हेलो, मेरा नाम कंचन है। मैं अभी 34 साल की हूं। मेरा रंग गोरा है, बदन छरहरा और कमर चिकनी-चिकनी। आज भी जब मोहल्ले के लोग मुझे देखते हैं तो उनकी नजरें टिक जाती हैं और मुंह से पानी टपकने लगता है।
मेरे परिवार में मेरा 14 साल का बेटा और 10 साल की बेटी है। पति ज्यादातर काम-काज के सिलसिले में बाहर रहते हैं। मैं घर पर रहकर बच्चों को पढ़ाती हूं और घर संभालती हूं। लेकिन यह कहानी उस समय की है जब मेरी शादी अभी नहीं हुई थी और मेरी पहली बार कौमार्य भंग हुई थी।
उस वक्त मैं और मेरी सहेली माया दोनों नई-नई जवानी में कदम रख चुके थे। माया मुझसे थोड़ी ज्यादा चतुर और नटखट थी। वह पहले से ही कई लड़कों के साथ अफेयर कर चुकी थी, जबकि मैं बिल्कुल सादी-सादी लड़की थी। हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं।
मेरे घर में मम्मी-पापा थे। मैं उनकी इकलौती संतान थी। वे मुझे बहुत नाजों से पालते थे और पढ़ाई पर पूरा जोर देते थे। उनके गौरव को ठेस न पहुंचे, इसलिए मैं कभी किसी लड़के से बात तक नहीं करती थी। बस चुपचाप अपनी किताबों में डूबी रहती थी।
माया के घर में उसके माता-पिता के अलावा एक बड़ा भाई था, राकेश। उसकी उम्र हमसे करीब पांच साल ज्यादा थी। मैं उसे राकेश भैया कहकर बुलाती थी और वह मुझे अपनी छोटी बहन की तरह मानता था। जब पढ़ाई में कोई दिक्कत होती तो हम दोनों उससे पूछ लेते थे। वह बहुत धैर्य से, प्यार से सब समझा देता था।
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एक दिन मैं घर पर अपनी किताबें खोले बैठी पढ़ रही थी। सामने मम्मी-पापा बैठे मेरी शादी की बातें कर रहे थे। पापा कह रहे थे, “एक लड़का देख रखा है। अच्छा परिवार है। जल्द ही उसके घरवालों से बात करके शादी पक्की कर देंगे।”
तभी माया मेरे घर आई और यह सारी बात उसने सुन ली। वह मुस्कुराई और मुझे आंख मारकर इशारा किया।
मम्मी ने माया को देखकर कहा, “आओ बेटी, बैठो। कहां जा रही हो? दिन भर बस खेलते-कूदते रहते हो?”
माया ने हंसते हुए जवाब दिया, “अरे चाची, अभी तो उम्र है न। थोड़ा खेल-कूद लेने दो। शादी हो जाएगी तो कहां मिलेगा मौका। आज बाग में झूला लगा है। हम आम के पेड़ के नीचे झूला झूलने जा रहे हैं।”
मम्मी का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया। वे माया को अच्छी तरह जानती थीं। माया की नटखट हरकतें और लड़कों से ज्यादा घुलना-मिलना उन्हें पसंद नहीं था। इसलिए वे मुझे माया से दूर रखना चाहती थीं।
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फिर भी मम्मी ने कहा, “अच्छा ठीक है। लेकिन शाम होने से पहले घर लौट आना। और ज्यादा झूला मत झूलना, गिर जाओगी।”
मैं बहुत खुश हो गई। सावन का महीना था। गांव में चारों तरफ हरे-भरे बाग-बगीचे थे। आम के पेड़ लदे हुए थे। सखियां वहां झूला झूलने जाती थीं।
हम दोनों बाग पहुंचे। वहां पहले से कई लड़कियां झूला झूल रही थीं। हमने भी अपना झूला लगाया और झूलने लगे। पास ही कुछ लड़के खेल रहे थे। जहां लड़कियां होती हैं, वहां लड़के जरूर होते हैं।
उनमें अजय नाम का लड़का था। वह माया को बहुत चाहता था और हमेशा उसे देखता रहता था। माया भी उसे मन ही मन पसंद करती थी, हालांकि उसका किसी और लड़के के साथ अफेयर चल रहा था। फिर भी अजय को वह दूर नहीं कर पाती थी।
माया ने अजय को झूला लगाने के लिए बुलाया। अजय ने झूला ऊंचा करने के बहाने माया से बातें शुरू कर दीं। माया हंस-हंसकर जवाब दे रही थी। मैं भी पास थी, लेकिन तभी अजय के दो-तीन दोस्त आ गए और वे मुझ पर भी लाइन मारने लगे।
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मैं बिल्कुल बात नहीं करना चाहती थी। इसलिए चुपचाप झूला झूलती रही। लेकिन माया अजय से चिपकी हुई थी। अजय उसे पीछे से जोर-जोर से झूलाता और जब झूला पीछे आता तो उसकी कमर या कंधे को पकड़ लेता। माया खुश होकर हंस रही थी।
इस तरह माया और अजय ने खूब मजे किए। फिर हम दोनों घर लौट आए।
शाम को मैं और माया छत पर बैठकर बातें कर रही थीं। तभी राकेश भैया नीचे से गुजरे। मैंने उन्हें आवाज दी, “राकेश भैया!”
वे रुक गए और ऊपर देखकर बोले, “क्या बात है कंचन?”
मैंने कहा, “भैया, गणित में थोड़ी हेल्प चाहिए।”
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राकेश भैया मुस्कुराए, “अच्छा। शाम को आता हूं। दोनों को साथ में पढ़ा दूंगा।”
मैं बहुत खुश हो गई। मैंने जल्दी से खाना बनाया, मम्मी-पापा को खिलाया और कहा कि राकेश भैया से पढ़ाई करनी है इसलिए दलान में जा रही हूं।
हमारे घर में एक साइड कमरा था जिसे दलान कहते थे। वहां कोई आसानी से डिस्टर्ब नहीं करता था।
शाम को राकेश भैया और माया दोनों आ गए। हम तीनों फर्श पर चटाई बिछाकर बैठ गए और पढ़ाई शुरू कर दी।
मम्मी को राकेश भैया पर पूरा भरोसा था। वे जानती थीं कि भैया घर के काम भी संभालते हैं और पढ़ाई में भी मदद करते हैं।
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राकेश भैया हम दोनों के बीच में बैठे थे। माया पढ़ाई में कमजोर थी। उसे जल्दी नींद आने लगती थी। भैया उसे डांटते, “माया, ध्यान से पढ़ो। सो मत जाओ।”
मैं होशियार थी इसलिए भैया मुझे बहुत प्यार से समझाते थे। उस दिन माया को नींद आ ही गई। वह बगल में लेट गई और सो गई।
राकेश भैया ने कहा, “ठीक है, सो जाने दो। पढ़ाई हो जाएगी तो जगा देंगे।”
फिर वे मुझे पढ़ाने लगे। मैं बहुत गौर से सुन रही थी। बीच-बीच में मेरी किताब में कुछ लिखते हुए उनका हाथ मेरे हाथ को छू जाता। मैं थोड़ा शरमा जाती लेकिन कुछ कहती नहीं।
तभी भैया रुक गए। मैंने देखा तो उनकी नजर मेरी चूचियों पर टिकी हुई थी। मैं झुकी हुई थी इसलिए ब्लाउज से मेरी गहराई साफ दिख रही थी।
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मैं एकदम शरमा गई। मेरे गाल लाल हो गए। हमारी आंखें मिलीं। दोनों ही घबरा गए। भैया जल्दी से नजरें नीचे कर लीं और मैंने भी किताब की तरफ देखना शुरू कर दिया।
फिर पढ़ाई चालू हो गई। हम बातें करते रहे। भैया कभी-कभी दूसरे मजेदार विषय भी छेड़ देते। मैं मजे से सुनती और सवाल पूछती। वे बहुत प्यार से समझाते। बीच-बीच में मेरे गाल खींच देते या कंधे पर हल्का हाथ रख देते। हम दोनों मुस्कुरा देते।
रात करीब दस बजे तक पढ़ाई चलती रही। फिर मैं सोने चली गई। राकेश भैया ने माया को जगाया और उसे घर ले गए।
ऐसे ही कई दिन बीत गए। धीरे-धीरे राकेश भैया का व्यवहार बदलने लगा। अब वे मुझसे ज्यादा मजाक करने लगे थे। बातों के दौरान मेरे करीब सट जाते। कभी मेरी कमर को हल्के से छू देते, कभी मेरे बालों में उंगलियां फेर देते। मैं हंसकर टाल देती थी लेकिन मन ही मन कुछ अजीब-सा महसूस होने लगा था।
इसके आगे की कहानी अगले पार्ट में।
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कहानी का अगला भाग: भैया ने किया पहला किस
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