शिवम् घायल होकर ऊपर चढ़ा, खुद को सेट किया। मैंने मस्ती में आँखें मूंद लीं। अंततः टाँगों के मध्य फिट हो गया। भारी लण्ड चूत पर दबाव डालने लगा। चूत ने मुँह खोल लिया, सुपारे को पकड़ लिया। मीठी गुदगुदी उठी, लण्ड भीतर समाता गया। मन को ठंडक मिली। इतने दिनों की चाहत पूरी हो गई।
शराब की महक नहीं भा रही थी, पर चुदना था। नशे में जानवर की तरह चोद रहा था। मैं पूर्ण मन से साथ देने लगी। लण्ड पूरा अंदर उत्तेजना दे रहा था। चूत ऊपर-नीचे चलने लगी। अचानक सीने में दर्द, चूचियाँ ज़ोर से दबा दीं। यौवनकलिका घिसकर सुख दे रही थी।
उसे ज़ोर से जकड़कर जवानी भोगना चाहती थी। कमर चूत पर ज़ोर से पड़ रही थी। चूत पिटी जा रही थी। गुदगुदी उठने लगी। चूत लण्ड खा जाना चाहती थी। जिस्म अकड़ने लगा, नसें खिंचने लगीं… मैं ज़ोर से झड़ गई। चूत में लहरें उठीं।
“भोंसड़ी की, चूत ने पानी छोड़ दिया… झड़ गई साली… मेरा तो नहीं निकला…!” समझकर मैंने धकेला और उल्टी हो गई।
“साली छिनाल, गाण्ड मरवानी है?”
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“भैया जी, बाकी हसरत गाण्ड में निकाल दो, मेरी तबीयत हरी हो जाएगी।”
“छीः मैं गाण्ड नहीं मारता… भोसड़ी की, गाण्ड फट के हाथ में आ जाएगी!”
“ओह्हो, डींगे मार रहे हो, गाण्ड नहीं चोदी जा रही?”
वो गुर्राकर उछला और पीठ पर सवार हो गया। “तेरी माँ की चूत… अब पानी निकाल के रहूँगा…”
लण्ड गाण्ड में दबाया। मैं दर्द से कराह उठी। लण्ड फाड़ता हुआ आधा अंदर बैठ गया। फिर धक्का मारा, चीख निकल गई। पर संतुष्ट थी, जमकर चुदाई हो रही थी। ईश्वर का धन्यवाद किया, मन की मुराद पूरी हो रही थी—थोड़ी दर्द भरी, थोड़ी मस्ती भरी!
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