Sauteli maa ki chudai sex story – Beta ka mota lund sex story: जब एक ही छत के नीचे अवैध रिश्ते पनपते हैं तो उन्हें या तो अंत तक निभाना पड़ता है या फिर उनका अंत अच्छा नहीं होता। ऐसा ही कुछ मेरे और मेरे सौतेले बेटे के बीच पनप गया। मैं विधवा हो गई थी और मेरे बेटे की पत्नी भी चल बसी थी। मैं दीनदयाल की दूसरी माँ थी। मेरे और दीनदयाल के बीच करीब दस साल का अंतर था। मैं उससे दस साल बड़ी थी लेकिन वो मेरी बहुत इज्जत करता था।
दीनदयाल पुलिस में था। इससे पहले कि मेरी गोद भरती, मेरे पति यानी दीनदयाल के पापा भी चल बसे। दीनदयाल की उम्र बत्तीस साल की थी। मेरी चाहत थी कि मैं अपने बेटे की दूसरी शादी करवाऊँ लेकिन वो हमेशा मना कर देता था। एक रात, करीब ग्यारह बजे, मैं धीरे से उसके कमरे के बाहर गई और खिड़की से झाँका। जो देखा तो मेरा दिल धक धक करने लगा। दीनदयाल गोल तकिए का सहारा लेकर बैठा था। बाएँ हाथ में किताब खुली हुई थी। उसका तना हुआ लंड देखकर मैं हैरान रह गई कि क्या मेरा सौतेला बेटा इतना मोटा लंबा हथियार रखता है। वो दायीं मुट्ठी में उसे जकड़े हुए था। धीरे धीरे ऊपर नीचे कर रहा था। हर स्ट्रोक के साथ चमड़ी की फच फच की आवाज कमरे में गूंज रही थी। उसकी सांसें तेज थीं और लंड की नोक पर चिपचिपा प्री कम चमक रहा था, जैसे कोई मीठा रस टपकने को तैयार हो। मेरी छाती धड़कने लगी। जाँघों के बीच एक गर्म सिहरन उठी। काश ये मेरी चूत में घुसता, मुझे रगड़ता। मैं कामुक हो उठी। मेरी ब्रा में निप्पल कड़े हो गए और नीचे पैंटी गीली होने लगी। शर्म से भागी लेकिन मन में वो दृश्य चिपक गया, रात भर तड़पाती रही।
फिर मुझे शर्म आ गई और मैं वापस अपने कमरे में आकर दीनदयाल के बारे में सोचने लगी। मेरी नींद उड़ गई थी। सुबह जब वो ऑफिस चला गया तो मैंने उसके बिस्तर के नीचे एक मैगजीन देखी जिसमें कई सुंदर औरतें अपने गोपनीय अंगों को मसल रही थीं। तो क्या मेरा बेटा रात को औरतों के निजी अंगों को देखता था। मैंने मैगजीन उठा ली और अपने कमरे में ले आई। फिर बिस्तर पर लेटकर शुरू से देखने लगी। उसमें ऐसे ऐसे सीन थे कि मुझे एक तंदरुस्त मर्द की जरूरत महसूस होने लगी। साथ ही मेरा सिर शर्म से झुक गया कि मेरा जवान बेटा इतनी कामुक सोच रखता है। उसमें हर उम्र के मर्द और औरतें सम्भोगरत थे। लड़कियाँ अधेड़ मर्दों से अपने कोमल जिस्म को रौंदने दे रही थीं। कई तस्वीरों में लड़कियों की चूत से सफेद गाढ़ा वीर्य बाहर आ रहा था। मैं भी कल्पनाओं में खो गई कि काश कोई मर्द मेरी चूत को भी अपने बड़े लंड से थरथरा देता। लेकिन इस उम्र में मैं यह बात किसी से कह नहीं सकती थी।
कई तस्वीरों में जवान लड़के अधेड़ महिलाओं के जिस्म को रौंद रहे थे। मैं इतनी उत्तेजित हो गई कि मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी हो गई। मैं शीशे के सामने अपने गोरे बदन को घुमाकर देखने लगी। मैंने लगभग दो हफ्ते पहले अपनी जाँघों के बीच से झाँटें साफ की थीं। मेरी चूत में जबरदस्त सुलगन होने लगी। तभी नीचे से चार पाँच बूँदें टपक पड़ीं। मैं छटपटाते हुए अपनी दायीं जाँघ उठाकर टेबल पर रख दी, इस आस में कि कोई जवान मर्द मेरी चूत की आग को अपनी मोटी कड़क लंड से बुझा दे और तब तक पेलता रहे जब तक मेरी पेशाब न निकल जाए। मुझे उन अधेड़ महिलाओं से जलन हो रही थी जो जवान लड़कों के लंड से अपनी चूत बजवा रही थीं।
तभी मेरे दिमाग में एक शैतानी विचार आया कि दीनदयाल भी तो औरत के बिना तड़प रहा है। क्यों न मैं घर में ही अति गोपनीय तरीके से दीनदयाल को उत्तेजित करके उसकी कड़क जवानी का आनंद उठाऊँ। मैंने वो किताब छिपाकर रख दी ताकि दीनदयाल को पता चले कि मम्मी को सब मालूम हो गया है। शाम को दीनदयाल आया। उसने किताब ढूँढी होगी। दो दिन तक वो थोड़ा परेशान रहा कि किताब कहाँ गई लेकिन तीसरे दिन उसके जाने के बाद मैंने किताब का वो पेज मोड़ दिया जिसमें एक अधेड़ महिला को डॉगी स्टाइल में चोदा जा रहा था और फिर से उसी जगह रख दी। अगले दिन वो अजीब सी नजरों से मुझे घूर रहा था।
अगले दिन सुबह मुझे उसी जगह वो किताब मिली और उसका वो पेज मुड़ा हुआ था जिसमें एक अधेड़ महिला एक जवान लड़के का लंड चूस रही थी। दीनदयाल बहुत सेक्सी था। मैं उसकी इच्छा समझ गई। मैंने उस दिन वैसे ही किताब रख दी लेकिन अगले दिन मुझे उसमें एक ताजा गुलाब का फूल मिला। मैंने उसे निकाल लिया और शाम को उसमें चमेली का सफेद फूल रख दिया। मैंने उसका प्यार स्वीकार कर लिया था। लेकिन अगले दिन जब वो ऑफिस चला गया तो उसमें एक कंडोम रखा हुआ मिला। मैं थोड़ी असहज हो गई क्योंकि दीनदयाल मेरी असलियत जान चुका था। इसलिए उसने कंडोम रख दिया था। मैंने सोचा कि क्यों न इस कहानी को यहीं खत्म कर दूँ लेकिन कंडोम देखकर मेरा बदन अंगड़ाई लेने लगा। मैंने कैंची से उसका मुँह काटकर थोड़ा बाहर निकाल दिया। हम दोनों ने इस तरह अपनी इच्छा बता दी थी।
अगले दिन सुबह उस किताब में मुझे एक छोटा कागज का टुकड़ा मिला। उसे खोलते हुए मेरा दिल धक धक करने लगा। उसमें लिखा था कि क्या ये काम पूरा हो जाएगा जो मैं सोच रहा हूँ। मैंने बिना देरी के उसके नीचे लिख दिया हाँ लेकिन प्यासे को कुएँ के पास आना पड़ेगा। ये लिखकर मैंने कागज वैसे ही मोड़कर रख दिया। शाम को हम टेबल पर एक साथ खाने बैठे तो हम दोनों की नजरें झुकी हुई थीं लेकिन दिल धड़क रहे थे। अगले दिन सुबह फिर मुझे नया कागज मिला जिसमें लिखा था रात में कितने बजे। मैंने लिख दिया रात को ग्यारह के बाद।
फिर रात मैं दीनदयाल का इंतजार करती रही और इस उम्मीद में मैंने अपना पेटीकोट दायीं जाँघ से उठाकर करवट लेकर सो गई लेकिन दीनदयाल नहीं आया और मैं कामवासना में सारी रात तड़पती रही। अगले दिन मुझे फिर बिस्तर के नीचे नया कागज मिला कि दिन में हम कैसे मिलेंगे। मैंने लिख दिया कि नहीं दिन में नहीं सिर्फ रात को। दिन में हमारे संबंध वही रहेंगे जो हैं। उसने उसी कागज पर लिखा कि कहीं मैं गलत तो नहीं समझ रहा। मैंने लिखा नहीं ताली दोनों हाथों से बजती है और आज रात प्यासे की प्यास बुझ सकती है लेकिन कुएँ का मुँह थोड़ा टाइट है किसी ने भी उसमें से अपनी प्यास नहीं बुझाई। कुआँ अच्छी मरम्मत मांग रहा है। कागज लिखते हुए मेरी उंगलियाँ काँप रही थीं। ये मेरा सौतेला बेटा है पुलिस वाला मजबूत लेकिन मैं उसकी कमजोरी बनूँगी। मन में डर था लेकिन चूत की आग ज्यादा थी जैसे गाँव की वो गाय सांड के नीचे तड़पती थी मैं भी वैसी बनना चाहती थी।
अगले दिन किताब तो मिली लेकिन उसमें कुछ नहीं लिखा था। फिर मैंने और पेज देखे तो एक कागज मिला लिखा हुआ था कि ठेकेदार पूरे एरिया का मुआयना करना चाहे तो क्योंकि कुआँ कहाँ है देखना पड़ेगा न। मैंने लिख दिया कुआँ दो पहाड़ों के बीच घिरा है थोड़ी कोशिश करोगे तो ढूँढ लोगे और हाँ चूचियाँ भी हैं लेकिन उनमें रस नहीं है। उसने लिखा कुआँ तो ज्यादातर तलहटी में ही रहता है लेकिन ऐसा तो नहीं कि अंत समय पर कुएँ की मालकिन कुएँ को ढक दे और मरम्मत के दौरान अगर ठेकेदार का कुछ सामान वहाँ छूट गया तो। उसके जवाब में मैंने लिखा कि वो सामान उसके कुएँ में नौ महीने तक सुरक्षित रहेगा और फिर वापस मिल जाएगा।
तो अगले दिन लिखा मिला मरम्मत तो ऐसी होगी कि कुएँ की मालकिन ने भी कभी नहीं देखी होगी और हाँ आसपास की भी तबीयत से मरम्मत हो जाएगी ठेकेदार का हथियार देख लिया था ना। दीनदयाल को आभास था कि मैंने उसका हथियार देख लिया था। दीनदयाल मेरे दोनों छेदों का मजा लेने को बेताब था। मैंने कागज में लिख दिया कि हाँ देख लिया था तभी तो कुआँ मरम्मत मांग रहा है लेकिन कब होगी कुएँ की मरम्मत। बस फिर जो मैसेज मिला उससे मुझे थरथराहट सी महसूस हुई क्योंकि दीनदयाल का लंड मैंने देख लिया था वो सीधा और बिना नसों वाला दिख रहा था। वो जवान था और शनिवार की रात को मेरे बदन से कैसे खेलेगा। मैं उन कल्पनाओं में खो गई जब मैं सिसकारियाँ भरूँ और वो अपने लंड से मुझे चोद रहा हो।
अगले दिन किताब में लिखा था कि कुएँ की मरम्मत शनिवार की रात होगी और तसल्ली से होगी कुएँ को अंधेरा पसंद है या डिम लाइट। आज शुक्रवार था इसलिए मैंने दिल पर पत्थर रख लिया। मैंने शनिवार सुबह कागज पर लिख दिया कि कुएँ को अंधेरा पसंद है क्योंकि मैं और वो दोनों माँ बेटे थे और मैं शर्माना नहीं चाहती थी। उसका तो पता था कि वो ड्रिंक करके ही मेरी चूत लेगा। मुझे डर लगने लगा क्योंकि दीनदयाल कई दिनों से प्यासा था और उसका लंड काफी बड़ा था सात से साढ़े सात इंच लंबा और करीब सवा दो इंच मोटा।
शनिवार को दिन में मेरे फोन पर एक अंजान नंबर से मिसकॉल आई। मैंने कॉल उठाई तो कोई जवाब नहीं। फिर कुछ देर बाद मैसेज आया कि अच्छी तरह आराम कर लेना क्योंकि आज कुएँ की मरम्मत होनी है खुदाई और मरम्मत देर तक चलेगी क्योंकि कुआँ काफी पुराना है। तब मेरे दिमाग की घंटी बजी कि ये दीनदयाल का ही मैसेज है। मैं इतनी खुश हुई कि कमरे में चटकनी मारकर अपने कूल्हे देखे और अपनी चूत को छुआ। मेरी रातें फिर रंगीन होने वाली थीं।
शाम को ठीक सात बजे मैं नहाई। ब्रा नहीं पहनी। काले रंग का पेटीकोट और लाल साड़ी पहनी। मैंने खाना पौने नौ बजे खा लिया और दीनदयाल के लिए टेबल पर लगा दिया। बरसात के दिन थे। रात मैं काफी देर तक उसका इंतजार करती रही। मैंने कमरे के पल्ले बंद कर दिए। फिर पता नहीं कब नींद आ गई। कमरे में पंखा तेज चल रहा था।
मैं दायीं करवट लेटी हुई थी। तभी मुझे लगा कि कोई मेरे बिस्तर पर आकर मेरे पीछे लेट गया। वो दीनदयाल के सिवा कोई नहीं था। मैं सीधी लेटी हुई थी। मुझे अपनी सांसों में शराब की गंध आई। शायद वो मेरे चेहरे के बहुत करीब था। फिर मैंने अपने होंठों पर बहुत धीरे से चुम्बन महसूस किया। मेरा बेटा मुझे चूम रहा था। मेरे तन बदन में कामवासना भड़कने लगी। आह्ह। मैं बिलकुल अनजान बनकर लेटी रही। मुझे करीब छह साल से कामसुख नहीं मिला था। एक बार मन हुआ कि उसके हाथ पकड़कर एक थप्पड़ मारूँ लेकिन फिर सोचा कि ये जवान तगड़ा लड़का है और कामवासना में जल रहा है। अपनी प्यास तो मेरे बदन से बुझा ही लेगा। अगर बाद में डाँटूँगी तो घर छोड़कर जा सकता है। इस कमजोरी ने मेरे हाथ बाँध दिए।
मेरी हालत ऐसी थी कि मुझे भी मर्द की जरूरत थी। जो बात मैं अपने बेटे से कभी न कह सकी वो इच्छा मेरा बेटा पूरी करने वाला था। फिर मैंने महसूस किया कि वो मेरे ब्लाउज का ऊपरी बटन खोलने लगा और अंदर हाथ डालकर मेरी दायीं चुची धीरे से मसल दी। ओह्ह दीनदयाल। उसकी हथेली गर्म थी, चुची को दबाते हुए निप्पल को उंगलियों से रगड़ रहा था। मेरी सांसें तेज हो गईं। शायद वो भी समझ रहा था कि मैं सोने का नाटक कर रही हूँ। बस इसके बाद मेरी चूत गीली हो गई और मन हुआ कि दीनदयाल आज सारे बंधन तोड़कर मुझे जकड़ ले। हम दोनों मस्ती में डूब जाएँ। मेरे निप्पल तन चुके थे। चूत में जबरदस्त सुलगन थी। मेरा मन उसकी मर्दानगी देखने और महसूस करने को तड़प रहा था। मैं अपने बेटे का मजबूत लंड हाथ और मुँह में लेकर चूसना चाहती थी लेकिन मजबूर थी कि कहीं वो शर्म से भाग न जाए और मैं उस रात प्यासी न रह जाऊँ।
मेरा बेटा दीनदयाल भी करीब दो साल से बिना औरत के था। मुझे लगा कि उसकी गुनहगार मैं हूँ। शारीरिक पूर्ति उसका हक था। तभी मुझे महसूस हुआ कि वो बेड पर ही अपना अंडरवियर उतार रहा है। मेरा जिस्म मदहोशी से थरथराने लगा। मुझे लगा मेरा पेटीकोट जाँघों तक उठ चुका है। मन हो रहा था कि दोनों जाँघें फैलाकर दीनदयाल को मदहोश कर दूँ। दीनदयाल बहुत धीरे मेरे पेटीकोट को हटा रहा था। शायद वो भी इतने करीब आकर प्यासा नहीं रहना चाहता था। उसने बहुत धीरे से मेरी दोनों जाँघें बारी बारी चौड़ी कर दीं। उसके हाथ अब मेरी जाँघों की गोलाई टटोल रहे थे। मेरी जाँघों के बीच उन दिनों छोटे छोटे बाल थे। तभी उसकी उंगलियाँ उन बालों में चलती महसूस हुईं। मैंने अंधेरे में देखने की कोशिश की कि उसके चेहरे पर क्या भाव हैं। कमरे में उसकी उत्तेजना की मुस्की गंध फैलने लगी थी।
तभी मैंने अपनी चूत पर उसकी गर्म साँसें महसूस कीं। शायद वो मेरी चूत चाटना चाहता था। उसने तीन चार बार जीभ निकालकर कोशिश की, हर बार मेरी जाँघों को चाटता हुआ ऊपर आता लेकिन सही जगह नहीं लग रही थी। उसकी जीभ की गर्माहट से मेरी चूत और सुलग उठी। मेरा मन हो रहा था कि दीनदयाल मेरे कूल्हों को हथेलियों में लेकर चूत चाट ले। मैं उसे कैसे कहती। एक बार जी हुआ कि बकरी की तरह झुक जाऊँ और दीनदयाल मेरी चूत चाटे जैसे सांड गाय की चूत चाटता है। मुझे इसलिए पता था क्योंकि गाँव में रहती थी। जानवर थे। कई बार सांड को गाय की पूँछ के नीचे चाटते देखा था। गाय गौंत देती थी। फिर सांड दौड़ता था और गाय की कमर पर पैर टिकाकर रगड़ता था। मेरे मन में भी यही ख्याल आया कि काश दीनदयाल मुझे वैसी ही चाटे और फिर चोदे। तभी मेरी चुचियों पर उसके हाथ महसूस हुए। वो धीरे धीरे दबा रहा था। आह्ह दीनदयाल। मेरी नींद खुली थी लेकिन नाटक करती रही। बहुत अच्छा लग रहा था। उसकी उंगलियाँ निप्पल को मरोड़ रही थीं, हल्का दर्द और सुख की लहर दौड़ रही थी।
कमरे में दीनदयाल के अलावा कौन हो सकता था। रात साढ़े ग्यारह होंगे। घुप्प अंधेरा था। उसके इस तरह चुचियाँ दबाने से बहुत अच्छा लग रहा था। गर्मी ज्यादा होने से मैंने साड़ी उतारकर बिस्तर पर फेंक दी थी क्योंकि तेज रंग से मर्द ज्यादा कामुक हो जाते हैं। वो मेरा पेटीकोट धीरे धीरे ऊपर सरका रहा था। मेरी दायीं जाँघ मुड़ी हुई थी बायीं सीधी। पेटीकोट कूल्हों तक उठ चुका था। तभी मेरी जाँघ पर उसकी हथेली का स्पर्श हुआ। मेरे रोम रोम में मस्ती छा गई। उसकी गर्म हथेली जाँघों के जोड़ की तरफ फिसल रही थी। मुझे यकीन था कि आज दीनदयाल मेरी छह साल से अनछुई चूत सहलाएगा। तभी उसकी उंगलियाँ मेरी चूत के मांसल हिस्से को टटोलने लगीं। मैंने रेजर से करीब बीस दिन पहले झाँटें साफ की थीं इसलिए करकरी थीं। उसकी उंगलियाँ चूत की दरार में घुसकर रस को महसूस कर रही थीं। मेरी चूत से चिपचिपी आवाज आ रही थी।
मैं स्लिम थी। कूल्हों का साइज पैंतीस इंच। उसकी उंगलियों की छुवन मेरी वासना भड़का रही थी। इस बात को वो नारी समझ सकती है जो सालों से मर्द की बाहों में नहीं सोई। दीनदयाल की उंगलियाँ मेरी चूत की दरार में मचल रही थीं। वो चूत की लंबाई का अंदाजा लगा रहा था। इतने अंधेरे में भी उसने मेरा दाना ढूँढ लिया। जैसे ही अंगूठे और उंगली से पकड़ा मन हुआ कि उसकी हथेली में पेशाब कर दूँ। आह इह्ह। उसने दाना सहलाना शुरू किया। दाना फूलने लगा। दोनों छेद सिकुड़ने लगे। फिर उसने चूत के होंठ टटोले लेकिन निराश हुआ क्योंकि उसके पापा भी मेरी चूत के होंठ बाहर नहीं निकाल सके थे। मैं न कली रह गई थी न फूल बनी।
तभी दीनदयाल के लंड से अजीब आवाज आई। शायद चमड़ी टकराने से। वो माँ के पास हस्तमैथुन करने लगा। मैंने उसके पापा को कई बार ऐसे करते देखा था माहवारी के दिनों में। तभी उसने मेरे दोनों पैर ढाई फीट दूर फैला दिए। मुझे उसके घुटने जाँघों पर महसूस हुए। वो उकड़ू बैठा था। घबरा भी रहा था और धड़क रहा था। फिर मेरे दोनों हाथ अपनी हथेलियों में फँसा लिए। मैं बेसुध नाटक कर रही थी।
दीनदयाल मेरे बदन पर छाता चला रहा था। तभी उसने मेरे होंठ अपने गर्म होंठों में भींच लिए। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने भी चूसना शुरू कर दिया। जब मैं समझ गई कि वो अब नहीं रुकेगा तो मैंने धीरे कहा दीनदयाल मुझे छोड़ो ये क्या कर रहे हो। लेकिन उसकी पकड़ तेज हो गई। उसने गरम सांसें मेरे कान में छोड़ी और बोला मम्मी बस एक बार तेरी टाइट चूत में अपना मोटा लंड डालने दे सालों से तड़प रहा हूँ चोदने दे ना प्लीज आह्ह तेरी गंध मुझे पागल कर रही है। मैं जन बुझकर मचलने लगी लेकिन उसने मुझे नीचे दबा लिया। दीनदयाल की हाइट साढ़े पाँच फीट थी। मैं जाँघें भींचने की कोशिश करने लगी। उसने घुटनों से फिर चौड़ी कर दीं। वो मेरी चुचियाँ मसलने लगा।
मेरी जाँघों के बीच उसका गर्म लंड टकरा रहा था। काफी भारी था। वो चूत को लंड से रगड़ने लगा। उसका सुपाड़ा मेरी चूत के होंठों पर फिसल रहा था। हर रगड़ के साथ चिपचिपा रस की स्मैक स्मैक आवाज आ रही थी। मैंने कहा दीनदयाल जो करना चाहता है वो मैं नहीं करने दूँगी। उसने सांस फूलते हुए कहा मम्मी प्लीज करने दो ना तेरी चूत की आग मुझे महसूस हो रही है। तभी उसने मेरे ब्लाउज के बाकी बटन खोल दिए। चुचियाँ मसल दी। आज वो मुझे किसी कीमत पर हासिल करना चाहता था। कान में फुसफुसाया मम्मी मुझे तेरी फुद्दी मारनी है तेरी चूत में अपना लंड पेलना है। मैं सन्न रह गई। ये गुंडों वाली भाषा थी लेकिन सुनकर मेरी चूत मचलने लगी। ओह्ह।
उसने चूत पर हाथ फेर दिया। मैं कल्पनाओं में खो गई। दिखावे के लिए मैंने उसका लंड पकड़ लिया लेकिन इतना मोटा सोचा न था। मेरे जिस्म में वासना की लहरें उठीं। मैंने तीन चार बार छेद से हटाया लेकिन दीनदयाल ने छिटक दिया। फिर निराश हुई कि सही जगह पहुँचकर पीछे क्यों हटा। तभी मेरी गांड पर गर्म अंगारा महसूस हुआ।
दीनदयाल ने मोटा सुपाड़ा मेरी गांड पर टिका दिया और कूल्हे हिलाने लगा। मुझे यकीन हो गया कि आज दीनदयाल मेरे बदन से दो साल की हवस मिटाएगा। सुपाड़ा गांड पर दबाव बना रहा था जैसे मोटा गरम डंडा खुदाई कर रहा हो। आह्ह। मैं तैयार नहीं थी। गांड में फटन सी लग रही थी। सोचा अगर जबरदस्ती गांड में घुसाएगा तो भाग जाऊँगी लेकिन जैसे उसने मन पढ़ लिया।
थोड़ी देर बाद उसका मोटा लंड मेरी चूत के नीचे पहुँच गया। दिल धक धक करने लगा। दीनदयाल ने दायाँ हाथ कूल्हे पर रखा। पंखा फुल स्पीड पर था। वो लंड से छेद चौड़ा करने लगा। अब मजा आने लगा क्योंकि प्राकृतिक था। मैं उसके मोटे लंड से चुदने को उत्सुक थी। मेरी चूत की दीवारें सुलग रही थीं। सालों की प्यास से थरथरा रही थीं। काश ये अब घुसे मुझे भरे फाड़े। वो धीरे धीरे दबाव बढ़ा रहा था। मेरी जाँघें काँप रही थीं और कमरे में हमारी उत्तेजना की मुस्की गंध फैल गई थी जैसे पसीने और रस का मिश्रण।
मैं कल्पनाओं में खोने लगी। तभी हलक से हिचकी निकली। दीनदयाल ने जोर का धक्का मारा। मेरी चूत पहले से लार टपका रही थी इसलिए सुपाड़ा फिसलकर अंदर सरक गया दीवारों को फैलाता हुआ। दर्द और सुख की लहर दौड़ी। मेरी चूत ने उसे जकड़ लिया जैसे कभी छोड़ना न चाहे। आह इह्ह ओह्ह दीनदयाल। दीनदयाल ने दाएँ हाथ से मुझे जकड़ लिया और धीरे धीरे लंड ठेलने लगा। अब मेरी चूत मस्ताने लगी। मोटे लंड से खिंचाव कम हो रहा था। सलवटें खुलने लगीं। बेहद मस्ती छाने लगी।
मन हो रहा था कि दीनदयाल मुझे मुंह करके चोदे। मैं अपनी चूत की जबरदस्त रगड़ाई करवाने को बेताब थी। दीनदयाल ने कुछ धक्के मारकर मुझे ऊपर ले लिया। मोटा लंड टाइट चूत में फँसा था। उसने दोनों जाँघें फैला दीं। मुझे आइडिया हो गया कि वो क्या चाहता है। तभी दीनदयाल ने कूल्हे ऊपर उछालना शुरू किया। आह ह ह ह्हीईई। उसने दोनों चुचियाँ जोर से निचोड़ीं। दर्द से मैं कराही। उसने कहा मम्मी क्या हुआ। मैंने कहा इतनी जोर से मत भींच।
बस फिर उसने मुझे लौड़े पर उछालना शुरू कर दिया। मैं मस्ताने लगी। मुँह से अजीब आवाजें निकलने लगीं। आह्ह्ह ओह्ह ऊउइ। सुपाड़ा बच्चेदानी की गाँठ को पीछे धकेल रहा था। दीनदयाल बार बार गांड उछाल रहा था। मोटा लौड़ा मुझे खुश करने लगा। चार पाँच मिनट बाद उसने मुझे मुंहा कर दिया। कूल्हे फैलाए और लौड़ा घुसा दिया। मैं सिसकारती हुई बोली दीनदयाल गांव के सांड की तरह चोद मुझे मेरी चूत चाट फिर पेल। वो हँसकर बोला हाँ मम्मी तू मेरी गाय है आज और जोर से गांड पर थप्पड़ मारा जिससे दर्द की मीठी लहर दौड़ी।
जबरदस्त धक्कों से मेरा जिस्म हिल रहा था। जाँघें मेरे कूल्हों से भट भट टकराने लगीं। बॉल्स दाने से। मैं खुद को तपती भट्टी महसूस कर रही थी जिसमें अपने बेटे की जवानी झुलसा रही थी। मेरी चूत छह साल से प्यासी थी। दीनदयाल ने रफ्तार बढ़ाई। कमरे में पंखे के अलावा बदनों की टकराहट की आवाज थी। तभी मेरी घुटी चीख निकली। उसने पूरी ताकत से मोटा लंड पेल दिया करीब पाँच इंच तक। आअह्ह्ह। उसने कराहते हुए कहा मम्मी कितने सालों बाद तेरी चूत में इतना मोटा लंड घुसा है ना फट रही है क्या। मैं सिसकारती हुई बोली हाँ मेरे राजा आह्ह तेरा लौड़ा मुझे फाड़ रहा है और जोर से पेल अपनी मम्मी की चूत को अपना रस दे।
मैंने कभी इतना मोटा लंड नहीं लिया था सवा दो इंच व्यास से कम नहीं। चीख सुनकर उसने गाल चूमे और कहा आज तुम सिर्फ मेरी हो। वो नशे में था। धक्का मारा। मैंने टाँगें उठा लीं। जैसे टाँगें उठाईं उसने टखनों से पकड़कर सिर की तरफ कर दीं। मोटा लंड गीली फुद्दी में जगह बना रहा था। मैं गर्दन हिला रही थी। ओह्ह दीनदयाल। दीनदयाल कूल्हों से धक्के मारकर फुद्दी रौंद रहा था। मुझे इच्छा हुई कि गर्भवती कर दे। दीनदयाल जोर लगा रहा था। अंधेरा अच्छा था वरना मजा नहीं आता। लंड नाभि के करीब पहुँचने लगा। मीठा दर्द बच्चेदानी में। सुपाड़े से गाँठ को मजा आने लगा। सात आठ मिनट बेरहम चुदाई के बाद लंड ने आठ नौ तेज गर्म फुहारें छोड़ीं। मेरी फुद्दी रौंद दी। ऊऊ ऊइईई।
दीनदयाल मेरे ऊपर पसर गया। गर्दन चूम रहा था। उसका लंड सिकुड़कर बाहर निकलने लगा। उसे झपकी आई। मैंने कूल्हों पर थपथपाया। नींद खुली। मैंने चार पाँच चुम्मियाँ लीं। उसने कहा पेशाब आ रही है। पेशाब करके आया। मैंने लाइट ऑन कर दी। वो नंगा था। लौड़ा झूल रहा था ढीला। मुझे छूने की इच्छा हुई। मैंने हथेली में ले लिया। न तना न शिथिल। साइज वही। मैं फर्श पर उकड़ू बैठ गई। गोटियों की चुम्मियाँ लीं। बड़े लौड़े से चुदने का अलग नशा। मैंने हथेली में लेकर हिलाना शुरू किया। दीनदयाल के चेहरे पर कामुक भाव देखे। वो समझ गया। नीचे झुककर होंठ चूम लिए। लौड़े में सख्ती आई। हमारी झिझक मिट चुकी थी।
उसने सिर के बाल जकड़े। मुँह में लंड घुसा दिया। मुश्किल से एडजस्ट किया। जीभ चलाई तो कूल्हे आगे पीछे हिलाने लगा। ग्ग्ग्ग गी गी गों गोग। मेरा मन फिर मर्दानगी देखने को लालायित हुआ। दो मिनट में उसने मुझे बाहों में उठा लिया। लौड़ा फुंकार रहा था। ड्राइंग रूम में सोफे पर ले गया। मुंहा कर दिया। मैं घबराई। उसने कहा आज तुम्हारे कुएँ की ऐसी मरम्मत करूँगा कि पिछला भूल जाओगी।
हिमाचली आड़ू जितना सुपाड़ा फुद्दी पर टिकाया। इधर उधर हिलाकर छेद में डाला। फिर कूल्हे पकड़े। मर्दानगी दिखानी शुरू की। सात मिनट तक डॉगी पोजीशन में मस्ताया। बीच में कूल्हों पर थप्पड़ मारे। मुझे सुख मिला। आह ह्ह्ह इह्ह। मेरी सिसकारियाँ उसे कामुक बना रही थीं। चूत से हवा निकलने लगी। जाँघें दर्द करने लगीं। मैंने कहा पोजीशन बदलो।
उसने कहा काश वो पेज न मोड़ा होता अब तुम्हारी इच्छाएँ पता हैं मन नहीं भरा तब तक चोदता हूँ। जोर से गहरा धक्का मारा। कमर दुहरी हो गई। आह्ह्ह ओह्ह। पति ने कभी ऐसा सुख नहीं दिया। उसने बाएँ हाथ से छाती घेरी। मुझे ऊपर उठाया। मुँह अपनी तरफ किया। चूत के नीचे लंड छुवा दिया। रोंगटे खड़े हो गए। आज लगा मर्दानगी नापने में भूल की। मुझे धीरे छोड़ना शुरू किया। जाँघों के नीचे हाथ लगाकर उठाता और छोड़ता। चूत का बुरा हाल हुआ। ऊईईई आह्ह्ह। मैंने रिक्वेस्ट की अब नीचे उतार दे। उसने कहा उतार रहा हूँ। धीरे फर्श पर खड़ी कर दी। चूत का अच्छा मर्दन हो चुका था। मुझे बाहों में कसा। कूल्हों से खेलने लगा। मेरा हाथ चिकने लंड को सहलाने लगा।
आँखें बंद होने लगीं। गाल चूम रहा था। मैंने खाल आगे पीछे की तो मस्ताने लगा। सफेद रौशनी में बुदबुदाया इतने दिन क्यों तड़पा रही थी तुम छह साल बिना मर्द मैं बिना बीवी। जवाब देने से पहले घूमा। पीछे से हाथ छाती पर रखे। चुचियाँ मसलने लगा। कड़क लंड कूल्हों पर टच हो रहा था। स्वर्गिक सुख। ओह्ह।
फिर उठाया। बेडरूम में ले गया। बिस्तर पर लिटाया। जमीन पर खड़े होकर खींचा। दायीं करवट दी। आँखों में लाल डोरे। दायीं टाँग बिस्तर पर रखी। गीली चूत थपथपाई। बायीं टाँग पाजेब से पकड़कर ऊपर उठाई। पहली बार लगा असली मर्द से पाला पड़ा। जाँघों बीच देखा। मोटा लौड़ा घुसेड़ना शुरू किया।
फिर धक्के मारता रहा। कुएँ की बाउंड्री तोड़ने लगा। खड़े होकर पहले राउंड से ज्यादा ताकत। चूत जितनी फैला सकता था फैलाई। घर्षण से झाग जाँघ तक आ गया। तरंगें चुचियों तक उठ रही थीं। आह ह ह ह्हीईई। कितने मिनट रगड़ा पता नहीं। फिर चूत दीवारें दबी महसूस हुईं। बच्चेदानी मुँह सुपाड़े से दबा। फिर आह आह मम्मी ई इ इ। गाढ़ा वीर्य फिर भर दिया। ऊउइ ऊईईई।
हम जुड़े रहे एक मिनट। फिर दीनदयाल निढाल होकर लेट गया। नींद लग गई। दो बार पूर्ति कर चुका था। मैं भी हल्की महसूस कर रही थी। बगल में लेट गई। पतली चादर से ढका। दीनदयाल ने मोटे लंबे हथियार से चूत की बेहतरीन मरम्मत कर दी। टाइट माँस ढीला पड़ चुका था। घमंड चूर हो गया। सोचा दो चार झटके मारकर सो जाएगा लेकिन उल्टा हुआ।
सुबह क्या कहूँगी सोच रही थी। नींद आ गई। साढ़े तीन बजे नींद खुली। वो फिर हथियार अंदर कर चुका था। तीसरे राउंड की चुदाई कर रहा था। आह्ह दीनदयाल। पूरा बदन तोड़ दिया। फिर चूत तर कर दी। हम सो गए। दीनदयाल ने जवानी का रस लबालब भर दिया।
सुबह नींद खुली। हम नंग धडंग पड़े थे। कपड़े बिस्तर और फर्श पर। दीनदयाल पीठ के बल। लंड की खाल उलटी। सुपाड़ा ढीला। नार्मल साइज साढ़े पाँच इंच। मोटाई वही। चादर पर सफेद चकत्ते। चूत धारण न कर पाई थी। मैं उसके नंगे बदन का दर्शन करती रही। शायद कोई माँ अपने जवान बेटे से सारी रात कुचलवाती हो सिर्फ वासना के लिए। लेकिन विचार त्याग दिया। भविष्य में वंचित नहीं होना चाहती।
मोबाइल से दस बारह तस्वीरें लीं ताकि मना न कर सके। बाद में एक फोटो उसे व्हाट्सएप की लिखा ये हमारा राज आज रात फिर। वो शर्मा गया लेकिन मैं जानती थी ये उसे और बाँधेगा। आहिस्ता लंड सीधा किया। रेशम का केला जैसा। उसके बलिष्ठ कूल्हे देखे। मर्द था। मन में आया अच्छा हुआ उसकी बीवी नहीं है लेकिन दया भी आई। पश्चाताप हुआ कि बदन की आग के लिए कितना गिर गई। मैं भी नंगी थी।
झुककर लंड की चुम्मी ली। वो जाग गया। पूरे बदन को देखा। सॉरी मम्मी कहकर छाती के बल लेट गया। समझ गई सारी याद है। शर्म से आँख नहीं मिला रहा। लेकिन मैं भी उतनी कसूरवार थी। मैंने कूल्हों पर थपथपाया। कहा सोने दो ना। मैंने कहा खड़ा हो वाशरूम हो आ। शर्म आ रही है कहा। मैं हँसकर कहा शैतान रात को शर्म नहीं आई जब बदन से आग बुझा रहा था।
चादर दिखाई तीन बार मसला था। हाथ पकड़कर उठाया। होंठ चौड़ी छाती पर रख दिए। मुझे कसकर कहा सॉरी मम्मी बड़ी गलती हो गई। मैंने प्यार से डाँटा चुप जो हुआ अच्छा हुआ आज से मेरे साथ सोएगा मैं तेरी माँ भी हूँ बीवी भी। वो हैरानी से देखता रहा। कच्छा बनियान उठाकर अपने कमरे में भाग गया। मैं पेटीकोट ढूँढने लगी जिसे उतारकर दीनदयाल ने सुहागरात मनाई थी।