मेरी मौसी मम्मी से सिर्फ तीन साल बड़ी हैं, यानी अब करीब 40-41 की होंगी, पर उनका बदन अभी भी ऐसा है कि देखते ही लंड सलामी देने लगे। गोरा रंग, भारी-भरे दूध जो मैक्सी में भी ढके नहीं ढकते, पतली कमर और इतनी भारी, गोल-मटोल गांड कि जब चलती हैं तो लय में हिलती है जैसे कोई नरम-नरम तकिया हवा में लहरा रहा हो। बचपन से मैं मौसी को देखकर ही हिलाता था, रात में उनके नाम की मुठ मारता था, सपने में उनकी चुदाई करता था। मौसी के दो बच्चे हैं, दोनों पुणे के बोर्डिंग में रहते हैं। 2019 में मौसा जी का एक्सीडेंट में निधन हो गया था, उसके बाद से मौसी बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं, घर में कोई मर्द नहीं, बस रातें अपनी उंगलियों से गुजारती थीं।
एक दिन मौसी ने मम्मी को फोन किया, आवाज में हल्की सी उदासी और हवस दोनों थी, “दीदी, कुछ दिन अनीश को भेज दो ना, अकेलापन मार डालता है।” मम्मी ने हँसते हुए हाँ कर दी और अगली सुबह ही मुझे उनके घर भेज दिया। शाम चार बजे मैं पहुँचा, बेल बजाई तो दरवाजा मौसी ने खोला। साधारण सी फूलों वाली मैक्सी पहनी थी, ब्रा नहीं थी, दूधों के उभार और निप्पल साफ दिख रहे थे, बाल खुल्ले थे, हल्की सी लिपस्टिक, आँखों में काजल और खुशबू ऐसी कि सारा बदन सिहर उठा। मुझे देखते ही वो मुस्कुराईं, गले लगाया, उनका गर्म-गर्म बदन मेरे सीने से दबा, दूध मेरे सीने पर रगड़ खा रहे थे, “आजा बेटा, अब मजा आएगा।” उस एक गले लगाने में ही मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया।
अंदर आया, फ्रेश हुआ, रात को खाना खाते वक्त मौसी बार-बार मेरी ओर देखकर हँसतीं, होंठों पर लिपस्टिक चमक रही थी, आँखों में कुछ और ही कह रही थीं। बातें करते-करते ग्यारह बज गए। मौसी बोलीं, “चल सोते हैं।” उठीं तो उनकी गांड की लहर देखकर मन किया वहीं पकड़ लूँ। मैं अपने कमरे में आया, पर खिड़की से मौसी का कमरा साफ दिखता था, लाइट जली हुई थी। मैं चुपके से झाँकने लगा और जो देखा उसने मेरे होश उड़ा दिए।
मौसी ने मैक्सी का नाडा खोला, मैक्सी नीचे सरक गई, फिर ब्रा का हुक खोलकर फेंकी। उनके भरे हुए सख्त दूध बाहर आए, गुलाबी निप्पल तने हुए, हल्की सी नसें दिख रही थीं। वो बेड पर लेटीं, दोनों हाथों से अपने दूध जोर-जोर से मसलने लगीं, निप्पल उंगलियों में चिमटाकर खींचने लगीं, आँखें बंद, होंठ कटे हुए, सिसकारी लेते हुए, “हाय… कोई तो चूसो इनको… कितने दिन हो गए…” फिर पैंटी उतारी, घनी काली झांटें, गुलाबी बुर चमक रही थी, हल्का सा गीली भी। मौसी ने दो उंगलियाँ अंदर डालीं, चपचप की आवाज आने लगी, कमर ऊपर उठा-उठा कर पेल रही थीं खुद को, “आह्ह… ह्ह्ह… कोई मोटा लंड चाहिए… आह्ह…” पंद्रह मिनट बाद उनका बदन अकड़ गया, कमर ऊपर उठी, पैर काँपे और वो झड़ गईं। मैं बाहर खड़े-खड़े अपना लंड हिलाकर झड़ गया।
सुबह मौसी किचन में नाश्ता बना रही थीं, गांड हिलाते हुए, मैं पीछे से देखता रहा, लंड फिर खड़ा। शाम को मैं जानबूझकर बाथरूम का दरवाजा खुला छोड़कर नहाने लगा, लंड पूरा तना हुआ। तभी मौसी अंदर आ गईं, मुझे नंगा देखकर पहले चौंकीं, फिर होंठ दबाकर मुस्कुराईं, आँखों में शरारत, “दरवाजा तो बंद कर लिया करो बदमाश…” और धीरे से दरवाजा बंद कर चली गईं। मैं बाहर आया तो शर्मा गया, सॉरी बोला। मौसी हँस पड़ीं, मेरे कंधे पर हाथ रखा, “अरे पागल, बचपन में तो मैं ही तुझे नंगा नहलाती थी, अब इतना बड़ा हो गया है…” उनकी नजर मेरे तौलिये पर अटकी थी, मैं समझ गया मौसी गरम हो चुकी हैं।
रात को मैं अपने कमरे में नंगा लेटा और लंड हिलाने लगा, जानबूझकर खिड़की की ओर करके, जोर-जोर से। मौसी बाहर से झाँक रही थीं, मैंने देख लिया पर अनजान बना रहा। वो अपने दूध दबा रही थीं, साँसें तेज थीं। बीस मिनट बाद मैं झड़ा, मौसी भी चुपके से चली गईं।
अगले दिन दोपहर को मौसी बाथरूम से निकलते वक्त फिसल कर गिर पड़ीं, “अनीश… जल्दी आ…” मैं दौड़ा, मौसी को गोद में उठाया, उनका गर्म बदन मेरे सीने से चिपका, दूध दब रहे थे, खुशबू नाक में घुस रही थी। कमरे में बेड पर लिटाया। मौसी बोलीं, “पैर में बहुत दर्द है, तेल मालिश कर देगा?” मैंने तेल लिया, मौसी ने मैक्सी घुटनों से बहुत ऊपर चढ़ा दी, मलाई जैसे जांघें, पीली पैंटी दिख रही थी। मैं मालिश करने लगा, हाथ ऊपर-ऊपर जाता गया, पैंटी के किनारे तक पहुँचा। मौसी आँखें बंद किए सिसकियाँ ले रही थीं, “ऊपर… और ऊपर…” मैंने पैंटी के ऊपर से सहलाना शुरू किया, मौसी की साँसें तेज, “बस सहलाओगे या कुछ और भी करोगे?” मैंने हाथ हटा लिया। मौसी ने आँखें खोलकर मुस्कुराते हुए कहा, “अब ज्यादा शरीफ मत बनो…”
बस फिर क्या था, मैंने मौसी को बाहों में भरकर होंठ चूस लिए, जीभ अंदर डाल दी, वो भी भरपूर साथ देने लगीं। मैक्सी ऊपर उठाई, ब्रा फाड़ी, दोनों दूध मुँह में लेकर चूसने लगा, निप्पल काटने लगा। मौसी मेरे लंड से खेल रही थीं, “हाय कितना मोटा और गर्म है…” मैंने मौसी को लिटाया, पैंटी उतारी, झांटों वाली बुर को चाटने लगा, जीभ अंदर तक, मौसी की कमर ऊपर उठी, “आह्ह्ह… अनीश… चाट… पूरी जीभ डाल… ओह्ह्ह… ह्ह्ह…” फिर मैंने लंड बाहर निकाला और एक जोर का धक्का मारा, मौसी की चीख निकली, “आअह्ह्ह… मार डाला… कितना मोटा है… आह्ह्ह… चोद मुझे… फाड़ दे…” मैंने आधे घंटे तक लगातार पेला, हर धक्के में मौसी चीखतीं, “आह्ह… ह्ह्ह… मौसा का कभी इतना मजा नहीं दिया… ओह्ह्ह…” आखिर में मैंने सारा बीज उनकी बुर में उड़ेल दिया। मौसी की आँखों में पानी, “कहीं बच्चा हो गया तो?” मौसी हँसीं, “नसबंदी करवा ली है बेटा, जब चाहे भर दे…”
थोड़ी देर बाद लंड फिर खड़ा हो गया। मैंने कहा, “मौसी गांड भी मारने दो…” मौसी शरमाईं, “रात को ले लेना…” रात को मौसी सज-धज कर आईं, काले रंग की लेगिंग और टाइट कुर्ती, गांड और कसी हुई थी। हम लिपट गए, मैंने कुर्ती-लेगिंग फाड़ डाली, मौसी को घोड़ी बनाया, पीछे से बुर में पेला, फिर उल्टा लिटाया, गांड के छेद पर तेल लगाया, धीरे-धीरे सुपारा अंदर किया, मौसी चीखीं, “उईई माँ… आह्ह्ह… धीरे… फट जाएगी… ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह…” पूरा लंड अंदर गया तो मैंने जोर-जोर से ठोकना शुरू किया, थपथप… थपथप… कमरा गूँज रहा था, मौसी की चीखें, “आह्ह्ह… चोद अपनी मौसी की गांड… फाड़ दे… ओह्ह्ह…” उस रात मैंने चार बार चोदा, दो बार बुर में, दो बार गांड में, हर बार बीज अंदर ही गिराया।
पूरे एक महीने मैं मौसी के यहाँ रहा, रोज सुबह-शाम-रात उनकी चुदाई करता, कभी किचन में झुकाकर, कभी सोफे पर चढ़ाकर, कभी बालकनी में दबाकर। मौसी मेरा लंड चूसतीं तो ग्ग्ग्ग… ग्ग्ग्ग… गी… गी… पूरा गले तक लेतीं, फिर मैं उनकी गांड और बुर बारी-बारी से भरता। जब घर लौटने का वक्त आया तो मौसी रो पड़ीं, “जल्दी फिर आना बेटा, तेरी मौसी की दोनों छेद अब तेरे लंड की गुलाम हैं…”