एक शाम मैं उनके एक मित्र के साथ बैठी चाय पी रही थी। चाय पीने के दौरान एक-दूसरे को झुकने की चेष्टाएं जारी थीं – उनकी उंगलियां मेरे हाथ को छूतीं, उनकी सांसें मेरे चेहरे पर गर्म हवा की तरह लगतीं। आधा घंटा बीत चुका था। उस दिन जाने के लिए उठते समय उसने पहली बार अपनी चाहत प्रकट की। “जाने का मन ही नहीं होता, जी चाहता है आपके साथ बैठा रहूं।” उसकी आवाज में एक कांपती हुई गर्माहट थी। मैंने मुस्कुरा दिया, मेरे होंठों पर एक मीठी सिहरन दौड़ गई।
ठीक उसी समय पापा जी आ गए। उस रोज एक ही घंटे में वापस लौट आए थे। उन्हें देखकर मित्र तो चला गया। चाय की दो प्यालियों को देखकर पापा जी ने कुछ तो अर्थ लगाया ही होगा। विदाई के समय मेरी मुस्कान कुछ अलग ही तरह की थी – एक शरारती, ललचाती मुस्कान। इसे देखकर तो पापा जी का आशंकित हो जाना स्वाभाविक ही था। फिलहाल उस वक्त पापा जी ने कुछ नहीं कहा-पूछा।
मेरा छह वर्षीय बेटा पापा जी से बहुत घुला-मिला हुआ है। ज्यादा समय वह पापा जी के पास ही पढ़ता और खेलता है। वह खाना खा चुका होता है तो भी पापा जी के साथ एक-दो कौर जरूर खाता है। उसे नींद भी पापा जी के पास ही आती है। मेरे पति नाइट ड्यूटी में होते हैं तो मुन्ने को सो जाने के बाद अपने बिस्तर पर उठा लाती हूं। नाइट ड्यूटी नहीं होती तो पापा जी के पास ही सोने देती हूं।
उस दिन तो नहीं, अगले दिन जब मेरे पति की नाइट ड्यूटी लग गई, तब पापा जी बोले थे। खाना-पीना हो चुका था, मुन्ना तो सो चुका था। पापा जी भी सोने की तैयारी कर रहे थे। मैं मुन्ने को उठाने पहुंची तो पापा जी पूछने लगे, “कल वो कैसे बैठा था? क्या कह रहा था?” उनकी आवाज में एक गहरी जिज्ञासा थी, जैसे कोई गर्म सांस मेरे कानों में फूंक रही हो।
“मैं चाय का घूंट भरने ही जा रही थी कि वो आ गया। उसे यह बता कर कि ये अभी ड्यूटी से नहीं आए हैं, यों ही कह दिया चाय पी लो। वो रुक गया। मैं एक और प्याली ले आई, अपनी चाय देनी पड़ गई…” मैं क्षण भर के लिए रुक कर तुरंत ही बोल पड़ी, “वह किसी विशेषज्ञ के बारे में बता रहा था, कह रहा था उसे दिखा लो, कोई खराबी आ गई होगी, इलाज से खराबी दूर हो जाएगी।” तब तक आप आ गए और वो चला गया। मेरी आवाज कांप रही थी, जैसे कोई रहस्य छिपा हो।
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“मेरे आते ही वह चला गया, इसीलिए सोचने को मजबूर हो गया हूं,” पापा जी कहने लगे, “बहू तुम यहां बैठो, मैं तुम्हें समझाता हूं, आ जाओ।” उनकी आंखों में एक चमक थी, जो मुझे बेचैन कर रही थी।
मैं बैठने से हिचकी। वे मेरे पति के पिता थे। मैं उनके बराबर बैठने की हिम्मत नहीं कर पाई। वे मेरे संकोच को समझ गए। दोबारा बैठने के लिए नहीं कहा और अपनी बात बोलने लगे, “देखो… न तुममें खराबी है और न ही मेरे लड़के में कोई खराबी है। मेरा लड़का ही बेवकूफी कर रहा है, जिसके कारण हर कोई सोचने लगा कि अब तुम्हें बच्चे नहीं होंगे। उस मूर्ख को कितनी बार समझाया कि नाइट ड्यूटी मत लगवाया करो, लेकिन वह मानता ही नहीं। रात भर अस्पताल में ड्यूटी करेगा, यहां कुछ करेगा ही नहीं तो बच्चे कैसे होंगे?” उनकी बातें मेरे बदन में एक गर्म लहर दौड़ा गईं, जैसे कोई छिपी आग भड़क रही हो।
मैं पापा जी की बात समझ कर लज्जा से भर उठी। एक नजर उनकी ओर देखा और शांत खड़ी रही। वे सही बात कह रहे थे। मुझे ऐसा ही लगा, क्योंकि नाइट ड्यूटी करके वो सुबह आते थे और दिन भर खर्राटे मारकर सोते थे। शाम को फिर चले जाते थे। नाइट ड्यूटी नहीं होती तो वे मेरे साथ सोते थे, लेकिन महीने में दो या तीन बार ही संभोग करते थे। मेरे दिमाग में यह बात भी बैठ गई थी कि जब तक अंधाधुंध संभोग न किया जाए, गर्भ नहीं ठहरता। गर्भ की बात तो अलग, मैं जवानी के दौर से गुजर रही थी। मैं खुद को अतृप्त महसूस करती थी। मेरा यौवन संभोग के बिना प्यासा रहने लगा था – एक गहरी, जलती हुई प्यास जो मेरे गुप्तांगों में सिहरन पैदा करती रहती थी।
आगे पापा जी बोले, “आज वह सलाह दे रहा है डॉक्टर के पास जाने की, कल कहेगा मैं तुम्हें मां बना सकता हूं। मानता हूं कि भरपूर जवान और सुंदर युवती को पुरुष का भरपूर सहवास चाहिए। मां बनने की लालसा हर औरत में होती है। तुम्हें एक बच्चा हो चुका है, लेकिन एक ही काफी नहीं है। कम से कम तीन, नहीं तो दो तो होने ही चाहिए। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम उसके दोस्तों से मेल-जोल बढ़ाओ और उसके सहवास से मां बनो। ये आजकल के छोकरें बिन पैंदी के लोटे हैं, कभी इधर लुढ़कते हैं कभी उधर। इनमें गंभीरता नाम की चीज होती ही नहीं है। ये अपने दोस्तों तक बिना हिचके बात पहुंचा देते हैं, फिर बदनामी मिलती है। तुम उससे बातें करना बंद कर दो। कोई गंभीर आदमी होता तो मैं मना नहीं करता। मां बनने के और भी उपाय हैं।” उनकी आवाज में एक मखमली गर्माहट थी, जो मेरे दिल को छू रही थी।
“क्या…?” मैं अकस्मात ही पूछ बैठी, मेरी सांसें तेज हो गईं।
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