मेरा नाम नाथूराम है, और मेरी उम्र अब 50 के पार हो चुकी है। मेरे घर में मेरे बेटे रोहित के अलावा और कोई नहीं है। उसकी माँ को गुज़रे हुए 8 साल हो चुके हैं, और मेरे माता-पिता का देहांत भी दो साल पहले हो गया था। अब सिर्फ मैं और रोहित ही बचे हैं। रोहित की उम्र 26 साल है, और वो देखने में ठीक-ठाक है। वो एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है। मैं चाहता था कि रोहित की शादी हो जाए, लेकिन वो इसके लिए तैयार ही नहीं था। फिर भी, परिवार वालों के दबाव में मैंने उसकी शादी एक खूबसूरत और घरेलू लड़की वंदना से करवा दी, हालाँकि रोहित का मन शादी के लिए बिल्कुल नहीं था।
शादी हो गई, मेहमान भी अपने-अपने घर चले गए। कुछ दिन बाद वंदना ने मुझसे अपने मायके जाने की इजाज़त माँगी। मैंने खुशी-खुशी उसे जाने की अनुमति दे दी, लेकिन ये शर्त रखी कि वो जल्दी लौट आएगी। पर 10 दिन बीत गए, और वो नहीं आई। मैंने रोहित को उसे लाने भेजा, लेकिन वो तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर नहीं आई। इस तरह एक महीना बीत गया। मैंने रोहित को कई बार वंदना को बुलाने को कहा, लेकिन वो टालती रही, जैसे ससुराल आने का उसका कोई इरादा ही नहीं था।
मेरे दोस्त और रिश्तेदार, जो अक्सर घर आते थे, वंदना के बारे में पूछते। उनके सवालों का जवाब देना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। मुझे ये भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वंदना ससुराल क्यों नहीं लौट रही। रोहित के सास-ससुर भी उसे भेजने को तैयार नहीं थे। आखिरकार, हारकर मैं खुद वंदना के मायके पहुँच गया। वहाँ मेरा स्वागत बड़े प्यार से हुआ। सब खुश दिख रहे थे, लेकिन मैं बातों-बातों में ये जानना चाहता था कि वंदना ससुराल क्यों नहीं आ रही।
रोहित के ससुर ने बस इतना कहा कि वंदना हर बार यही बोलती है कि वो कुछ दिन अपने मायके में रहना चाहती है, क्योंकि ससुराल में उसे जल्दी दोबारा आने का मौका नहीं मिलेगा। मैंने वंदना से भी बात की, लेकिन उसने वही घिसा-पिटा जवाब दोहराया। मेरा अनुभव मुझे कुछ और ही बता रहा था। मुझे शक था कि रोहित की कोई नाकामयाबी इसकी वजह हो सकती है। मैंने मन ही मन प्रार्थना की कि ऐसा न हो, जैसा मैं सोच रहा हूँ। फिर भी, मुझे सच जानना था।
मैंने वंदना से कहा, “बेटी, मैं तुम्हारे शहर आया हूँ, क्या तुम मुझे अपना शहर नहीं घुमाओगी?” वो खुशी-खुशी तैयार हो गई। मैंने उसके मम्मी-पापा से इजाज़त ली और वंदना के साथ स्कूटी पर निकल पड़ा। कुछ देर तक हम इधर-उधर की बातें करते हुए घूमते रहे। फिर मैंने उसे कहा कि मुझे ऐसी जगह ले चलो, जहाँ हम अकेले में बात कर सकें। पहले उसने टालने की कोशिश की, लेकिन मेरी ज़िद के आगे उसे मानना पड़ा। वो मुझे एक रेस्टोरेंट में ले गई। वहाँ भीड़ थी, तो हम जाने लगे। तभी मैनेजर ने हमें रोककर एक खाली केबिन की तरफ इशारा किया।
मुझे वही चाहिए था—एक ऐसी जगह जहाँ कोई डिस्टर्ब न करे। मैंने मैनेजर से कुछ स्नैक्स भेजने को कहा और वंदना के साथ केबिन में चला गया। कुर्सी पर बैठते ही मैंने उससे वही सवाल पूछा, “वंदना, तुम ससुराल क्यों नहीं लौट रही?” उसने फिर वही रटा-रटाया जवाब दिया। मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “बेटी, मैं ही रोहित का माँ-बाप हूँ। अगर उसकी माँ होती, तो वो तुमसे खुलकर बात करती। मुझे बताओ, क्या बात है? मुझे लगता है कि तुम दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ है, जो तुम मुझसे छुपा रही हो।”
वंदना ने मेरी बात काटते हुए कहा, “नहीं पापा, ऐसी कोई बात नहीं है।”
मैंने फिर कहा, “बेटी, कुछ तो बात है। नई-नवेली दुल्हन भला ससुराल से इतने दिन दूर कैसे रह सकती है?” मैंने उसके हाथ को फिर से पकड़ा और कहा, “वंदना, मुझे चाहे सास समझो, ससुर समझो, या दोस्त, जो भी समझना हो, लेकिन अपनी बात मुझसे शेयर करो। मैं अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को तुम्हारे न आने का कारण नहीं बता पा रहा।”
मैं उसकी आँखों में देखने लगा। उसकी आँखों के कोने में आंसू की बूंद चमकी। मैंने उस आंसू को अपनी उंगली से पोंछते हुए कहा, “वंदना, ये आंसू बता रहे हैं कि कुछ तो हुआ है, जिसकी वजह से तुम रोहित से दूर हो।” वो चुप रही, बस मुझे टकटकी लगाकर देखती रही।
मैंने उसके हाथ को सहलाते हुए कहा, “बेटी, मान लो कि तुम अपनी सहेली से बात कर रही हो। जो भी तुम्हारे दिल में है, मुझे बता दो, ताकि मैं तुम्हारी परेशानी दूर कर सकूँ।”
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उसने रूंधे गले से कहा, “मुझे तलाक चाहिए।”
मैं सन्न रह गया। “तलाक? ये क्या कह रही हो, वंदना?”
“हाँ पापा, मुझे तलाक चाहिए।”
“लेकिन क्यों, बेटी?”
“पापा, मैं कारण नहीं बता सकती, लेकिन मैं रोहित से तलाक चाहती हूँ।”
“बेटी, कोर्ट में भी तो कारण बताना पड़ेगा। और इससे तुम्हारे और मेरे परिवार को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। मुझे लगता है कि तुमने ये बात अपने मम्मी-पापा को भी नहीं बताई।”
मेरी बात सुनकर वंदना ने नज़रें झुका लीं। कुछ देर तक खामोशी छाई रही। फिर मैंने कहा, “वंदना, मैंने बड़ी उम्मीदों से रोहित की शादी करवाई थी, ताकि घर में एक औरत की कमी पूरी हो। लेकिन तुम बिना कारण बताए तलाक की बात कर रही हो। ज़रा सोचो, मैं लोगों को क्या जवाब दूँगा कि मेरे बेटे और बहू के बीच ऐसा क्या हुआ कि इतनी जल्दी तलाक की नौबत आ गई?”
वंदना बोली, “तो पापा, मैं क्या करूँ? मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है।”
मैं थोड़ा झल्ला गया। “रास्ता नहीं है? और तुम समस्या भी नहीं बता रही?”
वंदना की आँखें भीग गईं। रूंधी आवाज़ में बोली, “पापा, रोहित से शादी करने से बेहतर था कि मैं आप जैसे किसी अधेड़ मर्द से शादी कर लेती।”
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उसकी बात सुनकर मैं समझ गया कि रोहित ने मेरे नाम को मिट्टी में मिला दिया। मैं अब और बात आगे नहीं बढ़ा सकता था। तभी वंदना बोली, “पापा जी, एक बात पूछनी है।”
“हाँ, पूछो बेटी?”
“मान लीजिए, मैं अपने मम्मी-पापा और आपकी इज़्ज़त के लिए अपनी औरत वाली भावनाओं को दबा दूँ। लेकिन रोहित की गलती का इल्ज़ाम मैं अपने ऊपर क्यों लूँ?”
“मैं समझा नहीं?”
“क्षमा चाहती हूँ, पापा, बुरा न मानिए। मैं अपनी जिस्मानी भूख को मार भी दूँ, लेकिन अगर कल को हमारा बच्चा नहीं हुआ, तो लोग मुझे ही बाँझ कहेंगे। जबकि गलती मेरी नहीं होगी, फिर भी सजा मुझे मिलेगी।”
“हाँ, ये बात तो सही है, वंदना। लेकिन एक रास्ता ये भी है कि तुम और रोहित एक बच्चा गोद ले लो।”
“फिर मैं अपने मम्मी-पापा को क्या जवाब दूँगी? अगर वो पूछें कि तुमने बच्चा गोद क्यों लिया? अगर मैं सच बता दूँ, तो वो कहेंगे कि मैंने पहले क्यों नहीं बताया। और अगर न बताऊँ, तो रोहित की गलती की सजा मुझे?”
मैं चुप हो गया। तभी वंदना ने मेरे हाथ पकड़कर सहलाने शुरू किए। “पापा, मैं कल सुबह वापस जा रहा हूँ। अगर तुम मुझ पर भरोसा करो, तो मैं वादा करता हूँ कि तुम माँ भी बनोगी, और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम्हें औरत होने का अहसास भी मिलेगा। किसी को कुछ कहने का मौका नहीं मिलेगा।”
वंदना मुझे टकटकी लगाकर देखने लगी। शायद मैंने कुछ ज़्यादा ही बोल दिया था। मैं उससे नज़रें नहीं मिला पा रहा था। काफी देर तक खामोशी रही। जब वंदना ने कोई जवाब नहीं दिया, तो मुझे अपने पर गुस्सा आने लगा।
बात आगे नहीं बढ़ी, तो हम वापस चल दिए। रास्ते में मैंने उसे उसकी पसंद के कुछ कपड़े खरीदकर दिए और कहा, “बेटी, ये छोटा-सा गिफ्ट तुम्हारे पापा की तरफ से है।” घर पहुँचने के बाद वंदना से मेरा कोई सामना नहीं हुआ। मैं सोचता रहा कि शायद उसने मेरी बातों को बुरा मान लिया। रात के खाने में भी वो मेरे सामने नहीं आई। खाना खाते वक्त मैंने उसके मम्मी-पापा को बता दिया कि मैं सुबह चला जाऊँगा।
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अगले दिन सुबह सात बजे मैं सामान लेकर बाहर आया, तो देखा कि एक और बैग है। वंदना के पापा ऑटो ले आए थे, और वंदना साड़ी में सजी-धजी मेरे साथ चलने को तैयार थी। हमने अपने शहर के लिए बस पकड़ी। रास्ते में हमारी कोई बात नहीं हुई। बस चल रही थी, और हमारे हाथ आपस में टकरा रहे थे। कई किलोमीटर तक हम चुप रहे। मैं जानना चाहता था कि वंदना ने मेरी बातों को किस अर्थ में लिया।
मैंने उसका हाथ पकड़ा, सहलाते हुए कहा, “वंदना, थैंक्स। तुम्हारे इस अहसान का बदला नहीं चुका सकता। लेकिन ये बताओ, तुम मेरी बात का सही मतलब समझकर मेरे साथ आई हो ना?”
वंदना ने मेरी तरफ देखा और बोली, “पापा, कहते हैं ना कि इंसान अपना भाग्य खुद बनाता है। मैं भी आज अपना भाग्य बनाने आपके साथ चल रही हूँ। मैं अपने मम्मी-पापा पर फिर से बोझ नहीं डालना चाहती।”
“वंदना, अगर ऐसी बात है, तो तुम रोहित से तलाक ले सकती हो। मैं तुम्हारा सारा खर्च उठाऊँगा।”
“फिर आपने ऐसा क्या पाप किया कि आप हर जगह पैसा खर्च करें, और बदनामी भी आपको मिले?”
“तो मैं समझूँ कि तुम्हारे मन में कोई बोझ नहीं है?”
उसने बस के आसपास देखा, फिर मेरा हाथ चूमते हुए बोली, “पापा, ये सबूत है कि मुझे कोई अफसोस नहीं।”
मैंने भी उसका हाथ चूमकर कहा, “वंदना, समाज के सामने हमारा रिश्ता जो भी हो, लेकिन आज से हम एक-दूसरे के दिल में रहेंगे। बस तुम्हें धैर्य रखना होगा। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी सुहागरात वैसी हो, जैसी तुमने सपने में सोची होगी।”
पूरे रास्ते हमारे हाथ एक-दूसरे से अलग नहीं हुए। घर पहुँचते ही रोहित ने दरवाजा खोला। वंदना को देखकर वो खुशी से झूम उठा और उसे बाहों में भर लिया। कुछ देर तक दोनों एक-दूसरे से चिपके रहे। फिर वंदना मेरे सीने से लिपट गई। रोहित भी मेरे गले लग गया। मेरा एक हाथ रोहित के सिर को सहला रहा था, तो दूसरा वंदना की पीठ से लेकर उसके चूतड़ों तक फिसल रहा था। कुछ देर तक हम बातें करते रहे, फिर मैंने रोहित को होटल से खाना लाने भेज दिया।
रोहित के जाते ही मैंने वंदना को कुछ पैसे दिए और कहा, “तुम अपनी सुहागरात की तैयारी करो। जिस रात मौका मिलेगा, वो तुम्हारे जीवन की सबसे सुखद रात होगी।”
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15-20 दिन बीत गए, लेकिन हमें कोई मौका नहीं मिला। वंदना की नज़रें हर सुबह-शाम मुझसे सवाल करती थीं। इस बीच वो और रोहित हनीमून के बहाने घूमने भी गए, लेकिन वंदना की फोन पर धीमी “नमस्ते पापा” मेरे दिल में चुभती थी। मैंने उसे छुआ नहीं, और उसने भी मुझे छूने की कोशिश नहीं की। तभी एक दिन रोहित ने बताया कि उसे अपने बॉस के साथ अगले दिन सुबह जाना है और दूसरी रात को वो लौटेगा।
मेरे मन में खुशी की लहर दौड़ गई। मैंने वंदना की तरफ देखा, तो उसने नज़रें झुकाकर अपने पैरों से ज़मीन खोदना शुरू कर दिया। अगले दिन रोहित सुबह 10 बजे निकल गया। उसके जाते ही वंदना मुझसे लिपट गई और बोली, “पापा, आज की रात के लिए मैं कितनी रातों से बेचैन थी।”
“जाओ वंदना, अपनी तैयारी करो। मैं बेडरूम सजवाता हूँ।”
मैंने उससे उसकी ब्रा और पैंटी का साइज़ पूछा। उसने सहजता से कहा, “80 साइज़ की ब्रा और 85 साइज़ की पैंटी।” मैं बाहर गया, उसके लिए एक सोने का हार, उसी साइज़ की ब्रा-पैंटी और ढेर सारे फूल खरीद लाया। घर लौटकर मैंने सब उसे दे दिया। फूल देखकर वो बहुत खुश हुई। मैंने उसे ब्यूटी पार्लर जाने को कहा।
जाते वक्त वंदना बोली, “पापा, आज आपको एक दुल्हन ही मिलेगी!”
मैंने जवाब दिया, “और तुम्हें एक दूल्हा, जो आज रात तुम्हें कली से फूल और लड़की से औरत बनाएगा।”
वंदना शरमाते हुए बाहर चली गई। मैंने बेडरूम में सफेद चादर बिछाई और उस पर गुलाब, चमेली और मोगरे के फूल बिखेर दिए। दो-तीन घंटे बाद वंदना ब्यूटी पार्लर से लौटी। उसके चेहरे पर नई दुल्हन सी चमक थी।
शाम के सात बजे थे। हम दोनों के मन में जिस्मानी मिलन की बेचैनी थी। खाना खाने के बाद मैंने वंदना से कहा कि वो दुल्हन की पोशाक पहनकर मेरे कमरे में मेरा इंतज़ार करे। साढ़े आठ बजे मैं शेरवानी पहनकर दूल्हे के गेटअप में कमरे में दाखिल हुआ। दरवाज़ा बंद करके मैंने पलंग की ओर देखा। वंदना दुल्हन के लिबास में सिकुड़ी-सी बैठी थी। कमरे में मेरी सुहागरात जैसी खुशबू थी।
मैं उसके पास बैठा और उसके हाथों पर अपने हाथ रखे। शायद पहली बार मैंने उसे इस तरह छुआ था, तो वो और सिकुड़ गई। मैंने फिर उसका हाथ पकड़ा, लेकिन वो फिर पीछे हटी। मैंने उसका घूंघट उठाया और उसकी ठुड्डी को ऊपर करते हुए कहा, “वंदना, तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”
वो मेरी तरफ देखने लगी। मैंने उसे सोने का हार देते हुए कहा, “ये खूबसूरत दुल्हन के लिए गिफ्ट।”
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वंदना की नज़रें हार पर टिक गईं। “कैसा लगा?” मैंने पूछा।
“बहुत खूबसूरत,” उसने जवाब दिया।
मैंने उसके सीने पर सिर टिकाकर उसकी धड़कनों को सुना। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, साँसें भी तेज़ थीं। मैंने उसका पल्लू हटाया, उसकी नथ उतारी, और धीरे-धीरे उसके सारे गहने उतारकर किनारे रख दिए। फिर उसे अपनी बाहों में भर लिया। वंदना ने भी मुझे कसकर जकड़ लिया।
“वंदना, तैयार हो?” मैंने पूछा।
“हम्म,” उसने हल्के से जवाब दिया।
मैंने उसे धीरे से बिस्तर पर लिटाया। उसकी साड़ी को सीने से हटाते हुए मैंने उसके उरोजों को चूमा। पेटीकोट का नाड़ा खोलकर मैंने अपना हाथ उसकी चूत पर फेरना शुरू किया। उसकी चूत पहले से ही गीली थी। मैंने उसके कान को दाँतों से काटते हुए कहा, “वंदना, तुम तो पहले से ही पानी छोड़ चुकी हो।”
“पापा, सुबह से बस आपके बारे में सोच रही थी। जैसे ही आपने छुआ, मैं गीली हो गई। प्लीज़, ऐसे ही सहलाते रहिए, बहुत अच्छा लग रहा है,” उसने कहा।
वंदना ने अपने पैर सिकोड़कर टाँगों के बीच थोड़ा गैप बनाया। मैंने उसके अनारदानों को मसलना शुरू किया, उंगली को अंदर डालने की कोशिश की। उसके ब्लाउज़ के ऊपर से मैंने उसके खरबूजों को मुँह में लिया, बारी-बारी से चूसा और मसला। फिर ब्लाउज़ और ब्रा उतारकर उसके छोटे-छोटे निप्पलों पर जीभ फेरी, उन्हें हल्के से काटा। वो “सीईईई” करके सिहर उठी। मैं उसकी नाभि और पेट पर जीभ फिराने लगा।
“पापा, बहुत चुनचुनाहट हो रही है, कुछ कीजिए ना!” वंदना ने सिसकारी भरी।
मैंने पहले अपने कपड़े उतारे, फिर वंदना के बचे-खुचे कपड़े हटाकर उसे पूरी तरह नंगा कर दिया। उसकी चूत चिकनी और गुलाबी थी। मैंने दो तकिए लिए और उसकी कमर के नीचे रखकर उसकी चूत को अपनी कमर की ऊँचाई तक उठाया। अपने लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रगड़ते हुए मैंने कहा, “वंदना, थोड़ा दर्द होगा, तैयार हो ना?”
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“पापा, आप करो, मैं बर्दाश्त कर लूँगी,” उसने जवाब दिया।
मैं उसके ऊपर झुका और अपने 7 इंच के मोटे लंड को उसकी चूत में धीरे-धीरे डालने लगा। जैसे ही लंड अंदर गया, वंदना की चीख निकल गई। “आआह्ह… पापा, धीरे!” वो मुझे नोचने लगी, मुझे धक्का देकर हटाने की कोशिश करने लगी। लेकिन मैंने उसकी बात अनसुनी की और लंड को धीरे-धीरे और अंदर पेलता गया। उसकी चूत टाइट थी, और मेरे लंड को जगह बनाने में वक्त लग रहा था।
“पापा, प्लीज़, बहुत दर्द हो रहा है! छोड़ दीजिए, मैं मर जाऊँगी!” वंदना चिल्लाई, उसकी आँखों में आँसू थे।
मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और लंड को पूरा अंदर डाल दिया। उसकी सील टूट चुकी थी, क्योंकि मेरा लंड चिपचिपा हो गया था। मैं रुका, उसके आँसुओं को चूमा, उसके होंठों को चूसा, और उसके निप्पलों पर जीभ फेरी। कुछ देर बाद वंदना की कमर हिलने लगी। वो धीरे-धीरे अपनी चूत को मेरे लंड पर सेट करने लगी। “पापा, अब फिर चुनचुनाहट हो रही है… आआह्ह,” उसने सिसकारी भरी।
मैंने धीरे-धीरे लंड को अंदर-बाहर करना शुरू किया। उसकी चूत की टाइटनेस कम होने लगी, और मेरी स्पीड बढ़ने लगी। थप-थप की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। “हाँ पापा… ओह्ह… ऐसे ही… बहुत मज़ा आ रहा है!” वंदना की सिसकारियाँ तेज़ हो गईं। मैं उसके खरबूजों को चूस रहा था, उसके होंठों को काट रहा था, और उसकी कमर को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के मार रहा था।
कई साल बाद मुझे चूत चोदने का मौका मिला था, वो भी रोहित की नाकामी की वजह से। मैं थकने लगा था, साँसें फूल रही थीं। मैंने अपना वजन वंदना पर डाला और उसके निप्पलों को चूसते हुए धक्के मारने लगा। जब मुझे लगा कि मेरा वीर्य निकलने वाला है, मैंने स्पीड और बढ़ा दी। “वंदना, मेरा निकलने वाला है… आह्ह!”
“पापा, मेरी चूत में ही छोड़ दीजिए… ओह्ह… मैं भी झड़ रही हूँ!” वंदना चीखी।
मेरे लंड ने पिचकारी छोड़ दी, और वंदना भी उसी वक्त झड़ गई। उसका गर्म पानी मेरे लंड को भिगो रहा था। मैं हाँफते हुए उसके नंगे जिस्म पर गिर गया। कई मिनट तक मेरा लंड उसकी चूत में ही रहा। फिर मैं उसके बगल में लेट गया।
वंदना मुझसे चिपक गई। कुछ देर बाद वो कसमसाने लगी। “पापा, छोड़ दीजिए ना… पेशाब आ रही है।”
मैंने उसे और कसकर जकड़ा। “पापा, प्लीज़… बिस्तर गीला हो जाएगा!”
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मैंने उसे छोड़ा, तो वो चादर से अपने जिस्म को ढकने लगी। मैंने चादर खींच ली और कहा, “अब क्या शरमाना? अब हम पति-पत्नी जैसे हैं। नंगी ही बाथरूम जाओ।”
वो लंगड़ाते हुए बाथरूम भागी। उसके कूल्हे ऊपर-नीचे हो रहे थे। कुछ देर बाद वो लौटी और बोली, “पापा, पेशाब करते वक्त जलन हुई। मैंने देखा, तो हल्का खून भी आ रहा था।” उसने अपनी चूत की तरफ इशारा किया।
मैंने उसे अपने पास खींचा और कहा, “अगर मैं इतना मज़बूत न होता, तो तुम्हें मज़ा नहीं आता।”
वो चुप हो गई, फिर बोली, “पापा, अभी भी जलन हो रही है।”
मैंने क्रीम निकाली और उसकी चूत में अच्छे से लगाई। “अब कैसा लग रहा है, बेटी?”
“पापा, बहुत अच्छा लगा। आपने मेरी हर उम्मीद पूरी की। मेरा पानी दो बार निकला, लेकिन आप तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।”
“चलो, अब हमारी सुहागरात हो चुकी है। जब भी तुम चाहोगी, मैं तुम्हें सुख दूँगा।”
“थैंक्स, पापा।”
“अब ये बताओ, रोहित ने सुहागरात में क्या किया?”
वंदना उदास हो गई। “कुछ नहीं, पापा। कमरे में आते ही उसने जल्दी-जल्दी मेरे और अपने कपड़े उतारे, मुझे इधर-उधर चूमा, और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उसका पानी निकल गया। वो बगल में लेटकर सो गया। मैं पूरी रात रोती रही।”
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“कोई बात नहीं, वंदना। आज तुम्हारी रात सुखद होगी।”
मैंने उसे बिस्तर पर खड़ा होने को कहा। उसका दूधिया जिस्म चमक रहा था। उसकी जाँघ पर एक तिल था। “पापा, मुझे ऐसे क्यों घूर रहे हैं?” उसने पूछा।
“तुम्हारे खूबसूरत जिस्म को देख रहा हूँ। ऊपरवाले ने तुम्हें बहुत फुरसत से बनाया है।”
“नहीं पापा, आपकी वजह से मेरा जिस्म खूबसूरत हुआ। वरना ये मुझे बोझ लगता था।”
मैंने उसकी नाभि पर चूमा और कहा, “मुझे माफ करो, वंदना। मेरी वजह से तुम्हें रोहित जैसा पति मिला।”
“लेकिन आप जैसा ससुर भी मिला, जिसने मेरे सारे दुख एक रात में दूर कर दिए।” वो मेरी गोद में बैठ गई। मेरे हाथ फिर से उसकी चूत पर चलने लगे। मैं उसकी गर्दन चूम रहा था, उसके कान काट रहा था। उसने मेरे एक हाथ को पकड़कर अपनी चूची पर रख दिया। अब मेरा एक हाथ उसकी चूत सहला रहा था, दूसरा उसकी चूची मसल रहा था।
“पापा, फिर से खुजली शुरू हो गई… आह्ह!” वंदना ने सिसकारी भरी।
मैंने उसे लिटाया और लंड उसकी चूत में पेल दिया। इस बार लंड आसानी से अंदर चला गया। वंदना ने अपनी टाँगें और चौड़ी कर लीं। मैं ज़ोर-ज़ोर से धक्के मार रहा था। “आह्ह… पापा… और ज़ोर से… ओह्ह!” उसकी सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं। थप-थप की आवाज़ तेज़ हो रही थी। मैंने उसकी टाँगें हवा में उठाईं और लंड को और गहराई तक पेला। उसकी चूत और टाइट हो गई। “आआह्ह… पापा, धीरे… दर्द हो रहा है!”
मैं थकने लगा था, तो मैंने उसे अपने ऊपर लिया। वंदना मेरे लंड पर बैठकर उछाल मारने लगी। उसके चूचे हवा में लहरा रहे थे। “पापा, मेरा फिर निकलने वाला है… ओह्ह!”
“वंदना, मेरी पिचकारी भी छूटने वाली है… आह्ह!”
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हम दोनों एक साथ झड़ गए। वो मेरे ऊपर गिर पड़ी। कुछ देर बाद वो अलग हुई और बोली, “पापा, आपने मेरी भूख मिटा दी।”
थोड़ी देर बाद मैंने कहा, “वंदना, अब हमारी सारी मर्यादाएँ टूट चुकी हैं।”
“हाँ पापा, लेकिन ये मर्यादाएँ सिर्फ बिस्तर पर टूटेंगी। बाहर मैं आपकी बहू-बेटी ही रहूँगी।”
मुझे नींद आने लगी। मैंने करवट बदली। वंदना ने अपने चूतड़ मेरी जाँघों के बीच फंसाए और मेरे हाथ को अपनी चूची पर रख दिया। उसकी गर्मी की वजह से मेरी नींद उड़ गई। मैंने आँखें बंद करने की कोशिश की, लेकिन उसका गर्म जिस्म मुझे बेचैन कर रहा था।
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि वंदना उठकर बैठ गई। उसने अपने बालों का जूड़ा बनाया और मेरे लंड को देखने लगी। “पापा, आपका लंड रोहित के लंड से दुगुना लंबा और मोटा है। रोहित का लंड तो मेरी हथेली में गुम हो जाता है, लेकिन आपका लंड समाता ही नहीं।” उसने मेरे लंड को चूमा, सुपारे पर जीभ फेरी। “पापा, थैंक्स। मुझे अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं।”
वो बाथरूम चली गई। लौटकर वो मेरे लंड को फिर से निहारने लगी। उसने मेरे लंड को मुँह में लिया और चूसने लगी। मैं चुपचाप उसकी हरकतें देख रहा था। उसने मेरे टट्टों को सहलाया, सुपारे को चाटा। अचानक मेरा वीर्य उसके मुँह में छूट गया। वो हड़बड़ा गई, लेकिन मेरे लंड को चाटती रही। फिर वो शीशे के सामने गई और मेरे वीर्य को अपने चेहरे, चूचियों और चूत पर मलने लगी। मेरे पास आकर बोली, “पापा, आपने मुझे कली से फूल बना दिया। लेकिन… मैं आपके जागते हुए आपके लंड को चूसना चाहती हूँ।”
मैंने करवट बदली और सो गया। सुबह वंदना ने मुझे जगाया। उसने पीली साड़ी, पीली बिंदी, पीली लिपस्टिक और पीली चूड़ियाँ पहनी थीं। वो बहुत सुंदर लग रही थी। उसने चाय का कप थमाया। मैंने चाय ली, और उसने मेरे पैर छुए। मैंने कहा, “दूधो नहाओ, पूतो फलो।”
वो मुस्कुराई और बोली, “अब मैं पूतों से फलूँगी, क्योंकि आपके दूध का आशीर्वाद मिल गया।”
“रोहित का फोन आया था?” मैंने पूछा।
“हाँ पापा, वो रात तक आएगा। आप नहा लें, मैं नाश्ता बनाती हूँ।”
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मैं बाथरूम में गया। नहाकर तौलिया लपेटे बाहर आया। वंदना रसोई में थी, उसका पल्लू कमर में खोंसा हुआ था। उसकी चिकनी कमर देखकर मेरा लंड फिर तन गया। मैं चुपके से रसोई में गया और उसे पीछे से पकड़ लिया। उसकी चूचियों को ब्लाउज़ के ऊपर से दबाते हुए मैंने कहा, “नहा तो लिया, लेकिन अब मेरी गुड़िया मुझे प्यार करे।”
वंदना ने कहा, “पापा, मैं कैसे करूँगी?”
“तुम आजकल की लड़की हो, तुम्हें पता होगा कि मर्द को कैसे खुश करते हैं।”
मैंने उसे अपने ऊपर खींचा और कहा, “वंदना, मुझे ऐसा प्यार करो कि मैं तुम्हारा गुलाम हो जाऊँ।”
वंदना ने मेरे होंठों पर हल्की-सी पप्पी दी। फिर वो मेरे होंठों को चूसने लगी, मेरी जीभ को अपने मुँह में लेकर चाटने लगी। उसने मेरे गाल पकड़े और ज़ोर-ज़ोर से मेरे होंठ चूसने लगी। फिर वो नीचे खिसकी और मेरे निप्पलों को चूसने, काटने लगी। उसकी आँखों में कामवासना चमक रही थी।
उसने अपनी साड़ी और ब्लाउज़ उतार दी। उसकी पीली ब्रा उसके उरोजों को और उभार रही थी। उसने ब्रा उतारी और अपने चूचों को मेरे निप्पलों पर रगड़ने लगी। फिर वो मेरी जाँघों पर बैठ गई और मेरे पेट पर जीभ फेरते हुए मेरे लंड को मुठ मारने लगी। “पापा, मज़ा आ रहा है ना?” उसने पूछा।
“हाँ, वंदना… बहुत मज़ा आ रहा है। बस ऐसे ही प्यार करो,” मैंने सिसकारी भरी।
वो मेरे लंड को चूसने लगी, मेरे टट्टों को सहलाने लगी। उसने अपनी गांड मेरी तरफ कर दी। मैं उसकी चूत में उंगली डालने लगा। वो 69 की पोज़िशन में आ गई। मैंने उसकी गुलाबी चूत को चाटना शुरू किया। उसका नमकीन-कसैला स्वाद मेरी जीभ पर चढ़ गया। “आआह्ह… पापा… और चाटिए… ओह्ह!” वो सिसक रही थी।
मैं उसकी चूत की फांकों को मसल रहा था, उसकी गांड में उंगली फेर रहा था। वो मेरे लंड को चटखारे लेकर चूस रही थी। अचानक उसने मेरे सुपारे को हल्के से काट लिया। “आह्ह… वंदना, धीरे!” मैंने कहा।
वो मेरे ऊपर बैठ गई और मेरे लंड को अपनी चूत में लेने की कोशिश करने लगी। लेकिन लंड बार-बार फिसल रहा था। मैंने लंड को उसकी चूत के मुहाने पर सेट किया और कहा, “धीरे-धीरे दबाव डालो।” वो उछलने लगी। उसके चूचे हवा में लहरा रहे थे। “आआह्ह… पापा… बहुत मज़ा आ रहा है!”
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मुझे लगा कि मेरा वीर्य निकलने वाला है। “वंदना, माँ कब बनना चाहती हो?”
“पापा, अभी नहीं… मुझे आपके लंड के साथ और खेलना है!”
मैंने उसे अपने नीचे लिया और 8-10 ज़ोरदार धक्के मारे। मेरा वीर्य उसकी चूत के ऊपर छूट गया। वो अपने हाथों से मेरे वीर्य को पोंछने लगी। फिर वो शीशे के सामने गई और अपनी चूत को देखने लगी। उसने अपनी पैंटी से पहले मेरे लंड को साफ किया, फिर अपनी चूत को। फिर वो साड़ी पहनकर बाथरूम चली गई।
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Daughter-in-law, Father-in-law, Suhagrat Chudai