मेरा नाम वरुण है और आज मैं 23 साल का हूँ, ये कहानी मैं पहली बार लिख रहा हूँ जो मेरी जिंदगी की सबसे यादगार घटना है। ये सब अगस्त 2023 के आसपास हुआ था जब मैं 20 साल का था और 12वीं के एग्जाम के बाद लंबी छुट्टियों में कई सालों बाद दिल्ली अपनी मासी के घर गया था। बचपन से ही मासी का घर मेरे लिए दूसरा घर जैसा था, वहाँ की हवा, वहाँ के लोग और खासकर मासी की तीन बेटियाँ जो मुझसे काफी बड़ी हैं, सब कुछ पुरानी यादों से भरा हुआ। सबसे बड़ी दीदी शादीशुदा थीं, तीसरी वाली कॉलेज में बिजी रहतीं और बीच वाली रेनू दीदी, जो उस समय 27 साल की थीं, घर पर ही जॉब करतीं और घर संभालतीं। रेनू दीदी हमेशा से मेरी फेवरेट रही हैं, गोरी-चिट्टी, लंबे बाल, भरी हुई बॉडी, बड़ी-बड़ी चुचियाँ और उभरी हुई गांड, देखकर ही मन में कुछ-कुछ होता था। लेकिन कभी सोचा नहीं था कि ये रिश्ता इतना आगे बढ़ जाएगा।
बचपन की यादें तो जैसे कल की बात लगती हैं। जब मैं 7-8 साल का था, तब मैं तीनों दीदियों के साथ खेलते हुए बिना समझे लिप लॉक किस कर लेता था। रेनू दीदी सबसे ज्यादा मुझे चिढ़ातीं, लेकिन प्यार से गले लगातीं। मासी डाँटतीं, “रेनू, तुम क्या कर रही हो इस छोटे बच्चे के साथ, ये नासमझ है, मत बिगाड़ो इसे।” लेकिन तब मुझे कुछ पता नहीं चलता था, बस मजा आता था। फिर सालों तक मैं नहीं गया, पढ़ाई, घर के कामों में बिजी रहा। लेकिन इस बार जब मैं दिल्ली पहुँचा, ट्रेन से उतरते ही मासी ने गले लगाया और रेनू दीदी कार लेकर आईं। रास्ते में हम बातें करते आए, दीदी बोलीं, “वरुण, कितना बड़ा हो गया है तू, अब तो जवान लड़का लगता है।” मैं हँसा और कहा, “दीदी, आप तो वैसी ही हो, और भी खूबसूरत।” घर पहुँचकर सबने स्वागत किया, शाम को चाय-नाश्ता हुआ, लेकिन मेरी नजरें बार-बार रेनू दीदी पर जातीं। रात को सोने का इंतजाम एक ही बड़े कमरे में था, सब मैट्रेस बिछाकर सोते थे। मैं किनारे पर लेटा, रेनू दीदी मेरे बगल में। रात गहरी होने लगी, सब सो चुके थे, लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं पुरानी यादों में खोया था, सोच रहा था कि काश बचपन में ये सब समझता तो कितना मजा आता। कभी-कभी टॉयलेट जाकर मुठ मार लेता, लेकिन आज मन कुछ ज्यादा उछल रहा था।
पहली रात का वो पल मेरी जिंदगी बदल गया। मैं आँखें बंद करके लेटा था, तभी महसूस हुआ कि रेनू दीदी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा, मैं सोने की एक्टिंग करने लगा, लेकिन शरीर में电流 दौड़ गई। दीदी ने मेरा हाथ अपनी कुर्ती के ऊपर से अपनी चुचियों पर रखा, वो इतनी नरम और गरम थीं कि मेरा लंड पैंट में तन गया। उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और जोर-जोर से दबवाने लगीं, जैसे खुद को मसल रही हों। मैं हैरान था, लेकिन रोक नहीं पाया, धीरे-धीरे दबाने लगा। दीदी की साँसें तेज हो गईं, वो धीरे से फुसफुसाईं, “आह्ह… वरुण… दबा ना अच्छे से, दीदी की चुचियाँ तेरे लिए हैं…”। मैंने और जोर लगाया, निप्पल्स सख्त हो चुके थे। फिर उन्होंने मेरा हाथ नीचे सरकाया, सलवार के ऊपर से चूत पर रखा और रगड़वाने लगीं। चूत गरम और गीली महसूस हो रही थी, सलवार भीग चुकी थी। मैंने उंगली से दबाया, दीदी सिहर उठीं, “ओह्ह… ह्ह्ह… वरुण, दीदी की चूत को सहला… ऐसे ही, दीदी की कुंवारी चूत गीली हो गई…”। फिर उन्होंने सलवार का नाड़ा ढीला किया, मेरा हाथ अंदर डाला, पैंटी के ऊपर से चूत पर रखा और मेरी उंगली को अंदर धकेल दिया। चूत चिकनी और रसीली थी, उंगली आसानी से फिसल गई, मैं अंदर-बाहर करने लगा। दीदी की कमर हिलने लगी, “आह्ह… इह्ह… वरुण, उंगली से चोद दीदी की चूत… तेज… हाँ ऐसे… ओह्ह दीदी झड़ने वाली है…”। कुछ ही पलों में दीदी झड़ गईं, उनकी चूत से गर्म रस बह निकला, हाथ गीला हो गया। उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और सो गईं, लेकिन मैं रातभर जागता रहा, सोचता रहा कि ये सपना था या हकीकत।
अगला दिन मुश्किल था। सुबह उठा तो रेनू दीदी नॉर्मल लग रही थीं, लेकिन मुझे देखकर मुस्कुरातीं। मैं शरमा जाता, आँखें चुराता। दिनभर घर में घूमता रहा, लेकिन मन उसी रात में अटका था। सोचता कि आज रात भी कुछ होगा, लेकिन डर भी लगता। शाम को सब लोग टीवी देख रहे थे, दीदी मेरे पास बैठीं, धीरे से मेरी जांघ पर हाथ रखा, लेकिन मैं हट गया। रात हुई, सब सो गए। मैंने पहले से हाथ उनके बिस्तर पर रख दिया, इंतजार में। लेकिन दीदी ने हाथ नहीं पकड़ा, बल्कि मुझे कंधे से हिलाकर जगाने लगीं। मैं एक्टिंग करता रहा, तो वो गुस्से में मेरा हाथ जोर से फेंक दीं और मुंह फेरकर सो गईं। मुझे बुरा लगा, लेकिन सेक्स की आग लग चुकी थी। मैंने हिम्मत की, उनके गाल पर हाथ रखा, वो आँखें बंद किए गुस्से में थीं। मैं पास सरका और अचानक उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, जोर से चूसने लगा। पहले तो दीदी हिली नहीं, लेकिन फिर पिघल गईं और मुझे जोर से किस करने लगीं। हमारी जीभें एक-दूसरे से लड़ने लगीं, गीली किस की आवाजें धीरे-धीरे आ रही थीं, “ग्ग्ग्ग… गी… गी…”। दीदी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “कल रात तो तू बहुत हिम्मती था, आज क्यों सोने की नाटक कर रहा था?” मैंने शरमाते हुए कहा, “दीदी, मुझे लगा आप सिर्फ हाथ इस्तेमाल करोगी, मैं डर गया था।” वो हँसीं, “पता था मुझे तू जाग रहा है, अब आ जा, दीदी तेरी है।” हम फिर किस करने लगे, मैंने कुर्ती के ऊपर से चुचियाँ दबाईं, निप्पल्स को चुटकी में लिया। दीदी गरम हो गईं, “आह्ह… वरुण, दीदी की चुचियाँ मसल… हाँ ऐसे… ओह्ह दीदी की चूत फिर भीग गई…”। मैंने उंगली चूत में डाली, अंदर-बाहर की, लेकिन दीदी मेरे लंड को इग्नोर कर रही थीं। मैंने उनका हाथ पकड़कर पैंट पर रखा, लंड पर दबाया। दीदी ने मसला, “ओह्ह वरुण, तेरा लंड कितना मोटा और सख्त है… दीदी के लिए इतना तना हुआ…”। लेकिन फिर बोलीं, “आज बस इतना, किसी और दिन पूरा करेंगे, सो जा अब।” हम सो गए, लेकिन ये खेल 3-4 दिन चलता रहा – किस, चुचियाँ दबाना, उंगली से चोदना, लेकिन चुदाई का नाम नहीं। हर रात तनाव बढ़ता जाता, मैं दीदी को और चाहने लगा।
फिर वो सुनहरा दिन आया जब घर में सिर्फ हम दोनों अकेले थे। मासी और बाकी सब बाहर शॉपिंग गए थे, दिन का समय था, धूप चढ़ रही थी। रेनू दीदी बेडरूम में लेटी थीं, पतली सलवार-कुर्ती पहने, मैं उनके पास जाकर लेट गया। बातें शुरू हुईं, पुरानी यादें, हँसी-मजाक। अचानक दीदी बोलीं, “वरुण, करेगा?” मैंने पूछा, “क्या दीदी?” वो शरमाकर बोलीं, “ज्यादा बन मत, वही जो रातों में करता है, लेकिन अब पूरा।” मेरा दिल उछल पड़ा, दीदी ने लाइट बंद की, पर्दे गिराए और मुझे अपने ऊपर खींच लिया। लंबी गीली किस शुरू हो गई, मैं चुचियाँ दबा रहा था, कुर्ती के बटन खोलने लगा। दीदी ने अपना हाथ मेरे पैंट में डाला, लंड पकड़ा, “आह्ह… वरुण, तेरा लंड तो लोहे जैसा है… दीदी की चूत फाड़ देगा…”। मैंने पैंट उतार दी, लंड बाहर निकाला। दीदी ने उसे सलवार के ऊपर से चूत पर रगड़ा, “ओह्ह… ऐसे रगड़… दीदी की चूत जल रही है तेरे लिए…”। मैंने कहा, “दीदी, ऐसे नहीं जाएगा, सलवार उतारो।” वो थोड़ा डरीं, “नहीं वरुण, पहली बार है, दर्द होगा।” मैंने समझाया, “मेरे फोन में पॉर्न है, देखकर सीखते हैं।” दीदी मान गईं, मैंने वीडियो लगाया – एक जोड़ा सेक्स कर रहा था। दीदी देखते-देखते गरम हो गईं, मैं कुर्ती ऊपर करके चुचियाँ दबा रहा था। वीडियो में लड़का चुचियाँ चूस रहा था, दीदी बोलीं, “वरुण, कर ना, दीदी की चुचियाँ चूस।” मैंने ब्रा खोली, गुलाबी निप्पल्स पर मुंह लगाया, जोर-जोर से चूसा, “ग्ग्ग्ग… गी… गों…” की आवाजें, दीदी की कमर उछल रही थी, “आह्ह… ह्ह्ह… वरुण, चूस ले… दीदी की चुचियाँ तेरी हैं… ओह्ह कितना मजा…”।
वीडियो में लड़की लंड चूस रही थी, मैंने कहा, “दीदी, तुम भी करो।” वो बोलीं, “नहीं, गंदा लगता है।” मैंने मनाया, “दीदी, आपने कहा तो मैंने किया, अब चूसो ना मेरा लंड।” काफी बहस के बाद बोलीं, “ठीक है, बस टॉप पर किस करूँगी, पूरा मुंह में नहीं।” लेकिन जैसे ही जीभ लगाई, “उम्म… अच्छा है…” और धीरे-धीरे पूरा लंड मुंह में ले लिया, “ग्ग्ग्ग… गी… गी… गों… गोग…” की आवाजें गूँज रही थीं। मैंने कहा, “दीदी, आप तो मना कर रही थीं।” वो बोलीं, “मस्त है रे, दीदी तेरे लंड को चूसकर मजा ले रही है…”। मैं झड़ने लगा, बोला “रुको”। दीदी बोलीं, “झड़ जा मेरे मुंह में, दीदी पी लेगी तेरे लंड का रस…”। मैंने मुंह में गिराया। फिर मैंने उनकी सलवार-पैंटी उतारी, चूत चाटने लगा, उंगली डाली, जीभ से चोदा। दीदी चीखीं, “आह्ह… ओह्ह… वरुण, चाट दीदी की चूत… ह्ह्ह… इह्ह… ऊई… दीदी झड़ रही है… तेरी जीभ कमाल है…”। हम दोनों झड़ गए, लेकिन तभी बाहर से आवाज आई, मासी आ गईं। हमने जल्दी कपड़े ठीक किए, लेकिन मन अधूरा रह गया।
शाम को मैंने प्लान बनाया। मासी से कहा, “मासी, यहाँ मच्छर बहुत हैं, मैं दूसरे कमरे में सोऊँगा।” रेनू दीदी ने तुरंत कहा, “हाँ माँ, मैं भी वहाँ सोऊँगी, अकेले डर लगता है।” मासी ने हँसकर हाँ कर दी। रात का इंतजार जैसे सदियाँ लग रही थीं। आखिर रात हुई, हम दूसरे कमरे में गए, दरवाजा बंद किया। सब सो चुके थे, मैं उठा, दीदी के पास गया। किस शुरू हुई, मैंने कुर्ती उतारी, ब्रा खोली, सलवार-पैंटी नीचे सरकाई, खुद भी नंगा हो गया। दीदी लेटीं, मैं चुचियाँ चूस रहा था, “आह्ह… वरुण, चूस… दीदी की चुचियाँ दबा जोर से…”। फिर मैं पीछे लेट गया, उनकी एक टांग ऊपर की, लंड चूत पर रगड़ा। दीदी बोलीं, “वरुण, अब डाल दे, दीदी तेरी चुदाई के लिए तैयार है…”। लेकिन पहले मैंने लंड चुसवाया, दीदी ने जोर से चूसा। फिर टांग ऊपर करके लंड अंदर धकेला, सील फटी, खून निकला। दीदी दर्द से चीखीं, “आह्ह्ह… वरुण, दर्द हो रहा है… रुक जा… दीदी की चूत फट गई…”। मैं रुका, लंड अंदर रखा, दीदी को किस किया, चुचियाँ दबाई। कुछ देर बाद दर्द कम हुआ, दीदी बोलीं, “अब कर… मजा आ रहा है… चोद दीदी को वरुण…”। मैंने धक्के लगाने शुरू किए, धीरे-धीरे तेज। दीदी बोल रही थीं, “आह्ह… और तेज… ओह्ह… वरुण, चोद… दीदी की चूत मार ले… ह्ह्ह… ऊई… तेरे लंड से भर दे दीदी को…”। मैं ऊपर आ गया, चुचियाँ दबाते, किस करते जोरों से चोदा। हम दोनों साथ झड़ गए, मैंने चूत में ही माल गिराया, दीदी बोलीं, “ओह्ह… गर्म रस… दीदी भर गई…”।
सुबह उठे तो चादर पर खून के धब्बे, मैंने दीदी को जगाया। वो डरीं लेकिन फटाफट चादर धो दी, बोलीं, “अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा, अब रोज ऐसे ही करेंगे वरुण, दीदी तेरी हो गई।” वो महीना जन्नत जैसा था, रोज रात चुदाई – कभी दीदी ऊपर, कभी कुत्ते वाली पोज में, दीदी बोलतीं, “वरुण, दीदी की गांड पकड़कर चोद… आह्ह… हाँ ऐसे… दीदी की चूत तेरे लंड की दीवानी हो गई…”। लेकिन छुट्टियाँ खत्म हुईं, मैं मेरठ वापस आ गया। अब दिल्ली जाता हूँ तो मौका नहीं मिलता, लेकिन फोन पर बातें होतीं, दीदी कहतीं, “वरुण, कब आएगा, दीदी की चूत सूख रही है…”। वो यादें आज भी ताजा हैं, कभी-कभी मुठ मारते हुए सोचता हूँ कि काश फिर वो दिन लौट आएं। लेकिन रिश्ता अब भी वैसा ही है, प्यार भरा और गुप्त।