ये कहानी उसी होली की है जब मैं छह साल बाद अपने घर पर था। मेरा नाम विनोद है, उम्र उन्नीस साल। मैं अपने शहर से कोसों दूर एक कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा हूँ। कॉलेज में हड़ताल की वजह से एक महीने की छुट्टी हो गई थी, और मैं घर लौट आया। होली का त्योहार मुझे कभी पसंद नहीं रहा। रंग, गंदगी, शोर-शराबा, सब कुछ मुझे बेकार लगता था। पिछले छह साल मैंने हॉस्टल में बिताए, जहाँ होली का मतलब सिर्फ दोस्तों के साथ हल्की-फुल्की मस्ती तक सीमित था। लेकिन इस बार घर पर होली ने मेरी जिंदगी बदल दी।
घर में मेरे अलावा मेरे बाबूजी, माँ मालती, और इस बार दादाजी भी थे। मेरी छोटी बहन रेनू, जिसकी शादी पिछले साल हुई थी, कुछ वजहों से होली में नहीं आ पाई। उसकी जगह दादाजी होली से कुछ दिन पहले हमसे मिलने आ गए थे। दादाजी की उम्र करीब 61-62 साल होगी, लेकिन इस उम्र में भी वो हट्टे-कट्टे थे। घने सफेद बाल, चौड़ा सीना, और बिना चश्मे के तेज नजर। गाँव में उनकी जवानी के किस्से मशहूर थे, और अब भी उनकी ताकत देखकर कोई उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता था। बाबूजी की उम्र 40-41 साल थी, और माँ मालती 34-35 साल की थी। माँ बताती थी कि उसकी शादी 14 साल की उम्र में हो गई थी। एक साल बाद मैं पैदा हुआ, और दो साल बाद रेनू।
अब माँ मालती की बात। वो गाँव में पैदा हुई, पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी। गोरा चिट्टा रंग, जो धूप में भी दमकता था। 5 फुट 5 इंच की लंबाई, चौड़े कंधे, भारी-भरकम छाती, और गोल, उभरे हुए नितंब। उसका फिगर ऐसा था कि गाँव की औरतें जल-भुन जाती थीं, और मर्दों की आँखें ठहर जाती थीं। जब मैं 14 साल का हुआ और मर्द-औरत के रिश्तों को समझने लगा, तब माँ मेरे लिए बस एक औरत बन गई—एक ऐसी औरत जिसके बारे में सोचते ही मेरा लंड खड़ा हो जाता था। मालती की चुचियों का उभार, उसकी कमर का लचक, और चूतड़ों का थिरकना—सब कुछ मेरे दिमाग में बस्ता था। मैंने अनगिनत बार माँ को सोचकर मुट्ठ मारी, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हुई कि उसकी चुचियाँ दबाऊँ या अपना लंड दिखाऊँ। डर था कि अगर घर में रहा, तो एक दिन पाप हो जाएगा। इसीलिए आठवीं के बाद मैंने जिद करके हॉस्टल में दाखिला ले लिया।
माँ को कभी शक नहीं हुआ कि उसका बेटा उसकी चूत के लिए तड़पता है। छुट्टियों में जब घर आता, चोरी-छिपे माँ की जवानी का मजा लेता। कभी उसकी साड़ी का पल्लू सरकने पर उसकी गहरी नाभि देखता, कभी नहाने के बाद उसके गीले बदन को ताकता। रात को माँ के बारे में सोचकर लंड हिलाता और पानी निकालता। मैं हमेशा सावधान रहता कि माँ को मेरे इरादों का पता न चले। और वो बेखबर रही। कभी-कभी वो प्यार से मेरे गालों पर थपकी देती, तो दिल बाग-बाग हो जाता। लेकिन पिछले 4-5 सालों में उसने मुझे गले नहीं लगाया था। शायद उसे लगता था कि बेटा अब बड़ा हो गया है।
अब इस होली की बात। सुबह से माँ किचन में व्यस्त थी। पकवान, नाश्ता, और खाना बनाने में उसका ध्यान था। करीब 9 बजे मैं, बाबूजी, और दादाजी ने नाश्ता किया। माँ ने हमारे साथ बैठकर चाय पी। उसकी साड़ी में से उसकी गहरी नाभि और चुचियों का उभार साफ दिख रहा था। मैंने नजरें चुराकर उसे देखा, और मेरा लंड टाइट होने लगा। 10 बजे के आसपास बाबूजी के दोस्तों का ग्रुप आया। शोर-शराबे के साथ रंग और गुलाल उड़ने लगा। मैं छत पर चला गया, क्योंकि मुझे होली की भीड़ पसंद नहीं थी। छत से मैंने देखा कि कुछ लोगों ने माँ को भी रंग लगाया। दो मर्दों ने तो माँ के चूतड़ों को जोर से दबाया। माँ ने पहले हँसकर मजा लिया, फिर छिटककर हट गई। बाबूजी अपने दोस्तों के साथ बाहर चले गए, और दादाजी अपने कमरे में जाकर बैठ गए।
आधे घंटे बाद औरतों का हुजूम आया। करीब 30 औरतें थीं—जवान, अधेड़, हर उम्र की। सबने जमकर होली खेली। मैं छत से देख रहा था, और मेरा दिल धक-धक कर रहा था। औरतें एक-दूसरे की चुचियाँ मसल रही थीं, कुछ ने साड़ियाँ उठाकर रंग लगाया। एक औरत ने तो हद कर दी—उसने दूसरी औरत के साया में हाथ डालकर उसकी चूत मसली। माँ मालती को भी औरतों ने खूब छेड़ा। उसकी चुचियाँ दबाईं, चूतड़ों पर रंग रगड़ा। माँ हँस रही थी, मानो उसे मजा आ रहा हो। फिर सबने खाना-पीना किया और बाहर चली गईं। औरतें माँ को भी अपने साथ ले जाना चाहती थीं, लेकिन माँ ने मना कर दिया।
उनके जाने के बाद माँ ने दरवाजा बंद किया। वो पूरी तरह भीग चुकी थी। बाहर बरामदे में खड़े-खड़े उसने अपनी साड़ी उतार दी। गीला साया और ब्लाउज उसके बदन से चिपक गए थे। उसकी कसी हुई जाँघें, भारी चुचियाँ, और गोरे बदन पर लाल-हरा रंग उसे किसी अप्सरा जैसा बना रहा था। मेरा लंड पैंट में तन गया। मैंने सोचा, आज मौका है। होली के बहाने माँ को बाहों में ले लूँगा, उसकी चुचियाँ मसलूँगा, और शायद चूत भी छू लूँ। ये सोचते हुए मैं सीढ़ियाँ उतरने लगा। आधी सीढ़ी पर रुक गया, क्योंकि मुझे दादाजी की आवाज सुनाई दी।
“विनोद कहाँ गया?” दादाजी ने माँ से पूछा।
“मालूम नहीं, लगता है अपने बाबूजी के साथ बाहर चला गया,” माँ ने जवाब दिया।
माँ को नहीं पता था कि मैं छत पर हूँ, और अब उनकी बातें सुन रहा हूँ। मैंने देखा, माँ अपने ससुर के सामने गर्दन झुकाए खड़ी है। दादाजी उसकी भीगी जवानी को घूर रहे थे। तभी दादाजी ने माँ के गालों को सहलाते हुए कहा, “मेरे साथ होली नहीं खेलोगी?”
मैं दंग रह गया। एक ससुर अपनी बहू से होली खेलने को बेताब था! मैंने सोचा, माँ अब दादाजी को धक्का देगी, लेकिन माँ ने चेहरा उठाया और मुस्कुराकर बोली, “मैंने कब मना किया? और अभी तो घर में कोई है भी नहीं!”
कहकर माँ वहाँ से हट गई। दादाजी कमरे में गए, और दोनों अपने-अपने हाथों में रंग लेकर वापस आए। दादाजी ने पहले माँ के गालों पर रंग मसला, फिर उसकी छाती पर हाथ फेरते हुए चुचियों को दबाया। माँ सिसकारियाँ भर रही थी, और बदले में दादाजी के सीने और गालों पर रंग रगड़ रही थी। कुछ देर तक दोनों एक-दूसरे की चुचियाँ और बदन मसलते रहे। फिर दादाजी ने माँ को बाहों में कस लिया और उसके होंठों को चूसने लगे। मैंने सोचा, माँ अब गुस्सा करेगी, लेकिन वो दादाजी के पैरों पर पैर चढ़ाकर चुम्मा लेने में साथ दे रही थी। दादाजी का हाथ माँ की पीठ से होता हुआ उसके चूतड़ों तक गया। दोनों पति-पत्नी की तरह एक-दूसरे को चूम रहे थे।
दादाजी अब माँ के चूतड़ों को दोनों हाथों से कसकर मसल रहे थे। मेरा लंड पैंट फाड़ने को तैयार था। मैं सोच रहा था कि माँ को मैं छूने की सोचूँ, और यहाँ दादाजी उसकी रंडी जैसा मजा ले रहे हैं। गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन तभी दादाजी बोले, “रानी, पिचकारी से रंग डालूँ?”
माँ का पिछवाड़ा दादाजी से सटा था, और मुझे उसकी चुचियाँ और पेट दिख रहा था। दादाजी का एक हाथ चुची मसल रहा था, दूसरा माँ की चूत को सहला रहा था। माँ बोली, “अब भी पूछने की जरूरत है?”
दादाजी ने एक झटके में माँ के साये का नाड़ा खोल दिया। साया जाँघों से नीचे गिर गया। मैं माँ की चूत देखकर पागल हो गया। घने बालों से ढकी चूत, गीली और चमकती हुई। माँ ने पैरों से साया हटाया और दादाजी का हाथ अपनी चूत पर रखकर सहलाने लगी। दादाजी की उंगलियाँ चूत को कुरेद रही थीं। माँ ने अपने ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए, लेकिन दादाजी ने उसके हाथ हटाए और फटाफट सारे बटन खोलकर ब्लाउज उतार दिया। अब माँ पूरी नंगी थी। उसकी चुचियाँ वैसी ही थीं, जैसा मैंने सपनों में देखा था—बड़ी, गोल, और तनी हुई। निप्पल काले और सख्त। दादाजी आराम से माँ की जवानी का मजा ले रहे थे।
माँ ने दादाजी को कुछ देर चुचियाँ और चूत मसलने दी, फिर वो अलग हुई और फर्श पर मेरी तरफ पैर करके लेट गई। मेरा मन कर रहा था कि दौड़कर उसकी चूत में लंड पेल दूँ। तभी दादाजी ने अपनी धोती और कुर्ता उतारा और माँ के चेहरे के पास बैठ गए। माँ ने उनका लंड पकड़ा, मसला, और बोली, “पिचकारी तो अच्छी है, लेकिन देखें इसमें रंग कितना है! जल्दी करो, कोई आ गया तो मजा किरकिरा हो जाएगा!”
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दादाजी माँ के पैरों के बीच बैठे। उनका लंड मोटा और लंबा था, जैसे किसी जवान मर्द का। उन्होंने लंड को माँ की चूत पर रगड़ा, और तीसरे धक्के में पूरा लंड अंदर पेल दिया। माँ की सिसकारी निकली, “आह्ह… धीरे राजा!” लेकिन दादाजी ने रफ्तार बढ़ा दी। करीब 15 मिनट तक उन्होंने माँ को जमकर चोदा। माँ के चूतड़ उछल-उछलकर लंड का जवाब दे रहे थे। उसकी सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं— “आह्ह… ओह्ह… और जोर से… मारो राजा!” दादाजी उसकी चुचियाँ मसलते, कभी उसके होंठ चूसते, और धक्के पर धक्का लगाते। मैं समझ गया कि ये कोई पहली बार नहीं था। माँ और दादाजी पहले भी चुदाई कर चुके थे।
“क्या राजा, इस बहू की चूत कैसी है?” माँ ने कमर उछालते हुए पूछा।
“मेरी रानी, ऐसी चूत और चुचियाँ पहले कभी नहीं देखीं!” दादाजी ने चुचियाँ मसलते हुए कहा। “जबसे तू दुल्हन बनकर आई, मैं तेरी चूत का सोचकर लंड हिलाता हूँ। हजारों बार तेरा नाम लेकर पानी निकाला है।”
दादाजी ने चुदाई रोककर माँ की चुचियाँ चूसीं, फिर बोले, “मुझे नहीं पता था कि तू इतनी आसानी से चूत दे देगी, वरना मैं तुझे सैकड़ों बार चोद चुका होता!”
मैं हैरान था। क्या माँ पहली बार दादाजी से चुद रही थी? तभी माँ बोली, “राजा, मैं कोई रंडी नहीं हूँ। आज होली है। तुमने रंग लगाया, मैंने लगवाया। तुमने चुचियाँ मसलीं, मैंने मना नहीं किया। तुमने चूमा, मैंने भी चूमा। और तुम चोदना चाहते थे, तो मैंने चूत खोल दी। तुम्हारी जगह कोई और होता—चाहे राजा हो या नौकर—मैं उससे भी चुदवाती। होली के दिन मेरी चूत, मेरी जवानी, सबके लिए खुली है!”
माँ ने दादाजी को जाँघों और बाहों में कस लिया और बोली, “जितना चोदना है, आज चोद लो। अगली होली तक इंतजार करना पड़ेगा!”
मैं सुनकर दंग रह गया। होली के दिन माँ किसी से भी चुदवा सकती थी? फिर तो मैं भी मौका नहीं छोड़ूँगा! मैंने फैसला किया कि आज माँ को चोदकर रहूँगा। उधर दादाजी ने माँ की चूत में पानी छोड़ दिया। माँ की चूत से गाढ़ा, मलाई जैसा रस टपक रहा था। दादाजी उसे प्यार से चूम रहे थे। कुछ देर बाद दोनों उठे।
“होली कैसी रही?” माँ ने पूछा।
“रानी, तूने जन्नत दिखा दी। पहले क्यों नहीं आया मैं!” दादाजी बोले।
माँ ने उनके लंड को सहलाया और कहा, “इस लंड में अभी भी दम है। किसी कुँवारी की चूत भी फाड़ सकता है।” उसने लंड को चूमा और बोली, “अब बाहर जाओ। मैं नहीं चाहती कि विनोद या उसके बाप को पता चले।”
दादाजी ने कपड़े पहने, माँ को फिर से चूमा, और बाहर चले गए। माँ नंगी ही बरामदे में खड़ी रही। मैं छत पर गया और देखा—दादाजी घर से दूर जा रहे थे, और बाबूजी कहीं दिख नहीं रहे थे। मेरा लंड तन चुका था। मैंने उसे पैंट में दबाया और धीरे-धीरे नीचे आया। माँ बरामदे में नहीं थी। मैंने चुपके से किचन में झाँका। माँ वहाँ थी, अभी भी नंगी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी, और वो पुआ बेल रही थी। उसके गोल, मांसल चूतड़ देखकर मेरा लंड पागल हो गया।
मैंने बिना सोचे दोनों हाथ माँ की बाहों के नीचे डाले और उसके गालों पर रंग मलते हुए बोला, “माँ, होली है!” फिर दोनों हाथ नीचे लाकर उसकी भारी चुचियाँ मसलने लगा। उनकी नरमी और वजन मेरे हाथों में समा नहीं रहा था। निप्पल सख्त थे, और मैं उन्हें जोर-जोर से दबाने लगा।
“ओह… तू कब आया? दरवाजा तो बंद है! छोड़ बेटा… माँ के साथ ऐसे होली नहीं खेलते… आह्ह… इतना जोर से मत मसल… छोड़ दे!” माँ बोली।
लेकिन मैं रुकने वाला नहीं था। मैंने उसके चूतड़ों को अपने लंड से दबाया, जो पैंट में कैद था। एक हाथ से चुची मसलते हुए दूसरा हाथ नीचे ले जाकर पैंट का बटन खोला और लंड बाहर निकाला। मेरा लंड 7 इंच लंबा और मोटा था, और अब वो माँ के चूतड़ों के बीच दब रहा था। मैंने दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर उसकी चूत पर रखा। चूत गीली थी, शायद दादाजी के रस से। मैंने बीच वाली उंगली चूत में घुसेड़ दी।
“नहीं बेटा, चूत मत छू… ये पाप है!” माँ बोली, लेकिन उसकी सिसकारियाँ बता रही थीं कि उसे मजा आ रहा है।
मैंने लंड को चूतड़ों के बीच रगड़ते हुए उंगली चूत में अंदर-बाहर की। माँ की चूत गर्म और चिकनी थी। मुझे लगा कि अगर यूं ही रगड़ता रहा, तो बिना चोदे झड़ जाऊँगा। मैंने उंगली निकाली, माँ को कमर से पकड़कर उठाया, और बोला, “चल रंडी, अब तुझे जमकर चोदूँगा!”
मैंने उसे बेडरूम में ले जाकर बेड पर पटका। उसकी टाँगें फैलाईं और लंड को चूत पर सेट किया। माँ की चूत चमक रही थी, बालों से ढकी, लेकिन गीली और खुली। मैंने जोर से धक्का मारा। लंड आधा अंदर गया।
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“आउच… धीरे बेटा!” माँ बोली।
मैंने दूसरा धक्का मारा, और पूरा लंड चूत में समा गया। माँ की सिसकारी निकली, “आह्ह… ओह्ह!” मैंने धक्के शुरू किए, और उसके रसीले होंठ चूसने लगा। उसकी चुचियाँ मेरे सीने से दब रही थीं। मैंने दोनों हाथों से चुचियाँ पकड़ीं और जोर-जोर से मसला। निप्पल को उंगलियों से कोंचा, तो माँ की सिसकारी और तेज हो गई।
“माँ, जबसे मेरा लंड खड़ा होना शुरू हुआ, मैं तुझे चोदना चाहता था। हजारों बार तेरी चूत सोचकर मुट्ठ मारी। हर रात सपने में तुझे चोदा। आज तू मेरी रंडी है!” मैंने धक्के मारते हुए कहा।
माँ की आँखें बंद थीं। वो कमर उछाल-उछालकर चुदाई में साथ दे रही थी। उसकी चूत मेरे लंड को जकड़ रही थी, जैसे वो उसे निचोड़ देगी। मैंने उसकी जाँघें पकड़ीं, और तेजी से धक्के मारे। उसकी चुचियाँ उछल रही थीं, और मैं उन्हें चूसने लगा। निप्पल को दाँतों से हल्के से काटा, तो माँ चिहुँक उठी, “आह्ह… बेटा… मार डाला!”
“साली, आँख खोल! देख तेरा बेटा कैसे चोदता है!” मैंने कहा।
माँ ने आँखें खोलीं। उसकी आँखों में न गुस्सा था, न शर्म। वो बस चुदाई का मजा ले रही थी। मैंने उसकी टाँगें और फैलाईं, और चूत में लंड को गहरे तक पेला। उसकी चूत इतनी गीली थी कि हर धक्के के साथ ‘पच-पच’ की आवाज आ रही थी। मैंने उसकी कमर पकड़ी और उसे घोड़ी बनाया। उसकी गोल गांड मेरे सामने थी। मैंने चूतड़ों को थपथपाया, और लंड फिर से चूत में डाल दिया।
“आह्ह… बेटा… और जोर से!” माँ बोली।
मैंने पूरी ताकत से धक्के मारे। उसकी गांड हर धक्के के साथ हिल रही थी। मैंने एक हाथ से उसकी चुचियाँ पकड़ीं, और दूसरा हाथ उसकी चूत पर ले जाकर क्लिट को रगड़ा। माँ पागल हो गई। उसकी सिसकारियाँ चीखों में बदल गईं, “आह्ह… ओह्ह… फाड़ दे बेटा… चोद दे अपनी माँ को!”
“रंडी, इतनी गर्म चूत तूने अपने बेटे से छुपाई? साली, पहले क्यों नहीं चुदवाया?” मैंने कहा, और उसकी गांड पर एक जोरदार थप्पड़ मारा।
“मादरचोद, तुझे इतना शौक था तो पहले बोलता! हर होली में तुझे चूत दे देती!” माँ बोली।
मैंने उसे फिर से पीठ के बल लिटाया। उसकी टाँगें अपने कंधों पर रखीं और चूत में लंड पेला। इस बार मैंने धक्के धीरे-धीरे मारे, ताकि मजा लंबा चले। माँ की चूत मेरे लंड को निचोड़ रही थी। मैंने उसकी चुचियाँ चूसीं, उसकी गर्दन पर काटा, और उसके होंठों को चूस-चूसकर लाल कर दिया। माँ की सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं।
करीब 20 मिनट की चुदाई के बाद माँ की साँसें तेज हो गईं। उसने मेरी कमर पकड़ी और बोली, “बेटा… मेरा होने वाला है… जोर से चोद!” मैंने स्पीड बढ़ा दी। उसकी चूत सिकुड़ने लगी, और वो जोर से चीखी, “आह्ह… बेटा… निकल गया!” उसका बदन काँपने लगा, और चूत से गर्म रस बहने लगा। मैंने धक्के जारी रखे। कुछ देर बाद मेरा भी होने वाला था।
“माँ, कहाँ निकालूँ?” मैंने पूछा।
“अंदर ही डाल दे… मैं गोली खा लूँगी!” माँ बोली।
मैंने जोर-जोर से धक्के मारे, और चूत में पानी छोड़ दिया। मेरा लंड झटके मार रहा था, और माँ की चूत मेरे रस से भर गई। मैं उसकी चुचियों पर ढेर हो गया, और उसके होंठ चूसने लगा। माँ ने मेरे बदन को सहलाया, और मेरे चुम्मों का जवाब दिया। कुछ देर बाद वो बोली, “बेटा, कपड़े पहन ले… कोई आ जाएगा!”
“माँ, फिर कब चोदने दोगी?” मैंने उसकी चूत मसलते हुए पूछा।
“अगली होली में, अगर तू घर पर होगा,” उसने हँसकर कहा।
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“चुप रंडी, नखरे मत कर। मैं तुझे रोज चोदूँगा!” मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारते हुए कहा।
“ये रंडी चालू माल नहीं है। जा, कॉलेज में रंडियों को चोद!” माँ हँसते हुए नंगी ही किचन में चली गई।
मैंने पीछे से उसके चूतड़ पकड़े और बोला, “माँ, तू मस्त माल है। तुझे कोठे पर बैठाऊँगा, लाखों कमाएगी!” मैंने उसकी गांड में उंगली डाली, और वो चिहुँक उठी।
“रंडी बाद में बनूँगी। अभी कपड़े ला दे!” वो बोली।
मैंने कमरे से साया और ब्लाउज लाकर उसे पहनाया।
“साड़ी नहीं पहनाओगे?” माँ ने मेरे गाल चूमते हुए पूछा।
“नहीं रानी, आज से तू घर में ऐसे ही रहेगी—बिना साड़ी के!” मैंने कहा।
“दादाजी के सामने भी?” उसने पूछा।
“ठीक है, सिर्फ आज। कल से साड़ी पहनूँगी,” माँ बोली और खाना बनाने लगी।
मैं उसके साथ मस्ती करता रहा। उस दिन के बाद होली मेरे लिए सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं रहा। माँ की चूत ने मुझे उसका दीवाना बना दिया। अगली होली का इंतजार है, जब फिर से उसकी जवानी का मजा लूँगा।
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