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बाजरे के रोटले के बाद चूत का स्वाद – 1

मेरी उम्र 28 साल है और मेरी बीवी निशा, जो 24 साल की है, मेरे दिल की धड़कन है।

मैं एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में ड्राइवर और साइट सुपरवाइजर का काम करता हूँ, जबकि निशा घर की दुनिया को अपने प्यार और मेहनत से सँवारती है।

यह कहानी उस मोड़ की है जब हमारी जिंदगी में गुजरात से एक साहब आए और सब कुछ हिलाकर रख दिया।

जी हाँ, यह मेरी और निशा की उस रात की बात है जब हमारे बीच की गर्माहट ने नया रंग लिया।

मैं दिल से कहता हूँ कि इसका हर शब्द सच है।

मेरी कंपनी में गुजरात से एक साहब आए, उनका नाम विशाल था।

विशाल सर का काम ऑडिट और चेकिंग का था।

वे उम्र में शायद 45 से 50 के आसपास होंगे, लेकिन बातों में ऐसी चमक थी जो किसी को भी अपनी ओर खींच ले।

चेहरे पर मस्ती वाली कसक साफ कहती थी कि साहब रसिया किस्म के हैं।

मैंने उनके साथ जो देखा, वह आईने जैसा साफ था। साहब को चूत चुदाई का शौक था, और मौका पड़े तो किसी लौंडे की गाँड मारने का भी।

उस दिन मैं पूरा दिन सड़क के काम में उलझा रहा।

साइट पर धूल मिट्टी के बीच पसीना बहा रहा था।

शाम को अचानक कंपनी से फोन आया कि विशाल सर को गाड़ी में होटल छोड़ दो और कहीं बाहर खाना भी खिला लाओ।

मैं सर को लेकर निकला।

हमारा इलाका बॉर्डर का है। यहाँ न ज्यादा रौनक है, न चमक दमक।

एक छोटा सा रेस्टोरेंट था, सोचा वहीं ले चलता हूँ।

वहाँ की खराब सफाई देखकर सर का मूड बिगड़ गया।

वे बोले, दिव्येश, यह क्या जगह ले आए। गर्मी का मौसम है, कुछ और करो, कहीं घुमा दो।

अब यहाँ घूमने को क्या है। न पार्क, न मॉल, बस रेगिस्तान की हवा और सन्नाटा।

मैंने कहा, सर, इधर शहर जैसा कुछ नहीं है।

फिर सर बोले, चलो, होटल ही छोड़ दो। मैं वहाँ खाने का जुगाड़ कर लूँगा।

रास्ते में सर ने मुझसे ढेर सारी बातें कीं।

उनकी आवाज में अजीब सी गर्मी थी, जैसे हर बात को और गहरा करना चाहते हों।

अचानक बोले, यार, यहाँ कोई मजेदार जगह है। कोई खास लड़की मिलती है क्या।

मैं हक्का बक्का रह गया।

हँसते हुए कहा, सर, यहाँ ऐसा कुछ नहीं मिलता। न लड़की, न रंडी।

मेरी बात सुनकर सर ने गहरी नजर से देखा, जैसे मजा ले रहे हों।

फिर बोले, अरे, तुम तो ड्राइवर हो, लोकल आदमी हो। तुम्हें तो सब पता होना चाहिए। अच्छा, यह बता, तुम्हें क्या पसंद है।

मैंने सोचा, अब क्या छुपाना।

खुलकर कहा, सर, मुझे तो सब पसंद है। सच कहूँ तो मैं लड़कों को भी पसंद करता हूँ। समलैंगिक रिश्तों में भी रहा हूँ। पिछले महीने अहमदाबाद में था, वहाँ एक दोस्त के साथ कुछ पल बिताए थे।

सर की आँखों में चमक आ गई।

वे बोले, अच्छा। सबकी अपनी अपनी पसंद होती है, दिव्येश।

फिर गाड़ी से उतरे और होटल की ओर चले गए।

जाते जाते मैंने अपना नंबर दे दिया। कहा, सर, कुछ जरूरत हो तो कॉल कर लेना।

सर मुस्कुराए, तू क्या जरूरत पूरी करेगा। मैं यहाँ जुगाड़ कर लूँगा।

यह कहकर हँसते हुए उन्होंने मेरा नंबर ले लिया।

शाम के करीब 8 बजे मैं घर पहुँचा।

हमारा घर छोटा सा है, लेकिन निशा ने उसे अपने प्यार से रंगीन बना रखा है।

वह रसोई में खाना बना रही थी। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था और चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।

मुझे देखकर थोड़ा गुस्से में बोली, तुमने फोन भी नहीं किया। कब का खाना तैयार करके रखा है।

मैंने हँसते हुए सर की सारी बात बता दी।

मेरी नौकरी ऐसी है कि समय फिक्स नहीं। कभी जल्दी घर आ जाता हूँ, तो कभी देर रात तक काम करना पड़ता है।

कंपनी की गाड़ी भी मेरे पास ही रहती है।

निशा और मेरी जिंदगी में प्यार तो बहुत है, लेकिन कुछ कमी भी है।

मैं हफ्ते में दो तीन बार ही निशा के करीब आ पाता हूँ। मेरा मूड हमेशा नहीं बनता।

मेरा लंड 6 इंच का तो है, लेकिन जल्दी थक जाता है।

मैं अक्सर बहाना बना लेता हूँ कि आज थक गया हूँ, और सो जाता हूँ।

निशा को यह बात खटकती है।

उस रात भी जब मैं बिस्तर पर लेटने जा रहा था, निशा ने ताना मारा, क्या, आज भी थक गए।

आवाज में शिकायत थी, लेकिन आँखों में चमक थी, जैसे कुछ और कहना चाहती हो।

मैं चुपचाप मुस्कुराया। मन में आया, क्या करूँ। निशा मेरे साथ घरवालों की इज्जत की खातिर है, और मैं शायद उसे वह खुशी नहीं दे पाता जो वह चाहती है।

बस ऐसे ही दिन बीत रहे थे, जैसे रेगिस्तान की रेत हवा में उड़ती है।

तभी दूसरे दिन रात को विशाल सर का फोन आया।

आवाज में बेचैनी थी।

वे बोले, यार दिव्येश, इस होटल में तो जीना मुहाल है। एसी काम नहीं कर रहा, पंखा खटखट की आवाज कर रहा है, गर्मी से हालत खराब है। यह लोकल होटल रुकने लायक भी नहीं। कोई और जगह बता, जहाँ सुकून मिले।

मैंने एक पल सोचा और निशा को बता दिया कि सर को लेने जा रहा हूँ।

निशा, जो हमेशा दूसरों का ख्याल रखती है, बोली, अरे, तुम्हारे सर ने अभी तक खाना भी नहीं खाया होगा। यह टिफिन ले जाओ, उन्हें खिला देना। और हाँ, तुम भी कुछ खा लेना, फिर कहीं होटल में छोड़ देना।

मैं गाड़ी लेकर होटल पहुँचा।

विशाल सर बाहर खड़े थे, चेहरे पर हल्की झुंझलाहट।

मुझे देखते ही बोले, दिव्येश, मैंने इस होटल को मना कर दिया। यहाँ पाँच दिन तो क्या, पाँच घंटे भी नहीं रुक सकता। ऑनलाइन आसपास कोई दूसरा होटल भी नहीं दिख रहा। अब तू बता, क्या करूँ।

मैंने कहा, सर, मैं आपको बाड़मेर छोड़ देता हूँ, लेकिन वह 100 किलोमीटर दूर है।

फिर आगे कहा, वैसे मेरा खाना बाकी है। आप चाहें तो मेरे घर चलें, कुछ खा लें। फिर आप बताइए, कहाँ जाना है।

सर ने एक पल सोचा और बोले, ठीक है, चल। तू खाना खा ले, मैं बाद में कंपनी ऑफिस में ही सो जाऊँगा। 200 किलोमीटर का रास्ता, वह भी इन खराब सड़कों पर, बहुत वक्त लेगा।

मैं सर को लेकर घर पहुँचा।

घर में निशा की रसोई से हल्की मसालों की खुशबू आ रही थी।

मैंने सर को खाने के लिए बुलाया, लेकिन वे बोले, नहीं यार, मैं ठीक हूँ।

मैं भूखा था, सो खाने बैठ गया।

निशा ने देखा कि सर गाड़ी से उतरे ही नहीं।

उसका दिल ऐसा है, मेहमान को भूखा कैसे छोड़ दे।

वह बाहर गई और बड़े प्यार से आग्रह किया, सर, अन्दर आइए न। थोड़ा सा खाना तो खा लीजिए।

निशा की मीठी आवाज और आँखों की गर्मजोशी ने मना करने का मौका ही नहीं दिया।

आखिरकार वे अन्दर आ गए।

मैं और विशाल सर खाने की मेज पर बैठ गए।

निशा ने बाजरे का रोटला, दही और मसालेदार फ्राई बनाया था।

सर ने पहला निवाला मुँह में रखा और आँखें चमक उठीं।

वे बोले, वाह, यह तो लाजवाब है।

निशा मुस्कुराई, सर, कल मैं दाल बाटी और चूरमा बनाऊँगी। आप फिर आ जाना।

सर ने हँसकर मेरा मजाक उड़ाया, अरे, दिव्येश को शायद बुरा लग जाए। मैं आज भूख से मर रहा था, लेकिन इसने तो एक बार भी नहीं कहा कि सर, घर आ जाओ।

मैं हँसा और चुपचाप खाना खाने लगा।

लेकिन सर और निशा की बातें रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं।

दोनों दोस्तों की तरह हँस हँसकर बातें कर रहे थे।

खाने के बाद सर ने हमारा घर देखा। बोले, दिव्येश, तेरा घर तो बहुत अच्छा और बड़ा है।

मैं मन ही मन सोच रहा था कि सर को अब कंपनी ऑफिस छोड़ दूँ। कहीं ये रुक गए तो निशा को अपनी गोद में बिठा लेंगे।

दूसरी तरफ यह ख्याल भी था कि अगर सर रुके, तो शायद मुझे भी कुछ मजा मिल जाए।

मन में अहमदाबाद वाली रातें तैर रही थीं, जब मैंने समलैंगिक सुख का स्वाद चखा था।

रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे।

सर बोले, चल भाई, मुझे कंपनी ऑफिस छोड़ दे। तू यहाँ अपने घर में मजे कर। मेरे नसीब में शायद यह घरेलू सुख नहीं।

मैंने गाड़ी स्टार्ट की ही थी कि निशा ने टोक दिया।

उसकी आवाज में अजीब सी गर्मी थी।

वह बोली, सर, यह आपका भी घर है। रुक जाइए। वैसे भी यहाँ तीन कमरे हैं। आप आराम से रह सकते हैं।

विशाल सर तो जैसे यही चाहते थे।

आँखों में चमक आ गई।

वे बोले, ठीक है, जब तुम इतना कह रही हो, तो रुक जाता हूँ।

मैं चुपचाप गाड़ी बंद करके घर में आ गया।

निशा ने एक कमरे में दो बिस्तर और गद्दे लगा दिए।

सर ने मजाक में कहा, अरे, यह दो बिस्तर किसके लिए।

निशा हँसकर बोली, दिव्येश भी आपके पास सो जाएगा। आपको अच्छा लगेगा।

सर तपाक से बोले, अरे, मेरी वजह से बेचारा आज यहाँ। निशा, तुझे कोई दिक्कत तो नहीं।

निशा ने तुरंत जवाब दिया, नहीं सर, यही ठीक है। वैसे भी ये मेरे पास आएगा तो क्या करेगा।

उसकी बात में ताना था जो मेरे दिल को चुभ गया।

वह हँसती हुई चली गई।

मैं और विशाल सर कमरे में लेट गए।

लाइट बंद थी, लेकिन मेरे मन में उथल पुथल मची थी।

मैंने मोबाइल ऑन किया और कुछ वीडियो देखने लगा।

तभी सर का पैर मेरे कूल्हों पर हल्के हल्के घूमने लगा।

दिल की धड़कनें तेज हो गईं।

मैं समझ गया कि आज रात कुछ खास होने वाला है।

मैंने मोबाइल साइड में रखा।

सर ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा और अपने तगड़े औजार पर रखवा दिया।

वह लोहे की तरह सख्त और गर्म था।

बदन में सिहरन दौड़ गई।

सर ने धीमी आवाज में कहा, लड़की नहीं मिली तो क्या, तू तो है ना। तुझे भी तो लड़के पसंद हैं, है ना।

मैंने हल्के से हाँ कहा।

सर ने मुझे उनके औजार को हिलाने और चूसने को कहा।

मैंने धीरे धीरे शुरू किया।

हर पल मजा दोगुना होता जा रहा था।

मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और पूरी तरह उस पल में डूब गया।

सर का मस्त, तगड़ा औजार मेरे हाथों में था और मैं उसका हर इंच महसूस कर रहा था।

मन में बड़ा उल्लास था कि सर का लंड मेरी गाँड की खुजली दूर कर देगा।

दोस्तो, उस रात आगे ऐसा हुआ जिससे सर को मेरी बीवी की चूत पसंद आ गई।

अगली कड़ी में वही सब विस्तार से सुनाना है।

कहानी का अगला भाग: साहब ने पहले मेरी बीवी की हाथ की रोटी खायी, फिर उसकी चुत

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⚠️ महत्वपूर्ण अस्वीकरण

ये सभी कहानियाँ केवल काल्पनिक हैं।
इनका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है।

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बिना सहमति के कोई भी कार्य गलत और दंडनीय है।

इन कहानियों से प्रेरित न हों।
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