मेरा नाम सुमन है। मैं और मेरी पड़ोसन नैनी दोनों पक्की सहेलियाँ हैं। जब भी कहीं जाना होता है, दोनों साथ-साथ ही आया-जाया करती हैं।
उस दिन भी वही आदत थी। मैंने हल्की गुलाबी सूती साड़ी लपेट रखी थी, पल्लू कंधे पर टिका था, और बालों में अभी भी तेल की हल्की महक बाकी थी। नैनी मेरे बराबर चल रही थी, उसकी चूड़ियाँ हर कदम पर खनक रही थीं। गली की धूप कड़ी थी, पैरों के नीचे गर्म धूल चिपक रही थी, और आसपास रिक्शों की घंटी व दूर के ठेले की आवाज मिल रही थी।
एक दिन हमें बाजार जाना था। हम दोनों तैयार होकर निकल पड़ीं। रास्ते भर दोनों बातें करते हुए जा रही थीं।
नैनी सब्जी के भाव बता रही थी, मैं चूड़ी और साबुन की सूची गिन रही थी। हमारी कोहनियाँ कभी-कभी टकरा जातीं, पल्लू हवा से उड़कर बाजू पर चिपक जाता, और हम हँसकर उसे संभाल लेतीं। चौराहे की भीड़ बढ़ने लगी थी, पसीने की हलकी गर्मी गर्दन पर उतर रही थी, और बातचीत बीच-बीच में ठहराव ले रही थी।
मेरी सहेली ने इशारा किया और कहा, देख तो उस आदमी को। बीच सड़क में खड़ा क्या कर रहा है?
उसकी उंगली नाली की तरफ उठी। आवाज धीमी थी, पर हैरानी साफ थी। मैंने पहले उसकी आँखें देखीं, फिर उसी दिशा में गर्दन घुमाई।
मैंने देखा कि वह हमें देखे बिना हमारी ओर होकर मूत रहा था। उसका बड़ा सा लंड बाहर निकला हुआ था।
आदमी किनारे खड़ा था, धोती घुटनों तक उठे हुए, एक हाथ कपड़े को थामे। उसकी टाँगें थोड़ी फैली थीं, कमर आगे झुकी थी, और लंड हाथ की पकड़ से बाहर लटक रहा था। मोटी, लंबी नस वाली डंडी से पीले मूत की तेज धार नाली में गिर रही थी। धार पत्थर से टकराकर छिटक रही थी, और गर्म मूत की तीखी गंध हवा में हमारे नथुनों तक आ रही थी। लंड का सुपारा गीला चमक रहा था, नीचे की थैली ढीली लटक रही थी, और हर झटके के साथ धार कभी मोटी होती, कभी पतली। वह हमारी तरफ मुँह किए बिना ही हमारी दिशा में खड़ा था, इसलिए लंड सीधा हमारी आँखों के सामने हिल रहा था।
हम दोनों ने उसे देखा, पर मेरा मन बेचैन होने लगा। हम दोनों अपनी नजरें दूसरी तरफ करके चलने लगीं।
नैनी ने पल्लू ठुड्डी तक खींच लिया। मैंने भी नजर फेरने की कोशिश की, पर सीने में धक-धक तेज हो गई। गला सूख रहा था, पेट के निचले हिस्से में अजीब कसक उठ रही थी, और पैरों की चाल अपने आप धीमी पड़ गई। हम सड़क के दूसरे किनारे की दुकानों को देखने लगीं, जैसे प्याज और मिर्ची ही हमारा काम हों, पर कानों में मूत की धार गिरने की आवाज अब भी आ रही थी।
जैसे-जैसे हम उस आदमी के पास होते जा रहे थे, आँखें उसके लंड को बरबस देखने लगीं। कितना लंबा और बड़ा था। यह लौड़ा तो मेरे पति के लंड से बड़ा और तगड़ा था।
पास आते ही लंड और साफ दिखा। धार अब धीमी हो रही थी, आखिरी बूँदें सुपारे पर अटककर नीचे टपक रही थीं, और वह उसे एक बार हल्का झटक रहा था। मोटाई मेरी कलाई से ज्यादा लग रही थी, लंबाई धोती के घेरे से बाहर तक निकली हुई थी, और ऊपर की नस खाल के नीचे फूली दिख रही थी। यह लौड़ा तो मेरे पति के लंड से बड़ा और तगड़ा था। साड़ी के अंदर मेरी जाँघें आपस में सट गईं, साँस छाती में अटक गई, और आँखें उसी गीले, लटकते लौड़े पर टिक गईं।
गर्म धूल की गंध और मूत की तीखी भाप दोनों एक साथ नाक में घुस रही थीं। सुपारे की गीली खाल धूप में चमक रही थी, और हर टपकती बूँद के साथ लंड हल्का काँप रहा था। मेरे पैर अपने आप धीमे हो गए, पल्लू मुट्ठी में कस गया, और सीने के नीचे एक खाली-सी कसक उठ आई।
मैंने कहा, “नैनी, कैसा है?”
आवाज गले में अटककर निकली। मैंने नजर नहीं हटाई, केवल उसके कान के पास मुँह किया, ताकि भीड़ सुन न ले।
उसने कहा, “धत्त, ऐसा तो सबका होता है।”
उसके गाल लाल हो गए थे, पर होठों पर बनावटी सख्ती थी। उसने मेरी कोहनी पकड़कर एक कदम आगे खींच लिया, जैसे मुझे उस नजारे से बचा रही हो।
यह कहकर वह हँस पड़ी, पर मैं उसे देखती ही रह गई।
हँसी के बाद भी मेरी गर्दन पीछे मुड़ी रही। आदमी धोती गिरा चुका था, पर गीले सुपारे की चमक पलक के पीछे चिपक गई थी। बाजार की आवाज कानों में आ रही थी, फिर भी दिमाग में सिर्फ वही मोटा, लटकता लौड़ा घूम रहा था।
मुझे घर आने तक उस आदमी के लौड़े की याद बार-बार आ रही थी।
घर की देहली चढ़ते ही साड़ी उतारने का मन हुआ, पर मैं रसोई में खड़ी पानी पीती रही। गिलास होंठों से लगा, और सुपारे पर टपकती बूँदों की तस्वीर फिर आँखों के आगे तैर गई। जाँघों के बीच पसीना जमा था, और हर बार पैर बदलने पर वही कसक जाग उठती थी।
शायद मेरी सोच को मेरी सहेली समझ गई थी, इसलिए उसने मुझे टहोका।
नैनी मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोली कि मुँह क्यों लटका है। उसकी उँगलियाँ गर्म थीं, और आँखों में वही हँसी थी जो सड़क पर थी।
मैंने कहा, “यदि वह कहीं हमारे पीछे आ जाए घर में, तो कैसा रहेगा?”
कहते हुए मेरी साँस रुक गई। मैंने उसकी आँखों में देखा, ताकि वह मजाक न समझे। सीने में धक्-धक् तेज थी, और साड़ी का कपड़ा पेट पर चिपक रहा था।
नैनी बोली, “ना बाबा ना। फजीहत होगी और बदनामी अलग। यदि तू चाहे तो मैं जुगाड़ कर सकती हूँ।”
उसने आवाज और धीमी कर दी। पहले वाक्य में डर था, दूसरे में आँखें सिकुड़कर मुस्कुराईं। उसने मेरे हाथ की उँगली दबाई, जैसे वादा छुपा रही हो।
मैंने कहा, “सच बोल।”
उसने कहा, “सच बोल रही हूँ। ऐसे ही थोड़ी बोल रही हूँ।”
उसकी हँसी अब हल्की थी। उसने पल्लू संभाला, मेरी तरफ झुककर कहा कि जल्दबाजी मत कर, और फिर सीधी खड़ी हो गई। मेरे कान गर्म हो गए, मुँह सूख गया, और पेट के नीचे वही खाली कसक और गहरी हो गई।
मैं आशा भरी निगाहों से चुप रह गई।
नैनी ने कहा, “तू देखती जा और साथ दे। बहुत मजा आएगा।”
उसने यह कहकर मेरे गाल को दो उँगलियों से हल्का छुआ। आँखों में शरारत थी, आवाज में धीमा जोर था, और मैं बस सिर झुकाए खड़ी रह गई।
दूसरे दिन नैनी का फोन आया। मेरे घर में जल्दी आ जा।
घंटी बजते ही मैं चूल्हा छोड़कर उठी। उसकी आवाज जल्दी की थी, बिना लंबी बात के। मैंने साड़ी का पल्लू ठीक किया, चप्पल पहनी, और गली की धूप में उसके दरवाजे की तरफ चल दी। दिल फिर धक्-धक् कर रहा था, क्योंकि कल की बात कानों में गूँज रही थी।
मैं तुरंत चली गई। मैंने दरवाजे पर दस्तक दी और उसके पति ने दरवाजा खोला।
किवाड़ भीतर से खुला, और ठंडी छाया चेहरे पर पड़ी। सामने नैनी का पति खड़ा था, बाल गीले, कंधे पर पानी की बूँदें, और सीना नंगा।
मैंने देखा तो दंग रह गई। वे केवल एक पतला सा तौलिया लपेटे हुए थे। उनके बदन में एक कपड़ा नहीं था।
तौलिया कमर पर ढीला बँधा था, एक छोर जाँघ पर लटका था। ऊपर छाती की बालों वाली नम खाल चमक रही थी, पेट की हलकी लकीर तौलिये के किनारे तक उतर रही थी। कपड़े का नामोनिशान नहीं था, सिर्फ वही पतला भीगा कपड़ा बीच में रुका था।
मैंने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा तो काँप उठी। उनका लंड अभी खड़ा होने लगा था। वह बहुत कड़ा दिख रहा था। ऐसा लगा जैसे उनके लौड़े ने चूत देखकर अंगड़ाई ली हो।
तौलिये के आगे एक मोटा उभार धीरे-धीरे उठ रहा था। कपड़ा खिंचकर लौड़े की शक्ल साफ कर रहा था, सुपारे की जगह गोल सूजन बन रही थी, और नीचे की थैली किनारे से झाँक रही थी। हर साँस के साथ वह उभार और कड़ा होता गया, तौलिया आगे की तरफ तन गया, और मेरी एड़ियाँ फर्श पर काँप गईं। गला सूख गया, जाँघें आपस में दब गईं, और साँस छाती में अटककर रह गई।
वे अपने लंड को अपने हाथों से मसलने लगे। उन्होंने मुझसे कहा, “आओ बैठो। नैनी आती ही होगी।”
उँगलियों ने तौलिये के ऊपर से लौड़े को दबाकर एक बार सहलाया, जैसे उसे संभाल रहे हों। आवाज भारी थी, आँखें मेरी साड़ी के पल्लू पर टिकी रहीं, और दूसरे हाथ से उन्होंने दरवाजा और खोल दिया।
मैं अंदर आ गई और कुर्सी पर बैठ गई।
मैंने देखा कि वे बाथरूम के अंदर चले गए और नहाने लगे। मैं घूमते हुए बाथरूम के पास गई तो देखा कि वे एक भी कपड़ा नहीं पहने थे। पूरे नंगे होकर नहा रहे थे।
मैंने आवाज देकर कहा, मैं घर जा रही हूँ। नैनी आए तो कह देना कि मैं आई थी।
मैंने सोचा कि उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी है, तो मैं अंदर जाकर बैठ गई। मेरे दिमाग में उनका नग्न जिस्म घूमने लगा।
थोड़ी देर बाद वे बाथरूम से बाहर सीधे अपने कमरे में आ गए। वे अभी पूरे नंगे थे। उनके बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था।
मुझे देखकर वे चौंक गए। आप गई नहीं थीं। सॉरी।
और उन्होंने अपने हाथ अपने लंड पर रख लिए और दरवाजे की ओर भागे।
मैं उठी और उन्हें पीछे से पकड़ लिया। लंड को अपने हाथों से पकड़कर रगड़ने लगी। वे भी चुप खड़े हो गए। वे एक-एक करके मेरे कपड़े उतारने लगे।
मैं और वे दोनों नंगे होकर एक-दूसरे के बदन से खेलने लगे। वे मुझे किस करने लगे। मैं और वे किस करते हुए बारी-बारी लंड और चूत को पीने लगे। दोनों गर्म होकर अपनी वासना शांत करने में लग गए।
मैंने उनके लंड को सीधे अपने मुँह में लेकर पीना शुरू कर दिया। वे मेरे सर को पकड़कर लौड़े को मेरे मुँह में अंदर-बाहर करने लगे। मैंने आखिरी दम तक लंड को पिया और उनका पूरा माल नीचे गिराने लगी।
अब उन्होंने मुझे उठाकर अपने पलंग पर लिटा दिया। मेरे दोनों पैरों को फैलाकर सीधे अपने लंड को मेरी चूत में डालकर बड़ी जोरों से मेरी चुदाई करने लगे।
मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि इतना मजा आएगा। मैं तृप्त होने लगी। वे मुझे दो बार झड़ा चुके थे।
मैं लस्त होकर उनकी बांहों में लिपटी पड़ी थी कि तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। हम दोनों अपने कपड़े पहनकर जल्दी-जल्दी बाहर आए।
मैंने देखा कि वह नैनी थी। उसने मुझे देखकर आँख मारी और मुस्कुराने लगी।
आपके विचार आमंत्रित हैं।
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