Incest behan bhai sex story: मैं और मेरी बहन कीर्ति इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे थे। हम दोनों ने एक कोचिंग में नाम लिखवा लिया था। दिसंबर का महीना चल रहा था और कड़क सर्दियां पड़ रही थीं। हम दोनों भाई बहन ने एक फ्लैट किराए पर ले लिया था।
मैं घर से गद्दा रजाई लाना चाहता था लेकिन बेवजह पैसा खर्च नहीं करना चाहता था क्योंकि पढ़ाई में पहले ही काफी खर्च हो रहा था। मैं इक्कीस साल का था और मेरी बहन कीर्ति बीस साल की थी। वह कड़क माल थी। उसका फिगर तीस अट्ठाईस चौंतीस का था। छोटे पर मस्त मम्मे थे। मोहल्ले के सारे आवारा लड़के उसे छेड़ते रहते थे।
बिना रजाई गद्दे के हम जनवरी का महीना किसी तरह काट रहे थे। मेरे चाचा घर से रजाई गद्दा लेकर आने वाले थे इसलिए मैंने नहीं खरीदा था। उस दिन बुधवार था। सुबह बारह बजे तक इंतजार करने पर भी सूरज नहीं निकला। बाहर न धूप निकली न गर्मी हुई। कड़ाके का पाला पड़ रहा था। हमारी कोचिंग एक हफ्ते के लिए बंद कर दी गई थी।
मैंने थोड़ी आग जलाई थी जो अब खत्म हो गई थी। मेरी जवान मस्त बहन अपने कमरे में कंबल में लेटी ठंड से बच रही थी। आग खत्म होने के बाद मुझे बहुत ठंड लगने लगी। मैंने खिड़की से बाहर देखा तो दूर दूर तक कोई नहीं दिख रहा था। मैं अपनी बहन के पास चला गया और उसके कंबल में घुस गया।
मैंने सीधे उसके सामने लेटने की कोशिश की ताकि दोनों आमने-सामने हो जाएं और गर्मी ज्यादा मिले। मेरी बीस साल की जवान बहन काफी गर्म थी। जैसे ही मैं उसके सामने लेटा उसने मुझे देखकर हल्का मुस्कुराया और कंबल को और कस लिया। हम दोनों अब पूरी तरह आमने-सामने थे, चेहरा चेहरे के सामने, सांसें एक-दूसरे पर पड़ रही थीं। मुझे तुरंत सुकून मिला।
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पर कंबल में जगह कम थी और न जाने कहां से हवा का झोंका आ रहा था। ठंड से बचने के लिए मैं अपनी जवान मस्त गदराई जवानी से लबरेज बहन से और ज्यादा चिपक गया। हमारा बदन एक-दूसरे से सटा हुआ था, छाती छाती से, जांघें जांघों से मिल रही थीं। मेरी जवान बहन के मस्त रसीले ओंठ बिलकुल मेरे ओंठों के सामने थे, इतने करीब कि उनकी गर्म सांस मेरे होंठों पर लग रही थी।
अचानक कंबल में हल्का सा धक्का लगा, शायद बिस्तर पर हलचल हुई या हम दोनों का वजन एक तरफ हो गया। मेरे ओंठ सीधे मेरी जवान बहन के मुलायम, गर्म ओंठों पर जा लगे। एक पल के लिए दोनों ठिठक गए। मैंने महसूस किया कि उसके होंठ कितने नरम और गुलाबी हैं, जैसे कोई रसीला फल। मैं रुक नहीं पाया। धीरे से मैंने अपने होंठ हिलाए और उसके निचले होंठ को हल्का सा चूसा।
कीर्ति ने विरोध नहीं किया। उसने अपनी आंखें धीरे से बंद कर लीं और मेरे साथ होंठ मिलाने लगी। पहले तो सिर्फ हल्का स्पर्श था, लेकिन फिर उसने भी अपने होंठ थोड़े खोले और मेरे होंठों को चूसने लगी। हम दोनों के होंठ एक-दूसरे में खो गए। मैंने अपनी जीभ बाहर निकाली और उसके होंठों की किनारों पर हल्का सा फेरा। कीर्ति ने भी अपनी जीभ मेरी जीभ से छुआ। हमारी जीभें आपस में लिपट गईं, धीरे-धीरे, गीली और गर्म।
उसकी सांसें तेज हो गईं। मैंने महसूस किया कि उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही है, उसके छोटे मस्त मम्मे मेरी छाती से दब रहे हैं। हम दोनों एक-दूसरे के मुंह में खोए हुए थे। मैंने उसके निचले होंठ को हल्का सा दांतों से काटा, फिर चूसा। कीर्ति से हल्की सी सिसकी निकली, “ह्म्म…”। मैंने उसके ऊपरी होंठ को चाटा, फिर पूरी तरह से उसके मुंह में जीभ डाल दी। वो मेरी जीभ को चूसने लगी, जैसे बहुत दिनों से प्यासी हो।
हमारा किस गहरा होता गया। मेरे हाथ धीरे से उसके पीठ पर फिसले, उसे और पास खींचा। कंबल के अंदर हमारा बदन एक-दूसरे से पूरी तरह चिपका हुआ था। इतने में कीर्ति ने थोड़ा सा शरीर हिलाया, शायद ज्यादा आराम से लेटने के लिए या चुदास में। उसके सूट का गला थोड़ा खिसका और एक मस्त रसीला मम्मा बाहर निकल आया। वो गोल, गोरा, काला घेरा वाला मम्मा ठंड में भी तनकर खड़ा था, निप्पल सख्त और उभरी हुई। जैसे कह रहा हो कि इतनी सर्दी में क्यों नहीं चूस रहे हो मुझे।
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ऊपरवाले का सर्दी काटने का हथियार समझकर मैं अपनी सगी बहन का मम्मा पीने लगा। शायद मेरी जवान बहन को अच्छा लगा तो वो मेरे और पास आ गई। मैं मजे से उसकी दूध भरी छाती पीने लगा। क्या मस्त मस्त गोल काले घेरों वाली छाती थी। मैं हैरान था कि कब मेरी बहन इतनी मस्त माल बन गई।
अगर पता होता तो इसे पटाकर चोद लेता। सर्दी इतनी ज्यादा थी कि बाहर निकलना नामुमकिन था। अपनी बहन के पास रहना ही सबसे बड़ी समझदारी थी। सुबह से वैसे ही मैंने चाय नहीं पी थी। अब अपनी जवान बहन के दूध पी रहा था।
मैंने पहले वाले मम्मे को मुंह में भरकर जोर से चूसा। निप्पल मेरी जीभ पर सख्त हो गया। मैंने जीभ घुमाकर उसे चाटा, फिर हल्के दांत लगाकर काटा। कीर्ति सिहर गई। “आह्ह… भैया…” उसकी आवाज कांप रही थी। मैंने दूसरे हाथ से दूसरे मम्मे को दबाया, मसलने लगा। उसका निप्पल मेरी उंगलियों के बीच आ गया, मैंने उसे हल्के से निचोड़ा। वो और सख्त हो गया।
शायद मेरा दूध पीना कीर्ति को भा गया और उसने दूसरा मम्मा भी निकाल दिया। ठंड से बचने के लिए मैं पीने लगा। अब मैं दोनों मम्मों को बारी-बारी चूस रहा था। एक को मुंह में लेकर जोर-जोर से चूसता, फिर दूसरे को। दोनों निप्पल चमक रहे थे मेरे थूक से। कीर्ति की सांसें तेज हो रही थीं। वो बार-बार कमर उठा रही थी और मेरे सिर को अपने मम्मों पर दबा रही थी। “ओह्ह… हां भैया… और चूसो… आह्ह…”
धीरे धीरे हम दोनों सगे भाई बहन गर्म और चुदासे होने लगे। मैंने अपनी जवान बहन के सूट को ऊपर की तरफ खींचकर पूरी तरह निकाल दिया। अब वो मेरे सामने बिल्कुल नंगी छाती लिए लेटी थी। मैंने दोनों मम्मे बदल-बदल के पीने लगा। कभी दोनों को साथ दबाकर चूसता, कभी एक-एक करके। उसके मम्मे मेरे मुंह में भर रहे थे। उनकी गर्मी और नरमी मुझे पागल कर रही थी।
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धीरे धीरे हम दोनों इतने गर्म हो गए कि अब चुदाई भी होनी चाहिए। मैंने कीर्ति से इशारे से पूछा कि दोगी??? वो तैयार हो गई। उसने सलवार का नाड़ा खोल दिया और चड्डी उतार दी। मैंने कीर्ति का दूध पीते पीते अपना सीधा हाथ उनकी जवान चूत की तरफ बढ़ा दिया। ऊफ्फ्फ आहा कितनी चिकनी भरी भरी जांघें थीं। लगा संगमरमर का बदन है।
मेरा हाथ उसकी जांघों के बीच सरका। जांघें पहले से ही गीली हो चुकी थीं। मैंने उंगलियों से उसकी चूत की बाहर की सतह को छुआ। वो बहुत गर्म और चिकनी थी। मेरा मध्यमा उंगली धीरे से उसके चूत के छेद पर घुमाई। कीर्ति ने कमर उठाई। “आह… भैया…” मैंने उंगली अंदर डाली। क्या गर्म गर्म भट्टी की तरह चूत थी। अंदर बहुत गीला और तंग था। मैं उंगली अंदर बाहर करने लगा।
मेरी जवान बहन मस्त होने लगी। मैं उसकी चूत फेटने लगा। चूत का रास्ता खुला हुआ था। मैं हैरान था कब उसने सील तुड़वा ली।
“ऐ कीर्ति! कब तूने चुदवा लिया??” मैंने पूछा। “जब तुम बाहर गए थे पिकनिक पर जीतेन्द्र अंकल के लड़के नीरज से मैंने चुदवा लिया था।” कीर्ति ने बताया।
“हाय हाय रांड लंड के बिना तेरा काम नहीं चला। इतनी ही जल्दी थी तो मुझसे बताती चोद चोद के चूत फाड़ देता तेरी!” मैंने गुस्सा दिखाते हुए कहा। और कस कसके मैं चूत में उंगली करने लगा।
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मेरी बहन चुप हो गई। मैंने दोनों उंगलियां उसकी चूत में डाल दी और जल्दी जल्दी उंगली चलाने लगा। मेरी बहन मचलने लगी वो आहें भरने लगी सिसकने लगी। “आह भैया… ह्ह्ह… ओह्ह… अंगुली और तेज… आह्ह…”
अब मैं अपनी जवान बहन के ऊपर लद गया। हम दोनों अभी भी आमने-सामने थे। ऊपर से मैंने कसके कंबल ओढ़ लिया था चारों कोनों पर कसके दबा लिया था जिससे हवा न अंदर आ सके। मैंने अपनी जवान बहन के दोनों हाथ ऊपर कर दिए और उसके रसीले ओंठ फिर से पीने लगा। हम दोनों ही बहुत गर्म हो गए थे। हम दोनों के बदन जल रहे थे।
मेरी बहन के ओंठ फड़क रहे थे। वो थोड़ा चुदासी होकर कांप रही थी। उसके होंठ सिकुड़ रहे थे। चुच्चे बार बार छोटे होते फिर बड़े होते। मैं जान गया कि मेरी बहन चुदासी हो गई है। इसको अब जल्दी से जल्दी चोद लेना चाहिए वरना ये मर जाएगी।
मैंने अपनी जवान बहन की गड्ढेदार नाभी चूम ली। उसके दोनों पैर खोल दिए। लंड का सुपाड़ा मैंने उसकी चूत में लगाया और अंदर डाल दिया। “आह्ह… भैया… धीरे… ओह्ह… कितना मोटा है… चूत फाड़ देगा ये…” कीर्ति सिसकी।
मैंने धक्का मारा और पूरा लंड उसकी गर्म चूत में उतार दिया। उसकी चूत बहुत टाइट और गर्म थी, जैसे कोई गीली आग मुझे निचोड़ रही हो। आज बड़े दिनों बाद मेरी बहन भी लंड खा रही थी इसलिए उसको भी खूब कस कस लग रहा था। मैंने उसे चोदने लगा। हम आमने-सामने थे तो उसकी आंखें मेरी आंखों में देख रही थीं। शर्म से वो लजा गई लेकिन नजरें नहीं हटा पाई।
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“कीर्ति!! ऐ कीर्ति! अपने भैया से नजरें मिलाओगी अब??” मैंने बड़े प्यार से पूछा। “हां भैया… अब शर्म नहीं आ रही… आह्ह… चोदो मुझे… अपनी रंडी बहन को चोदो…” कीर्ती बोली।
कीर्ति अब मेरी आंखों में देखते हुए चुद रही थी और मैं उसको बजाता रहा। चट चट! पट पट! का स्वर कमरे में गूंजने लगा। ऊपर से मैंने कंबल ओढ़ रखा था। मेरा सांप जैसा लंड कीर्ति की कोमल योनि को कूट रहा था। मैं बेदर्दी से धक्के मार रहा था जिससे वो पूरी पूरी और कसके चुदे।
“ले छिनाल… ले मेरी बहन… तेरी चूत कितनी प्यासी थी… बोल ना… भैया का लंड कैसा लग रहा है?” मैंने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा। “आह्ह… बहुत अच्छा… भैया… मोटा… लंबा… चूत भर रहा है… ओह्ह… और जोर से पेलो… फाड़ दो मेरी चूत…” कीर्ति चिल्लाई।
हर धक्के पर उसकी चूत मेरे लंड को कसकर पकड़ लेती। अंदर की दीवारें सिकुड़तीं, फिर छूटतीं। उसकी चूत से चिकनाई निकलकर मेरी जांघों पर बह रही थी। “आह भैया… हां… और जोर से… ओह्ह… चूत फट जाएगी… आह्ह्ह… लेकिन मत रुकना… मुझे रंडी बना दो…” कीर्ति अब चुदाई के मजे में आ गई थी। वो अपनी कमर उठाकर मेरे हर धक्के का जवाब दे रही थी।
रह रहकर मुझे थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था कि जीतेन्द्र अंकल के लड़के नीरज से उसने क्यों सील तुड़वा ली। मैं बेदर्दी से धक्के मार रहा था। “साली रांड… नीरज से चुदवा ली… अब भैया से चुद… बोल… कौन बेहतर चोदता है? मैं या वो हरामी?” मैंने गुस्से में पूछा। “तुम… भैया… तुम बेहतर… ओह्ह… तुम्हारा लंड मोटा है… कसके चोद रहे हो… आह्ह… नीरज से ज्यादा मजा आ रहा है… चोदो मुझे… अपनी छिनाल बहन को…” कीर्ति रोते हुए बोली।
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हम दोनों भाई बहन एक हल्के फोल्डिंग प्लाई वाले बेड पर थे। लगा कहीं टूट जा जाए। “भैया धीरे पेलो!!! कहीं बेड टूट गया तो जमीन पर सोना पड़ेगा!!” कीर्ति ने मुझे सावधान किया।
मैं अब धीरे धीरे पेलने लगा क्योंकि इस हाड़ कपा देने वाली सर्दी में मैं किसी भी हालत में जमीन पर नहीं सोना चाहता था। मैं अब अपनी बहन को आराम आराम से पेलने लगा। क्या मस्त गदराई चूत थी बड़ा मजा आ रहा था कीर्ति को चोदने में।
उसकी चूत मेरे लंड को कसकर पकड़े हुए थी। हर धक्के पर उसकी दीवारें सिकुड़ रही थीं। मैंने उसके मम्मों को मसलते हुए तेज तेज ठोके लगाए। “ले रांड… ले मेरी बहन… तेरी चूत अब मेरी है… बोल… भैया की रंडी बनेगी ना?” “हां भैया… बनूंगी… तुम्हारी रंडी… ओह्ह… रोज चुदवाऊंगी… आह्ह… मम्मे दबाओ… चूसो… चोदो मुझे…” कीर्ति चीखी।
मैंने उसके मम्मों को जोर से दबाया, निप्पल को उंगलियों से निचोड़ा। कीर्ति चीख पड़ी। “आह्ह्ह… भैया… हां… और जोर से मसलो… ओह्ह… मैं तुम्हारी रंडी हूं…” उसकी चूत और भी गीली हो गई। मैंने लंड को पूरी तरह बाहर निकाला, फिर एक जोरदार धक्के से अंदर ठोंक दिया। वो सिहर गई। मैंने रफ्तार बढ़ाई। चट चट चट… पट पट पट… की आवाजें तेज हो गईं।
उसकी आंखें उलट गईं, मुंह खुला रह गया। “आह भैया… मैं आ रही हूं… ओह्ह… फट गई चूत… आह्ह्ह्ह… पानी छोड़ो अंदर… भर दो मेरी चूत…” उसकी चूत मेरे लंड के चारों तरफ सिकुड़ने लगी, जैसे मुझे दूध पिलाने को तैयार हो। मैं भी रुक नहीं पाया। आखिरी कुछ धक्के बहुत तेज और गहरे मारे। “ले छिनाल… ले भैया का माल… तेरी चूत में झड़ रहा हूं…” फिर मैंने उसकी गुझिया में ही पूरा पानी छोड़ दिया। गर्म गर्म माल उसकी चूत में भर गया।
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मैंने अपनी बहन को सीने से लगा लिया। ऐसे ही नंगे नंगे हम सो गए। हमारी नींद शाम आठ बजे टूटी।
“भैया! मुझे बड़ी भूख लगी है!!” कीर्ति बोली।
मैं उठा कपड़े पहने। नीचे फ्लैट से उतरकर पास वाली दुकान पर गया। ठंड इतनी थी कि बाहर निकलते ही सांसें जम रही थीं। जल्दी से ब्रेड और अंडे ले आया। वापस आकर मैंने किचन में आमलेट बनाया – अंडे फोड़कर नमक-मिर्च डाली, थोड़ा प्याज और टमाटर काटकर मिलाया, और गर्म तवे पर पकाया। ब्रेड को हल्का टोस्ट किया। कीर्ति बिस्तर पर लेटी इंतजार कर रही थी, कंबल में लिपटी हुई, लेकिन उसकी आंखों में अभी भी चुदाई की चमक बाकी थी।
मैं प्लेट लेकर उसके पास गया। हम दोनों बिस्तर पर बैठकर जमकर खाए। कीर्ति ने आमलेट का एक बड़ा टुकड़ा मुंह में डाला और चबाते हुए बोली, “भैया… कितना मजा आया… अभी भी बदन में गर्मी है…” मैंने हंसकर कहा, “खा ले पूरी, फिर और मजा करवाऊंगा।” हम सुबह से भूखे थे, इसलिए पेट भरने में देर नहीं लगी। खाते वक्त वो मेरी जांघ पर हाथ फेर रही थी, जैसे अभी से अगली चुदाई की तैयारी कर रही हो।
पेट भर जाने पर हम दोनों फिर से बिस्तर में चले गए। ठंड ज्यादा हो जाने के कारण कुछ पढ़ने का भी मन नहीं कर रहा था। इसलिए मैंने अपनी जवान और नंगी बहन के पास कंबल में खिसक गया। अब रात होने वाली थी। पर क्या रात और क्या दिन। सुबह से कुहासा ही छाया है बाहर रोशनी है ही नहीं तो कौन सा दिन और कौन सी रात।
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कीर्ति ने फिर से मुझे अपने नंगे गर्म बदन से चिपका लिया। हम फिर आमने-सामने लेट गए। उसकी नंगी छाती मेरी छाती से दब रही थी, निप्पल सख्त होकर मेरी त्वचा को छू रहे थे। उसकी जांघें मेरी जांघों में फंसी हुई थीं, और उसकी चूत अभी भी गीली और गर्म महसूस हो रही थी। “कीर्ति! किसी से कहना मत कि मैंने तुम्हारी चीज देखी है!” मैंने बहन से कहा। “भैया! मैं किसी से नहीं कहूंगी कि तुमने मुझको चोदा खाया है!” कीर्ति बोली।
“मेरी समझदार बहना!” मैंने दुलार दिखाया और उसको माथे पर चूम लिया। “भैया! चाहो तो और चोद लो! मुझे भी मजा आ रहा है! कबसे लंड की प्यासी थी! मेरी चूत अभी भी तुम्हारे लंड की तलब में है…” कीर्ति बोली, अपनी कमर मेरे लंड पर रगड़ते हुए। “बहना सच कहा तूने। मैं भी कबसे चूत का प्यासा था। मैं तुझे पूरी रात बजाऊंगा! तेरी चूत और गांड दोनों फाड़ दूंगा आज!” मैंने कहा।
“पर पहले तेरी कुंवारी गांड मारूंगा!” मैंने कहा। “चल कुतिया बन!” मैंने कीर्ति से कहा।
वो कुतिया बन गई। घुटनों और हाथों के बल झुक गई, अपना चिकना गोल पुट्ठा ऊपर करके मेरी तरफ कर दिया। उसकी गांड की दरार में लंड का सुपाड़ा लगाया। मैंने थूक लगाकर थोड़ा गीला किया और धीरे से दबाया। लंड बिना ज्यादा रुकावट के अंदर धंस गया। अंदर बहुत टाइट, गर्म और चिकना था। जैसे कोई नई जगह फाड़ रहा हो।
“ये क्या कीर्ति! तेरी गांड तो चुदी है! सच सच बता किसने तेरी गांड चोदी??” मैंने पूछा। “वो भैया जब नीरज से मैंने चुदवाया था तो उसने पता नहीं कहां से मेरी गांड देख ली। बोला तेरी गांड बड़ी चिकनी है। तेरी गांड भी चोदूंगा। तो मैंने गांड भी चुदवा ली।” कीर्ति बोली।
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“साली हरामखोर! मैं तुझको सती सावित्री समझता था तू तो बड़ी छिनाल निकली!! साली रंडी कहीं की।” मैं चिल्लाया और जोर जोर से किसी चुदासे कुत्ते की तरह कीर्ति की गांड चोदने लगा।
अब तो मैं मारे नफरत के गुस्साकर कीर्ति की गांड फाड़ने लगा। मैं उसे जानवरों की तरह चोदने लगा। मेरी बहन कितनी बड़ी छिनाल है ये जानकर मैं उसके चिकने पुट्ठों पर कस कसके चांटे मारने लगा। “भैया धीरे मारो चोट लग रही है!” कीर्ति बोली। “हरामिन! जब जीतेन्द्र अंकल के लड़के से गांड मरवा रही थी तब नहीं तुझे चोट लग रही थी! अब क्यों तेरी गांड फट रही है?? तेरी तो मैं मां चोद दूंगा रंडी कहीं की! ले… ले मेरी छिनाल बहन… तेरी गांड अब मेरी है… बोल… भैया का लंड गांड में कितना गहरा है? चिल्ला!” मैंने गुस्से में कहा।
मैंने दो तीन तमाचे कीर्ति के चूतड़ों पर फिर रसीद कर दिए। उसके पुट्ठे लाल हो गए। वो रोने लगी। “आह्ह… भैया… दर्द हो रहा है… लेकिन… ओह्ह… और जोर से… फाड़ दो मेरी गांड… मैं तुम्हारी रंडी हूं…” मैं मजे से उसकी गांड फाड़ता रहा। मैं वहशी दरिंदा हो गया था। मैं करता ही क्या? मुझसे नहीं गांड मरवा पा रही थी। क्या मैं मर्द नहीं हूं। क्या मैं उसकी गांड नहीं फाड़ पाता। मैं कस कस के वहशी धक्के देने लगा।
मेरा लंड कीर्ति की गांड में पूरा अंदर तक धंस गया। मैं जोर जोर से जोश से अपनी सगी बहन की गांड चोद रहा था। “ये ले! ये ले छिनाल! कितना लंड चाहिए तुझको?? बोल… तेरी गांड कितनी प्यासी है… नीरज से ज्यादा मजा आ रहा है ना? चिल्ला रांड!” मैंने पूछा। “भैया भैया! धीरे धीरे! आह्ह… हां… तुम्हारा ज्यादा मजा है… ओह्ह… गांड फाड़ दो… मैं तुम्हारी रंडी हूं… रोज गांड मारवाऊंगी… आह्ह…” कीर्ति रोने और सिसकने लगी।
“हाय मम्मी! हाय मम्मी!! मर गई मैं!!” कीर्ति चिल्लाने लगी। “ये ले! ये ले कुतिया!! कितना लंड खाएगी?? जी भरके आज लंड खा ले! फिर मत कहना कि लंड की प्यासी है! ये ले कुतिया! ले… तेरी गांड में पूरा डाल रहा हूं… चिल्ला… बोल कितना गहरा है! तेरी गांड अब मेरी प्रॉपर्टी है!” मैंने हैवान की तरह चिल्लाया और दो तीन थप्पड़ कीर्ति के गाल पर जड़ दिए। उसके गुलाबी गाल लाल हो गए।
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मैंने रांड की गांड दो घंटे तक चोदी। हर धक्के पर उसकी गांड सिकुड़ती, फिर खुलती। चिकनाई और पसीने से सब गीला हो गया। कीर्ति बार-बार चिल्लाती, “भैया… और… ओह्ह… फाड़ दो… मैं मर जाऊंगी… लेकिन रुको मत…” इतनी ताकत आ गई थी गांड चुदवाने से कि कंबल वंबल मैंने दूर फेंक दिया। सच में दोस्तों चुदाई में बड़ी ताकत होती है इस सर्द भरे दिन में मैंने जाना। आखिर में मैंने कीर्ति की गांड में ही पानी छोड़ दिया। गर्म गर्म माल उसकी गांड में भर गया। इस वक्त रात के बारह बजे थे।
चुदाई में इतनी ताकत खर्च हो गई कि मुझे भूख लग आई। “कीर्ति! मुझे भूख लगी है। जा कुछ बना!” मैंने कहा।
कीर्ति उठी। वो अभी भी पूरी तरह नंगी थी, उसके बदन पर पसीने की चमक थी और चूत से मेरे माल की कुछ बूंदें टपक रही थीं। उसने थोड़ा शरमाते हुए कंबल से खुद को ढका और अलमारी से गर्म स्वेटर और पजामा निकाल लिया। जल्दी से पहनकर किचन में चली गई। उसने आलस छोड़कर दाल चावल सब्जी रोटी सब बनाया। आलू की सब्जी में थोड़ा मसाला डालकर तेज आंच पर पकाया, दाल में जीरा तड़का लगाया, चावल उबाले और रोटी बेलकर तवे पर सेकी। खाने की खुशबू पूरे फ्लैट में फैल गई।
हम दोनों भाई बहनों ने खाना खाया। कीर्ति मेरे सामने बैठी थी, खाते वक्त वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी। कभी-कभी उसके पैर मेरे पैर से छू जाते, जैसे अभी भी चुदाई की याद ताजा हो। खाना खत्म होने के बाद हमने प्लेटें साफ कीं और फिर बिस्तर की तरफ चले।
“भैया! एक बात बोलूं! तुम गुस्सा तो नहीं होंगे?” कीर्ति ने पूछा। “नहीं पगली!” मैंने कहा। “काश मुझे पता होता कि तुम इतनी बढ़िया चुदाई करते हो तो तुमसे ही चुदवा लेती। भैया! मुझे और चुदवाना है। मेरी चूत की गर्मी शांत नहीं हुई है! अभी भी जल रही है… तुम्हारा लंड चाहिए मुझे…” कीर्ति बोली, अपनी जांघें रगड़ते हुए।
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“बहना! फिकर मत कर! आज पूरी रात मैं तुझको रंडियों की तरह चोदूंगा! वादा है! तेरी चूत और गांड दोनों को इतना चोदूंगा कि कल उठने में दिक्कत हो जाए!” मैंने कहा।
फिर खाना खाने के बाद मैंने थोड़ी आग जलाई। कमरे में ठंड कम हुई। हम दोनों भाई बहनों ने अपना बदन गर्म किया। फिर जलती आग के बगल ही हम दोनों लेट गए। आग की लपटें हमारे नंगे बदन पर पड़ रही थीं, गर्माहट अंदर तक जा रही थी। मैंने उसके पैर को खोल दिया और कंधों पर रख लिया। उसकी चूत मेरे सामने खुली हुई थी, अभी भी गीली और लाल। मैंने लंड सुपाड़ा चूत पर रगड़ा और एक धक्के से पूरा अंदर डाल दिया।
“आह भैया… हां… पूरी चूत भर दो… ओह्ह… गहरी चोदो… आह्ह्ह… मैं तुम्हारी रंडी हूं… चोदो मुझे जैसे कोई सस्ती रंडी को चोदते हैं…” कीर्ति चिल्लाई।
मैंने उसके पैर कंधों पर रखकर तेज तेज ठोके मारे। हर धक्के पर उसकी चूत से चिकनाई टपक रही थी, मेरी जांघों पर गिर रही थी। उसके मम्मे उछल रहे थे। मैंने झुककर एक मम्मा मुंह में लिया और चूसते हुए और जोर लगाया। “ले छिनाल… ले मेरी बहन… तेरी चूत कितनी गर्म है… बोल… भैया का लंड कितना अच्छा लग रहा है?” “आह्ह… बहुत अच्छा… ओह्ह… मोटा… कसके चोद रहे हो… फाड़ दो चूत… मैं तुम्हारी छिनाल हूं… रोज चुदवाऊंगी…” कीर्ति चीखी।
फिर मैंने उसको गोद में उठा लिया। उसकी जांघें मेरी कमर पर लिपट गईं। मैंने उसे उचका उचका कर खूब चोदा हरामिन को। लंड हर बार पूरी तरह बाहर निकालकर जोर से अंदर ठोंकता। “ले… ले रांड… गोद में चुद… आह… कितनी टाइट चूत है तेरी… बोल… भैया की गोद में कैसा लग रहा है?” कीर्ति मेरी गर्दन से लिपट गई और कांपते हुए बोली “भैया… मैं मर जाऊंगी… ओह्ह… और तेज… चोदो… पूरी चूत भर दो… मैं तुम्हारी रंडी हूं… आह्ह…”
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फिर गोद में उठाकर ही मैंने अपनी जवान चुदासी बहन की गांड भी मारी। लंड निकालकर चूत से गांड में डाला। गांड अभी भी गीली थी, लंड आसानी से अंदर चला गया। मैंने उसे उछाल उछाल कर ठोका। “ये ले गांड में… ले मेरी छिनाल बहन… पूरी रात चुद… बोल… गांड में लंड कैसा लग रहा है? चिल्ला रांड!” “आह्ह… दर्द हो रहा है… लेकिन मजा भी… ओह्ह… भैया… फाड़ दो गांड… मैं तुम्हारी कुतिया हूं… और जोर से…” कीर्ति सिसकी।
अगले दिन मेरे चाचा हमारा रजाई गद्दा ले आए। अब हम अलग अलग कमरों में अलग अलग बिस्तर पर सोने लगे। लेकिन आज भी हम भाई बहन चुदाई करते हैं क्योंकि मुझे पता है अगर मैं नहीं चोदूंगा तो मेरी प्यासी बहन बाहर जाकर किसी और से चूत मरवाएगी और ये मुझसे सहन नहीं होगा। इससे अच्छा है कि हम दोनों एक दूसरे की सारी जरूरत पूरी करें। लेकिन हाँ अब हमने कंडोम इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
दोस्तों आपको ये सर्दी वाली भाई बहन वाली कहानी कैसी लगी? क्या आप भी कभी ऐसी ठंड में किसी रिश्तेदार के साथ आमने-सामने गर्मी महसूस करना चाहेंगे? कमेंट में अपनी राय और अनुभव जरूर शेयर करें!
Very nice story