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पापा जी का लौड़ा तो मेरे पति से लंबा है

पापा जी ने मेरी बांह पकड़कर कहा, “हां पानी तो पहले ही रख गई थी। मैंने पानी के बहाने यह पूछने बुलाया है कि क्या तुम मेरी बात का बुरा मान गई?” उनका स्पर्श मेरी बांह पर गर्म था, जैसे आग की तरह।

मैंने कहा, “नहीं तो।”

“अगर बुरा नहीं मान है तो आओ, बैठ जाओ ना।”

कहते हुए उन्होंने मेरी बांह खींची। मैं संभल नहीं पाई या ऐसा भी समझ सकते हैं कि मैंने संभलना नहीं चाहा। लड़खड़ाकर बैठ सी गई। मेरी सांसें तेज हो गईं, दिल की धड़कनें कान में गूंज रही थीं।

“शर्माओ मत बहू, यह तो समस्या के समाधान की बात है। और बच्चे पाने के लिए तुमने जो कदम उठाना चाहा वह गलत नहीं था। गलत तो वह लड़का है जिसकी ओर मैंने तुम्हारा झुकाव देखा। तुम इतनी सुंदर हो कि तुम्हें किसी का भी सहवास मिल जाएगा। लेकिन बाहरी किसी एक आदमी की आगोश में जाओगी तो उसके अनेक दोस्त भी तुम्हें अपनी आगोश में बुलाएंगे। मजबूरी में तुम्हें औरों का भी दिल खुश करना पड़ेगा। तुम इनकार करोगी तो चिढ़कर वे तुम्हें बदनाम करेंगे। नहीं इनकार करोगी तो भी बात एक-दूसरे दोस्तों तक पहुंचेगी और तुम चालू औरत के रूप में बदनाम हो जाओगी। खानदान की नाक कटेगी सो अलग। मैं घर का सदस्य हूं, हमारे संबंध ऐसे हैं कि किसी को संदेह तक नहीं होगा। मैं तुम्हारी बदनामी की बात सोच भी नहीं सकता, क्योंकि खुद मेरा मुंह काला हो जाएगा। अब शर्म छोड़ो और आओ मेरी आगोश में समा जाओ।”

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कहकर पापा जी ने मुझे अपनी ओर खींचा और बांहों में बांध लिया। मैंने जरा भी विरोध नहीं किया और उनके सीने में दुबक गई। समर्पण ही मेरे पास एक मात्र रास्ता था। उनका सीना गर्म और मजबूत था, उनकी खुशबू – एक मर्दाना, उत्तेजक खुशबू – मेरे नथुनों में भर गई। मेरी त्वचा उनके स्पर्श से सिहर उठी।

पापा जी यानी मेरे ससुर बूढ़े नहीं हुए हैं। अभी अधेड़ावस्था में पहुंचे हैं लेकिन युवा दिखने की चेष्टा में सफल हैं। हमसे एक पीढ़ी ऊपर जरूर हैं, लेकिन उनको सुंदरता की परख ही नहीं है बल्कि रूप-सौंदर्य को भोगने का आधुनिक ज्ञान भी है। यह मुझे उसी रात पता चल गया था।

मैं उनके अगले कदम की प्रतीक्षा सांस रोककर कर रही थी। सहसा ही मेरी रुकी हुई लंबी सांस छूट गई, जैसे कोई बांध टूट गया हो।

“क्या हुआ? प्यास बहुत तड़पा रही है ना,” कहने के साथ ही उन्होंने मेरे जिस्म को कसकर भींच दिया। उनकी बांहें मेरी कमर पर लोहे की तरह कस गईं, मेरी सांसें रुक सी गईं।

“आह!” मैं कराह उठी, एक मीठी पीड़ा मेरे बदन में दौड़ गई। इसके साथ ही मैंने चेहरा भी उठा दिया। आंखें चार हुई तो लज्जावश मेरी पलकें बंद हो गई। मैं तैयार नहीं थी। सहसा ही पापा जी ने अपने तपते होंठों को मेरे होंठों से चिपका दिया। मेरी थरथराती सांस फिर छूट गई। उनके होंठ गर्म और नरम थे, एक मीठा दबाव जो मेरे होंठों को चूस रहा था।

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