Bhains garam hai story, chhota lund cuckold, jungle me chudai, village cuckold story, small dick husband: मनीष और मीरा की शादी की पहली रात अभी भी दोनों के मन में ताज़ा थी। कमरे में अगरबत्ती की मीठी-मीठी खुशबू फैली हुई थी, लाल चंदन की माला बिस्तर के चारों तरफ़ बिखरी पड़ी थी। बाहर से ठंडी हवा आ रही थी, लेकिन कमरे की गर्मी और दोनों के बीच का तनाव सब कुछ और गहरा कर रहा था। मीरा शादी का भारी लाल जोड़ा पहने बैठी थी, सिर झुकाए, हाथों में मेहंदी की गहरी लाली चमक रही थी। उसकी साँसें धीमी-धीमी चल रही थीं, जैसे कोई डर और उत्सुकता साथ-साथ दौड़ रही हों।
मनीष धीरे से उसके पास बैठा। उसने मीरा का हाथ थामा, हथेली ठंडी-ठंडी थी। कई बार गला खारा, शब्द गले में अटक रहे थे। आखिरकार बहुत धीमी, काँपती आवाज़ में बोला, “मीरा, मुझे तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात कहनी है। शादी से पहले नहीं कहा, क्योंकि डर था कि तुम चली जाओगी। लेकिन अब छुपाना नहीं चाहता।”
मीरा ने सिर ऊपर उठाया। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें मनीष को देख रही थीं, चिंता से भरी हुईं। “क्या हुआ जी? इतनी गंभीर क्यों हो गए हो? कुछ गलत तो नहीं किया मैंने?”
मनीष ने गहरी साँस ली। उसकी आँखें नम हो गईं। “मीरा, मेरा लंड बहुत छोटा है। खड़ा होने पर भी बस दो इंच का। मैं तुम्हें कभी शारीरिक रूप से तृप्त नहीं कर पाऊँगा। कभी नहीं। मैंने बहुत कोशिश की है, डॉक्टरों से मिला, दवाइयाँ लीं, एक्सरसाइज की, लेकिन कुछ नहीं होता। मैं खुद से बहुत शर्मिंदा हूँ।”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मनीष ने पकड़ रखा। “रुको, पूरा सुन लो। मैं तुम्हें धोखा नहीं दे रहा। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। तुम मेरी ज़िंदगी हो। लेकिन मैं जानता हूँ कि एक औरत को क्या चाहिए। वो गहरा सुख, वो आग, वो तृप्ति, वो मैं कभी नहीं दे पाऊँगा।”
मीरा की आँखों में आँसू भर आए। उसकी ठुड्डी काँप रही थी। “तो तुम क्या कहना चाहते हो? कि शादी करके मुझे धोखा दिया? कि मैं अब क्या करूँ?”
मनीष ने सिर झुका लिया। “नहीं मीरा, मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं दूँगा। लेकिन मुझे एक फैंटेसी है। बहुत सालों से। मुझे अच्छा लगता है अगर कोई तगड़ा, मज़बूत मर्द तुम्हें पूरी तरह चोदे। मुझे अच्छा लगेगा अगर मैं बस देखूँ। तुम्हें खुश होते देखूँ। तुम्हारी वो सिसकारियाँ सुनूँ जो मेरे कारण कभी नहीं निकलेंगी। मुझे पता है ये कितना गलत लग रहा है। मैं खुद से नफरत करता हूँ। लेकिन ये मेरी सच्चाई है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ दीये की लौ हल्के से हिल रही थी। मीरा ने हाथ छुड़ाया। वो उठ खड़ी हुई। उसकी साड़ी का पल्लू सरक गया, लेकिन उसने ठीक नहीं किया। दीवार की तरफ़ मुड़ गई, पीठ मनीष की तरफ़। कंधे काँप रहे थे। “तुम पागल हो गए हो मनीष जी? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ। मैंने तुम्हें चुना है। पूरा परिवार, पूरा समाज देखकर चुना है। और तुम मुझे किसी और के साथ सोच रहे हो? ये बहुत गंदा है।”
उसकी आवाज़ टूट गई। वो फूट-फूटकर रोने लगी। मनीष उठा। मीरा के पीछे खड़ा हो गया, लेकिन छुआ नहीं। “मीरा, मैं जानता हूँ ये कितना दर्द दे रहा है। मैं खुद से भी नफरत करता हूँ। लेकिन मैं तुम्हें झूठ नहीं बोलना चाहता। अगर तुम कहो तो कल सुबह ही तलाक़ की बात कर देंगे। मैं सब कुछ सह लूँगा। लेकिन अगर तुम मेरे साथ रहना चाहती हो, तो बस इतना जान लो कि मैं तुम्हें कभी छोटा नहीं समझूँगा। तुम मेरी रानी हो। मैं बस तुम्हारा वो सुख देखना चाहता हूँ जो मैं दे नहीं पाता।”
मीरा ने धीरे-धीरे मुड़कर देखा। गालों पर आँसू बह रहे थे। मेकअप बिगड़ गया था। “तुम्हें सच में अच्छा लगेगा अगर कोई और मुझे…?”
मनीष ने सिर हिलाया। उसकी आँखें लाल हो गईं। “हाँ। बहुत अच्छा लगेगा। मैं जानता हूँ ये बीमार लगता है। लेकिन ये मेरी सच्चाई है। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता।”
मीरा चुप रही। काफी देर तक। फिर धीरे से बिस्तर पर बैठ गई। पल्लू से आँसू पोंछे। “मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मुझे लगता है मैंने गलती कर दी।”
मनीष उसके पास बैठा। इस बार मीरा ने हाथ नहीं छुड़ाया। “मुझे सोचने का वक्त दो। आज रात नहीं, लेकिन मैं वादा करती हूँ, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी। लेकिन ये सब बहुत नया है मेरे लिए। बहुत दर्द दे रहा है।”
मनीष ने मीरा को गले लगा लिया। मीरा ने विरोध नहीं किया। वो उसके सीने में मुँह छुपाकर रोती रही। मनीष भी चुपचाप रो रहा था। दोनों के आँसू एक-दूसरे पर गिर रहे थे। उस रात दोनों ने सिर्फ़ गले लगाकर सोया। कोई स्पर्श नहीं। कोई चुंबन नहीं। बस एक गहरा दर्द भरा सन्नाटा।
तीन महीने बीत गए। मनीष ने धीरे-धीरे मीरा को वीडियो दिखाए, कहानियाँ सुनाईं। मीरा की शारीरिक भूख बढ़ती गई। मनीष की छोटी कोशिशें बस तड़पातीं, बुझातीं नहीं। स्कूल से लौटकर मीरा चुपचाप बैठ जाती, जांघें आपस में रगड़ती, साड़ी के पल्लू से स्तनों को दबाती। रात को नींद नहीं आती, चूत में जलन रहती।
एक रात मीरा ने हार मान ली। आँखें बंद करके बोली, “ठीक है मनीष जी, मैं तैयार हूँ। लेकिन सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मैं अब और नहीं सह पा रही।”
मनीष ने उसे गले लगाया। फिर उसने गाँव की पुरानी परंपरा का कोडवर्ड बताया। “जब भी तुम्हें बहुत ज़्यादा इच्छा हो, बस इतना कहना, भैंस गरम है जी।”
(अगर आप कभी गाँव में रहे हैं तो जानते होंगे कि इसका क्या मतलब होता है। जब भैंस गरम होती है, यानी उसकी गर्मी चढ़ जाती है, तब उसे ले जाया जाता है एक मज़बूत नर भैंसे के पास ताकि वो गाभिन हो जाए। ये बात घर में सबके सामने भी सामान्य तरीके से कही जाती है।)
चार दिन बाद शाम को मीरा रसोई में खाना बना रही थी। लाल साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था। पसीने से कमर चिपचिपी हो गई थी। मनीष जैसे ही घर आया, मीरा ने बिना पीछे मुड़े फुसफुसाया, “मनीष जी, भैंस गरम है। बहुत गरम है।”
मनीष का दिल ज़ोर से धड़का। “कल सुबह ही ले चलते हैं।”
अगली सुबह नाश्ते पर पूरा परिवार इकट्ठा था। सास रोटी सेक रही थी, ससुर चाय पीते हुए अखबार देख रहे थे। मनीष ने चाय की चुस्की लेते हुए सामान्य स्वर में कहा, “बाबूजी, हमारी एक भैंस गरम हो गई है। मैं आज इसे जंगल ले जा रहा हूँ”
सास ने रोटी पलटते हुए कहा, “हाँ बेटा, ठीक है। ले जाओ, वरना दूध भी कम हो जाएगा।”
ससुर ने अखबार से नज़रें उठाकर बोला, “ शाम तक लौट आना।”
मीरा की साँसें थम गईं, लेकिन चेहरे पर कुछ नहीं आया। वो चुपचाप रोटी परोसती रही।
मीरा ने लाल बनारसी साड़ी पहनी। गहरा लाल ब्लाउज़, जिसमें उसकी गहरी नाभि और भरे हुए स्तनों की दरार साफ़ दिख रही थी। साड़ी नीचे से टाइट बंधी, गांड का गोल आकार उभरकर आ रहा था। पल्लू हल्का ढीला, चलते वक्त स्तन उछल रहे थे। एक मोटी-तगड़ी भैंस को रस्सी से पकड़कर दोनों निकल पड़े। रास्ते में गाँव की औरतें मुस्कुरा रही थीं, किसी को शक नहीं हुआ।
एक किलोमीटर चलने के बाद पगडंडी धीरे-धीरे जंगल में घुस गई। जनवरी की ठंडी धूप अब पेड़ों की घनी पत्तियों से छनकर आ रही थी, जिससे ज़मीन पर सुनहरी-नारंगी चित्तियाँ बन रही थीं, जैसे कोई जादुई कालीन बिछा हो। हवा में चीड़ की तीखी महक घुली हुई थी, साथ ही दूर से आती गोबर और ताजी मिट्टी की सोंधी खुशबू। मीरा की साड़ी का पल्लू हल्की हवा में लहरा रहा था, उसकी पायल हर कदम पर खनक रही थी। भैंस की रस्सी मनीष के हाथ में थी, और वो आगे-आगे चल रही थी, कभी-कभी पूँछ हिलाकर अपनी बेचैनी दिखाती। मीरा की साँसें अब तेज़ हो चुकी थीं, सीने में एक अजीब सी घबराहट और उत्सुकता मिलकर धड़क रही थी।
थोड़ा और चलते ही सामने उदयभान दिखा। वो एक पेड़ के सहारे खड़ा था, लंबा, चौड़ा कंधा, काला रंग, धोती-कुर्ता में भी उसकी मोटी जांघें और फूली हुई छाती साफ़ नज़र आ रही थी। पसीने की वजह से कुर्ता उसकी त्वचा से चिपका हुआ था, जिससे उसकी मांसपेशियाँ और भी उभरकर दिख रही थीं। हाथ में एक पुराना सा झोला लटका हुआ था, जो भारी लग रहा था। उदयभान ने जैसे ही मीरा और मनीष को देखा, उसके चेहरे पर एक गहरी, जानकार मुस्कान फैल गई। उसने आँखों से मीरा को ऊपर से नीचे तक घूरा, जैसे कोई मालिक अपनी पसंदीदा चीज़ को नाप-तौल रहा हो।
“अरे वाह मनीष भैया,” उदयभान ने गहरी, भारी आवाज़ में कहा, “लगता है आज भैंस बहुत ज़्यादा गरम है। देखो तो साहब, पूँछ कितनी ऊपर उठी हुई है, कितनी बेचैन है बेचारी। पूरे रास्ते में तो लग रहा था ये किसी को चढ़ने को तैयार है।”
मीरा की नज़रें तुरंत नीचे झुक गईं। उसके कान लाल हो गए, गालों पर एक हल्की सी गर्मी फैल गई। वो साड़ी का पल्लू और ज़ोर से पकड़कर सीने पर दबा लिया, जैसे खुद को छुपाने की कोशिश कर रही हो। मनीष ने बस हल्का सा मुस्कुराकर कहा, “हाँ भाई, आज बहुत ज़्यादा है। सुबह से ही तड़प रही है।”
उदयभान धीरे-धीरे उनके साथ चलने लगा। अब तीनों साथ-साथ जंगल की गहराई में जा रहे थे। रास्ता संकरा हो गया था, पेड़ों की छाँव और घनी थी। उदयभान ने बात शुरू की, आवाज़ में वो ही मजाकिया लहजा, लेकिन अब और गहरा।
“मनीष भैया, ये भैंस तो देखने में ही बहुत भारी लग रही है। इतनी गोरी-गोरी, इतनी मोटी-मोटी। ऐसे में तो नर भैंसा को भी बहुत ज़ोर लगाना पड़ेगा। नहीं तो ये मानेगी नहीं।”
मीरा की साँसें और तेज़ हो गईं। वो नीचे देखकर चल रही थी, लेकिन उदयभान की हर बात उसके कान में गूँज रही थी। उदयभान ने फिर कहा, “और देखो तो, चलते-चलते कितनी हिल रही है। कमर भी कितनी अच्छी घुमाव वाली है। आज तो गाभिन होने के बाद दूध भी खूब आएगा। बहुत मोटा, बहुत गाढ़ा।”
मनीष ने हल्के से हँसकर कहा, “हाँ भाई, उम्मीद तो बहुत है। ये भैंस तो पहली बार जा रही है, लेकिन लगता है बहुत भूखी है।”
उदयभान ने मीरा की तरफ़ देखकर मुस्कुराया। “पहली बार? अरे वाह, तो तो और भी मज़ा आएगा। पहली बार वाली भैंसें तो बहुत ज़ोर से चिल्लाती हैं। लेकिन चिंता मत करो, मैं धीरे-धीरे शुरू करूँगा। पहले अच्छे से गर्म करूँगा, फिर पूरी ताकत से डालूँगा। गहराई तक।”
मीरा ने साड़ी का पल्लू और कसकर पकड़ा। उसकी जांघें आपस में सिकुड़ गईं। वो कुछ बोल नहीं पाई, लेकिन उसकी साँसें अब इतनी तेज़ थीं कि साड़ी का पल्लू हिल रहा था। उदयभान ने फिर कहा, “देखो तो मनीष भैया, कितनी शर्मीली है। लेकिन अंदर से कितनी गरम है। पूँछ देखो, कितनी बार हिल रही है। लगता है ये खुद ही कह रही है कि जल्दी करो।”
वे अब लगभग १०-१५ मिनट से जंगल में चल रहे थे। रास्ता और गहरा हो गया था। कोई आवाज़ नहीं, सिर्फ़ पत्तों की सरसराहट और उनके कदमों की आवाज़। उदयभान ने फिर बात जारी रखी, “भैंसें तो जब गरम होती हैं, तब बहुत बेचैन हो जाती हैं। जांघें रगड़ती हैं, कमर हिलाती हैं। ये वाली तो देखो, चलते वक्त कितनी हिल रही है। लगता है बहुत दिन से किसी मज़बूत नर का इंतज़ार है।”
मीरा की चूत में अब लगातार एक मीठी जलन हो रही थी। वो चुपचाप चल रही थी, लेकिन हर बात उसके अंदर आग लगा रही थी। उदयभान ने एक बार फिर भैंस को छूने के बहाने मीरा के बहुत पास आकर कहा, “और ये तो बहुत नरम लग रही है। छूने से ही पता चल रहा है कि अंदर कितना रस भरा है। आज तो बहुत अच्छे से गाभिन होगी। पूरा भरकर, गहराई तक।”
मनीष ने हल्के से कहा, “हाँ भाई, बस यही उम्मीद है।”
उदयभान ने आँख मारकर कहा, “चिंता मत करो भैया। मैं पूरा ज़ोर लगाऊँगा। धीरे-धीरे शुरू करूँगा, फिर जब ये पूरी गरम हो जाएगी, तब जोर-जोर से ठोकूँगा। चीखेगी ज़रूर, लेकिन मज़ा भी बहुत आएगा।”
वे अब सुनसान जगह पर पहुँच चुके थे। चारों तरफ़ घने पेड़, बीच में छोटी सी खुली ज़मीन, जहाँ धूप की कुछ किरणें सीधे आ रही थीं। उदयभान ने झोला ज़मीन पर रखा। पहले उसने मोटी, पुरानी चटाई निकाली और ध्यान से बिछाई। फिर ऊपर एक साफ़, हरी चादर डाली, जो हल्की सी महक रही थी जैसे अभी धुली हो। छोटा-सा तकिया रखा, जो नरम और मुलायम लग रहा था। आखिर में उसने कंडोम का पैकेट बाहर निकाला और चादर के किनारे पर रख दिया, जैसे सब कुछ पहले से प्लान किया हुआ हो।
मनीष ने भैंस को पास के बरगद के पेड़ से बाँध दिया। रस्सी को अच्छे से कसकर बाँधा ताकि वो हिले नहीं। उदयभान ने मनीष की तरफ़ देखा, उसकी आँखों में एक चमक थी।
“अब भैंस को यहीं लिटा दो मनीष भैया,” उसने कहा, “और तुम किनारे पर बैठ जाओ। आज मैं इसे अच्छे से संभाल लूँगा। पूरा मज़ा दूँगा, चिंता मत करना।”
मनीष ने मीरा का हाथ थामा। उसकी हथेली पसीने से गीली थी। धीरे से उसे चादर के बीच में ले गया। मीरा की साँसें अब बहुत तेज़ चल रही थीं, सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। मनीष ने उसके माथे पर बहुत प्यार से चुम्बन दिया, फिर उसके कान में फुसफुसाया, “मजे करो मेरी जान। मैं यहीं हूँ। उदयभान भरोसे का आदमी है। वो तुम्हें पूरा सुख देगा, सेफ्टी की चिंता मत करना।”
मीरा ने बस सिर हिलाया, आँखें बंद कर लीं। मनीष धीरे से पीछे हट गया, लगभग बीस फीट दूर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसकी आँखें फटी की फटी मीरा और उदयभान पर टिकी हुई थीं।
उदयभान अब मीरा के ठीक सामने खड़ा था। उसकी साँसें गहरी थीं, जैसे कोई शिकारी अपना शिकार देख रहा हो। मीरा की साड़ी पर उसकी नज़र टिकी हुई थी। और अब असली खेल शुरू होने वाला था।
उदयभान मीरा के ठीक सामने खड़ा हो गया। उसकी साँसें गहरी और गर्म थीं, मीरा को लग रहा था जैसे उसकी त्वचा पर आग लग रही हो। उसने पहले मीरा के पल्लू को बहुत धीरे से पकड़ा, जैसे कोई कीमती चीज़ को छू रहा हो। उँगलियाँ पल्लू के किनारे पर सरकाईं, धीरे-धीरे उसे कंधे से नीचे सरकाया। साड़ी का पल्लू फिसलकर ज़मीन पर गिरा, हल्की सी सरसराहट हुई। मीरा की साँसें रुक गईं, सीना ऊपर-नीचे हो रहा था। ब्लाउज़ के नीचे से उसके स्तनों की गहराई साफ़ दिख रही थी।
उदयभान ने फिर मीरा के ब्लाउज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया। एक-एक करके हुक खोले, हर हुक खुलने के साथ मीरा की साँसें और तेज़ होती गईं। ब्लाउज़ खुला, कंधों से सरककर गिरा। काली लेस वाली ब्रा में उसके गोरे, भरे हुए स्तन फँसे हुए थे, जैसे जेल में बंद फूल। उदयभान ने ब्रा के स्ट्रैप्स को कंधों से नीचे सरकाया, फिर पीछे से हुक खोला। ब्रा ढीली हुई, दोनों स्तन बाहर आ गए। गुलाबी निप्पल्स ठंड और उत्तेजना से कड़े हो चुके थे, हल्के से काँप रहे थे। उनकी सतह पर पसीने की महीन बूँदें चमक रही थीं।
उदयभान ने दोनों स्तनों को हाथों में भरा। नरम, गर्म, भारी। धीरे-धीरे मसला, अँगूठों से निप्पल्स को रगड़ा, हल्के से निचोड़ा। मीरा की आँखें बंद हो गईं, मुँह से एक लंबी सिसकारी निकली, “आह्ह… उदयभान जी… कितना अच्छा लग रहा है…” उदयभान ने झुककर एक निप्पल मुँह में लिया। जीभ से घुमाया, चूसा, हल्के से दाँतों से काटा। मीरा की कमर ऊपर उठ गई, हाथ उदयभान के सिर में उँगलियाँ फँस गईं। दूसरा स्तन भी वैसा ही चूसा, मीरा की सिसकारियाँ जंगल में गूँजने लगीं। “ओह्ह… और चूसो… ज़ोर से… मेरे स्तन सालों से किसी ने ऐसे नहीं छुए…”
फिर उदयभान ने मीरा को खड़ा किया। साड़ी का छोर पकड़ा, धीरे-धीरे खींचना शुरू किया। मीरा घूमती गई, साड़ी उसके बदन से लिपटकर खुलती गई। हर फेर के साथ साड़ी का कपड़ा फिसलता, उसकी कमर, पेट, गहरी नाभि सब नंगी होती गई। आखिर में साड़ी पूरी खुली, मीरा के पैरों के पास ढेर हो गई। अब सिर्फ़ पेटीकोट और लाल पैंटी। पेटीकोट की नाड़ी खींची, वो भी नीचे सरक गई। मीरा अब सिर्फ़ लाल पैंटी में खड़ी थी। उसकी गांड गोल-गोल, जांघें मोटी-मोटी, पसीने से चमक रही थीं। पैंटी के बीच में गीलेपन की गहरी लकीर साफ़ दिख रही थी, जैसे चूत पहले से ही बह रही हो।
उदयभान ने मीरा को चादर पर लिटाया। उसकी जांघें धीरे से फैलाईं। पैंटी के ऊपर से ही चूत पर उँगली फिराई। कपड़ा पूरी तरह गीला था, रस से भरा। “वाह रानी, कितनी तर है ये… कितना रस बह रहा है… लगता है सालों से किसी ने चाटा नहीं,” उसने फुसफुसाया। फिर पैंटी को धीरे से नीचे सरकाया, उतारा। मीरा की चूत पूरी नंगी। हल्के बाल, गुलाबी होंठ फूले हुए, क्लिट तनी हुई, रस से चमक रही। उदयभान घुटनों पर बैठ गया। जीभ निकालकर पूरी चूत चाटी, ऊपर से नीचे। क्लिट पर जीभ घुमाई, हल्के से चूसा। मीरा की कमर उछल गई, “आह्ह… उदयभान जी… और चाटो… बहुत दिन से तड़प रही हूँ… अंदर तक चाटो… मेरी चूत को अपना मुँह दो…”
उदयभान ने जीभ अंदर डाली, फिर उँगली। पहले एक, धीरे से अंदर-बाहर। मीरा कराह रही थी। फिर दो उँगलियाँ, तेज़। फिर तीन। मीरा का रस उसके हाथ पर बह रहा था, चादर गीली हो गई। सिसकारियाँ जंगल में गूँज रही थीं, “आह्ह… हाँ… ऐसे ही… और तेज़… मेरी चूत फाड़ दो उँगलियों से…”
मीरा अब बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। वो खुद उठी, उदयभान की धोती पकड़ी, खींची। धोती खुली, आठ इंच का मोटा लंड बाहर आया। नसें फूली हुईं, सुपारा लाल-लाल, पहले से ही रस टपक रहा था। मीरा ने उसे हाथ में लिया, सहलाया, ऊपर-नीचे किया। फिर झुककर मुँह में लिया। पहले सिर्फ़ सुपारा चूसा, जीभ घुमाई। फिर आधा अंदर। फिर जितना मुँह में आ सका। लार टपक रही थी, चप-चप की आवाज़ें आ रही थीं। उदयभान ने उसके बाल पकड़े, धीरे से मुँह में धक्के देने लगा। “आह्ह… चूस अच्छे से रानी… मेरा लंड तेरे मुँह में कितना अच्छा लग रहा है… जैसे सालों से इंतज़ार कर रहा था… चूस ज़ोर से… मेरे लंड को अपनी रंडी जैसा चूस…”
मीरा ने मुँह से लंड निकाला, ऊपर देखकर बोली, “देख मनीष… ये है असली मर्द का लंड… तेरा तो दो इंच का भी नहीं होता… ये तो मेरे मुँह को भर रहा है… और तू बस देख… तेरी बीवी कितनी बेशर्म हो गई है… ये लंड चूस रही है जैसे भूखी कुत्ती…”
फिर फिर मुँह में लिया, और ज़ोर से चूसने लगी। गला तक ले जाती, लार बहाती। उदयभान कराह रहा था। मीरा ने फिर निकाला, “मनीष… आ… देख ना… तेरी पत्नी कितनी अच्छी चूसती है… तू तो कभी झड़ता भी नहीं था… ये लंड तो अभी-अभी फटने वाला है…”
कंडोम निकाला तो मीरा ने हाथ से रोक दिया। “नहीं… पहली बार तो बिना… पूरा अंदर महसूस करना है… मैं दवा खा लूँगी… मुझे वो गर्मी चाहिए… वो भराव…”
उदयभान ने मनीष की तरफ़ देखा। मनीष दूर से बोला, “जैसे वो चाहे, वैसे ही करो।”
उदयभान ने मीरा को चादर पर लिटाया। उसकी टाँगें कंधों पर रखीं। लंड चूत पर रगड़ा, रस से गीला कर लिया। धीरे से सुपारा अंदर। मीरा चीखी, “आआआह्ह… दर्द… बहुत मोटा है… फट जाएगी…” उदयभान रुका, फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर। खून की हल्की लकीर निकली। मीरा वर्जिन थी। उसने मीरा की पैंटी उठाई और मुँह में ठूँस दी। “चुप रहो रानी… आवाज़ चली गई तो गाँव में हंगामा हो जाएगा… बस सह लो…”
फिर धक्के शुरू। पहले धीरे, फिर तेज़। मीरा की आँखों में आँसू, लेकिन चूत से रस बह रहा था। पोज़िशन बदली। मीरा को घोड़ी बनाया। बाल पकड़कर पीछे से पेला। गांड पर जोरदार चपतियाँ। “ले भैंस… ले पूरा… आज तुझे गाभिन कर दूँगा… तेरी चूत में मेरा माल भर दूँगा…”
मीरा ने पैंटी मुँह से निकाली। अब वो बेशर्म हो चुकी थी। चिल्लाई, “मनीष… इधर आ… पास आ… देख ना कैसे असली मर्द चोदता है… तेरा छोटा-सा लंड तो मेरी चूत में घुसता तक नहीं था… देख… कितना गहरा जा रहा है… कितना मोटा… कितना ज़ोर से…”
मनीष पास आया। मीरा ने उसे देखकर कहा, “बैठ जाओ ज़मीन पर। पीठ पेड़ से टिका लो। पैर फैलाओ। अब मैं तुम्हारी गोद में पीछे की तरफ़ बैठूँगी। पीठ तुम्हारी तरफ़, सिर तुम्हारे कंधे पर। ताकि मेरी चूत उदयभान जी की तरफ़ पूरी खुली रहे… और तू अच्छे से देख सके।”
मनीष बैठ गया। पैर फैलाए। मीरा धीरे से उठी। उदयभान ने लंड बाहर निकाला। मीरा मनीष की गोद में पीछे मुड़कर बैठ गई। उसकी पीठ मनीष के सीने से सटी। सिर मनीष के कंधे पर टिका। गांड मनीष की जांघों पर दबी। टाँगें फैलीं। चूत पूरी खुली, उदयभान की तरफ़। मनीष ने दोनों हाथों से मीरा की कमर पकड़ ली, उसे सहारा दिया।
उदयभान आगे आया। लंड फिर से चूत पर रखा। मीरा ने खुद कमर थोड़ी ऊपर उठाई। उदयभान ने एक ज़ोरदार धक्का मारा। पूरा लंड अंदर। मीरा चीखी, “आह्ह… हाँ… ऐसे ही… गहराई तक…”
उदयभान ने रफ्तार बढ़ाई। ज़ोर-ज़ोर से पेलने लगा। मीरा मनीष की गोद में हिल रही थी। उसके स्तन उछल रहे थे। मनीष हर धक्के को महसूस कर रहा था—मीरा का बदन उससे सटकर हिलता, उसकी चूत में लंड अंदर-बाहर होता। मीरा फुसफुसाई, “देख मनीष… महसूस कर… कितना गहरा जा रहा है… कितना मोटा… बोल ना… तेरी बीवी को कितना मज़ा आ रहा है… मैं अब उदयभान जी की रंडी हूँ… तेरी पत्नी अब उनकी है… तेरा छोटा लंड तो बस मेरी चूत को खुजली करता था… ये तो फाड़ रहा है…”
मनीष काँपते हुए बोला, “हाँ मीरा… बहुत मज़ा दे रहा है… मैं देख रहा हूँ… सब कुछ… कितना ज़ोर से पेल रहा है… तुझे कितना अच्छा लग रहा है…”
उदयभान ने और तेज़ किया। मीरा की चूत से रस बह रहा था, उदयभान के लंड पर चमक रहा था। आखिर में उदयभान ने जोर का धक्का मारा और अंदर ही झड़ गया। मीरा भी साथ में झड़ गई, “आआआह्ह… भर दो मुझे… पूरा माल अंदर डाल दो…”
सब शांत हो गया। मीरा मनीष की गोद में ही लेटी रही, सिर पीछे करके मनीष के कंधे पर। उदयभान आगे झुककर मीरा के होंठ चूम रहा था। मीरा मुस्कुराई, लेकिन उसकी भूख अभी बाकी थी।
कुछ मिनट बाद मीरा ने उदयभान की तरफ़ देखा। उसका लंड अभी भी आधा खड़ा था, रस और मीरा का माल मिलकर चमक रहा था। मीरा ने धीरे से मनीष की गोद से उठकर घुटनों पर बैठ गई। उदयभान के सामने। उसने लंड हाथ में लिया, सहलाया। फिर मुँह में लिया। इस बार और ज़ोर से, और गहराई से।
मीरा ने मनीष की तरफ़ देखकर कहा, “देख मनीष… अभी भी भूखी हूँ… तेरी बीवी अब रुकने वाली नहीं… ये लंड फिर से चूसूँगी… देख कितनी अच्छी चूसती हूँ… तू तो कभी इतना बड़ा नहीं था… ये तो मेरे गले तक जा रहा है…”
उदयभान कराहने लगा। मीरा ने ज़ोर-ज़ोर से चूसा, हाथ से सहलाया। “चूस रानी… और ज़ोर से… मेरे लंड को साफ़ कर… तेरा माल और मेरा माल मिला है… चाट ले…”
मीरा ने मुँह से निकाला, ऊपर देखकर बोली, “मनीष… देख ना… तेरी बीवी कितनी बेशर्म हो गई है… ये लंड चूस रही है… और तू बस देख… तेरी पत्नी अब किसी और की रंडी है… तेरा छोटा लंड तो कभी मेरे मुँह में भी फिट नहीं हुआ… ये तो पूरा भर रहा है…”
फिर फिर चूसने लगी। तेज़। गला तक। उदयभान ने उसके बाल पकड़े, मुँह में धक्के दिए। “आह्ह… ले… ले मेरा माल… चूस… और चूस…”
मीरा ने आँखें बंद करके चूसा। आखिर में उदयभान काँप उठा। “आह्ह… निकल रहा है…” मीरा ने मुँह नहीं हटाया। उदयभान ने उसके मुँह में ही झड़ दिया। गाढ़ा, गर्म माल मीरा के मुँह में भरा। मीरा ने सब निगल लिया, एक बूँद भी बाहर नहीं गिरने दी। फिर जीभ से लंड साफ़ किया।
मीरा ने मनीष की तरफ़ मुड़कर मुस्कुराई। “देखा मनीष… मैंने सब खा लिया… तेरी बीवी अब असली मर्द का माल खाती है… तेरा तो कभी इतना नहीं निकलता था… अब से यही होगा… मैं उदयभान जी का माल खाऊँगी… हमेशा…”
मनीष बस सिर हिलाया, उसकी आँखों में शर्म और संतुष्टि दोनों थे।
मीरा मुस्कुराई और बोली, “अब से जब भी भैंस गरम होगी… हम यहीं आएँगे। और अगली बार… शायद और ज़्यादा मज़ा लूँगी।”
जंगल में हवा फिर चलने लगी। भैंस चुपचाप खड़ी थी। और मीरा अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वो जान चुकी थी—असली सुख क्या होता है, और वो सुख अब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था।
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