Namard pati sex story, Biwi ki chudai sex story: पता नहीं क्यों मैं शादी के नाम से बड़ा डरता था। एक नयी लंबी चौड़ी औरत आएगी तो रात भर मेरे बगल में सोएगी। रात भर मुझे उसको लेना होगा नहीं तो बच्चा नहीं होगा। मेरे दोस्त यही मुझसे कहते थे। मैं बचपन में खूब बेइंतहा मुठ मारा करता था। इतना ही नहीं मेरे दोस्त मौका मिलने पर मेरी गांड भी खूब मारते थे।
बस तभी से मैं शादी नाम से डरता था। मुठ मारते मारते मैं 32 साल का हो गया। मेरे सभी पांचों भाइयों की शादी हो गयी और अब मेरा नंबर आ गया। पर मेरी 3 छोटी बहनें भी थीं। मेरी शादी के बाद मेरी बहनों की शादी होनी थी। इसलिए मेरे पिताजी और सभी भैया मेरी शादी की बात चलाने लगे।
वो लोग लड़की भी पसंद कर आए। मैं दिनों दिन टेंशन में आने लगा। सच ये था कि मैं गांडू था, मैं आज भी 32 का होने के बाद भी अपने जिगरी दोस्तों से चोरी छिपे गांड मरवाता था। मैंने आज तक कोई लड़की नहीं चोदी थी। हां जब जब चुदास जागती थी, मुठ मारता था या गांड मरवाता था।
मेरे दोस्त मेरा मजाक उड़ाने लगे। अबे इसकी जोरू को या तो इसके दोस्त चलाएंगे या इसके बड़े 4 भाई। सब कमेंट करने लगे। मेरी गांड फट गई। मैं डर गया, खौफजदा हो गया। मैंने कई बहाने मारे पर मेरे पिताजी और भाइयों ने मिलकर मेरी शादी कर दी। मेरी जोरू घर आ गयी।
मैं तो पतला पापड़ था और हरामी मेरे भाई ये पहलवान जोरू ले आए। विदाई के बाद मुझे मेरी भाभियों ने जबर्दस्ती सुहागरात मनाने भेज दिया। मेरे बड़े भाइयों ने मुझे लड़की चलाना यानी कि चोदना सिखा दिया था। मैं कमरे में गया तो मेरी गांड फटी थी।
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मेरा कलेजा धक धक कर रहा था। मैं डर से कांप रहा था। मेरी जोरू साड़ी के लाल लहंगे में थी। घूंघट किये थी। मैं सफेद पलंग पर उसके बगल बैठ गया। कुछ देर हाल चाल हुआ। उससे कहां, किस कॉलेज से पढ़ाई की है, मैंने कहां से पढ़ा है ये सब पूछा। फिर बात खत्म। मेरी जोरू भावना ने घूंघट हटाया। दूध पिलाके लाइट ऑफ कर दी।
आप कपड़े निकालिए। मैं भी निकाल रही हूं। मेरी जोरू भावना बोली।
मैं डरे सहमे हाथों से कपड़े निकालने लगा। मेरी जोरू 6 फिट की मजबूत कद काठी की औरत थी। देखने में तो पहलवान लगती थी, वजन कोई 80 किलो होगा। कहां मैं 40-45 किलो का पतला पापड़ था। कहां मेरी एक एक हड्डी चमकती थी, कहां मेरी जोरू के बदन पर गोश ही गोश था। खैर मैंने कपड़े निकाल दिए। मेरी पहलवान जोरू नंगी पलंग पर लेट गयी।
आइए जी। वो बोली।
मेरी तो गांड फट गई। मुझे रह रहकर अपने दोस्तों की बात याद आ रही थी अबे इसकी जोरू को या तो इसके दोस्त चलाएंगे या इसके बड़े भाई। मैं सहम गया। मैं नंगा होकर अपनी जोरू के ऊपर लेट गया। उसकी मस्त मस्त बड़ी बड़ी छातियां पीने लगा। काफी देर हो गयी।
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रात बहुत हो रही है जी। अब करिए। सुबह जल्दी उठना भी है। मेरी जोरू भावना बोली।
करता हूं। मैंने कहा।
पर आधे घंटे तक अपनी पहलवान 80 किलो की बीवी की दोनों छातियां पीने के बाद भी मेरा लंड नहीं खड़ा हुआ। कहीं मैं छक्का तो नहीं हूं मैंने सोचा। फिर मैं अपनी पहलवान जोरू की चूत पीने लगा कि शायद लंड खड़ा हो जाए, पर नहीं हुआ। मेरी बीवी ध्यान से मेरे लंड को देखने लगी।
भावना मेरा खड़ा नहीं हो रहा। मैंने कहा।
मेरी बीवी बड़ी निराश हो गयी। उसने बड़ी देर मेरा लंड को पिया पर फिर भी खड़ा नहीं हुआ। मैं निराश हो गया। उस सुहागरात में हम बिना सेक्स के ही सो गए। अगली रात फिर यही हाल। धीरे धीरे मेरी बीवी जान गई कि मैं हिजड़ा हूं, नामर्द हूं।
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चिराग साफ साफ बताओ कि बचपन में तुमने कुछ क्या कुकर्म किये थे, वरना मैं अपने पापा को बता दूंगी कि तुम हिजड़े हो। मेरी पहलवान बीवी ने मुझे धमकाते हुए कहा।
मैं उसे बता दिया कि बचपन में मैं हर दिन 3-4 बार मुठ मारता था। और हर दूसरे दिन दोस्तों से गांड मरवाता था।
हे भगवान मेरे तो कर्म फूट गये। एक छक्के से मेरी शादी करा दी गयी।
मेरी जोरू रोने लगी और बिस्तर पर सर पकड़ के बैठ गयी। मैं भी रोने लगा। दोस्तों, धीरे धीरे मैं बहुत डिप्रेशन में आ गया। एकांत चुप और हमेशा गुमसुम रहता। मैंने डर से अपने दोस्तों से मिलना छोड़ दिया।
हमेशा उनकी वही बात याद आती कि अरे चिराग की जोरू को तो इसके दोस्त या इसके बड़े भैया चलाएंगे। दोस्तों मैं आत्महत्या के बारे में सोचने लगा। एक दिन मेरे सबसे बड़े भैया ने मुझे छत पर बुलाया और बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा।
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चिराग शादी से ही तू बड़ा दुखी दुखी लगता है। क्या बात है?
भैया मैं अपनी जोरू को नहीं ले पा रहा हूं। मेरा लंड ही नहीं खड़ा होता है। मैंने बता दिया।
अचानक से उनका मिजाज बिगड़ गया। उन्होंने मुझे एक तमाचा मारा। बहनचोद पहले नहीं बता पा रहा था ये समस्या। बेकार में एक नई लड़की की जिंदगी बर्बाद कर दी। बड़े भैया बोले।
मैं रोने लगा।
जरूर तूने कुछ हरामपन किया होगा। बड़े भैया बोले। उन्होंने मेरी पैंट उतरवाई। मेरी गांड देखी तो ये गांड बड़ी हो गयी थी मरवा मरवाकर। बहनचोद तूने बचपन में खूब गांड मरवायी है। इसी का नतीजा है।
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बड़े भैया चिल्लाए और लात मुक्कों की बौछार कर दी। मेरा मुंह फूट गया। मेरे दूसरे भाई, पिताजी, मां जी भी आ गए कि क्या हुआ। शर्म से मैंने कुछ नहीं बताया। रात को बड़े भैया सजधज के मेरे कमरे में मुझे लेकर आए।
बहू तेरे दर्द के बारे में मैं जान चुका हूं। पर बहू हमारे घर की इज्जत के लिए ये बात तुम किसी से मत कहना। आज से चिराग की जिम्मेदारी मैं उठाऊंगा। ये नामर्द है, मैं नहीं। मैं तुझे बच्चा दूंगा। बड़े भैया बोले। अबे, तू यहां खड़ा होकर झांट उखाड़ रहा है। जा एक शेविंग किट लेकर आ। बड़े भैया ने मुझसे कहा।
मैं दौड़कर एक शेविंग किट ले आया। मैंने दरवाजा बंद कर दिया।
चिराग तेरी बीवी को चोदूंगा तो मेरी सेवा तुझे ही करनी होगी। आकर मेरी झांटे बना। तेरी बीवी को आज रातभर पेलूंगा। भैया बोले।
भैया ने अपना सफेद कुर्ता पाजामा उतार दिया। खूब इत्र लगाकर आए थे। अपनी बनियान और अंडरवियर भी उतार दिया। मेरी जोरू भावना के बगल नंगे होकर लेट गए। मैं रेजर शेविंग मशीन में लगाया, भैया की झांटे बनाने लगा। बड़ी लंबी लंबी झांटे थी जंगली झाड़ की तरह।
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मैं जान गया कि मेरी भाभी भी झांटों में ही पेलवाती होगी। मैंने बड़े भैया की झांटे साफ की, फिर उनकी गोलियां बनायी। फिर मैंने सारे बाल एक पिन्नी में भर दिए।
चिराग तू इधर ही कुर्सी पर बैठ जा, अगर रात में तू बाहर रहेगा तो घर वाले सवाल करेंगे। बड़े भैया बोले।
मैं उधर ही कुर्सी पर बैठ गया। रात के 11 बज चुके थे। मेरे घर के बाकी सदस्य अपने अपने कमरों में सो गए थे। मेरे बड़े भैया मेरे सामने मेरी जोरू भावना को चोदने खाने वाले थे। क्योंकि मैं छक्का था, मैं हिजड़ा था, मेरा लंड ही खड़ा नहीं होता था। मैं कैसे अपनी जोरू को लेता। मेरी जोरू भावना ने मेरे बड़े भैया की बात मान ली।
भैया बेड पर आ गए, भावना को पास बुला लिया। भावना ने लाल रंग की मैक्सी पहन रखी थी। नंगे भैया को देखकर भावना थोड़ा शर्मायी क्योंकि भैया उससे करीब दस साल बड़े थे। भैया बड़े मोटे-ताजे थे, उनकी काया मेरी जोरू भावना से भी ज्यादा तगड़ी और मजबूत लग रही थी। उन्होंने मेरी जोरू को अपनी मोटी-मोटी बाहों में कसकर भर लिया।
भावना की कमर पर उनके हाथ टिक गए और उन्होंने उसे अपनी छाती से सटा लिया। फिर बिना एक पल गंवाए उन्होंने भावना के होंठों पर ताबड़तोड़ चुम्मे जड़ दिए। पहले हल्के से होंठों को छुआ, फिर धीरे-धीरे होंठों को चूसा और अचानक जीभ अंदर डालकर गहरा किस करने लगे। भावना की सांसें तेज हो गईं, उसका गठीला बदन थोड़ा असहज महसूस करने लगा। वह हल्का-सा पीछे हटने की कोशिश करती रही, लेकिन भैया की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह कहीं नहीं जा पाई।
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उन्होंने भावना को धीरे से पलंग पर अपने बगल लिटा दिया। भावना अब उनके बगल में लेटी थी, उसकी सांसें अभी भी तेज चल रही थीं। भैया का एक हाथ धीरे-धीरे भावना के पहलवानी छातियों की ओर बढ़ा। पहले उन्होंने मैक्सी के ऊपर से ही छातियों को सहलाया, हल्के-हल्के दबाया। भावना थोड़ा परेशान हो गई, उसकी आंखें मेरी ओर उठीं। वह मेरी तरफ देख रही थी जैसे मदद मांग रही हो। मैंने नजरें फेर ली क्योंकि मैं उसे एक महीने में एक बार भी नहीं ले पाया था, मेरी मजबूरी मुझे चुप करा रही थी।
तभी भैया ने भावना की दोनों छातियों को दोनों हाथों में कसकर पकड़ लिया। अचानक उन्होंने उन्हें नींबू की तरह जोर से निचोड़ दिया। भावना की जोरदार चीख निकल गई और वह पलंग पर उछल पड़ी। उसकी छातियां इतनी बड़ी और मजबूत थीं कि निचोड़ने पर भी वे भैया के हाथों में फड़फड़ा रही थीं। 80 किलो की मेरी पहलवान जोरू पर जब 120 किलो के बड़े भैया पूरी तरह चढ़ गए तो पलंग जोर से चरमराया और भावना की सारी हिम्मत एक पल में टूट गई।
वह कुछ नहीं कर पाई। भैया अब उसके चेहरे के पास आए और उसके दोनों मोटे-मोटे होंठों को फिर से चूसने लगे। पहले ऊपरी होंठ को मुंह में भरकर चूसा, फिर निचले होंठ को काटते हुए चूसा। उनकी जीभ भावना के मुंह के अंदर घूम रही थी। मैं एक किनारे खड़ा अपनी जोरू को चुदते देख रहा था। मन में थोड़ी जलन हो रही थी कि मेरा माल मेरे भैया इतने प्यार से, इतने धीरे-धीरे खा रहे थे। साथ ही खुद पर पछतावा भी हो रहा था – अगर बचपन में इतनी मुठ मारता और गांड मरवाता नहीं तो शायद आज ऐसी नौबत नहीं आती।
मैं रोने लगा, पर आंसू बाहर नहीं आने दिए। भैया ने भावना के होंठों को अच्छे से चूस लिया तो उन्होंने उसकी लाल मैक्सी को धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकाया। मैक्सी को पूरी तरह उतारकर फेंक दिया। अब भावना का नया, गोरा, चिकना, कसा हुआ, अनछुआ और अनचुदा बदन उनके सामने पूरी तरह नंगा था। भैया ने पहले उसकी लाल ब्रा के हुक खोले और ब्रा उतार दी। भावना की बड़ी-बड़ी छातियां अब आजाद होकर उछल रही थीं। फिर उन्होंने उसकी लाल पैंटी को भी धीरे से नीचे सरकाया और पूरी तरह उतार दिया।
अब भावना पूरी तरह नंगी उनके सामने लेटी थी। भैया ने उसकी दोनों टांगें चौड़ी करके खोल दीं। उनका एक हाथ भावना की चूत पर पहुंच गया। उन्होंने पहले बाहर से ही चूत के होंठों को सहलाया, फिर उंगली से गोल-गोल घुमाने लगे। धीरे-धीरे उंगली अंदर डालकर सहलाना शुरू किया। उधर उनका मुंह भावना की बड़ी-बड़ी विशाल छातियों पर जा पहुंचा। उन्होंने एक चुच्ची को मुंह में भर लिया और जोर-जोर से चूसने लगे। जीभ से निप्पल को घुमाते, काटते और चूसते रहे। दूसरी छाती को हाथ से दबाते और मसलते रहे।
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मेरा खून खौल गया ये सीन देखकर। मुझे तो कभी उनकी बीवी के चुच्चे चूसने को नहीं मिले थे। मैंने तो कभी अपनी भाभी के अनारों को भी नहीं पिया था। फिर ये सब क्यों हो रहा है? फिर वही हिजड़ा होने की मजबूरी। मन हुआ कि ये सब देखने से पहले जहर खा लूं या यहां से कहीं भाग जाऊं। पर बाहर जाता तो घर वाले पूछते कि आधी रात में अपनी जवान जोरू को छोड़कर कहां गया था। कई सवाल करते, इसलिए मैं चुपचाप रोता रहा और ये सब बर्दाश्त करता रहा।
बड़े भैया मेरे लाइसेंस पर गाड़ी चला रहे थे। मेरा माल मेरे सामने खा रहे थे। वो मेरी जोरू के मम्मों को खूब मजे से मुंह चलाकर पी रहे थे। भावना भी अब बिना किसी शर्म के अपनी दुधभरी छातियां उन्हें पिला रही थी।
वो भूल गई थी कि जिसके साथ उसने सात फेरे लिए थे, वो एक किनारे कुर्सी पर बैठा रो रहा था। बड़े भैया ने अब उसकी दूसरी छाती को मुंह में भर लिया। उन्होंने आंखें बंद कर लीं और धीरे-धीरे, बड़े मजे से उस चुच्ची को चूसने लगे। जीभ से निप्पल को गोल-गोल घुमाते, कभी हल्का सा काटते, कभी जोर से चूसकर खींचते। भावना की सांसें अब और तेज हो गई थीं। उधर मेरी जोरू भी आंखें बंद करके अपने मम्मे पिलाने लगी। वह अब पूरी तरह भैया के साथ बह रही थी, जैसे उसका शरीर अब सिर्फ उसी की इच्छा पर चल रहा हो।
दोनों की यह तालमेल देखकर लगा कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। भैया का मोटा-ताजा बदन भावना के गठीले, मजबूत शरीर से पूरी तरह जुड़ गया था। ये देखकर मेरी तो झांटें लाल हो गईं। जलन, गुस्सा, शर्म और बेबसी सब एक साथ उमड़ आया।
उधर बड़े भैया जहां एक तरफ भावना के मम्मे पी रहे थे, वही उनके हाथ नीचे जा पहुंचे। उन्होंने भावना की बाल साफ चूत पर उंगलियां फिरानी शुरू कीं। पहले बाहर से ही चूत के मोटे होंठों को सहलाया, फिर बीच की दरार में उंगली डालकर अंदर-बाहर करने लगे। दो उंगलियां अंदर डालकर गोल-गोल घुमाईं, चूत की दीवारों को सहलाया। मेरी जोरू के भोसड़े की कलियां अब पूरी तरह खुल चुकी थीं और मुझे साफ-साफ दिख रही थीं। चूत गीली होकर चमक रही थी, भैया की उंगलियां उसमें आसानी से अंदर-बाहर हो रही थीं। भावना की कमर अब हल्की-हल्की उठ रही थी, जैसे वह उंगलियों का और गहरा एहसास चाह रही हो।
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मेरी जोरू अब पूरी तरह चुदासी हो चुकी थी। उसकी सांसें भारी हो गई थीं, होंठ कांप रहे थे और आंखें बंद करके वह भैया के हर स्पर्श का मजा ले रही थी। तभी बड़े भैया ने मम्मे पीना बंद कर दिया। उन्होंने भावना के दोनों पहलवानी पैरों को और चौड़ा करके खोल दिया। भावना की चूत अब पूरी तरह उनके सामने खुली हुई थी।
भैया ने अपना विशाल लंड हाथ में पकड़ा। वो लंड बॉक्सिंग खिलाड़ी खली के लंड की तरह मोटा, लंबा और भयानक था। सिरा लाल और चमकदार हो रहा था। उन्होंने लंड को भावना के भोसड़े पर रखा और 2-3 बार प्यार भरी थपकियां दीं। हर थपकी पर भावना का शरीर हल्का सा कांप उठता।
“ऐ गांडू, आ इधर आ। आके देख कैसे नई नवेली बहू की नथ उतारते हैं,” भैया ने मुझे पुकारा।
मैं रोते-रोते उनके पास गया और खड़ा हो गया। मेरी आंखें आंसुओं से भर चुकी थीं।
“भावना, हल्का दर्द होगा, सह लेना बहू। बस चींटी सी कटेगी, यही लगेगा,” भैया ने भावना से प्यार से कहा और फिर एक जोरदार धक्का दिया।
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उनका विशाल लंड बर्फ तोड़ने वाली मशीन की तरह भावना की बुर के होंठों को चीरता हुआ अंदर घुस गया। भावना ने तेज चीख मारी, पलंग की चादर को दोनों हाथों से कसकर भींच लिया। उसकी आंखें खुल गईं, दांत भींच लिए और शरीर तन गया। भैया ने अपनी मोटी तोंद से एक और जोरदार धक्का मारा। लंड अब आधा से ज्यादा अंदर चला गया था। भावना की चूत की दीवारें लंड के दबाव से फैल रही थीं, और उसकी सील पूरी तरह टूट चुकी थी। खून की हल्की सी धार निकल आई।
बड़े भैया अब मेरी जोरू को मेरे सामने चोदने लगे। उन्होंने धीरे-धीरे रिदम बनाया। पहले छोटे-छोटे धक्के, फिर गहरे और तेज। हर धक्के पर पलंग चरमराता और भावना की कराह निकलती।
“चिराग गांडू, अब समझ में आया मर्द होने का मतलब,” भैया ने हंसते हुए कहा।
अपनी जोरू की अपने सामने सील टूटते देख मैं रो पड़ा। मैं वापस कुर्सी पर जाकर बैठ गया। अपना सिर दोनों पैरों के बीच में छुपा लिया। मुझे ये सब देखा नहीं जा रहा था। बड़े भैया अब मेरी जोरू को तोंद हिला-हिलाकर जोर-जोर से पेलने लगे। हर धक्के में उनका मोटा लंड पूरी तरह अंदर-बाहर हो रहा था। अब मेरी जोरू की चूत फट चुकी थी। दर्द की जगह अब मजा लेने लगी थी। उसे असली मर्द मिल गया था।
“हूं हूं हूं… ले कितना लंड खाएगी!” बड़े भैया उत्तेजित स्वर में गरजे। उनकी गहरी, भारी आवाज कमरे की दीवारों से टकराकर गूंज उठी, जैसे कोई शेर दहाड़ रहा हो। “आज तुझे इतना लंड खिलाऊंगा कि एक ही बार में पेट से हो जाएगी छिनाल!”
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वे अब पूरी तरह उन्माद में डूब चुके थे। आंखें लाल, चेहरा पसीने से चमकता हुआ, सांसें तेज-तेज। उन्होंने मजे से ठक-ठक की जोरदार आवाजें निकालनी शुरू कीं। अपने मोटे, भारी कुल्हों को पूरी ताकत से आगे-पीछे हिलाकर मेरी जोरू को गपागप पेलते गए। हर धक्का इतना गहरा और बेरहम था कि पलंग पूरी तरह डांवाडोल हो उठा। लकड़ी की जोड़ें चरमराने लगीं, जैसे अबकी बार टूटकर बिखर जाएंगी। पलंग की चारों टांगें हवा में उछल रही थीं, चादरें सिकुड़कर लपेटी जा रही थीं, तकिए नीचे गिर चुके थे और फर्श पर बिखर गए थे।
मेरी जोरू अब पूरी तरह मजे की लहरों में डूबी हुई थी। आंखें कसकर बंद, मुंह थोड़ा खुला, होंठ कांपते हुए, वह पेलवाती रही। शायद शादी के बाद पहली बार उसे ऐसी गहरी, जोरदार, जानवरों वाली चुदाई मिल रही थी, जिसकी तड़प वह महीनों से महसूस कर रही थी। उसके गठीले शरीर की हर मांसपेशी पहले तनकर कांपती, फिर ढीली पड़कर अगले धक्के का इंतजार करती। बड़े भैया ने क्या शानदार, क्या बर्बर चुदाई की थी मेरी चुदासी जोरू की।
भैया हच-हच गहरे, तेज धक्के मारते रहे। उनका मोटा, नसों से भरा लंड हर बार पूरी जड़ तक अंदर धंसता, फिर लगभग बाहर निकलता और फिर जोर से पूरी ताकत से अंदर पटक दिया जाता। उन्हें कोई फिक्र नहीं थी कि पलंग टूटे या रहे, कमरा हिले या दीवारें गिरें। वे बस अपनी रफ्तार बढ़ाते गए। भावना की चूत की दीवारें अब पूरी तरह फैल चुकी थीं, गीली, गरम और चिपचिपी होकर लंड को कसकर चिपका रही थीं। हर धक्के पर चपचप, पचपच की गंदी, गीली आवाजें कमरे में भर उठतीं, जैसे कोई गाढ़ा तरल जोर-जोर से हिलाया जा रहा हो।
चोद-चोदकर बड़े भैया ने मेरी जोरू की चूत का पूरा हलवा बना दिया। चूत अब इतनी ढीली, इतनी गीली और इतनी फैली हुई हो चुकी थी कि लंड बिना किसी रुकावट के आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था। मेरी जोरू “आं… आं… हां… और जोर से…” करने लगी। उसकी कराहें अब दर्द की नहीं रह गई थीं, बल्कि पूरी तरह मजा लेने वाली, चुदासी वाली सिसकारियां बन गई थीं।
भैया ने चुदाई के बीच में ही उसकी बड़ी-बड़ी छातियों की काली, सख्त भुंडियों को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया। नाखून गहराई से गड़ा दिए और बेरहमी से इतना जोर से कुचला कि भावना की तेज चीख निकल गई। दर्द और मजा का ऐसा मिश्रण हुआ कि उसका पूरा शरीर कांप उठा। अगले ही पल उसने जोर से मूत मार दिया। गर्म, तेज धार वाली मूत्र की धारा चादर पर फैल गई, पलंग की लकड़ी तक पहुंच गई, लेकिन बड़े भैया ने एक पल के लिए भी रफ्तार नहीं रोकी। बिना किसी फिक्र के, बिना रुके, वे गचागच, ठक-ठक पेलते रहे। उनकी तोंद हर धक्के पर भावना की कमर से टकराती, और कमरे में सिर्फ उनकी उन्मादी सांसें, पलंग की चरमराहट और भावना की कराहें गूंज रही थीं।
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उस रात बड़ी तोंद वाले बड़े भैया ने मेरी जोरू को लगातार चार घंटे बिना रुके पेला। उनका विशाल लंड बार-बार भावना की चूत में पूरी तरह डूबता और निकलता रहा। हर धक्के के साथ भावना की कराहें तेज होती गईं, लेकिन अब दर्द की जगह मजा लेने वाली सिसकारियां निकल रही थीं। भैया का पसीना उनकी तोंद से टपक रहा था, जो भावना की पीठ पर गिरकर चिपक जाता। पलंग की हर हलचल से कमरे में ठक-ठक की आवाजें गूंज रही थीं। भावना की चूत अब पूरी तरह लाल और सूजी हुई हो चुकी थी, लेकिन भैया की रफ्तार कम नहीं हुई।
चार घंटे बीतने के बाद भैया ने आखिरकार थोड़ा रुककर सांस ली। फिर उन्होंने भावना को पलट दिया। “अब असली मजा आएगा, बहू,” उन्होंने गहरी आवाज में कहा और भावना को कुतिया बना दिया। भावना घुटनों और हाथों के बल पर आ गई। उसकी कमर नीचे झुकी हुई थी, गांड ऊपर उठी हुई, चूत से रस टपक रहा था। भैया ने पीछे से उसकी मोटी-मोटी गांड पर कई थपकियां मारीं। हर थपकी पर भावना का शरीर हल्का सा कांप उठता।
भैया ने अपना अभी भी सख्त और गीला लंड हाथ में पकड़ा। उन्होंने लंड के सिरे को भावना की गांड के छोटे-से छेद पर रख दिया। पहले हल्का-हल्का दबाव डाला, सिर्फ सिरा ही अंदर गया। भावना की गांड पहले तो पूरी तरह तनी रही, जैसे विरोध कर रही हो। दर्द से उसके चेहरे पर लकीरें पड़ गईं, आंखों में आंसू छलक आए। उसने दांत भींच लिए और सांस रोक ली।
भैया ने धैर्य रखा। उन्होंने भावना की कमर को दोनों हाथों से पकड़कर स्थिर किया। फिर धीरे-धीरे, लगातार दबाव बढ़ाते गए। लंड का सिरा अंदर सरकता रहा। भावना की गांड की दीवारें फैलने लगीं, दर्द बढ़ता गया। “आह… भैया… दर्द हो रहा है…” भावना ने पहली बार कमजोर आवाज में कहा, लेकिन भैया रुके नहीं।
अचानक भैया ने एक जोरदार, तेज धक्का मारा। पूरा मोटा लंड एक झटके में भावना की गांड में समा गया। भावना की जोरदार चीख निकल गई, शरीर कांप उठा। गांड के छेद से हल्का खून निकल आया, लंड पूरी तरह अंदर तक पहुंच चुका था। मेरी जोरू की गांड फट चुकी थी। दर्द इतना तेज था कि भावना की आंखें लाल हो गईं, आंसू बहने लगे।
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भैया ने कुछ पल रुककर उसे सांस लेने दिया। फिर धीरे-धीरे पीछे-आगे करना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे धक्के, ताकि गांड आदत डाल ले। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाई। अब हर धक्के पर भावना की गांड लंड को चूस रही थी। दर्द अब कम होकर अजीब सा मजा देने लगा था। भावना अब चीखने की बजाय कराह रही थी।
कुछ देर बाद वह दर्द से चूर होकर आगे गिर पड़ी। भैया ने उसे फिर से पलटा और चित लिटा दिया। अब भावना पैर पूरी तरह फैलाकर लेट गई थी। उसका मुंह खुला हुआ था, सांसें तेज-तेज चल रही थीं, छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। चूत और गांड दोनों से रस और खून मिला हुआ बह रहा था। उसकी आंखें बंद थीं, चेहरा थका हुआ लेकिन संतुष्ट। वह हांफ रही थी, जैसे पूरी रात की चुदाई ने उसे थका दिया हो, लेकिन साथ ही पूरी तरह तृप्त भी कर दिया हो।
पांच घंटों के इस महाचोदन और पेलन के बाद बड़े भैया आखिरकार उठ खड़े हुए। उनका पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो चुका था। मोटी तोंद पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, जो उनकी छाती से नीचे सरककर नाभि के पास जमा हो रही थीं। सांसें अभी भी तेज चल रही थीं, लेकिन चेहरे पर संतुष्टि की गहरी मुस्कान फैली हुई थी। उनका विशाल लंड अब थोड़ा ढीला पड़ चुका था, लेकिन फिर भी मोटा और लंबा लटक रहा था, भावना के रस और खून से चिपचिपा और चमकदार।
भैया ने हाथ से लंड को हल्का सा झटका, फिर पसीने से गीले बदन को पोंछने की बजाय सीधे पाजामा उठाया। उन्होंने धीरे से पाजामा का नाड़ा कमर पर लपेटा और मजबूती से बांध लिया। पाजामा अब उनके पसीने से गीला हो गया था, लेकिन उन्हें कोई परवाह नहीं थी। वे मुस्कुराते हुए मेरी तरफ मुड़े, आंखों में विजेता जैसी चमक थी।
“आ गांडू, तेरा काम कर दिया मैंने,” भैया ने धीमी लेकिन गर्व भरी आवाज में कहा। उनकी आवाज में अभी भी उत्तेजना की गूंज बाकी थी, जैसे वे अभी-अभी कोई बड़ा कारनामा करके आए हों। मुस्कान के साथ उन्होंने मेरे कंधे पर हल्का थपका मारा, जैसे कोई बड़ा भाई छोटे भाई को तसल्ली दे रहा हो।
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फिर बिना एक शब्द और कहे, वे कमरे से बाहर निकल गए। उनके भारी कदमों की आवाज गलियारे में गूंजती रही, धीरे-धीरे दूर होती गई। मैंने जल्दी से उठकर दरवाजा बंद किया और चिटकनी लगा दी। कमरे में अब सिर्फ मेरी और भावना की सांसों की आवाज बची थी।
मैं कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गया। आंसू रुक ही नहीं रहे थे। हाथों से चेहरा ढक लिया और जोर-जोर से रोने लगा। बचपन के वे सारे कुकर्म एक-एक करके याद आने लगे – दोस्तों के साथ छिपकर मुठ मारना, गांड मरवाना, वो सब जो आज मेरी जिंदगी बर्बाद कर चुका था। मन में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था – अगर मैं नामर्द न होता, तो शायद आज ये सब न होता।
एक नजर भावना की तरफ डाली। वह अभी भी चित लेटी हुई थी, दोनों पैर पूरी तरह फैले हुए, चूत और गांड से रस, खून और मूत्र मिला हुआ बहकर चादर पर बड़ा सा दाग बना रहा था। उसका बदन पसीने और थकान से चमक रहा था। चेहरा शांत था, होंठों पर हल्की मुस्कान, आंखें बंद। नींद आ चुकी थी, और वह पूरी तरह संतुष्ट, तृप्त और खुश लग रही थी – जैसे सालों की चुदास एक रात में पूरी हो गई हो।
मैंने फिर से अपना सिर दोनों पैरों के बीच में छुपा लिया और चुपचाप रोता रहा। कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ मेरी सिसकियां और बाहर दूर कहीं भैया के कदमों की आखिरी गूंज बाकी थी।
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