चोरी-चोरी वो तिरछी निगाहों से मेरे उभरे स्तनों का आनन्द ले रहा था। उसकी हरकतों से मुझे भी आनन्द आने लगा। मैंने दिल कड़ा करके झुककर अपने पके आमों की गोलाइयाँ और लटका दीं। इस बीच मेरी धड़कन तेज़ हो गई, पसीना आने लगा।
ये कमबख्त जवानी जो करा दे, वो कम है। मुझे मालूम हो गया कि मैं उसकी जवानी का रस ले सकती हूँ। नाश्ता करके शिवम् कॉलेज चला गया। मैं दिन का भोजन बनाने के बाद बिस्तर पर लेटी शिवम् के बारे में सोच रही थी। उसका मदमस्त, गुलाबी, गोरा लण्ड आँखों के सामने घूमने लगा। मैंने चूत दबा ली, फिर बस नहीं चला तो पेटीकोट ऊँचा करके चूत नंगी कर ली और सहलाने लगी।
जितना सहलाती, उतना शिवम् का मोटा लण्ड चूत में घुसता सा लगता और मुँह से सिसकारी निकल जाती। मैं यौवनकलिका हिला-हिलाकर उत्तेजना बढ़ाती गई और फिर स्खलित हो गई। दोपहर दो बजे पति और शिवम् दोनों आ चुके थे, फिर पति दिन की गाड़ी से तीन दिनों के लिए दिल्ली चले गए। उनके दो-तीन दिन के टूर तो होते रहते थे। जब वो नहीं रहते, शिवम् शाम को खूब शराब पीता और मस्ती करता।
आज भी शाम को शराब लेकर आया और सात बजे से पीने बैठ गया। डिनर के लिए मुझसे पैसे लिए और मुर्गा-तंदूरी चपाती ले आया। वो बार-बार बुलाकर पीने को कहता, “भाभी, भैया तो हैं नहीं, चुपके से एक पैग मार लो!”
मस्ती में वो कहता रहा। “नहीं देवर जी, मैं नहीं पीती, आप शौक फ़रमाइए!”
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“अरे कौन देखता है, घर में तो हम दोनों ही हैं… ले लो भाभी… मस्त हो जाओ!”
उसकी बातें मुझे घायल करने लगीं। बार-बार मनुहार से मैं रोक नहीं पाई। “अच्छा ठीक है, पर भैया को मत बताना…!” मैंने हिचकते कहा।
“ओये होये, क्या बात है भाभी… मज़ा आ गया! फिकर ना करो, ये देवर-भाभी की बात है…”
मैंने गिलास मुँह से लगाया तो कड़वी और अजीब लगी। मैंने एक सिप की और चुपके से नीचे गिरा दी। कुछ देर में शिवम् बहकने लगा और गालियाँ निकालने लगा, पर वो गालियाँ मुझे सेक्सी लग रही थीं।
“हिच, माँ की लौड़ी, तेरी चूत मारूँ… चिकनी है भाभी… तुम्हारे मुम्मे बहुत मस्त हैं!”
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