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बुआ की बेटी को चोदकर वर्जिनिटी लूटी

Bua ki beti sex story, Cousin chudai kahani, Virginity todi sex story, Hotel me chudai sex story: ये बात करीब १४ साल पुरानी है जब मैं तन्नू दी की शादी में गया था। वो मेरी बुआ की सबसे बड़ी बेटी थी और रितु उसकी छोटी बहन, मेरी बुआ की बेटी। रितु उस वक्त १९ साल की थी, कॉलेज में पढ़ रही थी। मुझे हमेशा लगता था कि वो मुझे चुपके-चुपके देखती है। जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ती, वो शर्मा कर नजरें झुका लेती। मैं समझ गया था कि इसकी आंखों में कुछ तो है।

शादी से दो दिन पहले मैं पहुंच गया था। रितु और मैं शादी की तैयारियों में जुटे हुए थे। एक दिन हमें तन्नू दी के लिए सिंगार का सामान लेने जाना था। वो मेरी बाइक पर बैठी। वो मेरी कमर पकड़ना चाह रही थी लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई। आखिर मैं उसका मामा का लड़का था, ५ साल बड़ा और थोड़ा गुस्सैल माना जाता था। बाइक पर कुछ खास नहीं हुआ।

शादी का दिन आया। रात ८ बजे शादी शुरू हुई। करीब १० बजे रितु ने बुआ से कहा कि वो साड़ी बदलकर ड्रेस पहन लेगी। बुआ ने घर की चाबी दी लेकिन कहा अकेली मत जाना। मैं पास में ही खड़ा था तो रितु बोली, “गुड्डू भैया मेरे साथ बाइक पर चले जाएंगे।” बुआ ने कहा थोड़ी देर बाद जाना। मेरे मन में तो जैसे पटाखे फूट रहे थे। सोच रहा था घर पहुंचते ही दरवाजा बंद करके इसे गले लगा लूंगा।

मैंने १५ मिनट इंतजार किया लेकिन रितु चाबी नहीं ले आई। मैंने खुद कहा, “बाबू जल्दी चाबी ले लो, मुझे भी चार्जर निकालना है।” वो नशीली आंखों से मुझे देखकर बोली, “हां भैया लेती हूं।” उसकी आंखों में भी वही चाहत दिख रही थी जो मेरे मन में थी।

जैसे-तैसे चाबी लेकर हम बाइक पर निकल पड़े। रास्ते भर मैं सोच रहा था कि घर पहुंचते ही अंदर से दरवाजा बंद कर इसे जबरदस्त चिपक जाऊंगा, इसे दीवार से सटाकर होंठ चूस लूंगा, हाथों से इसके बूब्स दबा-दबाकर देखूंगा कि कितने मुलायम हैं। दिल की धड़कन तेज हो रही थी, लंड पहले से ही अंगड़ाई ले रहा था।

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घर पहुंचते ही रितु ने मुख्य दरवाजे का ताला खोला। मैं तेजी से अंदर चला गया। वो बाहर का कंपाउंड गेट अच्छे से बंद करके आई और हल्की सिसकारी के साथ बोली, “मैं चेंज कर लेती हूं भैया…” उसकी आवाज में थोड़ी कांप थी, जैसे वो भी उतनी ही बेचैन हो। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हां कर ले… जल्दी कर।” मैं हॉल का दरवाजा बंद करने की तरफ बढ़ा ही था कि बाहर बाइक का हॉर्न बज उठा। मैंने झटके से देखा – रितु के मौसा जी यानी मेरे छोटे फूफा जी और उनके एक-दो दोस्त। वो थके हुए अंदर आए और बोले, “यार बहुत थक गए हैं, बस सो जाएंगे।” बस १५ मिनट में उन्होंने गद्दा बिछाया और लेट गए। मैं मन ही मन उन्हें गालियां दे रहा था – साला सही मौका आया था और ये लोग बीच में आ गए। उस रात कुछ नहीं हो पाया। रितु ने बस नजरें मिलाईं, हल्का सा होंठ काटा और चुपचाप अपने कमरे में चली गई। मैं बिस्तर पर लेटा रहा, लंड टाइट, दिमाग में बस उसी की तस्वीरें घूम रही थीं।

अगले दिन दूल्हे के यहां रिसेप्शन था। हमने ८ सूमो बुक की थीं। शाम होते-होते सब लड़कियां तैयार होकर बैठ रही थीं। मैंने मौका देखकर रितु के ठीक पास वाली सीट पर जाकर बैठ गया। रात के करीब ७:३० बज रहे थे। गांव के रास्ते बिल्कुल अंधेरे, सिर्फ सूमो की लाइटें और दूर-दूर की मद्धम रोशनी। हवा ठंडी थी, लेकिन हमारे बीच का माहौल गर्म हो रहा था।

मैंने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। उसकी हथेली गर्म थी, थोड़ी सी कांप रही थी। उसने तुरंत मेरी उंगलियां अपनी उंगलियों में फंसाईं और हल्का-हल्का दबाने लगी। मैंने भी दबाव बढ़ाया। हम दोनों की सांसें तेज हो गईं। मेरा लंड पैंट में पूरी तरह खड़ा हो चुका था, दर्द करने लगा था। मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी जांघ पर सरकाया। साड़ी के ऊपर से भी उसकी जांघों की गर्माहट महसूस हो रही थी। मैंने उंगलियों से हल्के-हल्के सहलाना शुरू किया, धीरे-धीरे घुटने से ऊपर की तरफ। वो थोड़ा सिकुड़ गई, लेकिन हाथ नहीं हटाया। उसकी सांसें भारी हो गईं।

फिर उसने मेरे पैंट के ऊपर से मेरा लंड पकड़ लिया। पहले हल्का सा छुआ, फिर पूरी मुट्ठी में भर लिया और जोर-जोर से दबाने लगी। साली इतने जोर से दबा रही थी जैसे निकाल ही लेगी। मैं दांत पीसकर खुद को काबू में रख रहा था। मैंने भी हिम्मत करके उसकी साड़ी के नीचे हाथ डालने की कोशिश की। नाड़ा बहुत टाइट बंधा था, हाथ मुश्किल से अंदर गया। मैंने उंगलियों से उसकी चूत के ऊपर वाली जगह पर दबाव डाला, लेकिन पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। वो हल्की सी सिसकारी भरकर मेरी तरफ देखने लगी।

रितु नशीली आंखों से मुझे घूर रही थी, होंठ कटे हुए, सांसें फूल रही थीं। मैंने उसका हाथ उठाया और उसकी एक उंगली अपने मुंह में डाल ली। धीरे-धीरे चूसने लगा, जीभ से लपेटते हुए। उसने भी मेरी एक उंगली पकड़ी और अपने मुंह में डाल ली। हम दोनों एक-दूसरे की उंगलियां चूस रहे थे, जैसे चुदाई का प्रैक्टिस कर रहे हों। कभी-कभी वो अपनी जीभ मेरी उंगली पर घुमाती, मैं भी वैसा ही करता। जब भी दूर से कोई रोशनी आती, कोई सूमो या बाइक गुजरती, हम रुक जाते – हाथ हटा लेते, नजरें नीचे कर लेते। जैसे ही अंधेरा होता, फिर शुरू। उसकी जांघों पर मेरा हाथ फिर से सरक जाता, वो मेरा लंड फिर से दबाने लगती।

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हम ऐसे ही पूरे रास्ते मस्ती करते रहे। मेरा लंड इतना टाइट हो चुका था कि पैंट फाड़ने को तैयार था। वो भी गर्म हो चुकी थी, उसकी जांघें आपस में रगड़ रही थीं। लेकिन अफसोस रहा कि शादी में रितु को चोद नहीं पाया। बस इतनी ही छेड़छाड़, इतना ही टच, और दिल में आग लगाकर मैं घर लौट आया।

लेकिन असली कहानी उसके १०-१५ दिन बाद शुरू हुई। रितु अपने शहर वापस चली गई जहां वो कॉलेज में पढ़ रही थी। उसने मुझे लव मैसेज भेजने शुरू किए। हम मैसेज पर चैट करने लगे। एक दिन उसने सीधे प्रपोज किया, “I love you भैया, मुझे आप बहुत पसंद हो।” मैंने लिखा, “भैया…” वो तुरंत बोली, “तो फिर क्या बोलूं आपको?” मैंने कहा, “तू ही बता।” उसने लिखा, “I love you जान।” पढ़ते ही मेरा लंड फिर से टाइट हो गया।

चैट में मैंने कहा, “रितु उस दिन शादी की रात तुझे गले लगाने वाला था लेकिन तेरे मौसा जी ने सब खराब कर दिया। मैं तुझे चोदने वाला था।” उसका रिप्लाई सुनकर मैं दंग रह गया। वो बोली, “यार तब एक बार बोल तो देते, हम कर लेते।” मैंने कहा वो लोग आ चुके थे तो कैसे। वो बोली, “कैसे भी कर लेते, टेरेस पर या बाथरूम में जाकर।” हम दोनों पछताने लगे।

हम ऐसे ही चैट करते रहे। एक दिन उसने कॉल किया और पूछा कि एग्जाम का सेंटर भोपाल डालूं या नागपुर। मैंने कहा नागपुर डाल। उसने वैसा ही किया।

अब कहानी को तेज करते हैं। एग्जाम देने वो एक दिन पहले आई। मैं स्टेशन पर लेने गया। आते वक्त बाइक पर उसने मुझे बहुत प्यार किया, पैंट के ऊपर से लंड को छुआ और बोली, “तड़प गई हूं इसे अंदर लेने के लिए।” मैंने कहा, “हां कल पेपर हो जाए फिर सोमवार को होटल में बहुत सेक्स करेंगे।” वो बोली, “सब ठीक है लेकिन आज आपके घर पर भी चांस मिले तो ऊपर-ऊपर थोड़ा बहुत कर लेंगे।” मैंने कहा ठीक है। सच में वो मुझसे ज्यादा बेचैन थी। हम पहले भी कई बार फोन सेक्स कर चुके थे।

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घर पहुंचे तो मम्मी से बात चली। मेरा छोटा भाई गांव से २ दिन के लिए आया था। वो नए कपड़े की जिद कर रहा था। शाम को मम्मी ने रितु से कहा, “ये जिद कर रहा है, इसे कपड़े दिला देती हूं। बेटी तुम खाना बना लेना।” रितु खुशी से बोली, “हां मामीजी बना लूंगी।”

जैसे ही वो लोग गए हम दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया। वो बोली, “जान कितने लकी हैं हम, सेक्स का चांस मिल गया।” फिर बोली, “मैं खाना बना लेती हूं फिर सेक्स करेंगे।” मैंने कहा, “कितना टाइम लगेगा, पापा भी आ जाएंगे।” वो बोली, “जल्दी बनाती हूं।”

खाना बनाते वक्त मैं पीछे से चिपक जाता, उसे पकड़ लेता। वो पलटकर मुझे गले लगाती और मेरा लंड पकड़ लेती। मैं घुटनों पर बैठकर उसकी चूत चूसने लगा। पहले तो उसकी सलवार का नाड़ा खोला, धीरे से सलवार नीचे सरकाई। उसकी पैंटी भी उतारी। उसकी टाइट, गुलाबी चूत बिल्कुल साफ और गीली हो चुकी थी। मैंने अपनी जीभ से उसके क्लिटोरिस को चाटना शुरू किया, धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाते हुए। रितु की टांगें कांपने लगीं। वो दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी और धीमी आवाज में बोली, “आह्ह… जान… वहां… हां… ऊंह्ह…” मैंने अपनी जीभ अंदर डाल दी, उसके रस को चूसने लगा। वो मेरे बालों को पकड़कर अपनी चूत मेरे मुंह पर दबाने लगी। उसका पूरा शरीर सिहर रहा था। फिर उसने मुझे खींचकर खड़ा किया और मेरी बरमूडे खींचकर मेरा ८ इंच का मोटा लंड बाहर निकाला। उसने पहले सुपारे को चूमा, फिर मुंह में लिया। धीरे-धीरे चूसने लगी। मेरे प्रीकम की बूंद उसने चखी और बोली, “जान ये तो नमकीन लग रहा है।” मैंने कहा, “हां।” वो और जोर से चूसने लगी, कभी सिर हिलाती, कभी हाथ से सहलाती।

खाना बन गया तो मैंने उसे उठाकर बेडरूम में ले गया। बेड पर सुलाया और ऊपर सो गया। लिप किस करने लगा। गहरी, लंबी किस। जीभें एक-दूसरे से लड़ रही थीं। वो मेरा लंड दबाने लगी। उसने मेरी बरमूड के बाहर से लंड निकाला और बोली, “आह्ह्ह… ये तो बहुत बड़ा है।” मैंने कहा, “हां अगर ये तेरा पहला बार है तो दर्द से पागल हो जाएगी।”

मैंने ज्यादा देर नहीं की। उसे नंगा किया। पहले उसकी कुर्ती उतारी, फिर ब्रा का हुक खोला। उसके गोरे-गोरे, नुकदार बूब्स बाहर निकल आए। मैंने दोनों हाथों से उन्हें दबाना शुरू किया, अंगूठों से निप्पल्स को रगड़ते हुए। वो कराह रही थी, “ऊंह्ह… जान… दबाओ… और जोर से…” फिर मैंने उसकी सलवार और पैंटी भी पूरी उतार दी। अब वो पूरी तरह नंगी बेड पर लेटी थी। मैंने उसके पैर फैलाए। उसकी चूत पर लंड का सुपारा रखा और धीरे-धीरे घुमाने लगा। वो बेचैनी से हिल रही थी। फिर मैंने हल्का सा धक्का दिया। सिर्फ सुपारा अंदर गया। वो बोली, “आह्ह्ह… जान धीरे।”

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मैंने फिर धीरे से झटका दिया। लंड करीब २५% अंदर गया। वो तड़पने लगी, दोनों हाथों से मेरी पीठ पकड़ ली। मैं आगे-पीछे होने लगा, बहुत धीरे-धीरे। हर धक्के पर वो सांस रोक लेती। तीसरा झटका दिया तो वो जोर से रो पड़ी, “नहीं निकालो… मेरी चूत से खून निकल रहा है… आह्ह्ह्ह… दर्द हो रहा है।” मैं डर गया। देखा तो उसकी चूत खून से लाल थी। वो बोली, “बहुत दर्द हो रहा, अभी नहीं करते। कल होटल में करेंगे।” मैंने पूछा, “तुझे कैसे पता खून निकल रहा?” वो बोली, “अंदर जाने के बाद ऐसा लगा जैसे कुछ फट गया।”

अगले दिन होटल में मैंने उसे तीन बार चोदा। कमरा बंद करते ही हमने एक-दूसरे के कपड़े फाड़ने जैसे उतारे। पहली बार मैंने उसे मिशनरी में लिटाया। उसके पैर कंधों पर रखे। लंड फिर से उसकी चूत पर रगड़ा। पहले तो सिर्फ सुपारा घुसाया। वो आंखें बंद करके सांस ले रही थी। फिर धीरे से पूरा सिरा अंदर किया। वो चीख पड़ी, “आआह्ह्ह… ओह्ह्ह… जान बहुत मोटा है… फाड़ दोगे… आह्ह्ह… धीरे… ऊंह्ह्ह…” मैं रुका, उसके होंठ चूमे, बोला, “आराम से जान, relax हो जा… अब धीरे-धीरे पूरा जाएगा।” फिर बहुत धीमे धक्के मारे। हर धक्के के साथ लंड थोड़ा और अंदर सरकता। खून और उसका रस मिलकर बिस्तर गीला हो गया। वो दर्द से कराह रही थी लेकिन मुझे छोड़ नहीं रही थी। धीरे-धीरे दर्द कम हुआ और वो खुद कमर उठाने लगी। मैंने स्पीड बढ़ाई। वो बार-बार बोली, “जान बस करो… लेकिन मत निकालना… आह्ह… फिर से करो…” आखिर में जब मैंने जोर से तीन-चार धक्के मारे तो वो पहली बार झड़ गई, शरीर कांप उठा। मैं भी उसके अंदर ही झड़ गया।

थोड़ी देर आराम के बाद दूसरी बार मैंने उसे डॉगी स्टाइल में किया। वो घुटनों और हाथों के बल थी। मैंने पीछे से उसकी कमर पकड़ी, लंड को चूत के मुंह पर रगड़ा और एक ही झटके में आधा घुसा दिया। वो तकिए में मुंह दबाकर चीख रही थी, “ओह्ह्ह… हां… ऐसे ही… गहरा डालो… आआह्ह्ह… फाड़ दो मेरी चूत… ऊंह्ह्ह…” मैंने उसके बूब्स पीछे से पकड़े, निप्पल्स खींचे और तेज-तेज पेलने लगा। हर ठोके पर उसके गांड की चमकती चमड़ी हिल रही थी। वो खुद पीछे धकेल रही थी। मैंने एक हाथ से उसकी चूत पर उंगली भी घुमाई। वो दो बार झड़ गई। मैंने भी उसके अंदर ही छोड़ दिया।

तीसरी बार मैंने उसे फिर मिशनरी में लिया। अब दर्द लगभग खत्म हो चुका था। मैंने उसके पैर कंधों पर रखे और धीरे से पूरा लंड अंदर कर दिया। वो मेरी पीठ पर नाखून गड़ा रही थी, “जान बस… और नहीं… ओह्ह्ह… फिर भी मत रुको… आह्ह्ह… कम हो गया दर्द… अब मजा आ रहा है…” मैंने रिदम बनाया, कभी तेज कभी धीमा। उसके बूब्स चूसता, काटता। वो मेरे कान में फुसफुसाती, “जान… और जोर से… मेरी चूत अब तुम्हारी है… फाड़ दो… आह्ह…” आखिर में हम दोनों साथ ही झड़ गए। वो पूरी तरह थक चुकी थी लेकिन चेहरा संतुष्ट था।

उसके बाद हर २ महीने में वो मुझसे चुदवाने आती। हम डायरेक्ट होटल में मिलते। घर पर नहीं आती ताकि शक न हो। वो रिलेटिव है और २०० किमी दूर से आती है।

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अब चोद-चोद के मैंने उसकी छोटी सी चूत को भोसड़ा बना दिया है। वो मोटी भी हो गई। उसके बूब्स और गांड भी बड़े हो गए। अब हम ऐसे ही मिलते हैं और इंतजार कर रहे हैं कि उसकी ग्रेजुएशन पूरी हो और वो हमारे शहर में पोस्ट-ग्रेजुएशन करे। मतलब हर हफ्ते चुदाई हो, शायद हर दिन। वो यहां आएगी तो मैं उसके लिए फ्लैट रेंट पर लूंगा और जी भर के चोदूंगा।

दोस्तों कहानी पढ़ने के बाद अपने विचार कमेंट में जरूर लिखें।

1983
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