Village girl sex story, Pan shop sex story: मैं गोंडा जिले का रहने वाला हूँ। मेरी कचहरी में पान की दुकान है। अब मैंने एक्स्ट्रा कमाई के लिए साथ में एक फोटोस्टेट की दुकान भी खोल ली है। मैं स्टाम्प पेपर भी बेचता हूँ। कुछ दिनों पहले मेरी दुकान पर एक संगीता नाम की लड़की आयी। उसके साथ कुछ लोगों ने गन्ने के खेत में जबरदस्ती कर दिया था। बस वही उसका मुकदमा चल रहा था।
वह जवान बिलकुल गांव की देहाती देसी लड़की थी। देखने में हट्टी-कट्टी, अल्हड़ और आकर्षक। उसकी चौड़ी थाती, मस्त गदराए हुए दूध जैसे बड़े-बड़े स्तन, चंचल आँखें और काले घने लंबे बाल उसे और भी मोहक बनाते थे। संगीता जब सुबह गन्ने के खेत में काम करने मैदान गई थी, बस वहीं उसके गांव के कुछ मनचले लोगों ने उसके साथ जबरदस्ती कर डाली थी।
संगीता के बाप ने तुरंत पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी थी। अब कचहरी में उसका मुकदमा चल रहा था। संगीता मेरी दुकान पर पान खाने आई थी। बस तभी मेरा उससे परिचय हो गया। जब-जब वह पेशी के लिए कचहरी आती, मेरी दुकान पर जरूर पान खाने रुकती। धीरे-धीरे बातों-बातों में मैंने उससे अपना फोन नंबर ले लिया।
जब दुकान पर कोई ग्राहक नहीं होता था, मैं उससे फोन पर इश्कबाजी वाली बातें करने लगता था। वह फोन पर मुझे अपना पूरा हाल सुनाती थी। उन आदमियों ने उसे बहुत बुरी तरह नोचा था। रंडियों की तरह उसे खेत में चोदा था। कुल पाँच लोग थे। जब एक थककर झड़ जाता था, तब दूसरा उसकी जगह ले लेता था। फिर तीसरा, चौथा और पाँचवाँ।
उन्होंने संगीता को खेत में मुर्गा बनाकर रखा था। यानी उसे घुटनों और हाथों के बल पर झुकाकर पीछे से लगातार चोदते रहे थे। नॉन-स्टॉप उसकी बुर फाड़ रहे थे। मोटे लंड, छोटे लंड, आड़े-तिरछे, हर तरह के लंड उसकी बुर में घुसते-निकलते रहे। पहले लंड ने उसकी बुर में जोर से धक्का मारा तो दर्द से उसकी चीख निकल गई। लेकिन वे नहीं रुके। एक के बाद एक उसकी बुर में घुसते गए।
जब पहला आदमी उसके अंदर झड़ गया, तो उसने संगीता की कमर पकड़कर और जोर से पीछे खींचा और तेज-तेज धक्के मारे। फिर जैसे ही वह निकला, दूसरा तुरंत तैयार था। उसने भी संगीता की गांड ऊपर उठाकर अपना लंड एक झटके में अंदर डाल दिया। संगीता दर्द से कराह रही थी, लेकिन वे हंसते हुए उसे और तेज चोदते रहे। तीसरे ने उसे पीछे से पकड़कर उसके स्तनों को जोर-जोर से दबाया और नीचे से ऊपर की तरफ धक्के देने लगा।
चौथे ने संगीता के बाल पकड़कर उसका सिर पीछे खींचा और मुंह में अपना लंड ठूंसने की कोशिश की, लेकिन मुख्य रूप से वे सब पीछे से ही उसकी बुर पर टूट पड़े। पाँचवें ने सबसे आखिर में उसकी बुर में इतनी जोर से धक्के मारे कि संगीता की आँखों से आंसू बहने लगे। खेत में गन्ने की पत्तियों पर संगीता की बुर से निकला खून फैल गया था। खून की लकीरें जमीन पर दिख रही थीं। ये सारी बातें संगीता ने मुझे फोन पर विस्तार से बताईं।
मैं उसके साथ खूब सहानुभूति दिखाने लगा। उसकी हर बात सुनकर मैं गहरा दुख जताता, आँखों में आँसू लाकर बोलता कि “अरे संगीता, इतना दर्द सहना पड़ा तुझे, ये कितना अन्याय है।” उसकी हर बात में मैं पूरी तरह हामी भरता रहा। “हाँ बिलकुल, वो लोग बहुत गलत थे।” “तुम बिलकुल निर्दोष हो।” “मैं तुम्हारे साथ हूँ।” इस तरह धीरे-धीरे मैंने खुद को उसके दिल के बहुत करीब ला लिया।
धीरे-धीरे मैंने उसको शीशे में उतार लिया। मतलब, मैंने उसे ऐसे दिखाया जैसे मैं उसका सबसे बड़ा सहारा हूँ, सबसे अच्छा दोस्त हूँ, जो उसकी हर बात समझता है और उसका साथ कभी नहीं छोड़ेगा। दोस्तों, जिस लड़की को पाँच लोग पहले ही हचक-हचक के पेल चुके हों, उसके पास अब छुपाने को क्या बचा था? मैं मन ही मन सोचता रहा – मिले चूत तो बस पेलो साली को, क्या फर्क पड़ता है पहले क्या हुआ। बस यही मेरे दिमाग में चल रहा था।
इसलिए मैं उसका हमराज और हमदर्द बन गया था। मैं उसे फोन पर घंटों सुनता, कभी-कभी रात को भी बात करता। उसकी हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखता। मेरा असली मकसद तो संगीता को मुर्गा बनाकर उसकी चूत लेना ही था। बस यही मेरा एकमात्र टारगेट था। मैं हर कदम सोच-समझकर उठाता था ताकि वो मेरे जाल में पूरी तरह फँस जाए।
धीरे-धीरे जब मुझे यकीन हो गया कि लड़की अब पूरी तरह सेट हो गई है, मतलब मेरे ऊपर भरोसा कर रही है और मेरी बातों में आ रही है, तब मैंने उसे गोंडा शहर में स्कूटर पर घुमाना शुरू कर दिया। शाम को कभी-कभी उसे पीछे बिठाकर शहर घुमाता, हवा में बाल उड़ते देखता, उसकी कमर पर हाथ रखकर मजा लेता। कभी-कभी उसे अच्छे रेस्टोरेंट में ले जाता। वहाँ बैठकर चाय-नाश्ता करते, हँसी-मजाक करते। वो मेरे साथ खुश दिखती, मेरी हर बात पर मुस्कुराती।
अब संगीता मुझ पर पूरा भरोसा करने लगी थी। मेरी हर बात पर वो जोर से हँस पड़ती। मैं धीरे से उसका हाथ पकड़ लेता। पहले तो हल्के से उँगलियाँ छूता, फिर पूरा हाथ अपने हाथ में ले लेता। बड़ी-बड़ी देर तक उसका हाथ अपने हाथ में थामे रहता। वो कुछ नहीं कहती, बस शरमाकर मुस्कुरा देती या नजरें नीची कर लेती। मैं समझ गया कि जो लड़की हाथ देने को तैयार है, वो चूत भी एक दिन दे ही देगी।
क्योंकि शादी के लिए जब लड़का जाता है, तो लड़की के बाप से ये नहीं कहता कि “मुझे आपकी बेटी की चूत चाहिए।” वो हमेशा यही कहता है कि “मुझे आपकी लड़की का हाथ चाहिए।” लेकिन असल में हर लड़का हाथ माँगकर लड़की की चूत को खुलकर मारता है। बस मैंने ये बात अच्छी तरह समझ ली थी। अगर संगीता मुझे अपना हाथ दे रही है, तो समझ लो चूत भी देने वाली है।
बस दोस्तों, मैंने एक दिन संगीता से बातों-बातों में बहुत सहज ढंग से कह दिया, “काश कोई लड़की मुझे भी अपना प्यार दे देती, मुझे भी कोई अपना बनाती।” मैंने ये बात ऐसे कही जैसे दिल से निकली हो, आँखों में थोड़ी उदासी दिखाकर। संगीता ने थोड़ी देर चुप रहकर मेरी तरफ देखा, फिर धीरे से मुस्कुराकर बोली, “ठीक है… मैं दे सकती हूँ।” बस वो मान गई।
मैं अंदर से बहुत खुश हुआ। लगा जैसे मैंने लाखों रुपये की लॉटरी जीत ली हो। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, मन में एक अलग ही उत्तेजना थी। आखिरकार मेरा प्लान काम कर रहा था। लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने आ गई – संगीता को चोदने के लिए जगह कहाँ मिलेगी? अपने घर पर तो बिलकुल नहीं ले जा सकता। वहाँ 30-40 लोगों का परिवार है। माँ-बाप, भाई-बहन, चचेरे-ममेरे रिश्तेदार, बच्चे कुत्ते-बिल्लियों की तरह इधर-उधर दौड़ते रहते हैं। कोई भी समय पर आ सकता है, दरवाजा खटखटा सकता है। इतने लोगों के बीच कोई निजी पल नहीं मिल सकता। संगीता को कहाँ ले जाऊँ?
मैंने बहुत सोचा। होटल जाना रिस्की था, क्योंकि वहाँ कोई पहचान वाला मिल सकता था। कोई खेत या बाहर का जगह भी सुरक्षित नहीं लग रही थी। घूम-फिर के आखिरकार यही आईडिया दिमाग में आया – अपनी पान की ढाबली में ही संगीता को मुर्गा बनाओ और उसकी गुझिया मारो। दुकान छोटी है, लेकिन शाम को बंद हो जाने के बाद पूरी तरह सुनसान हो जाती है। कोई नहीं आता-जाता। वहाँ मैं उसे आराम से चोद सकता हूँ, बिना किसी डर के।
मैंने संगीता से फोन पर कहा, “शनिवार की शाम 8 बजे मेरी दुकान पर आ जाना। सब बंद हो जाएगा, हम अकेले बात कर पाएँगे।” वो सहमति में बोली, “ठीक है, मैं आ जाऊँगी।” संगीता हमेशा साइकिल से चलती थी। उसका नेचर थोड़ा मर्दाना था – तेज चलती, सीधे-सपाट बात करती, लेकिन मेरे सामने अब नरम हो गई थी।
शनिवार को मैंने अपनी पान की दुकान को 8 बजे तक खुला रखा। जैसे ही 8 बजे हुए, मैंने अपना पान का काउंटर बंद कर दिया। सारे पान पुकार, मसाले की पुड़ियाँ, सुपारी, केतली सब समेटकर गत्ते के डिब्बे में अच्छे से रख दिया। दुकान का शटर आधा नीचे कर दिया ताकि बाहर से अंदर दिखे नहीं। मैं बाहर सड़क पर खड़ा हो गया। चारों तरफ नजरें घुमा-घुमा कर देख रहा था कि कहीं कोई आदमी तो नहीं है। अपनी माल संगीता का इंतजार कर रहा था।
मैंने देखा – कचहरी पूरी तरह खाली हो चुकी थी। सारे वकील, मुंसी, क्लर्क, दुकानदार सब जा चुके थे। सन्नाटा छा गया था। सिर्फ दूर-दूर से कुत्तों की भौंकने की आवाज आ रही थी। मेरे लंड में खुजली होने लगी थी। आज तो चूत मिल ही जाएगी, ये सोचकर मैं पैंट के ऊपर से ही लंड को मलने लगा। हल्के-हल्के दबाव डालता, उत्तेजना बढ़ती जा रही थी।
मैंने घड़ी में देखा – ठीक 8 बज गए थे। अभी तक संगीता नहीं आई। दिल थोड़ा धक-धक करने लगा। फिर सवा 8 बज गए। मैं सोचने लगा, “भोसड़ी के, लगता है लौंडिया हाथ से निकल गई। आज की चूत भी गई।” हर सेकंड एक साल के बराबर लग रहा था। पसीना आ रहा था, लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। मैंने जेब से सिगरेट निकाली, सुलगाई और धीरे-धीरे फूंकने लगा। धुएँ के साथ इंतजार जारी रहा।
मेरी आँखें संगीता और उसकी चूत के लिए तरस गई थीं। हर पल मन में बस वही एक ख्याल घूम रहा था – आज तो वो आएगी, आज तो चूत मिलेगी। लेकिन समय बीतता जा रहा था और वो नहीं दिख रही थी। मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी, पर धीरे-धीरे निराशा घेरने लगी। मेरी सिगरेट भी अब खत्म होने को थी। आखिरी कश लेकर मैंने उसे जमीन पर फेंक दिया और पैर से कुचल दिया। मैं जान गया कि अब न संगीता आएगी और न ही उसकी चूत मिलेगी। मन उदास हो गया, लंड की खुजली अब दर्द जैसी लग रही थी।
तभी मेरी नजर दुकान के पास पड़ी। वहाँ दो कुत्ते कुतिया के साथ प्रेमालाप कर रहे थे। कुतिया जमीन पर लेट गई थी, दोनों पिछले पैर फैलाकर, पूँछ ऊपर करके। कुत्ता उसके पीछे झुका हुआ था, नाक से उसकी बुर को जोर-जोर से सूंघ रहा था। लंबी-लंबी साँसें लेकर सूंघता, कभी जीभ निकालकर चाटने की कोशिश करता। कुतिया कराह रही थी, आँखें बंद करके मजा ले रही थी। ये सब देखकर मेरे अंदर गुस्सा भड़क उठा। मेरी तो माल नहीं आई, और ये हरामी यहाँ अपनी माल को चोद रहा है, उसकी बुर चाट रहा है।
मैं चिल्लाया, “बहनचोद!! यहाँ मेरी माल नहीं आई और तू अपनी माल को चोदेगा, उसकी बुर चाटेगा!” गुस्से में मैंने जमीन से एक पत्थर उठाया। जोर से खींचकर फेंका। पत्थर सीधा कुत्ते के लंड पर लगा। कुत्ता दर्द से चीखा, “पिल्ल-पिल्ल” करता हुआ पीछे हटा। कुतिया भी घबराकर उठी। दोनों टाँगें उठाकर, पूँछ दबाकर तेजी से भाग निकले। मैंने उन्हें जाते हुए और गालियाँ दीं।
मैं बहुत निराश हो गया था। अब सच में लग रहा था कि आज कुछ नहीं होने वाला। मैंने दुकान का शटर पूरी तरह नीचे किया। अंदर से ताला लगाने लगा। चाबी घुमाते हुए मन में सिर्फ एक ही बात थी – आज फिर चूत हाथ से निकल गई। तभी पीछे से किसी साइकिल की घंटी बजी। तेज, लगातार बजती हुई। मैं चौंककर मुड़ा। अरे बाप रे!! संगीता थी।
उसकी साइकिल तेजी से आ रही थी, बाल हवा में उड़ रहे थे। मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई। आप लोगों को दोस्तों बता नहीं सकता, कितनी खुशी हुई उस पल। लगा जैसे सारी निराशा एक झटके में गायब हो गई। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा, लंड फिर से सख्त होने लगा।
संगीता ने साइकिल को स्टैंड पर खड़ा किया। वो तेजी से मेरे पास दौड़कर आई। मैंने शाहरुख खान की तरह दोनों बाहें फैला दीं, जैसे फिल्म में हीरोइन का स्वागत करता है। वो सीधे मेरी बाहों में आ गई। मैंने उसे खुशी से जोर से गले लगा लिया। उसका गर्म जिस्म मेरे सीने से सटा, उसके बड़े-बड़े मम्मे दब गए। कितने महीने लगे इस लौंडिया को पटाने में। आज आखिरकार गले लगी है। मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरा, बालों में उँगलियाँ फेरते हुए उसे और कसकर भींच लिया।
मैंने संगीता से कहा, “साइकिल को स्टैंड पर खड़ा करके ताला लगा दे, कोई चोरी न कर ले।” वो तेजी से साइकिल को दीवार के सहारे खड़ा किया और चेन लॉक लगाकर ताला मार दिया। फिर दोनों अंदर ढाबली में चले आए। मेरी ढाबली ज्यादा बड़ी नहीं थी, बस एक छोटा-सा कमरा, जहाँ पान का काउंटर था और थोड़ी जगह बैठने की। अब एक नई चुनौती मेरे सामने थी – हम लोग पूरा आराम से लंबे होकर नहीं लेट सकते थे। फर्श पर चटाई भी नहीं बिछी थी, सिर्फ कंक्रीट का फर्श। लेकिन मुझे दिमाग लगाकर जुगाड़ करना था। संगीता को मुर्गा बनाना था, यानी उसकी चूत लेनी थी, और वो भी ऐसे कि वो डरे नहीं, बल्कि मजा ले।
मैंने फैसला किया कि उसे बिलकुल एकदम नंगा नहीं करूँगा। बल्कि बड़े आराम से, धीरे-धीरे पुचकार-पुचकार कर आगे बढ़ूँगा। वैसे भी उसका दिल पहले ही एक बार टूट चुका था, उस अनजान लोगों के हाथों। मैं नहीं चाहता था कि वो डर जाए या रोने लगे। सबसे पहले मैं फर्श पर बैठ गया, पीठ दीवार से टिकाकर। फिर मैंने संगीता को इशारा किया। वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई और धीरे से मेरी गोद में आ गई।
संगीता मर्दाना बदन वाली लड़की थी – हट्टी-कट्टी, मजबूत कंधे, चौड़ी कमर, मोटी जाँघें। जैसे ही वो मेरी गोद में बैठी, उसका पूरा वजन मेरी जाँघों पर पड़ गया। मेरी साँस एक पल के लिए अटक गई। बड़ी भारी थी दोस्तों, लेकिन मैंने किसी तरह संभाला। उसे अच्छे से अपनी गोद में बिठाया, उसकी जाँघें मेरी जाँघों के दोनों तरफ फैली हुई थीं। वाह! खूब हट्टी-कट्टी लौंडिया थी। उसके बड़े-बड़े मम्मे मेरे सीने से सटे हुए थे, सलवार के ऊपर से भी उनकी नरमी और गर्माहट महसूस हो रही थी। हम दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया। उसकी बाहें मेरी गर्दन के पीछे चली गईं, और मेरे हाथ उसकी कमर पर।
मैं दावे से कह सकता हूँ कि संगीता मुझसे प्यार करने लगी थी। उसकी आँखों में वो चमक थी, जो प्यार की होती है। लेकिन मैं उससे नहीं, बल्कि उसकी चूत से ज्यादा प्यार करता था। मेरे लिए वो सिर्फ एक मौका थी। काम की भावना में आकर वो मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगी। धीरे-धीरे अपनी उँगलियों से मेरी पीठ सहलाने लगी, जैसे मुझे और करीब खींच रही हो। मेरे ऊपर भी कामदेव हावी होने लगा। मैंने भी उसके कंधों पर हाथ फेरना शुरू किया, फिर धीरे से उसकी पीठ पर। हम दोनों एक-दूसरे की पीठ सहलाने लगे, जैसे कोई पुरानी प्रेमी जोड़े।
आज बड़े दिनों बाद मैं कोई चूत मारने जा रहा था। मन में उत्तेजना इतनी थी कि लंड पहले से ही पैंट में तड़प रहा था। हम दोनों की आँखें बंद हो गई थीं। हम एक-दूसरे के होंठों के करीब आ गए थे, साँसें मिल रही थीं। लेकिन मुझे डर था कि कहीं कोई तीसरा अजनबी हमें चुदाई करते हुए न पकड़ ले। इसलिए मैंने पहले ही ढाबली का पीला बल्ब बंद कर दिया था। कमरा अब अंधेरा-सा हो गया था।
मैंने अपना मोबाइल निकाला और उसकी स्क्रीन जला ली। मोबाइल को एक कोने में रख दिया, जहाँ से हल्की नीली रोशनी फैल रही थी। इतनी रोशनी काफी थी कि मैं संगीता के चेहरे को देख सकूँ, उसके मम्मों की उभार देख सकूँ, और अगर आगे बढ़ा तो उसकी चूत और गांड भी ढूंढ लूँ। वो रोशनी कमरे में एक मादक माहौल बना रही थी। हम दोनों अब और करीब आ गए थे, साँसें तेज हो रही थीं, और हाथ धीरे-धीरे नीचे की तरफ बढ़ने लगे थे।
पहले तो हम दोनों ने खूब चुम्मा-चाटी की। मैंने उसके होंठों को धीरे से अपने होंठों से छुआ। पहले हल्के से, जैसे टेस्ट कर रहा हूँ। फिर धीरे-धीरे गहरा किस करने लगा। उसकी निचली होंठ को हल्के से दाँतों से काटा, फिर जीभ से चाटा। संगीता भी जवाब दे रही थी। उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी, हम दोनों की जीभें आपस में खेलने लगीं। लंबे-लंबे किस होते रहे, साँसें तेज हो गईं। मेरे हाथ उसकी कमर पर फिसलते रहे, उसे और करीब खींचते रहे।
फिर बातों-बातों में संगीता अचानक रोने लगी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वो बोली, “मेरा हमेशा से सपना था कि मैं चुदवाना तो चाहती थी, लेकिन प्यार से, किसी ऐसे के साथ जो मुझे चाहता हो, मुझे दुलार से छुए। पर हुआ कुछ और… वो लोग तो बस… जबरदस्ती…” उसकी आवाज भर्राई हुई थी। मैंने तुरंत उसकी पीठ पर हाथ फेरा, धीरे-धीरे सहलाया। “शश्श… रो मत संगीता। वो सब बीत गया। आज मैं हूँ ना तेरे साथ। मैं तुझे प्यार से ही लूँगा, दुलार से।” मैंने उसकी हिम्मत बढ़ाई, कहा कि “इंसान जो सोचता है, हमेशा वैसा नहीं होता। लेकिन अब जो होगा, वो अच्छा होगा। तू बस मेरे साथ है, मैं तुझे कभी दुख नहीं दूँगा।” वो धीरे-धीरे शांत हुई, आँसू पोंछे और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।
हम दोनों अब चुदाई की ओर बढ़ चले। मैंने धीरे से कहा, “अगर कपड़े पहने रहोगी तो मैं तुमको कैसे लूँगा? सब उतार दो ना…” वो शरमाकर मुस्कुराई और धीरे-धीरे अपने कपड़े उतारने लगी। पहले सलवार खोली, फिर कुरती ऊपर से निकाली। ब्रा और पैंटी भी उतारी। मेरी नजरें भूखे भेड़िए की तरह उसके गर्म जिस्म पर टिक गईं। उसके बड़े-बड़े स्तन, गोल नाभि, मोटी जाँघें, सब कुछ देखकर मन ललचा गया। चुदास मेरे लंड पर पानी बनकर तैरने लगी। जमाना हो गया था किसी चूत के दर्शन नहीं हुए थे। आज इंतजार खत्म होने वाला था।
मैं भी अब खुद को रोक नहीं पाया। अपनी टीशर्ट उतारी, पैंट और अंडरवियर भी निकाल फेंका। संगीता ने अपने सलवार सूट, ब्रा और पैंटी को ढाबली के कोने में बड़ी सावधानी से रखा, ताकि सिकुड़न न आए। मैं नंगा होकर बैठ गया। गदराई जवानी से मालामाल संगीता को फिर से अपनी गोद में बैठा लिया। उसका नंगा जिस्म मेरे नंगे जिस्म से सट गया।
मेरा लंड तमतमा गया, पूरी तरह खड़ा होकर उसके पेट में गड़ने लगा। मैंने उसे हल्का सा ऊपर उठाया और एडजस्ट किया। अब मेरा लंड ठीक उसकी चूत के मुंह पर था। मैंने संगीता के मम्मों को दोनों हाथों से पकड़ा और पीने लगा। बड़े-बड़े, मस्त, भरे हुए मम्मे। निपल्स इतनी शर्मीली, नुकीली और सख्त थीं कि मैं उनके रूप पर मुग्ध हो गया। पहले एक निप्पल को जीभ से घुमाया, फिर मुँह में भरकर चूसा।
कुछ देर तो मैं सिर्फ हाथों से छूकर उन आठवें अजूबे को देखता रहा। मन में सोचा – खूब दूध पिए होंगे उन लोगों ने इसके, तभी इतने बड़े-बड़े मम्मे हो गए। फिर मैंने संगीता के दोनों होंठों पर अपना अंगूठा बड़े कामुक अंदाज में रगड़ा। वो मस्त हो गई, आँखें बंद करके सिसकारी भरने लगी।
एक चुदासी लड़की को देखकर हर लड़के का चेहरा खुशी से खिल जाता है और लाल हो जाता है। बिलकुल मेरा चेहरा लाल हो गया। उधर संगीता भी चुदने को तैयार थी। शर्म और खुशी से उसका चेहरा भी लाल हो गया। मैंने उसके नुकीले मम्मों को समोसे की तरह मुँह में भर लिया। जोर से चूसने लगा। संगीता तड़पने लगी, “आह… धीरे…” लेकिन मैं और मस्ती से उसके दूध पीने लगा। मेरे हाथ उसकी पीठ पर बराबर फेर रहे थे, जिससे वो और गरम हो जाए और खुलकर चुदवाए।
मुझे शरारत सूझी। मैंने उसके मस्त, शक्तिशाली नंगे कंधों को हल्का सा मादक अंदाज में काट लिया। दाँतों से हल्का दबाया। वो सिहर उठी। उसके नंगे कंधे मुझे बहुत सेक्सी लग रहे थे। मैंने दोनों कंधों को बारी-बारी खूब काटा, चाटा। वो और चुदासी हो गई, सिसकारियाँ बढ़ गईं।
किसी लौंडिया को बस आप चोदिए मत। नंगे-नंगे अपनी गोद में बिठाए रखिए, हल्के-हल्के मजा लेते रहिए। चुम्मा-चाटी करते रहिए। बस दोस्तों, मैं इसी पॉलिसी में चल रहा था। मैं संगीता के मस्त, नुकीले, बेहद सुंदर दूध को पीता था, काटता था। उसके नंगे मांसल कंधों को शरारत के साथ काटता था। फिर नीचे आकर उसकी नाभि चाटी, जीभ से घुमाया। उसके मस्त गोरे पेट में हल्के-हल्के काटे। बस मजा आ गया दोस्तों उस दिन। ढाबली की बत्ती मैंने पहले ही बुझा दी थी, सिर्फ मोबाइल की हल्की रोशनी में सब कुछ और भी मादक लग रहा था।
दो जवान जब चुदाई का कार्यक्रम बना रहे हों, तो वैसे भी वहाँ अँधेरा रहना ही बेहतर होता है। इसमें कोजीनेस ज्यादा मिलती है, माहौल और भी अंतरंग और गर्म हो जाता है। मोबाइल की हल्की नीली रोशनी में संगीता का नंगा जिस्म चमक रहा था, जैसे कोई सपने की परी। मेरे हाथ धीरे-धीरे नीचे सरकते हुए उसके मस्त, गोल, लपलपे चुत्तड़ों पर पहुँच गए। दोनों हाथों से मैंने उसके नरम, भरे हुए गालों को मजबूती से पकड़ा। उँगलियाँ गहराई में धँस गईं, मांस इतना मुलायम और गरम था कि मन नहीं भर रहा था। मैंने हल्के से उसके चुत्तड़ ऊपर उठाए, ताकि उसकी चूत मेरे लंड के ठीक सामने आ जाए और आसानी से घुस सके।
मैंने अपना लंड पकड़ा और उसके सुराख में डालने की कोशिश की। पहले तो छेद नहीं मिल रहा था। चूत की गर्माहट और नमी महसूस हो रही थी, लेकिन सही एंगल नहीं लग रहा था। संगीता ने खुद मदद की। उसने अपना हाथ नीचे किया, मेरे लंड को अपनी उँगलियों में थामा। धीरे से सुपारा अपनी बुर के मुंह पर रखा और हल्का सा दबाव दिया। लंड धीरे-धीरे अंदर सरकने लगा। वो इतनी गीली और गरम थी कि लंड जैसे किसी गर्म, नरम सुरंग में घुस रहा हो। संगीता ने “उफ्फ…” की हल्की सिसकारी ली, आँखें बंद कर लीं।
जब मर्दाना बदन वाली लौंडिया दोबारा मेरी गोद में पूरी तरह बैठ गई, तो उसका पूरा वजन मेरे लंड पर पड़ गया। लंड एक झटके में सीधा उसकी बुर के सबसे अंदर चला गया, जड़ तक। संगीता की चूत ने लंड को कसकर जकड़ लिया, जैसे कभी छोड़ना ही नहीं चाहती। मैंने ढाबली की दीवार का सहारा लिया ताकि पीठ मजबूती से टिकी रहे। संगीता को मैंने अपने ऊपर लिटाया हुआ था। उसके मस्त नंगे चुत्तड़ मेरे हाथों में थे। मैंने उन्हें पकड़कर धीरे-धीरे आगे-पीछे सरकाने लगा। मेरा लंड गियर की तरह उसकी बुर में फिसलने लगा – अंदर तक जाता, फिर बाहर आता, फिर गहराई में।
वो चुदने लगी। पहले धीरे-धीरे, जैसे दर्द और मजा दोनों महसूस कर रही हो। मैं भी उसे चोदने लगा, हल्के-हल्के धक्के देता रहा। थोड़ी देर बाद संगीता ने भी मेहनत शुरू कर दी। अब वो खुद मेरे लंड पर ऊपर-नीचे होने लगी। पिस्टन की तरह तेज-तेज फिसलने लगी। उसके चुत्तड़ मेरे जाँघों पर पटक-पटक कर आवाज कर रहे थे – थप-थप-थप। मुझे तो मौज आ गई दोस्तों। संगीता को बड़ी आराम से, बिना किसी जल्दबाजी के, मैंने पूरे एक घंटे तक अपने लंड पर लिटाकर चोदा। कभी तेज धक्के, कभी धीमे गहरे, कभी सिर्फ सुपारे से खेलता रहा। वो सिसकारियाँ भरती रही, मेरे कंधों को नाखून गड़ाती रही, कभी मेरे होंठ चूमती रही।
मजा आ गया मुझे। आखिरकार जब मेरे लंड ने रस छोड़ना शुरू किया, तो बड़ा धीरे-धीरे, आराम से निकला। क्योंकि वो ऊपर की तरफ जा रहा था, सारा गाढ़ा, गरम माल संगीता की चूत के अंदर ही भर गया। चूत ने लंड को कसकर दबाया, जैसे हर बूंद सोख रही हो। हम दोनों ने गहरी-गहरी साँसें लीं। मैंने उसे अपने लंड से नहीं उतारा। लंड अभी भी अंदर ही था, हल्का-हल्का सिकुड़ रहा था। मैंने खूब देर तक उसके दूध पीते रहे। एक-एक निप्पल को मुँह में लेकर जोर से चूसा, जीभ से घुमाया, हल्का काटा। जिंदगी का असली मजा तो मेरी तरह किसी लौंडिया को ऐसे चोदने में ही है दोस्तों – आराम से, धीरे-धीरे, बड़े प्यार से।
फिर दोस्तों, मैंने संगीता को मुर्गा स्टाइल में बनाया। यानी उसे पूरी तरह कुतिया बनाकर, घुटनों और हाथों के बल पर झुकाया। उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ा, चुत्तड़ ऊपर उठाए। उसकी चूत और गांड मेरे सामने पूरी तरह खुल गई। मैंने पहले अपनी उँगलियों से उसकी चूत को सहलाया, गीला किया। फिर अपना लंड फिर से सख्त करके पीछे से उसकी गांड में डाल दिया। पहले तो धीरे से, क्योंकि गांड बहुत टाइट थी। सुपारा अंदर घुसते ही संगीता ने दर्द से “आह… धीरे…” कहा। मैं रुका, फिर धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर डाला। गांड ने लंड को इतनी कसकर जकड़ा कि मजा दोगुना हो गया।
फिर धक्के शुरू किए – पहले हल्के, फिर तेज। संगीता भी अब मजा ले रही थी, पीछे से कमर हिलाने लगी, “और जोर से… आह…” कहने लगी। मैंने उसके बाल पकड़े, हल्का सा पीछे खींचा, और जोर-जोर से गांड मारने लगा। थप-थप की आवाज कमरे में गूँज रही थी। मुर्गा स्टाइल में उसकी गांड फाड़ते हुए मैंने उसे कई बार चोदा, कभी चूत में वापस डालकर, कभी गांड में। 12 बजे तक मैंने संगीता को कुल 3-4 बार लिया – अलग-अलग पोजिशन्स में, लेकिन मुर्गा स्टाइल सबसे ज्यादा मजेदार रहा। हर बार वो थककर भी फिर तैयार हो जाती।
आखिरकार वो पूरी तरह थक गई। उसने अपने कपड़े पहने, सलवार सूट ठीक किया। साइकिल पर बैठकर चली गई। मैंने दुकान का ताला लगाया और घर लौट आया। मन में संतुष्टि थी, शरीर में थकान और खुशी दोनों।
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