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एग्जाम देने आई दीदी ने चूत भी दी गांड भी दी

Didi ko Pesab krte dekha sex story – Hot Girl Pissing Sex Story – Peeing Sex Story: मैं लव, उन्नीस साल का जिम जाने वाला लड़का, शहर के एक छोटे से बीएचके फ्लैट में अकेला रहता हूँ। 27 मार्च 2023 की दोपहर जब जिम से पसीना पोछता हुआ लौटा तो फोन की घंटी बजी। उधर से आन्टी की आवाज़ आई, “लव बेटा, बिन्नी का नर्सिंग का पेपर है, आज शाम पाँच बजे स्टेशन पहुँच रही है, तुम ले आना, दो-तीन दिन तुम्हारे पास ही रुकेगी।” मेरे दिल ने ज़ोर से धक् किया। बिन्नी दीदी, मेरी पड़ोसन, मेरी चाइल्डहुड क्रश, जिसकी शादी को अभी छह महीने ही हुए थे।

शाम पाँच बजे स्टेशन पहुँचा तो प्लेटफॉर्म पर भीड़ थी, पर दूर से ही लाल साड़ी में कोई मटक-मटक कर चली आ रही थी। पहले तो लगा कोई और है, फिर चेहरा देखा तो साँस रुक गई। दीदी थीं, पर पहले वाली दुबली-पतली बिन्नी नहीं। अब कमर में हल्की सी चर्बी, कूल्हे गोल-मटोल, ब्लाउज़ में स्तन ऐसे भरे हुए कि पल्लू बार-बार सरक रहा था। मंगलसूत्र हल्का सा झूल रहा था, हाथों में ताज़ी मेंहदी की महक, होंठों पर लाल लिपस्टिक। वो मुझे देखकर मुस्कुराईं और तेज़ कदमों से आईं। मैंने झुककर पैर छूने चाहे, पर उन्होंने झट से गले लगा लिया। उनके गर्म, मुलायम, भरे हुए स्तन मेरे सीने से दबे तो ऐसा लगा जैसे पूरा बदन में 440 वोल्ट का करंट उतर गया। उनकी खुशबू, क्रीम-पाउडर और हल्की पसीने की मिली-जुली देसी सुगंध नाक में चढ़ गई।

ऑटो में बैठे तो उनकी साड़ी की पल्लू बार-बार सरकती, गहरी नाभि और ब्लाउज़ की गहरी घाटी दिखती। मैं चोरी-चोरी देख रहा था, वो जानबूझकर पल्लू ठीक नहीं कर रही थीं। घर पहुँचते ही मैंने चाय बनाई, नाश्ता परोसा। वो सोफे पर बैठीं तो साड़ी का पल्लू फिर सरका, ब्लाउज़ में स्तन ऐसे उभरे हुए कि लगा अभी फट जाएगा। मैंने कहा, “दीदी, आप फ्रेश हो जाइए, मैं खाना बनाता हूँ, कल पेपर है ना, आराम से पढ़ लीजिएगा।” वो बोलीं, “कपड़े तो सिर्फ़ दो साड़ी लाई हूँ, घर में ही रहूँगी तो कोई अच्छे कपड़े दे दो।” मैंने अपना ढीला ट्राउजर और टी-शर्ट दिया और बालकनी में चला गया।

दस मिनट बाद आवाज़ आई, “लव आ जा।” मैं अंदर आया तो मेरा ट्राउजर और टी-शर्ट उनके जिस्म से ऐसे चिपके हुए थे जैसे दूसरी स्किन। गाँड एकदम गोल-गोल उभरी हुई, जाँघें चिकनी चमक रही थीं, टी-शर्ट में निप्पल साफ़ खड़े दिख रहे थे। मेंहदी वाले हाथ, लाल होंठ, मंगलसूत्र, और मेरे कपड़ों में वो देसी हॉट अवतार देखकर मेरा लंड तुरंत टाइट हो गया।

रात का खाना मैंने बनाया, दोनों एक ही थाली में बेड के नीचे बैठकर खाने लगे। उनकी गर्म जाँघ मेरी जाँघ से सटी थी, हर कौर के साथ कंधा कंधे से टकराता। खाना खत्म करके बर्तन धोया, फिर एक ही डबल बेड पर लेट गए। लाइट बंद की, सिर्फ़ बालकनी से हल्की नीली रोश्नी आ रही थी। बातें शुरू हुईं। मैंने कहा, “दीदी, शादी के बाद आप तो एकदम चेंज हो गई हो, पहले इतनी हॉट नहीं लगती थीं।” वो हँस दीं, “क्या चेंज हो गया?” मैंने शरमाते हुए कहा, पहले दुबली थीं, अब पूरा जिस्म भरा-भरा, चेहरा चमक रहा है, जैसे कोई ग्लो आ गया हो।” वो शरमाईं, “ये सब तेरे जीजा जी का कमाल है।” फिर मेरे कानों को मरोड़ते हुए बोलीं, “तू भी तो बॉडी बना ली है, छाती चौड़ी, बाजू फूले हुए।”

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नींद नहीं आ रही थी उन्हें। करवटें बदल रही थीं। अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी नंगी कमर पर रख दिया, एक टाँग मेरे ऊपर चढ़ा दी। मैं चौंका, “ये क्या दीदी?” वो धीरे से बोलीं, “बचपन से मम्मी मुझे ऐसे पकड़कर सुलाती थीं, अब आदत हो गई है।” मैंने मज़ाक किया, “अब तो जीजा जी पकड़कर सुलाते होंगे?” वो हल्के से शरमाईं, “हाँ… अब वही करते हैं।” उनकी गर्म साँसें मेरे गले पर लग रही थीं, कमर की नरमी हाथ में महसूस हो रही थी।

रात ढाई-तीन बजे वो बाथरूम के लिए उठीं। दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं किया, बेड से सब साफ़ दिख रहा था। हल्की लाइट में उन्होंने ट्राउजर नीचे किया, फिर काली पैंटी, दाहिनी जाँघ और गोरी-गोरी गोल गाँड चमक उठी। फिर पेशाब की तेज़ धार चली, वो हल्की सी सिसकारी के साथ, “स्स्स्स… हाय्य…” मेरे कानों में रस घोल रही थी। मेरा लंड पत्थर हो गया, मैंने चादर से दबा लिया। वो लौटीं तो मेरी तरफ़ पीठ करके लेटीं, मेरा हाथ खींचकर अपने पेट पर रख लिया। ठंड बढ़ने लगी तो उन्होंने छोटी चादर हम दोनों पर डाली और मुझे अपने सीने से चिपका लिया। उनके गर्म, भरे हुए स्तन मेरे गाल से सटे थे, साँसों की गर्मी कान में लग रही थी।

सुबह मैं पाँच बजे जिम चला गया, साढ़े सात बजे लौटा तो वो अभी भी सो रही थीं। चादर सरकी हुई थी, एक स्तन पूरा बाहर, गुलाबी निप्पल हल्का सख्त। मैं देखता रह गया। वो आँख खोलीं, चादर खींची, शरमाते हुए बोलीं, “हरामी, देख क्या रहा है!” फिर हँस दीं। मैंने चाय बनाकर दी। वो नहाने गईं। मैंने दूसरा ट्राउजर-टी-शर्ट दिया। नहाकर निकलीं तो बाल गीले, मेरे कपड़े फिर चिपके हुए। बाथरूम में उनकी भीगी हुई काली पैंटी पड़ी थी। मैंने मज़ाक में कहा, “दीदी, यही पहनकर पेपर देने जाएँगी?” वो शरमा गईं, “चुप पागल!” मैं बाज़ार से नई ब्रा-पैंटी ले आया, 34B ब्रा और M साइज़ पैंटी, बिल्कुल फिट। वो हैरान, “ये साइज़ कैसे पता?” मैंने शरमाते हुए कहा, “रात को देख लिया था।”

पेपर के बाद जब लौटीं तो नाराज़ थीं क्योंकि मैंने सेंटर पर सबको बता दिया था कि ये मेरी दीदी हैं। घर आकर बोलीं, “ढोल लेकर घूम रहा था कि ये मेरी बहन है!” मैंने मना लिया, बाहर घुमाया, आईसक्रीम खिलाई। रात को खाना उन्होंने बनाया। फिर बेड पर बातें। वो बोलीं, “सही बता, ब्रा का साइज़ कैसे पता?” मैंने सब सच बता दिया। वो पहले नाटक करने लगीं गुस्सा होने का, फिर हँस दीं, “कमीने, सब देखता है तू।”

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फिर बात बचपन की निकली। मैंने कबूल किया कि मैंने जानबूझकर राखी कभी नहीं बंधवाई क्योंकि मुझे उनसे शादी करनी थी। वो मेरे गाल सहलाते हुए बोलीं, “अब भी पसंद करता है?” मैंने हाँ कहा।

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वो मेरे ऊपर चढ़ गईं, होंठ मेरे होंठों पर रख दिए, गीले-गीले लंबे किस करने लगीं, जीभ अंदर डालकर चूसने लगीं। मेरे कान चाटे, गले पर दाँत गड़ाए, फिर मेरा टी-शर्ट उतारा, मेरे सीने पर, निप्पल्स पर जीभ फेरी। बोलीं, “सब मैं ही करूँ या तू भी कुछ करेगा?”

मैंने उन्हें पलटा, उनके होंठ चूसने लगा, जीभ आपस में लिपट गई, लार की चिपचिपी आवाज़ें आने लगीं। मैंने उनके गले को चूमा, कानों में गर्म साँसें छोड़ी, “दीदी… तुम बहुत हॉट हो…” वो सिसकारीं, “आह्ह लव्व… बोल ना और… मुझे गंदा-गंदा बोल…” मैंने कहा, “दीदी तुम्हारी चूत मारने का मन कर रहा है…” वो हँस दीं, “हरामी… आज तेरी है मेरी चूत… ले ले…”

मैंने उनका टी-शर्ट ऊपर किया, नई ब्रा में कैद भरे हुए स्तन देखकर आह निकली। ब्रा का हुक खोला, दोनों भरे हुए दूध बाहर आए, गुलाबी निप्पल एकदम खड़े। मैंने एक को मुँह में लिया, ज़ोर-ज़ोर से चूसा, दूसरा हाथ से मसलता रहा। वो कमर उछालने लगीं, “आह्ह लव्व… ज़ोर से चूस रे… जैसे जीजा चूसते हैं वैसे… हाय्य कितना अच्छा लग रहा है… आह्ह्ह इह्ह्ह…” मैंने दाँत से हल्का काटा, वो चीखीं, “हाँ ऐसे ही… काट ना… मेरे मम्मे तेरे हैं आज…”

फिर मैं नीचे आया, उनका ट्राउजर नीचे किया, नई पैंटी पर गीले धब्बे थे। मैंने पैंटी पर नाक लगाई, उनकी मादक खुशबू ली, फिर पैंटी उतारी। चूत एकदम क्लीन शेव, फूली हुई, रस से चमक रही थी। मैंने जाँघें चूमीं, भीतर की तरफ़ जीभ फेरी, फिर चूत पर जीभ रखी तो वो काँप उठीं, “ओह्ह्ह लव्व्व… क्या कर रहा है… हाय्य रे… चाट ना ऐसे… मर जाऊँगी… आह्ह ह ह ह…” मैंने जीभ अंदर-बाहर करनी शुरू की, क्लिट को मुँह में लेकर चूसा, दो उँगलियाँ चूत में डालकर तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगा। वो कमर उछाल रही थीं, “लव्व मत रुक… हाँ वहीं… आह्ह्ह ऊईईई माँ… आ गया… आह्ह्ह्ह…” और ज़ोर से झड़ गईं, पूरा रस मेरे मुँह पर छिटक गया, मैं चाटता रहा, वो काँप रही थीं, “बस कर… अब सह नहीं पा रही…”

उन्होंने मुझे खींचा, मेरा पाजामा नीचे किया, लंड बाहर आया तो वो चौंक गईं, “हाय्य रे… कितना मोटा और लंबा है तेरा… जीजा जी से भी बड़ा है…” फिर लंड पकड़ा, चमड़ा पीछे किया, सुपारे पर जीभ घुमाई, “ग्ग्ग्ग्ग गी गी गों गों…” पूरा मुँह में लेकर गले तक उतारने लगीं, आँखों में पानी आ गया उनका। मैंने उनकी गाँड दबाई, उँगलियाँ चूत में डालीं तो वो और तेज़ चूसने लगीं, “ग्ग्ग्ग्ग… ले पूरा… आज तेरा सारा रस पी जाऊँगी…”

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फिर वो मेरे ऊपर बैठ गईं, लंड को चूत पर रगड़ने लगीं, “लव्व अंदर डाल ना… सह नहीं पा रही…” धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर ले लिया, “आह्ह्ह्ह्ह मर गई रे… कितना मोटा है… फाड़ देगा आज… हाय्य…” वो ऊपर-नीचे होने लगीं, स्तन उछल रहे थे, मैंने गाँड पकड़कर झटके देने शुरू किए, “आह्ह ह ह ह… और तेज़ लव्व… फाड़ दे मेरी चूत… जीजा जी कभी ऐसा नहीं करते… आह्ह्ह…”

वो थक गईं तो मैं ऊपर आया, उनके पैर कंधों पर रखकर ज़ोर-ज़ोर से ठोकने लगा, चपचप चपचप की आवाज़, उनकी चीखें, “हाँ लव्व ऐसे ही… चोद मुझे… आज, आज तक किसी ने ऐसा नहीं चोदा… आह्ह्ह ऊईईई… हाँ मार गहरा…” मैंने कहा, “दीदी… तेरी चूत बहुत टाइट है… कितना रस है…” वो बोलीं, “तेरे लिए ही बचा रखा था… ले पूरा… आह्ह्ह्ह…” हम दोनों एक साथ झड़े, मैं उनकी चूत के अंदर ही पूरा रस डाल दिया, वो काँप रही थीं, “हाय्य… गर्म-गर्म… पूरा अंदर डाल दिया… कुछ नहीं होगा… सेफ डेज हैं…”

फिर दूसरा राउंड। मैंने उन्हें डॉगी बनाया, गाँड ऊपर उठाई, लंड एक झटके में पूरा अंदर, “आह्ह्ह्ह लव्व्व… हाँ मार गाँड पर… थप्पड़ मार…” मैंने गाँड पर लाल निशान कर दिए, बाल पकड़कर खींचा, तेज़-तेज़ ठोका, “ले दीदी… ले पूरा लंड…” वो बोलीं, “हाँ चोद रे… आज अपनी दीदी को रंडी बना दे…”

फिर गोद में उठाया, दीवार से सटा कर चोदा, उनकी टाँगें मेरी कमर पर लिपटी थीं, “हाय्य लव्व… और ज़ोर से… चूत फट जाएगी… आह्ह्ह्ह…” फिर बिस्तर पर लिटाकर मिशनरी में, आँखों में आँखें डालकर धीरे-धीरे फिर तेज़ किया, वो नाखून मेरी पीठ पर गड़ाने लगीं, “बस लव्व… आ रहा है… हाँ हाँ आह्ह्ह्ह्ह ऊईईई…” हम फिर साथ झड़े।

तीन दिन तक यही चलता रहा। सुबह उठते ही चुदाई, नहाते हुए चुदाई, खाना बनाते हुए पीछे से चुदाई, रात भर अलग-अलग पोज़ में। चौथे दिन स्टेशन छोड़ने गया। ट्रेन में चढ़ते वक्त वो फुसफुसाईं, “लव, अगले महीने फिर आऊँगी… तैयार रहना।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “दीदी, अब तो पूरा साल भर का स्टॉक तैयार रखूँगा।”

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