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पापा जी का लौड़ा तो मेरे पति से लंबा है

वे मुस्कुराए, उनकी मुस्कान में एक शरारत थी, फिर बोले, “तुम मुन्ने को ले जाकर बिस्तर पर लिटा आओ तो बताता हूं। ऐसा उपाय है कि सोने पर सुहागा। घर की इज्जत घर से बाहर नहीं जाएगी और तुम्हें दो-तीन बच्चे भी मिल जाएंगे। फिर अधूरी प्यास भी तुम्हें बेचैन करती होगी।” उनकी आंखें मेरे बदन पर ठहर गईं, जैसे कोई गर्म स्पर्श।

चूंकि मुझे मां बनने का रास्ता चाहिए था, इसलिए पापा जी के पास मैंने वापस आने का मन बना लिया। मैं झुकी, मुन्ने को उठाकर खड़ी होने लगी। तभी पापा जी ने मेरे वक्ष पर उभरी गोलाइयों को छूते हुए पूछा, “मुन्ने को लिटाकर आओगी ना?” उनका स्पर्श मेरे उरोजों पर एक बिजली की तरह दौड़ा, मेरी त्वचा सिहर उठी।

मैं हड़बड़ा गई। मुन्ना हाथ से छूटते-छूटते बचा। लेकिन जब मैं उनके कमरे से बाहर निकल आई तो सोचने लगी, पापा जी का सहवास आसानी से मिल रहा है। बुरा तो नहीं है। घर की इज्जत घर में ढकी रहेगी। वे खुद किसी से चर्चा करेंगे तो पहले उन पर ही थू-थू होगी। उनका स्पर्श अभी भी मेरे बदन पर महसूस हो रहा था, एक गर्म, ललचाती अनुभूति।

मन से तो मैं तैयार हो गई, लेकिन मुन्ने को लिटाने के बाद मैं बाहर की ओर कदम नहीं उठा पा रही थी। कुछ देर तक खड़ी रही, साहस जुटाती रही कि मेरे कदम दरवाजे की ओर बढ़ जाएं। लेकिन हमारे संबंध ने मेरे पांवों में बेड़ियां सी डाल दी थीं। मेरा मन और तन अजीब सी गुदगुदी से भर उठा था – एक मीठी, जलती हुई सिहरन जो मेरे गुप्तांगों तक फैल रही थी। केवल एक दरवाजा लांघते ही पापा जी के कमरे में दाखिल हो जाना था, लेकिन मुझे लग रहा था कि सफर बहुत लंबा तय करना पड़ेगा। बहुत देर बाद भी जब हिम्मत नहीं कर पाई तो स्विच ऑफ करके मुन्ने के पास बिस्तर पर बैठ गई।

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जितना कठिन था पापा जी की ओर कदम उठाना, उतना ही कठिन लग रहा था हार कर मुन्ने के पास बिस्तर पर लेट जाना। बैठ जरूर गई, लेकिन लेटने का मन नहीं हो रहा था। दरवाजा खुला था। मेरे पति नाइट ड्यूटी पर नहीं होते तो बीच का दरवाजा बंद कर लेती थी।

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पापा जी के कमरे में बत्ती जल रही थी। वे शायद मेरे आने की राह देख रहे थे। निराश होकर वे भी उठे और बत्ती बुझाकर लेट गए। मेरा निचला होंठ दांतों के नीचे दब गया। पापा जी ने जितनी लिफ्ट दे दी थी, उसके आगे बढ़ने में शायद वे भी संकोच कर रहे थे। हो सकता है मेरी असहमति समझकर पीछे हट गए हों। मैं पछताने लगी। मन अभी भी कशमकश में पड़ा हुआ था कि उनके पास चली जाऊं या नहीं?

एक लंबी सांस छोड़कर मैंने अपना माथा अपने घुटनों में झुका लिया। एक तरफ मेरी मां बनने की लालसा थी तो दूसरी तरफ हमारा पवित्र संबंध। स्थिति ने मुझे अधर में लटका कर छोड़ दिया था। मेरी सांसें भारी थीं, बदन में एक अजीब गर्मी फैल रही थी।

थोड़ी देर बाद पापा जी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, “बहू आज पानी मेरे पास नहीं रखा क्या?” उनकी आवाज में एक आमंत्रण था, गर्म और ललचाता।

“अभी लाती हूं,” कहकर मैं झट उठ पड़ी। स्विच ऑन करके पानी लेने नल की ओर तेजी से बढ़ गई। मुझे अच्छी तरह याद था कि मुन्ने को उठाने गई थी तो रोज की तरह पानी लेकर गई थी। मालूम होते हुए भी पापा जी ने पानी मांगा था। इसे मैंने पापा जी का स्पष्ट आमंत्रण माना। मुझे भी उनके पास जाने का बहाना मिल गया था। इसलिए पानी रख आई हूं यह बात मैंने भी भुला दी। अब दोबारा पानी लेकर जाने पर फंसकर रह जाना लाजमी था। इसलिए मुन्ने के लिए मैंने बत्ती जला दी थी ताकि अंधेरे में आंख खोले तो डर न जाए।

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पानी ले जाकर यथास्थान रखने के लिए झुकी तो मैंने कहा, “पानी तो रख ही गई थी, रखा तो है।” मेरी आवाज कांप रही थी, बदन में सिहरन दौड़ रही थी।

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