बस के झटके और चुदाई के झटके

Bus sleeper chudai sex story, College crush bus sex story: मैं जब २५ साल की थी। मैं उस समय झाँसी में रहती थी। मेरी जयपुर में नई नई नौकरी लगी थी। मुझे २ दिन बाद जयपुर जाना था। पापा ने अपने ऑफिस का ही एक काम करने वाला, जो जयपुर में रहता था, उसे मेरे साथ में भेजने के लिए तैयार कर लिया था।

घर की बेल बजी तो मैंने बाहर निकल कर देखा। एक सजीला, आकर्षक, २५-२६ साल का लड़का बाहर खड़ा था। उसकी सफेद शर्ट पर हल्की सी जालीदार डिज़ाइन थी, और जींस इतनी फिट कि उसकी मजबूत जांघें साफ़ नज़र आ रही थीं। मैंने पूछा, “कहिये… किस से मिलना है…”

उसने मुझे देखते ही आँखें चौड़ी कर दीं और मुस्कुराते हुए बोला, “अरे नेहा… तुम यहाँ रहती हो…”

मैंने उसे पहचानते ही हल्के से चौंक कर कहा, “हाय… तुम अनिल हो… आओ अन्दर आ जाओ…” मैंने उसे अन्दर आने का इशारा किया और बैठक में ले जाकर सोफे पर बैठाया।

अनिल मेरे साथ कॉलेज में पढ़ता था। उसने बताया कि वह अब पापा के ऑफिस में ही काम कर रहा था। “अंकल ने बुलाया था… जयपुर कौन जा रहा है…”

“मैं जा रही हूँ…” मैंने जवाब दिया।

“अंकल ने मुझे आपके साथ जाने को कहा है… रिज़र्वेशन के लिए बुलाया था… मैं भी २ दिन बाद जा रहा हूँ।”

मैंने मन ही मन सोचा कि कॉलेज के दिनों में यह मेरी तरफ़ कभी ठीक से देखता भी नहीं था। उसकी आँखें हमेशा दूसरी लड़कियों पर टिकी रहती थीं। लेकिन अब, जब मैंने उसे इतने करीब से देखा, तो पुरानी यादें एक साथ उभर आईं। अनिल मुझे शुरू से ही अच्छा लगता था — उसकी गहरी आँखें, हल्की मुस्कान, चौड़ी कंधे, और वह आत्मविश्वास भरी आवाज़। अब जयपुर तक साथ यात्रा करने का मौका मिल रहा था। मैंने मन में ठान लिया कि इस बार मैं उसे छोड़ूँगी नहीं।

मैंने जानबूझकर थोड़ा आगे झुकते हुए कहा, “आगे का स्लीपर लेना है… वरना बस में बहुत परेशानी होगी। झाँसी से जयपुर लंबा सफर है।”

“ओके, तो २ दिन बाद के स्लीपर लेना है… अंकल को बता देना,” अनिल ने कहा और उठ खड़ा हुआ।

अनिल चला गया। अब मैं अपने प्लान बनाने में जुट गई। मुझे सब कुछ बहुत साफ़ समझ में आ रहा था कि अनिल को कैसे पटाया जाए, कैसे उसकी नज़रें मेरे शरीर पर टिकाई जाएँ, और कैसे धीरे-धीरे उसे मेरे करीब लाया जाए।

हम बस स्टैंड पहुँच गए। बस में अनिल पहले से ही नीचे वाली डबल स्लीपर बर्थ पर बैठा हुआ था। मेरे आते ही वह तुरंत खड़ा हो गया और बाहर की तरफ़ आ गया ताकि मैं अंदर जा सकूँ। अभी बस के छूटने में १५ मिनट बाकी थे। मैंने आज हल्के गुलाबी रंग की सलवार-सूट पहना था, जिसमें कुरता थोड़ा ढीला-ढाला था, लेकिन सलवार इतनी पतली और चिपकी हुई कि मेरे गोल, भरे हुए चूतड़ों की हर लचक साफ़ दिख रही थी। मैंने जानबूझकर आज पेंटी नहीं पहनी थी। चलते समय मेरे नंगे चूतड़ आपस में रगड़ खा रहे थे, और वह हल्की सी गुदगुदी वाली सनसनी मेरे पूरे निचले हिस्से में फैल रही थी।

अनिल की नज़रें सीधे मेरे चूतड़ों पर टिक गईं। उसकी आँखों में खुली हसरत थी — वह बार-बार मेरे नितंबों की गोलाई को निहार रहा था, जैसे उन्हें छूने की तीव्र इच्छा हो। मैंने उसे देखते ही तुरंत भाँप लिया कि वह मेरे शरीर को घूर रहा है। मेरे मन में एक गहरी उत्तेजना भर गई। मेरी चूत में हल्की सी गीलापन महसूस होने लगा था।

“बड़ी सुंदर लग रही हो…” उसने धीमी, भारी आवाज़ में कहा।

“थैंक्स… अनिल…” मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और जानबूझकर थोड़ा और करीब जाकर पूछा, “सीट नम्बर क्या है?”

“आगे वाले पहले दो स्लीपर हैं… सिंगल नहीं मिला।”

मैंने मन में सोचा कि यह अनिल की शरारत है। लेकिन मुझे तो इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता था। मैंने ऊपर से गुस्सा दिखाते हुए कहा, “मैंने तो सिंगल के लिए कहा था… पर ठीक है…”

“अरे यार… खूब बातें करेंगे… साथ रहेंगे तो।”

बस का टाइम हो गया था, पापा मुझे छोड़ कर जा चुके थे। हम दोनों सीट पर आ गए। आगे से दूसरे नंबर की सीट थी। पहले मैं जा कर खिड़की के पास बैठ गई, फिर अनिल भी मेरे ठीक बगल में बैठ गया। बस अभी काफी खाली थी। झाँसी से बस ग्वालियर तक आमतौर पर खाली ही रहती है, लेकिन ग्वालियर पहुँचते ही लगभग सभी सीटें भर जाती हैं।

कंडक्टर से अनिल ने ग्वालियर तक सीट पर बैठने की परमिशन ले ली थी। अँधेरा अब गहराने लगा था। सड़क के दोनों ओर बत्तियाँ जल उठी थीं, उनकी पीली रोशनी बस की खिड़कियों से अंदर झांक रही थी। शाम ठीक सात बजकर तीस मिनट पर बस रवाना हो गई। इंजन की भारी गड़गड़ाहट के साथ बस हिलती-डुलती आगे बढ़ने लगी।

हम दोनों कॉलेज के पुराने दिनों की बातें करने लगे। दतिया स्टेशन को हमने क्रॉस कर लिया था। मैंने अपनी चादर को मोड़कर और पानी की बोतल को बगल वाली खाली जगह पर रख दिया। फिर जानबूझकर थोड़ा और करीब सरककर अनिल से सट कर बैठ गई। अब हमारी जाँघें आपस में पूरी तरह चिपक गई थीं। उसकी मोटी, मजबूत जाँघों की गर्माहट मेरी नरम जाँघों पर महसूस हो रही थी। हर छोटे-छोटे झटके में हमारी जाँघें एक-दूसरे पर रगड़ खा रही थीं, कपड़ों के बीच से ही एक मीठी सी गुदगुदी पूरे निचले हिस्से में फैल रही थी।

मैं अब जानबूझकर हर बार बस के मुड़ने पर उसकी तरफ गिर जाती थी। गिरते वक्त मेरे दोनों हाथ उसकी जाँघ पर टिक जाते थे। मैं अपनी उँगलियों से उसकी जाँघ की सख्त मांसपेशियों को दबाती, सहलाती, और फिर धीरे-धीरे सीधी होकर बैठ जाती थी। उसकी साँसें हर बार थोड़ी तेज हो जाती थीं। इतने में बस की भीतरी लाइटें जल उठीं। मैंने पीछे मुड़कर देखा। बस में बस कुछ ही यात्री थे, वे अपनी-अपनी सीटों पर सिर झुकाकर झपकियाँ ले रहे थे। अचानक लाइटें फिर से बंद हो गईं। अब बस में घना अँधेरा छा गया था, सिर्फ बाहर की सड़क की बत्तियों की हल्की-हल्की चमक खिड़की से आ रही थी।

मैंने आँखें बंद कर लीं और सिर पीछे की ओर टिका दिया। कुछ ही पलों बाद मुझे महसूस हुआ कि अनिल का हाथ मेरी जाँघ पर रखा हुआ है। पजामा के पतले, मुलायम कपड़े के ऊपर से उसकी गर्म हथेली मेरी जाँघ की नरम त्वचा पर टिकी थी। उसकी उँगलियाँ हल्के दबाव के साथ मेरी जाँघ पर सरक रही थीं। मैं सिहर उठी। मेरे पूरे शरीर में एक मीठी कंपकंपी दौड़ गई, मेरी चूत तुरंत गर्म और नम हो गई।

मुझे लगा कि अब अनिल पूरी तरह उत्तेजित हो चुका है, लेकिन मैं चुपचाप बैठी रही। उसने अपना हाथ धीरे-धीरे सहलाते हुए आगे बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ मेरी जाँघ की अंदरूनी सतह पर सरक रही थीं, जहाँ त्वचा सबसे ज्यादा संवेदनशील होती है। फिर उसने हथेली से हल्के से दबाव डाला। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर में बिजली का तेज झटका लगा हो। मेरी साँसें रुक-रुककर तेज हो गईं, मेरे निप्पल कुरते के अंदर सख्त होकर खड़े हो गए।

मैंने आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा। अँधेरे में भी मैं देख सकती थी कि वह जानबूझकर आँखें बंद किए हुए था, जैसे सो रहा हो। उसका हाथ अब और आगे बढ़ गया था। उसकी उँगलियाँ मेरी चूत की फाँकों के बिल्कुल पास पहुँच चुकी थीं। पजामा के कपड़े के नीचे मेरी चूत की गर्मी और बढ़ती नमी उसे साफ महसूस हो रही होगी। मैंने मौका जाने नहीं दिया। मैं चुप रही और अपनी टाँगें थोड़ी और चौड़ी फैला दी। अब मेरी चूत की दोनों फाँकें पूरी तरह खुल गई थीं, कपड़े के नीचे से मेरी चूत की गर्माहट बाहर आने लगी थी।

उसका हाथ अब मेरी चूत की फाँकों पर पूरी तरह टिक गया था। उसने हथेली से धीरे-धीरे दबाव डालते हुए मेरी चूत को सहलाना शुरू किया। उसकी मध्यमा उंगली कपड़े के ऊपर से मेरी चूत की दरार पर सरक रही थी। मैंने अब उसका हाथ पकड़ लिया। अपनी उँगलियों से उसकी उँगलियों को मजबूती से जकड़ते हुए मैंने उसे धीरे-धीरे अपनी तरफ खींचा और ऊपर की ओर ले जाने लगी। उसका हाथ मेरे पेट पर सरका, फिर कुरते के नीचे घुसकर मेरे स्तनों की तरफ बढ़ने लगा।

अनिल ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में कामुक आग साफ जल रही थी। मैं भी उसकी नजरों में झाँकने लगी, अपनी आँखों से उसे आमंत्रित करती हुई। उसने अपना चेहरा मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैंने भी धीरे से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। उसने तुरंत मेरे होंठों को चूमना शुरू कर दिया। पहले हल्के, नरम चुम्बन, फिर गहरे और लालची। मैंने भी जवाब में अपनी जीभ उसके होंठों के बीच डाल दी। हमारी जीभें आपस में लिपट गईं, एक-दूसरे को चाटने, चूसने, कुरेदने लगीं। उसके मुँह से हल्की, दबी हुई कराह निकली।

उसके हाथ अब मेरे स्तनों पर पूरी तरह काबिज हो चुके थे। अनिल ने कुरते के ऊपर से ही मेरे भरे हुए बूब्स को हौले-हौले दबाना शुरू कर दिया। उसकी हथेलियाँ मेरे गोल, मुलायम स्तनों को मसल रही थीं, उँगलियाँ मेरे सख्त निप्पलों को कपड़े के ऊपर से दबा रही थीं। हर दबाव के साथ मेरी चूत में और ज्यादा गीलापन भर रहा था, मेरी साँसें भारी और तेज हो रही थीं। मेरी आँखें कामुक मस्ती में धीरे-धीरे बंद होती जा रही थीं।

मेरा हाथ अब उसके लंड की तरफ बढ़ चला। पैंट के कपड़े के ऊपर से ही उसका लंड पूरी तरह खड़ा और सख्त हो चुका था। उसकी मोटी, लंबी उभार इतनी तेज थी कि पैंट का कपड़ा तनकर चमक रहा था। मैंने पैंट के ऊपर से ही उसकी पूरी लंबाई को सहलाना शुरू कर दिया। मेरी उँगलियाँ उसके लंड के सिरे से लेकर जड़ तक ऊपर-नीचे सरक रही थीं, उसे हल्के-हल्के दबा रही थीं। ऐसा लगा जैसे उसका लंड पैंट फाड़ कर बाहर आ जाएगा।

अनिल के हाथ मेरे शरीर को दबा-दबा कर सहला रहे थे। उसकी उँगलियाँ मेरे स्तनों को कुरते के ऊपर से मसल रही थीं, निप्पलों को कपड़े के माध्यम से चुटकियों से दबा रही थीं, जिससे मेरी उत्तेजना हर पल बढ़ती जा रही थी। मेरी चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी, पजामा के कपड़े में गीलापन साफ महसूस हो रहा था। मैंने अब उसकी पैंट का जिप धीरे से नीचे खींचा और अंदर हाथ डालकर उसका लंड सीधे पकड़ लिया। वो अंदर अंडरवियर नहीं पहना था। लगा कि वो भी इसी तैयारी के साथ आया था, जैसे पहले से ही इस पल की कल्पना कर रहा हो।

“हाय रे… मसल दो… हाय… तुमने अंडरवियर नहीं पहनी है…” मैंने धीमी, कामुक आवाज में कहा।

“नहीं… मैंने तो जान-बूझकर नहीं पहनी थी… पर तुमने भी तो नहीं पहनी है…” अनिल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, उसकी आवाज में भी उत्तेजना साफ झलक रही थी।

“मैंने भी जान-बूझकर नहीं पहनी थी…” मैंने कहा। तो आग दोनों तरफ लगी थी, और अब कोई रोक-टोक नहीं बची थी।

मैंने उसके लंड को खींचकर पैंट से पूरी तरह बाहर निकाल लिया। लंड अब खड़ा और सख्त था, नसें उभरी हुईं, गर्म और फड़कता हुआ। मैंने इधर-उधर झांककर देखा। बस में सभी यात्री अपनी-अपनी जगहों पर आराम कर रहे थे, कोई ध्यान नहीं दे रहा था। बस तेजी से अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी, इंजन की आवाज और सड़क के झटके हमें और उत्तेजित कर रहे थे।

उसके लंड को देखकर मेरे मुंह में पानी आ गया। मैंने अपनी उँगलियों से उसकी सुपारी के ऊपर की चमड़ी को धीरे से पीछे खींचा और ऊपर चढ़ा दिया। उसकी लाल-लाल, चमकदार सुपारी बाहर आ गई, जो खिड़की से आ रही हल्की-हल्की सड़क की रोशनी में बार-बार चमक उठ रही थी। मैंने अपना सिर झुकाया और उसकी सुपारी को अपने गर्म, नम मुंह में ले लिया। मेरी जीभ ने पहले सुपारी के चारों ओर चक्कर लगाया, फिर उसे चूसने लगी। साथ ही मैंने नीचे से उसका लंड मजबूती से पकड़ा और मुठ मारना शुरू कर दिया। मेरी उँगलियाँ उसकी पूरी लंबाई पर ऊपर-नीचे सरक रही थीं, कभी जड़ को दबातीं, कभी सुपारी को हल्के से मसलतीं।

मेरी हालत भी कुछ कम नाजुक नहीं थी। मैंने अपने पजामे का नाड़ा खोल दिया था। पजामा अब ढीला हो चुका था, मेरी चूत की गर्माहट और नमी हवा में फैल रही थी। अनिल ने अब पीछे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरी गांड की गोलाइयों को दबाना शुरू कर दिया। उसकी हथेलियाँ मेरे भरे हुए चूतड़ों को मसल रही थीं, उँगलियाँ दरार में सरक रही थीं। वह दरार में गहराई तक हाथ डालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मैं बैठी हुई और आगे झुकी हुई थी, इसलिए उसे मेरी चूत के पूरे दर्शन नहीं हो रहे थे। फिर भी उसके हाथ बड़ी तेजी से चल रहे थे, मेरे चूतड़ों को दबा-दबाकर, सहलाकर, कभी हल्के थप्पड़ मारकर।

उसने मेरी चूचियों को मसल-मसलकर मुझे पूरी तरह बेहाल कर दिया था। मेरे मुंह में उसका लंड था, इसलिए मैं आह भी नहीं निकाल पा रही थी, सिर्फ दबी हुई सिसकारियाँ मेरे गले से निकल रही थीं। मेरी जीभ उसके लंड पर तेजी से घूम रही थी, सुपारी को जोर-जोर से चूस रही थी।

अनिल ने धीरे से कहा, “नेहा… बस करो… छोड़ दो अब…”

“नहीं… अभी नहीं… राम रे… मजा आ रहा है…” मैंने कहा और उसकी सुपारी को और जोर से चूसने लगी। साथ ही मैंने मुठ को और तेज कर दिया, मेरी उँगलियाँ उसकी लंबाई पर तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थीं, कभी जड़ को दबातीं, कभी सुपारी को मुंह में लेकर चूसतीं।

वो खुद को अब रोक नहीं पा रहा था। दबी जुबान से मस्ती के शब्द निकल रहे थे… “अरे… बस… अब नहीं… बस… बस… हाय… निकल रहा है… नेहा…”

कहते हुए उसका लावा उबल पड़ा। उसका लंड फड़कने लगा और रुक-रुककर पिचकारियाँ छोड़ने लगा। पहली गरम, गाढ़ी फुहार सीधे मेरे मुंह में जा गिरी। मेरे मुंह में उसकी सुपारी तो थी ही, रस भरने लगा। मैंने गट-गट करके पूरा रस पी लिया, जीभ से हर बूंद चाट ली। फिर मैंने धीरे-धीरे चूसकर उसके लंड को साफ कर दिया, सुपारी पर बची आखिरी बूंद भी जीभ से चाट ली।

मैं अब बैठ गयी। उसने भी अपने कपड़े ठीक कर लिए। मैंने भी पजामे को ठीक करके नाडा बाँध लिया। ग्वालियर में बस पहुँच चुकी थी। बस की लाइट जल उठी। बस स्टैंड पर आ कर धीरे-धीरे रुक गयी।

कंडक्टर जोर से चिल्ला रहा था…. “१५ मिनट का स्टॉप है ….. नाश्ता कर लो ….. सभी अब अपने अपने स्लीपर पर चले जाए ..”

हम दोनों बस से उतर गए। ठंडी रात की हवा ने मेरे चेहरे को छुआ और मेरी उत्तेजित त्वचा पर सिहरन दौड़ा दी। हम स्टैंड के एक छोटे से स्टॉल पर गए और दो ठंडी कोल्ड ड्रिंक की बोतलें लीं। अनिल ने एक घूँट लिया और मेरी आँखों में देखते हुए मुस्कुराया।

“नेहा .. मजा आ गया … तुम्हारे हाथों में तो जादू है …..”

मैंने बोतल होंठों से लगाई, एक लंबा घूँट लिया और फिर धीरे से जवाब दिया, “और तुम्हारे हाथों ने तो मुझे मसल कर ही रख दिया …..” मैं मुस्कराई, मेरी आँखों में शरारत झलक रही थी।

उसने और करीब आकर, आवाज़ को और भी धीमा करते हुए पूछा, “मेरा लंड कैसा लगा …….”

मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए, बिना झिझक के कहा, “यार है तो खूब मोटा …… पर जब चूत में जाएगा तो पता चलेगा .. कि कैसा है ..”

दोनों ही जोर से हंस पड़े। हमारी हँसी में उन्माद और इंतज़ार दोनों घुले हुए थे।

बस का टाइम हो रहा था। हम दोनों तेज़ी से बस में वापस चढ़ गए और सीधे नीचे वाली दोनों स्लीपर बर्थ की तरफ़ बढ़ गए। दोनों सीटें खाली थीं। हमने चादर को एक तरफ़ सरका दिया और दोनों एक साथ लेट गए। बस ने फिर से इंजन स्टार्ट किया और धीरे-धीरे गति पकड़ ली। मुझे अभी चुदवाना बाकी था, मेरी चूत में जलन और खालीपन दोनों महसूस हो रहे थे।

मैंने अनिल की तरफ़ मुड़कर फुसफुसाई, “अनिल मैंने नाडा खोल लिया है ……. तुम भी पेंट नीचे खींच लो न ..”

अनिल की साँसें तेज़ हो गईं। वह उत्साह से बोला, “चुदवाने का इरादा है …… ठीक है ..”

उसने फटाफट स्लीपर का परदा पूरी तरह खींचकर बंद कर दिया। परदे के अंदर अंधेरा गहरा हो गया, सिर्फ़ बाहर की हल्की स्ट्रीट लाइट्स के छींटे किनारों से आ रहे थे। इतने में बस की सभी लाइटें भी बंद हो गईं। अनिल ने अपनी पैंट और अंडरवियर दोनों को जांघों तक नीचे धकेल दिया। अब हम दोनों नीचे से पूरी तरह नंगे थे। उसका मोटा, सख्त लंड पहले से ही खड़ा और गरम था। उसने चादर को अपने और मेरे ऊपर डाल ली और मुझे कमर से ज़ोर से पकड़कर अपनी छाती से सटा लिया। मेरी चिकनी, गोल, मुलायम गांड उसके नंगे पेट और जांघों से पूरी तरह चिपक गई।

उसके लंड ने तुरंत प्रतिक्रिया दिखाई। वह और सख्त होकर फड़कने लगा। उसकी मोटी, नसों से भरी शाफ्ट बार-बार मेरी दोनों चूतड़ों की गहरी दरार में दबाव डालने लगी, जैसे अंदर घुसने की ज़िद कर रही हो। मैंने हल्के से कमर को पीछे करके अपनी गांड को और दबाया तो उसका लंड मेरी चूतड़ों के बीच और गहराई तक फंस गया। उसकी गर्म साँसें मेरी गर्दन पर पड़ रही थीं, हर साँस के साथ मेरी त्वचा पर सिहरन दौड़ रही थी।

मैंने मुड़कर उसकी तरफ़ देखा। अनिल ने तुरंत मेरे गले पर होंठ रख दिए। पहले धीरे-धीरे चूमा, फिर जीभ निकालकर मेरी गर्दन की नरम त्वचा को चाटा, हल्के से काटा भी। साथ ही उसने अपनी कमर को और ज़ोर से आगे धकेला। उसका मोटा, गरम, सख्त लंड मेरी दोनों गोल, चिकनी, मुलायम गांडों को बीच से चीरता हुआ आगे बढ़ा। उसकी चिकनी, गोल टोपी ने मेरी गांड के तंग, सिकुड़े हुए छेद पर दबाव डाला। उसने और जोर लगाया तो टोपी ने छेद को हल्का सा खोलते हुए दबाया और वहीं रुक गई, जैसे अभी और गहराई में जाने की तैयारी में हो। उसका पूरा लंड मेरी गांड की दरार में दबा हुआ था, उसकी हर फड़कन मेरी त्वचा में महसूस हो रही थी।

मुझे लग रहा था कि वो जल्दी से अपने लंड को मेरी गांड में घुसेड़ दे। मैंने एक हाथ पीछे बढ़ाकर उसके चूतड़ पकड़ लिए और अपनी तरफ़ जोर से चिपका लिया। मेरी उंगलियाँ उसके मजबूत, सख्त नितंबों में धंस गईं और मैंने उसे और गहराई से अपनी ओर खींचा। अनिल ने भी अपनी पोज़िशन ठीक की, कमर को थोड़ा ऊपर उठाया और अपने मोटे, गरम लंड की सुपारी को मेरी गांड के तंग छेद पर सटीक दबाव के साथ रख दिया। उसने हल्का सा धक्का दिया तो उसकी चिकनी, गोल सुपारी फक की आवाज़ के साथ मेरे तंग छेद को खोलते हुए अंदर सरक गई।

मेरे मुंह से एक गहरी, दबी हुई आह निकल गई। दर्द और सुख दोनों का मिश्रण था। अनिल ने अपना लंड थोड़ा बाहर खींचा, सिर्फ़ सुपारी तक, और फिर एक तेज़, गहरा झटका दिया। उसका मोटा लंड मेरी गांड की दीवारों को फैलाते हुए और अंदर घुसता चला गया। हर इंच के साथ मुझे महसूस हो रहा था कि मेरा छेद कितना खिंच रहा है, कितना भर रहा है। उसका लंड धीरे-धीरे, लेकिन लगातार अंदर सरकता जा रहा था।

जैसे-जैसे वो धक्के मारता रहा, लंड और गहराई तक बैठता गया। आखिरकार उसका पूरा मोटा, नसों से भरा लंड मेरी गांड में पूरी तरह समा गया। उसकी जड़ मेरी चूतड़ों से सट गई। अनिल अब रिलैक्स होकर लेट गया, उसकी साँसें भारी लेकिन संतुष्ट थीं। अब वो मजे से मेरी गांड चोद रहा था। उसके धक्के शुरू में धीमे थे, लेकिन धीरे-धीरे तेज़ होने लगे। हर धक्के के साथ उसका लंड मेरी गांड की गहराई तक जाता और बाहर आता, मेरी आंतरिक दीवारों को रगड़ता हुआ। मुझे भी अब मजा आने लगा था। दर्द अब सुख में बदल चुका था, और हर धक्के के साथ मेरी चूत में भी गुदगुदी होने लगी।

अचानक अनिल ने मुझे पलटकर सीधा लेटा दिया। उसने मेरी टांगें थोड़ी फैलाईं और मेरे ऊपर चढ़ गया। उसका मोटा लंड अब मेरी चूत के मुंह पर टिका। एक ही जोरदार धक्के में, बस के झटकों की मदद से, उसका पूरा लंड मेरी चूत में एक बार में अंदर तक बैठ गया। उसकी मोटाई ने मेरी चूत को पूरी तरह भर दिया। मैं खुशी और उत्तेजना के मारे जोर से सिसकारी भरने लगी।

“धीरे …. नेहा …धीरे …”

“अनिल ..मैं मर जाऊंगी …हाय …”

उसने तुरंत मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए, मेरी आवाज़ को दबा दिया। उसकी जीभ मेरे मुंह में घुस गई, मेरी जीभ से खेलने लगी। मैं कुछ बोल नहीं पाई। मेरी उत्तेजना अब चरम पर पहुँच रही थी। मैंने अपनी चूतड़ों को ऊपर-नीचे हिलाकर उसके धक्कों का जवाब देने लगी। मेरी चूत उसके लंड को और जोर से निचोड़ रही थी। अब मुझे साफ़ लगने लगा कि मैं झड़ने ही वाली हूँ।

नीचे आग लगी हुई थी। मेरी चूत में मीठी-मीठी गुदगुदी तेज़ हो उठी। मेरे मन में सिसकारियाँ भर रही थीं। अब लग रहा था कि बस थोड़ी देर और… मैं गयी। मैंने अपनी चूत को ऊपर दबाते हुए जोर से पानी छोड़ना शुरू कर दिया। मेरी चूत से गरम, पतला रस तेज़ी से निकलने लगा, उसकी लंड को भिगोते हुए। मेरा मुंह उसके होंठों से चिपका हुआ था, मैं कुछ बोल नहीं पाई और अब पूरा पानी छोड़ दिया।

उधर अनिल ने भी अपनी रफ़्तार और तेज़ कर दी। उसके धक्के अब और ज़ोरदार, और गहरे हो गए थे। मैं झड़ चुकी थी और अब उसका लंड का मोटापन और उसका भारीपन मेरी संवेदनशील चूत में और ज़्यादा महसूस हो रहा था। अचानक ही उसके लंड का दबाव मेरी चूत में बहुत बढ़ गया। उसका लंड फड़कने लगा।

मेरे मुंह से एक दबी हुई चीख निकली, जो उसके होंठों में ही दब गई। मुझे अपनी चूत में अब गरम-गरम रस निकलता हुआ महसूस होने लगा। उसके वीर्य की गर्माहट मेरी चूत की दीवारों पर फैल रही थी, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। अनिल निढाल होकर मेरे बगल में लुढ़क गया। उसका लंड धीरे-धीरे मेरी चूत से बाहर सरका और उसके साथ-साथ उसका गाढ़ा वीर्य मेरी चूत से बहने लगा। मैंने जल्दी से चादर को अपनी चूत पर लगा दी। वीर्य रिसता रहा, मैं उसे हाथ से पोंछती रही, लेकिन वह गर्म और चिपचिपा था।

अचानक लगा कि कोई सिटी आने वाला है। मैंने अनिल को उठाने के लिए हिलाया, लेकिन वो गहरी नींद में सो चुका था। मैंने अपने कपड़े ठीक कर लिए। अनिल के पैंट को भी ऊपर खींचकर ठीक किया और उसके ऊपर चादर ओढ़ा दी। बस रुक चुकी थी। धौलपुर आ गया था। यहाँ पर यात्री डिनर के लिए उतरते हैं, पर मैं एक करवट लेकर अनिल से चिपक कर सो गई………….

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