दोस्तो, मैं दिव्येश फिर अपनी कहानी आगे बढ़ाता हूँ।
पिछले भाग में आपने पढ़ लिया था कि कंपनी के सर रात को मेरे घर रुके और उन्होंने मुझे अपना लंड चूसवाना शुरू कर दिया।
कहानी का पिछला भाग: साहब का लण्ड चूसा ड्राइवर ने
मुझे उनके लौड़े को चूसने में मजा आने लगा।
इस बीच सर ने मेरी और निशा की सेक्स जिंदगी के बारे में पूछा।
मैंने खुलकर बता दिया कि मेरी कमजोरी की वजह से निशा अक्सर अधूरी रह जाती है।
सर सुनते रहे और उनकी आँखों में अजीब सी चमक थी, जैसे वे कुछ और ही सोच रहे हों।
विशाल सर ने धीमी, गहरी आवाज में कहा, दिव्येश, बस चूसना ही ठीक है। गाँड मारने का मूड नहीं। लेकिन अगर तू कोई चूत का जुगाड़ कर दे, तो मजा आ जाए।
मैंने हँसते हुए समझाया, सर, यहाँ ऐसा कुछ नहीं मिलता। यह बॉर्डर का इलाका है, जुगाड़ भूल जाइए।
लेकिन सर का मन जैसे कहीं और ही अटक गया था।
वे बोले, अच्छा, तो निशा को भेज दे। बस एक बार। मैं मजे ले लूँगा और चुपचाप निकल जाऊँगा। वह भी खुश, तू भी खुश। और हाँ, कंपनी में तेरा भी कुछ भला कर दूँगा।
मैं एकदम सन्न रह गया।
मैंने साफ मना कर दिया, नहीं सर, यह नहीं हो सकता। निशा ऐसा नहीं मानेगी।
सर ने आँखों में चमक लाते हुए कहा, अरे, तुझे तो कोई दिक्कत नहीं ना। फिर मैं उसे मना लूँगा।
मैं कुछ जवाब न दे सका।
मन में तूफान सा उठ रहा था। सर पर चूत का भूत सवार था और मैं प्यासा ही बिस्तर पर लेट गया।
न जाने कब आँखें भारी हुईं और मैं नंगे बदन ही नींद की आगोश में चला गया।
अचानक निशा की सिसकारियों ने मुझे झकझोर दिया।
मैं हड़बड़ाकर उठा।
नाइट लैंप की हल्की रोशनी में देखा तो निशा विशाल सर के बिस्तर पर थी, उनकी बाँहों में सिमटी हुई, आँसुओं से चेहरा भीगा हुआ।
सर उसकी पीठ पर धीरे धीरे हाथ फेर रहे थे, जैसे कोई पुराना दोस्त हो।
मैं नंगा ही था, लेकिन सोने का नाटक करते हुए चुपचाप सब देख रहा था।
सर निशा से कह रहे थे, देख, दिव्येश को कोई दिक्कत नहीं। उसकी इजाजत से ही मैं तुझसे दोस्ती करना चाहता हूँ। उसकी भी अपनी मजबूरी है। वह समलैंगिक है, यह तू जानती है। डरने की कोई बात नहीं।
निशा की आवाज काँप रही थी।
वह बोली, मुझे डर है कि कहीं वह मुझे छोड़कर न चला जाए। मैं उसे ताने मारती हूँ, लेकिन सचमुच उससे प्यार करती हूँ।
सर ने तसल्ली दी, अरे, कुछ नहीं होगा। आज रात तो वह मुझसे गाँड मरवाने को कह रहा था, लेकिन मैंने सिर्फ मुँह में दिया। तू भरोसा कर, वह नंगा इसलिए सोया है।
मैं चुपचाप सुन रहा था, मन में उथल पुथल मची थी।
तभी सर ने धीरे धीरे निशा के कपड़े उतारने शुरू कर दिए।
निशा डरी हुई मेरी ओर देख रही थी, जैसे मुझसे कोई इशारा माँग रही हो।
लेकिन सर पर उसका जादू चल चुका था।
वे पागलों की तरह निशा की गोरी गोरी चूचियों को दबा रहे थे, जैसे कोई भूखा शिकारी अपनी मंजिल पा गया हो।
निशा ने भी धीरे धीरे अपने आप को उनके हवाले कर दिया।
सर का हाथ जब निशा की चूत पर गया तो निशा ने काँपती आवाज में कहा, सर, एक बार दिव्येश से सामने बात कर लीजिए। मुझे तसल्ली हो जाएगी।
सर ने मुझे आवाज दी, दिव्येश।
मैंने थोड़ा हिलकर सोने का नाटक तोड़ा और उठकर बैठ गया।
इधर निशा ने जल्दी से कंबल ओढ़ लिया ताकि उसका नंगा बदन न दिखे।
मैंने भी फटाफट कपड़े पहने और पूछा, क्या हुआ सर। कोई दिक्कत है।
सर ने निशा की ओर इशारा करते हुए कहा, “मुझे तो कोई दिक्कत नहीं, लेकिन तुझे तो नहीं ना।”
उनकी आवाज धीमी थी, पर कमरे की हल्की रोशनी में नजर निशा के कंबल पर टिकी हुई थी।
मैंने उनकी आँखों में वही चमक देखी, जो खाने के वक्त निशा की तरफ बार बार लौट रही थी।
मैंने धीरे से कहा, “नहीं सर, मुझे कोई दिक्कत नहीं।”
गला सूखा हुआ था और शब्द मुँह से निकलते ही छाती में धँस गए।
मैं बाहर जाने को हुआ, तभी निशा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ गर्म थीं और कलाई पर कस गई थीं, जैसे छोड़ने से डर रही हो।
उसकी आँखें मेरी आँखों में कुछ ढूँढ रही थीं।
पलकें भीगी थीं, होंठ भींच रहे थे और साँस छोटी छोटी टूट रही थी।
मैंने उसकी उँगलियों पर अपना अंगूठा रखा, पर कुछ बोल न सका।
सर ने मुझे वहीं बिठा दिया और बोले, “दिव्येश, यह बात साफ हो जाए। कल कोई झगड़ा नहीं होना चाहिए।”
उनका हाथ मेरे कंधे पर पड़ा और दबाव ऐसा था कि मैं गद्दे के किनारे बैठ गया।
मैंने कहा, “बस सर, वादा करो कि यह बात बाहर नहीं जाएगी।”
सर ने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ पकड़ा और निशा का हाथ मेरे हाथ में दे दिया।
तीनों हथेलियाँ एक साथ गर्म हो गईं।
निशा की हथेली पसीने से गीली थी और उँगलियाँ काँप रही थीं।
फिर निशा का हाथ धीरे से अपने तगड़े औजार पर रखवा दिया।
कंबल के नीचे से सर का लंड लोहे जैसा सख्त और गर्म निकला।
मोटा सुपाड़ा निशा की हथेली में धड़क रहा था और नसें उँगलियों के नीचे फड़क रही थीं।
निशा ने एक दम से साँस खींची, “अह… सर…”
उँगलियाँ खुद ब खुद उस मोटाई पर कस गईं।
इसके बाद सर ने निशा के होंठों पर अपने होंठ रखे और कंबल फेंककर उसके पूरे बदन पर हाथ फेरने लगे।
चुम्बन गहरा होते ही निशा के मुँह से दबी सिसकी निकली, “उम्म… अह…”
कंबल सरकते ही गोरी छातियाँ, सिकुड़े निपल और गीली चूत रोशनी में आ गई।
सर की हथेली पहले छाती मसली, फिर पेट सहलाती हुई जाँघों के बीच रुक गई।
निशा का बदन गर्मी से तप रहा था, वह पूरी तरह सर के रंग में रंग चुकी थी।
उसकी कमर खुद सर की ओर उठ रही थी और चूत के होंठों से चिपचिपा रस उँगलियों पर लग रहा था।
मैं बाहर वाले कमरे की ओर जाने लगा।
तभी सर ने टोका, “अरे दिव्येश, रुक। हमारे साथ जुड़ जा।”
निशा ने भी गीली आँखों से मेरी तरफ देखा और धीमी सिसकी में कहा, “रह जाओ… अह…”
मैंने एक पल सोचा और फिर अपने कपड़े उतार दिए।
सर के कपड़े भी निकाल दिए और बत्ती पूरी जला दी।
कमरे में अजीब सी गर्मी थी।
सर का मोटा लंड पेट पर धड़क रहा था और निशा की चूत पहले से चमक रही थी।
सर ने उनसठ की मुद्रा ली और निशा की चूत को चाटने में डूब गए।
उनका मुँह चूत पर चिपका, जीभ फांक में घुसी और सुपाड़ा निशा के होंठों पर आ टिका।
चाट चाटकर उन्होंने चूत गुलाबी कर दी।
हर चाट पर निशा काँपती, “आह… सर… अह… वहीं…”
रस उनकी जीभ और ठुड्डी पर लग रहा था।
इधर मैं और निशा बारी बारी सर के मस्त औजार को चूस रहे थे।
निशा सुपाड़ा मुँह में लेकर घुटती सिसकी छोड़ती, “उम्म… अह… मोटा है…”
फिर मैं उसी लार भरे लंड को चूसता और निशा चाटती हुई हाँफती रहती।
निशा तड़प रही थी, वह अब बस डलवाने को बेताब थी।
उसकी कमर सर के मुँह पर रगड़ रही थी और वह फुसफुसा रही थी, “अब डालो ना… आह… सर… नहीं रहा जाता…”
चूत के फांक सर की जीभ पर दब रहे थे और हर रगड़ पर निशा की जाँघें काँप रही थीं।
रस उनकी ठुड्डी तक बह रहा था और निशा के मुँह से टूटी सिसकी निकल रही थी, “उम्म… अह… और चाटो…”
मैं भी उस पल में खो गया था।
सर का मोटा लंड मेरे होंठों और निशा के गाल पर बारी बारी छू रहा था, गर्म और लार से चिपचिपा।
निशा की वह जंगली सी हालत देखकर मेरा भी मन मचल रहा था।
निशा सर के ऊपर आना चाहती थी, लेकिन सर तो उसके पूरे बदन को चूमने और हल्के हल्के काटने में मस्त थे।
वे छाती के नीचे दाँत गड़ाते, फिर निपल को होंठों में लेकर खींचते।
निशा चीख कर सिसकती, “आह… सर… अह… काटो मत… उम्म… और…”
पेट, कमर और जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर उनके होंठ रुक रुक कर लग रहे थे।
वे हर इंच को जैसे अपने नाम कर रहे थे।
निशा की सिसकारियाँ और सर की भारी साँसें कमरे में गूँज रही थीं।
मैं बस देख रहा था और मन में अजीब सा मजा भी ले रहा था।
निशा उस रात मस्ती के समंदर में गोते लगा रही थी।
उसका हर सिसकना, हर आह, कमरे में नया राग छेड़ रही थी।
अचानक विशाल सर ने उसे घोड़ी की तरह झुकाया और पीछे से उसकी चूत पर टूट पड़े।
निशा के घुटने गद्दे पर टिके, कमर झुकी और चूत उनके मुँह के सामने खुल गई।
उनकी जीभ निशा की चूत में इतनी गहराई तक जा रही थी कि निशा का बदन सिहर उठता था।
जीभ छेद में घुसती, बाहर आकर फांक चाटती, फिर फिर अन्दर जाती।
निशा तकिये को भींचकर हाँफ रही थी, “आह… सर… जीभ… अह… गहरे… उम्म…”
उसकी चूत रस छोड़ रही थी और सर उसकी मिठास को चखने में डूबे थे।
इधर मैंने निशा के मुँह में अपना लंड दिया और वह आगे पीछे की ताल में खो गई।
सर की जीभ पीछे धक्का देती, तो निशा का मुँह मेरे लंड पर और खुल जाता।
वह घुटती हुई चूसती, “उम्म… अह… दिव्येश… आह…”
सर ने फिर खड़े होकर एकदम से अपना तगड़ा औजार निशा की चूत में उतार दिया।
सुपाड़ा गीले छेद पर रुका, फिर कमर झटकी और मोटा लंड अन्दर खिंचने लगा।
दो तीन झटकों में ही वह पूरा अन्दर था।
निशा के मुँह से दर्द भरी चीख निकली, “आह… सर… रुक… उह… मोटा है… अह…”
लेकिन सर पर तो जैसे जुनून चढ़ा था।
वे बिना रुके, बिना रहम के धक्के पर धक्के लगाते रहे और हँसते हुए बोले, “आज तुझे असली मजा देता हूँ।”
हर धक्के पर चूत फच की आवाज करती और निशा की कमर आगे सरक जाती।
निशा भी अब दर्द को मजे में बदल चुकी थी।
वह चीखती हुई बोली, “सर… आह… आज मेरी चूत फाड़ दो… उम्म…”
सर का मोटा सुपाड़ा हर धक्के में छेद को खोलता और निशा की कमर आगे सरक जाती।
चूत की दीवारें उस तगड़े औजार पर कस रही थीं और फच फच की आवाज जाँघों के बीच गूँज रही थी।
निशा ने तकिया भींचकर गर्दन झुकाई और टूटी साँस में कहा, “उह… सालों से प्यासी हूँ… आह… आपका औजार तो कमाल है…”
सर ने कमर पकड़कर और गहरा धक्का मारा।
निशा के मुँह से लंबी चीख निकली, “आह… सर… और अन्दर… अह… रुकना मत…”
उसकी चूचियाँ झूल रही थीं और निपल गद्दे से रगड़ खा रहे थे।
वह हाँफते हुए फिर बोली, “दिव्येश तो… उम्म… चार पाँच मिनट में ढेर हो जाता है… आह… आप तो पेलते जा रहे हो… अह…”
सर हँसे और धक्के तेज कर दिए।
उनकी कमर निशा की जाँघों पर पूरी ताकत से टकरा रही थी और मोटा लंड हर बार छेद को खोलकर अन्दर धँस रहा था।
निशा की आँखें भींच गईं, जाँघें काँपने लगीं और चूत से गर्म रस लंड पर बहने लगा।
रस जाँघों से गद्दे पर टपक रहा था और हर धक्के पर फच की आवाज और तेज हो गई।
वह दबी सिसकी में कहती रही, “फाड़ दो सर… उम्म… आज पूरी चूत अपनी कर लो… आह…”
सर ने उसके बाल मुट्ठी में लिए और और जोर से पेला।
निशा चीखी, “आह… सर… उह… इतना गहरा… अह…”
काफी देर तक सर ने निशा को हर तरह से चोदा।
कभी करवट में टाँग उठाकर, कभी छाती से छाती चिपकाकर, और कभी कमर पकड़कर पीछे से।
हर मुद्रा में लंड चूत के अन्दर रगड़ खाता रहा और निशा हाँफती रही, “उम्म… और… आह… निकालो मत…”
फिर उन्होंने निशा के कंधों पर उसके पैर रखे और और गहरे धक्के लगाने लगे।
घुटने कंधों पर टिके, चूत पूरी खुल गई और सर का सुपाड़ा हर झटके में हड्डी तक टकराता महसूस हुआ।
निशा की चीखें अब और तेज हो गई थीं।
वह बार बार चिल्ला रही थी, “और अन्दर तक डालो सर… आह… और अन्दर तक पेलो… आह… जोर से आह…”
उसकी उँगलियाँ चादर भींच रही थीं और चूचियाँ हर धक्के पर ऊपर नीचे उछल रही थीं।
निपल सख्त हो चुके थे और पसीना छाती की दरार में बह रहा था।
सर ने उसकी एक चूची मुट्ठी में लेकर दबाई और बोले, “देख, कैसे उछल रही हैं। सालों से ये मजा नहीं मिला ना।”
निशा चीखी, “आह… सर… उह… दबाओ… अह…”
सर भी जोश में थे, बोले, “आज तुझे दिखाता हूँ, मर्द किसे कहते हैं।”
उन्होंने कमर और तेजी से चलाई और हाँफते हुए कहा, “ले, और अन्दर। पूरी चूत भर रहा हूँ। इतना रस छोड़, मैं देखूँ।”
मोटा लंड हर झटके में छेद खोलता और सर बोले, “कितनी टाइट है। दिव्येश ने इसे कभी ऐसे नहीं खोला होगा।”
मैं नीचे से लंड चूमते हुए बोला, “सर… और पेलो… निशा… आह… खोल दे मुँह…”
निशा के मुँह से टूटी आवाज निकली, “हाँ… आह… दिखा दो… उम्म… यही चाहिए था… अह…”
सर हँसे, “माँग रही है। ले, और जोर से। आज सुबह तक यही चूत मेरी है।”
मैंने कहा, “निशा… सर का लंड पूरा ले… उम्म… मैं देख रहा हूँ…”
मेरी आवाज कमर के नीचे से आई और होंठ उनकी जुड़ी जगह के पास काँप रहे थे।
वह हाँफते हुए बोली, “और अन्दर… सर… उह… छोड़ना मत… आह…”
सर ने उसकी कमर पकड़कर पूरा धक्का मारा और बोले, “ले, पूरा अन्दर है। देख दिव्येश, कैसे निगल रही है।”
मैं भी बीच बीच में सर के लंड को चूम लेता था, जो निशा की चूत में अन्दर बाहर हो रहा था।
जब लंड बाहर आता, तो गीला सुपाड़ा मेरे होंठ छूता, और जब अन्दर जाता, तो चूत के फांक मेरे मुँह के पास दब जाते।
लंड और चूत की गर्मी मेरे होंठों को छू रही थी।
नमकीन रस और लार की गंध नाक तक आ रही थी और निशा हर बार काँपकर सिसक रही थी, “आह… दिव्येश… उम्म… चूम लो… सर… और पेलो…”
मैंने फुसफुसाया, “चूत गरम है निशा… सर और जोर से मारो…”
सर हाँफे, “मार रहा हूँ। आज यह चूत याद रखेगी।”
लम्बी चली इस जंगली मस्ती ने दोनों को थका दिया।
आखिर में चार पाँच तेज झटकों के बाद सर और निशा दोनों शांत हो गए।
सर का बदन निशा पर ढेर हुआ और दोनों की साँसें एक साथ टूटने लगीं।
वे एक दूसरे से लिपटकर गहरी नींद में चले गए।
सुबह के चार बज रहे थे।
निशा की चूत से हल्का सा खून और सर का माल रिस रहा था।
सफेद गाढ़ा रस जाँघ पर सूख रहा था और छेद अभी भी थोड़ा खुला था।
सालों की प्यासी निशा आज तृप्त हो चुकी थी।
वह सर की बाँहों में सिमटकर सो रही थी, चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान लिए।
मैं उन्हें देख रहा था और मन में शर्म का तूफान उठ रहा था।
शायद दुनिया में मेरे जैसे पति गिनती के होंगे, जो न तो अपनी बीवी को खुश कर पाएँ और न ही उसे दूसरों के हवाले करने से रोक पाएँ।
वे दोनों नंगे ही सो गए थे।
मैं चुपचाप बाहर वाले कमरे में चला गया और सो गया।
सुबह तीन चार घंटे की नींद के बाद मैं बिना उन्हें जगाए कंपनी के लिए निकल गया।
करीब दस बजे सर का फोन आया, “दिव्येश, घर आ। मुझे ले जा।”
मैं जल्दी से घर पहुँचा।
वहाँ का नजारा देखकर मेरी आँखें ठहर गईं।
दोनों अभी भी नंगे सो रहे थे।
सर का हाथ निशा की नंगी कमर पर पड़ा था और चादर नीचे सरकी हुई थी।
लेकिन निशा के चेहरे पर अलग ही रौनक थी, जैसे सालों बाद उसे कोई खोया हुआ खजाना मिल गया हो।
गाल लाल थे, होंठ सूजे हुए थे और जाँघ पर सूखा रस अभी भी चिपका था।
मैंने निशा को जगाया और सर के लिए चाय बनाने को कहा।
निशा आँख मलते हुए उठी, चादर छाती पर खींची और धीमी आवाज में बोली, “अभी… पाँच मिनट…”
लेकिन सर ने हँसते हुए टोका, “अरे, चाय बाद में। एक आखिरी बार मजा कर लूँ। तू चाय बना, मैं तब तक।”
उनका हाथ निशा की नंगी कमर पर फिर गया और निशा के मुँह से हल्की सिसकी निकली, “उम्म… सर… सुबह सुबह…”
मैं दूध लेने चला गया और रसोई में चाय बनाने लगा।
इधर कमरे से निशा की सिसकारियाँ और फच फच की आवाजें गूँज रही थीं।
वह हाँफ रही थी, “आह… धीरे… उह… अन्दर है पूरा…”
सर की भारी साँस बीच में आई, “लेट जा। आखिरी बार है, फिर चाय।”
मैंने चाय बनाई और दोनों को दी।
सर और निशा ने एक ही कप से चाय पी, जैसे कोई पुराना जोड़ा हो।
निशा की उँगलियाँ कप पर काँप रही थीं और सर घूँट लेकर उसके होंठ चाट गए।
फिर सर नंगे ही उठे, बाथरूम गए और निशा को भी नंगी ही अपने साथ बाथरूम में खींच ले गए।
उसकी खिलखिलाती मदमस्त जवानी मुझे अन्दर तक सुख दे रही थी।
बाथरूम में फिर चुदाई शुरू हो गई।
दरवाजा आधा खुला था और आधे दरवाजे से अन्दर का नजारा साफ साफ दिख रहा था।
सर मेरी बीवी को कुतिया बनाकर पीछे से पेल रहे थे और वह नल को पकड़कर ऊँह आह करती हुई अपनी जवानी कुचलवा रही थी।
पानी की धार जाँघों पर पड़ रही थी और निशा चीख रही थी, “आह… सर… उह… फिसल रहा है… और जोर…”
सर बोले, “पकड़ नल। कमर झुका। सुबह की चूत और टाइट है।”
कुछ देर बाद चुदाई समाप्त हुई और सर ने पलटकर मेरी तरफ देखा।
वे हँसकर बोले, “सच में दिव्येश, निशा मस्त माल है।”
मैं हँस दिया।
निशा शर्माकर अपने बदन को ढकने लगी।
जब सर तैयार होकर निशा को विदा कहने लगे, तो निशा की आँखें छलक आईं।
वह साड़ी का पल्लू छाती पर भींचकर खड़ी थी और होंठ काँप रहे थे।
सर ने उसे गले लगाया और बोले, “अरे, अभी तो चार दिन और यहीं हूँ। तेरे साथ और मजे करेंगे।”
निशा का चेहरा खुशी से खिल उठा।
फिर वह मेरे पास आई और मेरे गले लगकर बोली, “तुम्हें बुरा लगा हो तो माफ करना। यह सब पहली और आखिरी बार था। अब तुम जो कहोगे, वही होगा।”
उसकी साँस मेरी गर्दन पर गर्म थी और आवाज में शर्म के साथ राहत भी थी।
मैंने निशा को समझाया, “निशा, इसमें कुछ गलत नहीं। जो हुआ, उसे भूल जा। अगले चार दिन सर के साथ मजे कर।”
तभी सर ने बीच में कहा, “अरे, चार दिन क्या। जब भी मैं इस तरफ आऊँगा, मुझे हर बार तेरा साथ चाहिए।”
निशा की आँखों में फिर से चमक आ गई।
वह धीरे से बोली, “सर, सच में आएँगे ना।”
सर हँसे, “आऊँगा। तेरी चूत याद रखकर आऊँगा।”
फिर हम कंपनी की ओर निकल पड़े।
अगले चार दिन सर, निशा और मेरे लिए जैसे कोई सपना थे।
मुझे भी निशा की चूत और सर के लंड का रस चखने का मौका मिला।
रात को सर निशा को चोदते, और मैं नीचे बैठकर उसी गीले लंड और चूत को चाटता।
निशा हाँफती, “आह… दोनों… उम्म… मत रुको…”
निशा के सामने सर ने मेरी भी गाँड मारी और हर रात एक नया रंग लेकर आई।
सर का मोटा लंड जब मेरी गाँड में जाता, तो निशा मेरा चेहरा सहलाकर कहती, “धीरे सर… दिव्येश काँप रहा है…”
लेकिन अब तीन चार महीने बीत गए।
सर ने वादा तो किया था, लेकिन वे फिर नहीं आए।
निशा आज भी उनकी राह देखती है, लेकिन सर अब काम में व्यस्त हैं।
उनके संदेश का जवाब भी ठीक से नहीं आता।
मैं जैसे तैसे निशा की प्यास बुझाने की कोशिश करता हूँ, पर वह बात कहाँ।
तो दोस्तो, कैसी लगी आपको मेरी और निशा की यह कहानी।
अपने विचार जरूर बताएं।
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