कहानी का पिछला भाग: सहेली के भाई की नजर मेरी चूचियों पर
एक दिन मैं घर पर मम्मी के साथ उनके काम में हाथ बटा रही थी। मैं बर्तन मांज रही थी और मम्मी आटा गूंथ रही थीं। तभी दरवाजे पर माया आ गई। वह हंसते हुए अंदर आई और बोली, “चलो ना कंचन, हम लोग बाग में थोड़ा झूला झूलने चलते हैं। आज मौसम भी कितना अच्छा है।”
मम्मी ने हम दोनों को थोड़ा गुस्से भरी नजरों से देखा। उनका चेहरा सख्त हो गया। फिर उन्होंने गहरी सांस लेकर कहा, “लगता है जल्द ही तुम्हारी शादी करनी पड़ेगी कंचन। अब तो बस खेल-कूद ही सूझता है।”
इस पर माया ठहाका लगाकर हंस पड़ी। वह बोली, “हां चाची, अब तो जल्दी से कंचन के लिए कोई अच्छा दूल्हा ढूंढ ही लो। नहीं तो यह बेचारी झूला ही झूलती रह जाएगी, शादी का नाम तक नहीं लेगी।”
मम्मी ने माया को डांटते हुए कहा, “तू चुप रह माया। तेरी वजह से ही तो यह भी बिगड़ रही है।” लेकिन मैं और माया दोनों हंसते हुए बाहर निकल आए।
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हम दोनों सहेलियां बाग में पहुंच गए। वहां झूला पहले से लगा हुआ था। हमने झूला पकड़ा और जोर-जोर से झूलने लगे। हवा में सावन की ठंडक थी, आम के पत्ते सरसराते थे। मैं चारों ओर देखने लगी। अजय कहीं नजर नहीं आ रहा था।
मैंने माया से पूछा, “माया, आज तो तेरा यार कहीं दिख ही नहीं रहा है? हमेशा तो झूला देखते ही दौड़ा चला आता है।”
माया ने होंठ सिकोड़कर कहा, “हां यार, आज तो झूलने में भी मजा नहीं आ रहा है। पता नहीं आज क्यों नहीं आया? शायद कोई काम पड़ गया होगा।”
तभी अजय का एक दोस्त वहां आया। वह तेजी से माया के पास पहुंचा और बोला, “माया, अजय तुम्हें खेतों में बुला रहा है। उधर पश्चिम में जो ईख के खेत लगे हुए हैं, वो अजय के ही हैं। वह उसी में मिलेगा तुम्हें। चली जाओ जल्दी।”
मैं तुरंत माया को मना करने लगी। “नहीं माया, उधर जाना ठीक नहीं होगा। अकेले खेतों में क्या करेगी? मम्मी को पता चला तो बहुत डांट पड़ेगी।”
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पर माया ने मेरी एक न सुनी। वह हंसकर बोली, “अरे कंचन, डर मत। अजय है ना वहां। कुछ नहीं होगा। चल ना मेरे साथ।” और वह मुझे हाथ पकड़कर खींचने लगी। मैं मना नहीं कर पाई और उसके साथ चल पड़ी।
थोड़ी देर में हम लोग ईख के खेतों के पास पहुंच गए। खेत हरे-भरे थे, ऊंची-ऊंची ईखें खड़ी थीं। बीच में अजय हमें दिखाई दिया। वह मुस्कुराता हुआ खड़ा था। उसने माया को इशारे से अपने पास बुलाया। हम धीरे-धीरे खेतों के बीच में चले गए।
खेतों के बीच में एक बड़ा सा आरामदायक खटिया डाला हुआ था। उस पर सफेद चादर बिछी हुई थी। आसपास ईखों की वजह से छाया थी और हवा भी ठंडी-ठंडी चल रही थी।
अजय ने मेरी तरफ देखकर कहा, “कंचन, तुम थोड़ा बाहर हम दोनों का वेट करोगी क्या? हम दोनों थोड़ा प्यार भरी बातें करेंगे। बस थोड़ी देर।”
मैंने माया की तरफ देखा। माया ने मुस्कुराकर मुझे जाने का इशारा कर दिया। उसकी आंखों में शरारत थी। मैं मन मारकर बोली, “ठीक है, मैं बाहर ही हूं।” और वहां से बाहर निकल गई।
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मैं खेत के किनारे बैठ गई। पास में कुछ ईखें तोड़ीं और चूसने लगी। मीठा रस मुंह में फैल रहा था। अंदर क्या हो रहा था, मुझे ज्यादा मतलब नहीं था।
मैं वहाँ बैठकर ईख चूस रही थी। मीठा रस मेरे होंठों पर फैल रहा था और मैं धीरे-धीरे उसे चाटते हुए आनंद ले रही थी। तभी अजय का दोस्त आया। वह बिना कुछ कहे मेरे बिल्कुल पास आकर बैठ गया। उसकी मौजूदगी से हवा में एक अजीब-सी गर्माहट फैल गई।
वह मुस्कुराते हुए बोला, “और बताओ कंचन, तुम यहाँ बैठकर ईख चूस रही हो, और उधर तुम्हारी सहेली माया पूरा जवानी का रस चूस रही है। देखा नहीं, कैसे वो अजय के नीचे लेटी हुई है और दोनों एक-दूसरे में खोए हुए हैं।”
उसकी बात सुनकर मेरे गाल तमतमा उठे। मैं थोड़ा झिझकते हुए, आवाज़ को थामते हुए बोली, “तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए?”
वह हँसा, उसकी हँसी में एक शरारत भरी ध्वनि थी। “अरे इसमें शर्म की कौन-सी बात है कंचन? यही तो उम्र है, मजा लेने की। देखो न, कितना मज़ा आ रहा है दोनों को। तुम चाहो तो तुम्हें भी वैसा ही मजा मिल सकता है।”
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यह कहते हुए उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं और पकड़ मजबूत। फिर वह अपना चेहरा मेरे चेहरे के और करीब लाया। उसकी साँसें मेरे गालों पर, मेरे होंठों के पास गर्म-गर्म लग रही थीं। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जो मुझे सहमा रही थी।
मैं घबरा गई। दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की। “छोड़ो मुझे,” मैंने कहा, लेकिन आवाज़ में काँपन था।
वह फिर भी मुस्कुरा रहा था। “अरे कंचन, तुम तो बचकानी हरकत कर रही हो। क्या तुम्हें सच में मजा नहीं लेना? देखो न, तुम्हारी सहेली माया कितनी खुश है। अजय के नीचे दबी पड़ी है, उसका पूरा बदन हिल रहा है। चलो, मैं तुम्हें पास से दिखाता हूँ, शायद तुम्हारा मन भी बदल जाए।”
उसकी बातें सुनकर मेरे अंदर गुस्सा और शर्म दोनों उमड़ आए। मैंने पूरे जोर से अपना हाथ खींचा, फिर तेज़ी से उसका गाल थप्पड़ मार दिया। आवाज़ चारों तरफ़ गूँज गई।
“दोबारा कभी ऐसी हरकत मत करना,” मैंने गुस्से से कहा। “मैं ऐसी वैसी लड़की नहीं हूँ।”
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वह अपने गाल को मसलता हुआ मुझे घूरने लगा। उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिख रहा था। बिना कुछ और कहे वह उठा और वहाँ से चला गया।
मैं वहीं अकेली बैठी रह गई। ईख अब भी मेरे हाथ में थी, पर अब उसका स्वाद फीका लग रहा था। मेरे अंदर कुछ-कुछ होने लगा था। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे शांत मन में पत्थर मार दिया हो। मन अचानक अशांत हो उठा।
बार-बार उसकी उँगलियों का मेरे हाथ पर दबाव याद आ रहा था। उसका बदन मेरे बदन से छूकर हुआ वह हल्का-सा टकराव। उसकी गर्म साँसें जो मेरे चेहरे पर लग रही थीं, वो सब कुछ मेरे दिमाग में घूम रहा था। मेरी साँसें भी अब थोड़ी तेज़ चल रही थीं। शरीर में एक अजीब-सी कंपकंपी थी। मैंने आँखें बंद कीं, पर वो सारी सनसनी और भी तेज़ होकर मुझे विचलित कर रही थी।
मैं न चाहते हुए भी यह सब सोचने लगी। मन में बार-बार वही ख्याल घूमने लगा कि अभी अंदर माया और अजय क्या कर रहे होंगे। क्या सच में अजय ने माया को पूरी तरह दबोच लिया होगा? क्या माया वाकई उसके नीचे दबी पड़ी होगी, उसकी सिसकियाँ सुनाई दे रही होंगी? मैं बार-बार इन विचारों को झटकने की कोशिश करती, पर वे और मजबूती से लौट आते।
मेरा शरीर अब भी थरथरा रहा था। उस दोस्त की गर्म साँसों की याद, उसके हाथ का स्पर्श, सब कुछ मुझे बेचैन कर रहा था। आखिरकार मुझसे सहन नहीं हुआ। मैं धीरे से उठी और चुपके-चुपके अंदर की ओर बढ़ने लगी। दिल की धड़कन कान में गूँज रही थी।
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थोड़ी ही दूर गई थी कि मुझे दोनों दिखाई दिए। मैं एक पेड़ के पीछे छिपकर देखने लगी। मेरी साँसें रुक सी गईं। दोनों बिल्कुल नंगे थे। माया घुटनों के बल बैठी हुई थी और अजय का लंड अपने मुंह में लेकर जोर-जोर से चूस रही थी। अजय खड़ा था, उसने माया के सिर को दोनों हाथों से पकड़ रखा था। उसकी आँखें बंद थीं और वह धीरे-धीरे कमर हिलाकर माया के मुंह में धक्के दे रहा था। माया की आँखें भी बंद थीं, गाल फूले हुए थे और होंठ लंड के चारों ओर कसे हुए थे। उसकी जीभ बार-बार लंड की नोक पर घूम रही थी।
कुछ देर बाद माया उठी और खटिया पर लेट गई। उसने अपनी टांगें फैला लीं। अजय उसके बीच में आया। उसने अपना लंड हाथ में पकड़ा, माया की बुर पर टिका और एक झटके में अंदर धकेल दिया। माया जोर से उछल पड़ी, उसका मुँह खुल गया और एक लंबी सिसकी निकली।
फिर दोनों में तेज रफ्तार शुरू हो गई। अजय ने माया के कंधों को मजबूती से पकड़ा और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ माया का पूरा बदन हिल रहा था। उसके स्तन ऊपर-नीचे लहरा रहे थे। माया की सिसकियाँ अब तेज हो गई थीं। “आह… अजय… और जोर से…” वह बड़बड़ा रही थी। अजय भी पसीने से तर था, उसकी साँसें फूल रही थीं। दोनों का बदन एक-दूसरे से टकरा रहा था, चटक-चटक की आवाजें आ रही थीं।
मैं यह सब देख रही थी और मेरी साँसें तेज चल रही थीं। मैं जानती थी कि माया पहले भी कई लड़कों के साथ सो चुकी है, पर आज पहली बार मैं उसे इतने करीब से चुदाई करते देख रही थी। मेरी बुर में सनसनी दौड़ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे पेट के नीचे कोई गर्म नल खुल गया हो। मेरी चूत गीली हो चुकी थी, रस धीरे-धीरे बह रहा था। मेरी साँसें भारी हो गईं, मैंने अनजाने में अपनी जाँघें आपस में रगड़ लीं।
दोनों की चुदाई अब चरम पर पहुँच रही थी। अजय के धक्के और तेज हो गए थे। माया की सिसकियाँ अब चीखों में बदल रही थीं। मैं समझ गई कि अब खत्म होने वाला है। डरते-डरते मैं वहाँ से पीछे हटी और चुपचाप बाहर आकर अपनी जगह पर बैठ गई।
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थोड़ी देर बाद माया बाल ठीक करती हुई, चेहरा लाल किए मेरे पास आई। उसकी आँखों में अभी भी वही चमक थी। वह मुस्कुराई और बोली, “चलो कंचन, अब घर चलते हैं।”
हम दोनों घर लौट आए। शाम को राकेश भैया फिर से पढ़ाने आए। उस दिन मेरा मन कतई पढ़ाई में नहीं लग रहा था। बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने आ जाता। माया आज भी जल्दी ही नींद के आगोश में चली गई और मेरे बगल में लेटकर सो गई।
राकेश भैया ने मुझे इस हालत में देखा तो बोले, “कंचन, क्या हुआ है तुम्हें आज? तुम बिल्कुल भी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रही हो।”
मैं थोड़ी घबराई, पर खुद को संभालते हुए बोली, “ऐसी कोई बात नहीं भैया। मैं तो फोकस कर रही हूँ। बस आज पता नहीं क्यों मन नहीं लग रहा।”
राकेश भैया ने मेरी ओर देखा, फिर हल्के से मुस्कुराए। उनकी आँखों में एक अलग-सी चमक थी। उन्होंने किताब बंद की और धीरे से बोले, “कोई बात नहीं। आज तुम्हें थोड़ा इंटरेस्टिंग टॉपिक पढ़ाता हूँ।”
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फिर राकेश भैया थोड़ा अलग अंदाज में पढ़ाने लगे। अब वे किताब से ज्यादा मेरे साथ बातें करने लगे थे। मुझे पढ़ाई में उतना आनंद नहीं आ रहा था, लेकिन बीच-बीच में जो हंसी-मजाक चल रहा था, उसमें मुझे सच में अच्छा लग रहा था। उनकी बातों में एक अलग-सी मिठास थी, जो मुझे हल्का-हल्का छू रही थी।
पढ़ाते-पढ़ाते राकेश भैया की पुरानी आदत थी कि वे मुझे छू लिया करते थे। कभी मेरी कमर पर हाथ फेर देते, कभी गाल को प्यार से खींच लेते, कभी जांघों पर हल्के से हाथ रखकर सहला देते। मैं इन सब पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी, बस हंसकर टाल देती थी। हर बार जब मैं हंसती, राकेश भैया मुझे बड़े प्यार भरी नजरों से देखते और मुस्कुराते हुए कहते, “पता है कंचन, तुम हंसते हुए बहुत ही प्यारी लगती हो। बहुत ज्यादा खूबसूरत हो जाती हो।”
उनकी तारीफ सुनकर मैं शर्मा गई। गालों पर लाली छा गई और मैं नजरें दूसरी तरफ कर ली।
तभी राकेश भैया मेरे और करीब सरक आए। वे इतने पास बैठ गए कि हमारा बदन एक-दूसरे से सटा हुआ था। उन्होंने धीरे से मेरे चेहरे को दोनों हाथों में थाम लिया और मेरी नजरों को अपनी नजरों में कैद कर लिया। उनकी आँखों में एक गहरी चाहत थी।
वे धीमी, गहरी आवाज में बोले, “तुम सच में बहुत ज्यादा सुंदर हो कंचन। तुम्हारा चेहरा, तुम्हारी आँखें, तुम्हारे होंठ… और तुम्हारे बदन की ये बनावट… सब कुछ मेरे दिल को तार-तार कर देता है। ऐसा लगता है जैसे तुमसे ज्यादा खूबसूरत कोई परी भी नहीं होगी।”
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यह सब कहते हुए उन्होंने अपना चेहरा मेरे चेहरे के और पास ला दिया। उनकी गर्म साँसें मेरे गालों पर, मेरे होंठों पर लग रही थीं। उनकी साँसों की गर्मी मेरे पूरे शरीर में फैल रही थी।
मुझे पता नहीं क्या हो गया था। मैं उनकी आँखों में झांक रही थी और उनकी साँसों को महसूस करके एक अजीब-सा सुकून और उत्तेजना दोनों महसूस कर रही थी। सुबह माया और अजय की चुदाई देखकर जो गर्मी मेरे अंदर जगी थी, वो अब फिर से भड़क रही थी। मेरी साँसें तेज चलने लगीं।
राकेश भैया मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में थामे हुए थे। हम दोनों इतने सटे हुए थे कि उनकी छाती मेरी छाती से छू रही थी। मैं लड़खड़ाती आवाज में बोली, “राकेश भैया… माया यहीं पर सो रही है। अगर वो जाग गई और हमें इस हालत में देख लेगी तो क्या सोचेगी? हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। ये सब… पाप है। मैं ये सब नहीं करना चाहती।”
राकेश भैया ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “पाप-वाप कुछ नहीं होता कंचन। जिंदगी मिली है तो मजे लेने के लिए। डर करके क्या मिलेगा? और माया तो गहरी नींद में है, वो अभी नहीं उठने वाली। जब तक कोई उसे जगाएगा नहीं, वो सोती रहेगी।”
यह कहते हुए उन्होंने मेरे चेहरे को और पास खींच लिया। हमारे होंठ अब सिर्फ कुछ इंच दूर थे। कमरे में पूरी खामोशी छा गई थी। सिर्फ हम दोनों की साँसों की आवाज सुनाई दे रही थी।
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मेरी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। राकेश भैया के होंठ मेरे होंठों से हल्के से रगड़ खाने लगे। पहले तो सिर्फ छुअन थी, फिर धीरे-धीरे दबाव बढ़ने लगा। मैं पूरी कोशिश कर रही थी कि उनका साथ न दूं, पर मेरे शरीर ने मेरी बात नहीं मानी। उनकी गर्म साँसें, उनके मुलायम होंठों की नरमी… सब कुछ मुझे खींच रहा था।
मैंने अनजाने में अपने होंठ भी उनके होंठों पर रगड़ दिए। राकेश भैया ने मेरे निचले होंठ को अपने होंठों के बीच दबाकर धीरे से चूसना शुरू किया। उनकी जीभ मेरे होंठों पर फिसलने लगी। मैं भी अब उनका साथ देने लगी थी। मेरे हाथ अनजाने में उनके कंधों पर जा टिके।
वे बड़े प्यार से मेरे होंठ चूस रहे थे। कभी ऊपरी होंठ, कभी निचले, कभी दोनों को एक साथ अपने मुंह में भर लेते। उनकी जीभ मेरे मुंह में घुस आई और मेरी जीभ से खेलने लगी। हम दोनों की साँसें एक हो गईं। मेरी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी। मेरे बदन में एक मीठी कंपकंपी दौड़ रही थी।
इसके आगे की कहानी अगले पार्ट में।
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