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दीदी को चोदने को गरम तेल लाया भाई

मेरा नाम धैर्या है, इक्कीस साल की हूँ, झाँसी के एक कॉलेज में बीए फाइनल ईयर कर रही हूँ। होस्टल में रहती हूँ, गोरी रंगत, साधना कट बाल, फिगर 34-28-36, ब्रा साइज 34बी। टाइट जीन्स और क्रॉप टॉप मेरी पहचान हैं, नाभि से ऊपर टॉप, चलते वक्त चूतड़ हिलते हैं तो लड़के पीछे मुड़ते हैं। मेरा ममेरा भाई किशन चौबीस साल का, गाँव में पिताजी के साथ खेती-दुकान संभालता है। कसरती बदन, चौड़े कंधे, गेहुँआ रंग, लंबाई छह फुट। उसका लण्ड सात इंच लंबा, मोटा, नसें उभरी हुईं।

मुझे और मेरी सहेलियों को सेक्स स्टोरी पढ़ने की लत है, रात को होस्टल में चुपके से मोबाइल निकालकर पढ़ती हूँ, कभी उत्तेजना में उँगलियाँ चूत पर फिराने लगती हूँ। एक महीना पहले किशन झाँसी आया, घर से सामान लेकर। हर महीने कोई न कोई आता रहता है, इस बार उसकी बारी। मेरे रूम की साथ वाली बेड खाली थी, इसलिए वो रात भर रुका।

रात ग्यारह बज चुके थे, मैं बेड पर लेटी स्टोरी पढ़ रही थी, किशन ऊपर वाली बेड पर गेम खेल रहा था। मैंने स्कर्ट और स्लीवलेस टॉप पहना था, नीचे पिंक पेंटी। अचानक पेट में तेज दर्द, जैसे कोई छुरी घोंप रहा हो। करवट बदलती रही, आँसू आ गए। किशन घबरा गया, “दीदी, क्या हुआ?” मैंने बताया पेट में दर्द है। वो बाहर भागा मेडिकल ढूंढने, लेकिन बारह बज चुके थे, सब बंद। लौटकर बोला, “दीदी, माँ गाँव में सरसों का तेल गरम करके मालिश करती थी, मैं लगा दूँ?” दर्द से तड़प रही थी, बोली, “ठीक है।”

किचन से गुनगुना तेल कटोरी में लेकर आया। मैं लेटी थी, स्कर्ट कमर तक। टॉप नाभि तक ऊपर सरकाया। दोनों हाथों में तेल लिया, पेट पर रखकर गोल गोल मालिश शुरू की। पहले हल्का प्रेशर, नाभि के चारों तरफ़। फिर उँगलियों की पोर से दबाव बढ़ाया, मांसपेशियों को ढीला करने के लिए। तेल चिकना, हर सर्कल में फिसलन। बीच में और तेल डाला, बूँदें गिराईं, फैलाया। “दीदी, यहाँ दबाऊँ?” नाभि के ठीक नीचे दबाया। मैंने “हाँ” कहा। उँगली नाभि में घुमाई, अंदर तक, फिर बाहर निकालकर गोल गोल।

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दर्द कम होने लगा, लेकिन अब गर्मी अलग सनसनी दे रही थी। मालिश ऊपर की ओर, रिब केज के नीचे, ब्रा के लोअर एज तक। उँगलियाँ ब्रा के नीचे से हल्के छुईं, चूचियाँ सिहर उठीं। “दीदी, यहाँ भी दर्द?” मैंने कुछ नहीं कहा, आँखें बंद। हिम्मत करके ब्रा के नीचे हाथ डाला, मम्मों के नीचे सहलाने लगा, तेल से चिकनाहट। निप्पल अभी नहीं छुए, सिर्फ़ अंडरबूब मसलता रहा, गोल गोल, हल्का दबाव, हल्का सहलाना। साँसें तेज़, चूत में गुदगुदी।

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नीचे की ओर आया, कमर की साइड्स, हिप बोन। उँगलियाँ स्कर्ट के वेस्टबैंड के नीचे सरकीं, पेंटी के ऊपरी किनारे पर। “दीदी, रिलैक्स हो जाओ।” पैर थोड़े फैला दिए। जाँघों की ओर बढ़ा, स्कर्ट घुटनों से ऊपर, मिड थाई तक। तेल जाँघों पर, इनर साइड में। उँगलियाँ अंदर बाहर, घुटने के पीछे, जाँघ के जोड़ पर। पेंटी के साइड से उँगली अंदर, लेकिन सिर्फ़ त्वचा। पैर अलग किए, एक किनारे पर, दूसरा अंदर। इनर साइड पूरी खुली। और तेल, पेंटी के क्रॉच के बगल से गुजरती उँगलियाँ, हल्का दबाव। चूत गीली, पेंटी में महसूस।

पैर की उँगलियों से शुरू करके ऊपर, एंकल, पिंडली, घुटने के पीछे, जाँघ। हर बार टॉप पर रुकता, पेंटी के नीचे सरकाता, सिर्फ़ सहलाना। “दीदी, दर्द कम हुआ?” “हाँ।” पेट पर वापस, नाभि में उँगली गोल गोल, नीचे की ओर, पेंटी के ऊपर से चूत के ऊपरी हिस्से पर हल्का दबाव। सिहर गई। पेंटी के साइड से उँगली अंदर, क्लिट के ऊपर से, हल्का रगड़ा। “उफ्फ” मेरी मुह से निकला। तेल और पानी का मिश्रण।

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मेरा हाथ उसकी पैंट से टकराया, कड़क। भाई का लण्ड खड़ा। टॉप और ऊपर सरकाया, ब्रा का निचला हिस्सा दिखा। उँगली से ब्रा के नीचे छुआ, चूचियाँ सिहर उठीं। अच्छा लगने लगा। पैरों की ओर, स्कर्ट जाँघों तक। इनर साइड में तेल, उँगलियाँ पेंटी के किनारे से टकरातीं। हल्की आँखें खोलकर देख रही थी। पैंट का नाडा खोला, जिप नीचे, मोटा लण्ड बाहर, धीरे हिलाने लगा। नजर मेरे लण्ड पर, सुपारा लाल, नसें उभरी। पेंटी की ओर देख रहा था।

पेंटी के नाडे खींचे, नींद का बहाना। पेंटी घुटनों तक सरका दी, चूत पर हल्के बाल, गुलाबी फाँक। पेंटी सूँघी, “उफ्फ दीदी, क्या खुशबू।” पेंटी लण्ड पर लपेटकर हिलाने लगा, “आह्ह आह्ह”। उत्तेजना बढ़ रही थी।

पैर अलग किए, स्कर्ट कमर तक। चूत पूरी खुली। “इस्स्स, ओह्ह क्या चीज है दीदी की चूत।” लण्ड हिलाते हुए देखता रहा। अब चोदने का इरादा। नींद का बहाना छोड़ा, उठ बैठी, “किशन, ये क्या कर रहे हो?” वहशी नजरें, “दीदी, आज मत रोकना प्लीज, मुझे चोदना है।”

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“नहीं, ये नहीं हो सकता।” “क्यों नहीं? मेरे घर की चीज को कोई और चोद सकता है और मैं नहीं?” “कौन मेरे साथ क्या किया?” मुस्कुराया, “ट्यूशन वाले सर से नहीं चुदवाया? मामा जी से भी।” झटका लगा। “ठीक है, लेकिन आज मेरा पीरियड शुरू, थोड़ा खून, आज छोड़ दो, कल ले लेना।”

“ठीक है, लेकिन थोड़ा सा घुसाने दो।” मना कर रही थी, अंदर आग। “ठीक है, थोड़ा सा।” पैर कंधों पर, चूत पर सुपारा, जोर का धक्का। “आआआह्ह्ह्ह” चीख, चूत फट गई लगी। “कहा था ज्यादा मत!” “दीदी, शेर के सामने बकरी हो और शेर सूँघकर छोड़ दे?” झटके देने लगा।

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फच फच फच। गाँड उठाकर धक्के, “आह्ह आह्ह उफ्फ उफ्फ और जोर से किशन आह्ह आ आ आ ओऊऊ उफ्फ्फ”। ब्रा ऊपर, चूचियाँ बाहर, मम्मे दबाए, निप्पल चूसे। बाल पकड़कर दबा रही थी। दस मिनट बाद मैं ऊपर, कमर पर बैठी, लण्ड पूरा घुसा, उछलने लगी, “आह्ह आह्ह मर गई रे उफ्फ्फ किशन और गहराई तक आह्ह”।

घोड़ी बनाया, पीछे से घुसाया, गाँड पर थप्पड़, “ले दीदी, ले मेरा लण्ड, फच फच फच”। चादर पकड़कर चिल्लाई, “हाँ भाई, चोद मुझे, और तेज आह्ह आह्ह उफ्फ्फ ओऊऊ”। आधे घंटे चली, तीन बार झड़ी, अंदर झड़ा। होंठ चूसे, फिर खड़ा। मैंने लण्ड चूसा, गले तक, वो चूत चाटी, जीभ अंदर।

रात भर तीन राउंड, कभी ऊपर, कभी वो, कभी साइड में। सुबह उठी तो चल नहीं पा रही थी, चूत सूज गई, लेकिन रात का मजा अलग था।

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