांकि मैं दोनों से शारीरिक संबंध बनाने की जरूरत महसूस नहीं कर रही थी, क्योंकि मैं बदनाम होना नहीं चाहती थी। चारा मैं दोनों के आगे फेंक रही थी। जो भी पहले चुग जाए, यह भाग्य के ऊपर मैंने छोड़ दिया था। दोनों एक साथ कभी नहीं आए। एकाध बार ऐसा मौका आया, लेकिन न मैंने बैठने के लिए कहा और न वे बैठते थे। दोनों अपनी-अपनी गोटी सेट करने में लगे थे। इसलिए एक साथ बैठकर दोनों ही मुझसे हंसी-ठिठोली कैसे करते?
पापा जी यानी मेरे ससुर जी एक दुर्घटना में चार साल पहले अपने दाएं पांव का पंजा खो चुके हैं। इसलिए काम-धंधा उनके बस का रहा नहीं। जरूरत भी क्या है? अपना मकान है, इकलौता बेटा कमा ही रहा है। इसलिए वे घर में ही बेकार पड़े रहते हैं। उनकी उम्र लगभग सैंतालीस साल है। दिन भर घर में पड़े-पड़े ऊब जाते हैं, इसलिए शाम को चार बजे बाजार घूमने चले जाते हैं। चलने में दिक्कत होती है, इसलिए धीरे-धीरे चलते हैं। वापस लौटने में उन्हें दो-तीन घंटे लग जाते हैं। पति के मित्रों से हंसी-मजाक करने का मुझे यही समय मिलता था। वे हर रोज आकर बैठते भी नहीं थे।
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