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चाची ने लंड पकड़कर चुदाई का पूरा पाठ पढ़ाया

Chachi ne sikhaya sex story, Horny aunty fingering sex story: मेरा नाम राकेश है। मैं पटना में रहता हूं। मेरा कद 5 फीट 10 इंच है। देखने में मैं बहुत हैंडसम लगता हूं, जॉन अब्राहम जैसा। मेरी पर्सनैलिटी जबरदस्त है। लड़कियां मुझे देखकर लाइन लगा लेती हैं। मेरे 11 इंच के मोटे लंड से मैं उनकी चूत की गहराई नापता हूं।

मुझे सेक्स में बहुत मजा आता है। खूबसूरत लड़कियां देखते ही मेरा लंड खड़ा हो जाता है। चूत न मिले तो मुठ मारकर इसे रेलगाड़ी बना लेता हूं। एक बार चल गई तो मलाई निकालकर ही रुकता है। मेरी पहली असली चूत मेरी चाची ने ही दी थी।

मेरा मूल घर गांव में है। वहां कोई अच्छा स्कूल नहीं था। मैं दूर के छोटे स्कूल में पढ़ता था। क्लास 8 में था तब चाचा आए। उनका नाम अमर है। वे पटना में रहते थे। गांव कभी-कभी घूमने आते थे।

मुझसे स्कूल के बारे में पूछा तो मैंने सब बताया। चाचा बोले, यहां कोई ढंग का स्कूल नहीं। तुम मेरे साथ पटना चलो, अच्छे स्कूल में एडमिशन करवा दूंगा। मैं तो खुश हो गया। घरवाले मना करते रहे, लेकिन आखिर मान गए। मैं चाचा के साथ पटना चला आया।

घर पहुंचते ही चाची से मिला। चाची बहुत खूबसूरत लग रही थीं। तब मेरे मन में कुछ गलत ख्याल नहीं थे। मैं उन्हें बहुत प्यार करता था। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, नजर बदलने लगी। क्लास 10 में पहुंचा तो चाची मुझे जबरदस्त माल लगने लगीं। उनकी जवानी देखकर दिल धड़कने लगता।

मैंने ब्लू फिल्म देखना शुरू किया। उसी से सब कुछ सीखा। पहली बार जोश में मुठ मारी। आधे घंटे तक लगातार हिलाया, फिर मलाई निकली। वो पहला एहसास आज भी याद है। फिर रोज मुठ मारने लगा। सपनों में चुदाई देखकर कच्छे में झड़ जाता। सुबह जल्दी पैजामा बदल लेता।

चाची की ब्रा-पैंटी लेकर मुठ मारता। उनकी ब्रा पर माल गिराकर लंड साफ करता। मैं चाची के साथ ही सोता था। रात में उन्हें छूते ही लंड खड़ा हो जाता। सो जाने पर उनकी गांड में लंड रगड़ता।

एक रात सपने में खूब चुदाई की। कई बार झड़ गया। सुबह पैजामा गीला। चाची ने पैजामा धोने मांगा। मैं डर गया। सोचा आज तो पिटाई पक्की। डरते-डरते पैजामा दे दिया। चाची ने धोया लेकिन कुछ नहीं कहा।

कुछ दिनों बाद शक हुआ। रोज सुबह चाची पैजामा क्यों ले जाती हैं। एक दिन खिड़की से देखा। चाची मेरे पैजामे को सूंघ रही थीं। सूंघते-सूंघते अपनी चूत में उंगली डालकर मुठ मार रही थीं। उनकी चूत से रस टपक रहा था। मुझे पता चला चाची कितनी चुदासी हैं।

चाचा ड्यूटी पर ज्यादा रहते। कई दिनों से चाची को लंड नहीं मिल रहा था। उनकी चुदाई की आवाजें भी नहीं सुनाई दे रही थीं। चाची की प्यास बढ़ती जा रही थी।

एक दिन चाची ने सीधे पूछ लिया।

चाची बोलीं, “राकेश, तुम्हारे पैजामे पर कुछ दिनों से सफेद दाग क्यों लग रहे हैं। मेहनत से भी नहीं मिटते।”

मैंने सीधा बनकर कहा, “रात में सो जाता हूं, पता नहीं कैसे लग जाता है। सुबह उठता हूं तो देखता हूं।”

चाची हंस पड़ीं, “हा हा हा, तुझे सच में नहीं पता ये दाग कौन लगाता है?”

मैंने शरमाते हुए कहा, “नहीं पता।”

मैं उनके बड़े-बड़े मम्मों को घूर रहा था। चाची ने मुझे पास बुलाया।

चाची बोलीं, “मुझे पता है ये दाग कौन लगाता है। रात में बताऊंगी। उसके बाद कभी नहीं लगेगा।”

मैं रात का इंतजार करने लगा। रात हुई। मैं जल्दी बिस्तर पर लेट गया। चाची भी पास लेटीं।

मैंने पूछा, “बताओ ना, कौन लगाता है दाग?”

चाची बोलीं, “ये जो तुम्हारे पैजामे में बड़ा मोटा खंभा है, यही लगाता है।”

मैंने पूछा, “वो कैसे?”

चाची ठहाके मारकर हंसीं। उन्हें लगा मुझे कुछ नहीं पता। उन्होंने दरवाजे की कुंडी लगाई। फिर मेरे पैजामा उतारने को कहा। मैं शरमा रहा था।

चाची ने खुद मेरे पैजामा नीचे किया। उनका हाथ मेरे कमर पर फिसला और धीरे-धीरे पैजामा खींचकर नीचे कर दिया। मेरा लंड पहले से ही आधा तना हुआ था, लेकिन जैसे ही हवा लगी, वो और सख्त हो गया। चाची ने उसे हाथ में लिया, अपनी नरम हथेली से चारों तरफ से सहलाया। फिर हल्के से हिलाते हुए बोलीं, “अभी दिखाती हूं कैसे दाग लगता है।”

उनकी उंगलियां मेरे लंड की नसों पर फिसल रही थीं। वो जोर-जोर से मुठ मारने लगीं, ऊपर-नीचे तेज गति से। कभी सुपारे को अंगूठे से दबातीं, कभी जड़ तक नीचे ले जातीं। मेरा लंड फूलकर लोहे जैसा सख्त हो गया, सिर लाल होकर चमक रहा था। मैं सांसें तेज ले रहा था, शरीर में कंपकंपी सी दौड़ रही थी। चाची की आंखें मेरे चेहरे पर टिकी थीं, वो मुस्कुरा रही थीं, जैसे कोई खेल खेल रही हों।

करीब 20 मिनट तक वो लगातार हिलाती रहीं। कभी स्पीड बढ़ातीं, कभी धीमी करके तड़पातीं। मेरी सांसें रुकने लगीं, कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी। मैं बोला, “चाची… अब… झड़ने वाला हूं…” चाची ने और तेज किया, अपना दूसरा हाथ मेरी गोलियों पर रखकर हल्के से दबाया। आखिरकार मैं झड़ पड़ा। गरम-गरम माल की धार निकली, चाची ने हथेली आगे करके पूरा माल अपने हाथ में ले लिया। वो सफेद चिपचिपा माल उनकी उंगलियों पर फैल गया। फिर हंसकर बोलीं, “देखो, ऐसे लगता है दाग।”

मैं थककर लेट गया, सांसें तेज चल रही थीं। चाची ने हाथ साफ किया और फिर मेरी तरफ देखकर बोलीं, “कुछ समझ आया?”

मैंने शरमाते हुए कहा, “किए बिना समझ नहीं आएगा।”

चाची मुस्कुराईं। उन्होंने लाल साड़ी और ब्लाउज पहना हुआ था। धीरे से साड़ी को कमर तक ऊपर किया, पेटीकोट नहीं था। बोलीं, “पैंटी निकालो।” मैंने हाथ बढ़ाकर उनकी पैंटी के किनारे पकड़े, धीरे-धीरे नीचे खींची। उनकी चिकनी जांघें नजर आईं, फिर गीली चूत। पैंटी घुटनों तक उतर गई।

फिर बोलीं, “अंदर सर डालकर देखो, एक सुरंग दिखेगी।” मैंने झुककर अपना सर उनकी टांगों के बीच ले जाया। उनकी चूत बहुत गीली थी, हल्की सी महक आ रही थी। मैंने सर और आगे बढ़ाया, जीभ से छुआ। बाहर निकलकर देखा तो चाची मुस्कुरा रही थीं।

चाची ने ब्लाउज के हुक खोले। ब्लाउज उतारा, ब्रा भी खोल दी। बड़े-बड़े, गोल मम्मे आजाद हो गए, निप्पल सख्त और गुलाबी। मैंने उनके होंठ चूमने शुरू किए। ब्लू फिल्म से सीखा था, इसलिए पहले हल्के से होंठ दबाए, फिर जीभ अंदर डाली। उनके नरम गुलाबी होंठ चूस रहा था, चाची भी साथ दे रही थीं, अपनी जीभ मेरी जीभ से मिला रही थीं।

मैंने दोनों मम्मों को हाथ में लिया। नरम, भारी, दबाने पर उंगलियां धंस जातीं। निप्पल मुंह में लेकर चूसने लगा। बहुत मीठा लग रहा था, जैसे कोई मलाई। मैंने एक निप्पल चूसते हुए दूसरे को उंगलियों से मसलता रहा। चाची की सांसें तेज हो गईं, वो कराह रही थीं, “हम्म… अच्छा लग रहा है…”

फिर मैंने उनका पूरा बदन सहलाना शुरू किया। गर्दन से कमर तक, जांघों पर हाथ फेरा। चाची मस्त हो रही थीं, आंखें बंद, होंठ काट रही थीं। मेरा लंड फिर खड़ा हो गया, सख्त और तना हुआ। चाची ने उसे देखा, हाथ में पकड़कर हिलाना शुरू किया।

मैंने लंड उनके मुंह के पास ले जाकर रखा। चाची ने मुंह खोला, लॉलीपॉप की तरह चूसना शुरू किया। ग्ग्ग्ग… गी… गी… गों… गों… की आवाज आने लगी। वो जीभ से सुपारे को चाट रही थीं, फिर गले तक ले जा रही थीं। मैं धीरे-धीरे कमर हिला रहा था, गले तक पेल रहा था। चाची की आंखें नम हो गईं, लेकिन वो रुक नहीं रही थीं।

5 मिनट बाद मैंने उनकी साड़ी पूरी उतार दी। अब वो नंगी थीं। मैंने मुंह सीधे उनकी चूत पर रख दिया। जीभ से चारों तरफ घुमाया, पंखुड़ियों को चाटा। फिर चूत के छेद में जीभ घुसाई, अंदर-बाहर किया। चाची सिसकारियां भरने लगीं, “आह्ह… ओह्ह… इह्ह… आऊ… ऊं… अच्छा… चाटो और जोर से…”

उनकी चूत और गर्म हो गई। रस निकलने लगा, मीठा-नमकीन। मैंने सारा पी लिया, जीभ से चाट-चाटकर साफ किया। चूत का दाना होंठों से पकड़कर खींचा, हल्के से काटा। चाची मुझे अपनी चूत में दबा रही थीं, टांगों से मेरे सर को जकड़ लिया था, “और… अंदर… हां… ऐसे ही…”

फिर मैंने उनकी टांगें फैलाईं। दोनों जांघों को कंधों पर रखकर थोड़ा और खोल दिया। मेरा 11 इंच का मोटा लंड उनकी चूत के मुंह पर रगड़ने लगा। सुपारा चूत की गीली पंखुड़ियों पर फिसल रहा था, ऊपर-नीचे, कभी छेद पर दबाव डालकर। चाची तड़प उठीं, कमर ऊपर उठाकर बोलीं, “अब डाल ना… रगड़-रगड़ के तड़पा मत…” उनकी सांसें तेज हो गईं, चूत और गीली होकर चमक रही थी।

मैंने सुपारे को छेद पर सटाया और हल्का सा धक्का मारा। चूत टाइट थी, कई दिनों से चुदाई न होने की वजह से और सिकुड़ गई थी। आधा लंड मुश्किल से अंदर गया। चाची की आंखें बंद हो गईं, मुंह से चीख निकली, “हूंउउ… ऊं… सी… हा… धीरे… बहुत मोटा है…” वो दांत पीस रही थीं, हाथों से चादर पकड़ ली।

मैं रुक गया, फिर जोर से कमर झटका। पूरा 11 इंच एक झटके में अंदर समा गया। चाची का पूरा शरीर कांप उठा, सुसक रही थीं, “आह्ह… पूरा… अंदर तक…” चाचा पास वाले कमरे में सो रहे थे, इसलिए वो जोर से चिल्ला नहीं पा रही थीं। सिर्फ दबी हुई सिसकारियां निकल रही थीं। उनकी चूत मेरे लंड को जकड़ रही थी, गर्म और नरम।

मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे धक्के, फिर थोड़ा लंबे। हर बार बाहर निकालते वक्त चूत की पंखुड़ियां बाहर निकल आतीं, फिर अंदर जाते वक्त गप की आवाज। चाची को मजा आने लगा। उनकी सांसें सामान्य हुईं, बोलीं, “बहुत अच्छे बेटा… तुम तो सब जानते थे।”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “करना तो तुमसे सीख रहा हूं।”

चाची अब चूत उठा-उठाकर चुदवा रही थीं। उनकी कमर मेरी हर धक्के के साथ ऊपर उठती। लंड गप-गप… गप-गप की आवाज कर रहा था, कमरे में गूंज रहा था। मैंने स्पीड बढ़ाई। घच-घच… घच-घच… तेज-तेज धक्के मारने लगा। चाची जोर-जोर से सिसकारियां भरने लगीं, “आह्ह… ओह्ह… इह्ह… ऊं… तेज… और तेज… फाड़ दो चूत को…”

मैंने उन्हें उठाया। बोला, “अब झुक जाओ।” चाची चारों हाथ-पैरों पर आ गईं। मैंने पीछे से लंड उनकी चूत पर सटाया और एक झटके में पूरा अंदर कर दिया। कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगा। चाची गांड उछाल रही थीं, पीछे धकेल रही थीं ताकि लंड और गहरा जाए। मेरी गोलियां उनकी गांड पर टकरा रही थीं, थप-थप की आवाज हो रही थी।

कुछ देर बाद चाची की सांसें रुकने लगीं। शरीर कांपने लगा। बोलीं, “मैं झड़ रही हूं… आह्ह… बहुत तेज… माल पीना हो तो मुंह लगा दो…” उनकी चूत सिकुड़ने लगी, लंड को दबाने लगी। मैंने लंड निकाला, नीचे लेट गया और चूत के नीचे मुंह लगा दिया। चाची ने कमर नीचे की, रस की धार मेरे मुंह में टप-टप गिरने लगी। गर्म-गर्म, मीठा-नमकीन रस। मैंने सारा पी लिया, जीभ से चाटकर साफ किया। चाची थर-थर कांप रही थीं।

फिर मैंने चाची को कुतिया बनाया। अब गांड की बारी थी। चाची चारों हाथ-पैरों पर आ गईं, उनकी गोल गांड मेरे सामने तनी हुई थी। मैंने लंड पर थूक लगाया, अपनी उंगली से फैलाकर सुपारे को चिकना किया। फिर सुपारे को उनकी टाइट गांड के छोटे से छेद पर रखा। हल्का सा दबाव डाला। गांड बहुत टाइट थी, जैसे कभी किसी ने छुआ ही न हो। मुश्किल से सुपारा अंदर घुसा। चाची का पूरा शरीर कांप उठा, चीख निकली, “ओह्ह… अई… धीरे… दर्द हो रहा है… बहुत बड़ा है…” वो आगे सरकने लगीं, कमर नीचे करके बचने की कोशिश करने लगीं, लेकिन मैंने दोनों हाथों से उनकी कमर मजबूती से पकड़ ली।

मैं रुक गया, उन्हें थोड़ा समय दिया। फिर धीरे-धीरे और आगे धकेला। लंड की मोटाई से गांड का छेद फैल रहा था। आधा लंड घुस गया। चाची की आंखों में आंसू छलक आए, दर्द से मुंह बन गया, लेकिन उनकी सांसों में अब दर्द के साथ-साथ मजा भी मिलने लगा था। वो दांत भींच रही थीं, लेकिन कमर हल्के से पीछे धकेलने लगीं। मैंने पूरा जोर लगाकर एक लंबा धक्का मारा। पूरा 11 इंच का मोटा लंड उनकी गांड में जड़ तक समा गया। चाची चिल्लाईं, लेकिन आवाज दबी हुई थी, “आऊ… हम्म… अह्ह… सी… हा… पूरा अंदर… ओह्ह…” उनका शरीर थर-थर कांप रहा था, गांड के छेद से लंड निकलकर बाहर आता तो छेद थोड़ा खुला रह जाता।

मैंने धीरे-धीरे चोदना शुरू किया। पहले छोटे-छोटे धक्के, बाहर-आधा अंदर। हर धक्के पर चाची की सिसकारी निकलती, “हम्म… धीरे… अच्छा लग रहा है…” फिर मैंने स्पीड बढ़ाई। जोर-जोर से पेलने लगा। घच-घच… घच-घच… की आवाज कमरे में गूंजने लगी। उनकी गांड लाल हो गई, गर्म होकर चमक रही थी। अब चाची खुद पीछे धकेल रही थीं, गांड उठा-उठाकर लंड को और गहरा ले रही थीं। दर्द अब मजा में बदल चुका था।

फिर चाची मेरे ऊपर चढ़ गईं। मैं लेट गया, लंड सीधा खड़ा। चाची ने गांड के छेद पर लंड सटाया और धीरे से बैठ गईं। पूरा लंड अंदर समा गया। वो उछलने लगीं, ऊपर-नीचे तेज-तेज। उनकी बड़े मम्मे उछल रहे थे। मैं नीचे से कमर उठाकर जोर-जोर से पेल रहा था। हाथ से उनकी गांड पर थप्पड़ मारता, चटाक-चटाक की आवाज होती, लाल निशान पड़ जाते। चाची उचक-उचक कर चुदवा रही थीं, “हां… ऐसे… गांड फाड़ दो… थप्पड़ मारो और… जोर से… आह्ह… ओह्ह…” उनकी सिसकारियां कमरे में भर गईं, कभी दबी, कभी तेज।

10 मिनट बाद मेरी सांसें तेज हो गईं। चाची की गांड की सवारी से लंड और सख्त हो चुका था, सुपारा फूलकर लाल हो रहा था, नसें उभर आई थीं। मैं झड़ने की कगार पर पहुंच गया। शरीर में कंपकंपी दौड़ने लगी। बोला, “चाची… अब… निकाल रहा हूं…” चाची समझ गईं, उन्होंने उछलना थोड़ा धीमा किया, लेकिन गांड में लंड को हल्के से घुमाती रहीं। मैंने कमर पकड़कर उन्हें थोड़ा ऊपर उठाया और लंड उनकी गांड से धीरे से बाहर निकाला। गांड का छेद थोड़ा खुला रह गया, लाल और गीला, अंदर से हल्का सा रस बह रहा था। चाची हांफ रही थीं, मुस्कुरा रही थीं।

मैं खड़ा हो गया। चाची भी घुटनों पर बैठ गईं। मैंने उनका सर पकड़ा, लंड उनके मुंह के पास ले जाकर रखा। चाची ने मुंह खोला, जीभ बाहर निकाली। मैंने लंड अंदर डाला। पहले धीरे-धीरे, फिर गले तक। मुंह चोदने लगा। ग्ग्ग्ग… गी… गों… गों… की आवाजें आने लगीं। चाची की आंखें नम हो गईं, लेकिन वो जोर से चूस रही थीं, गाल अंदर-बाहर हो रहे थे। मैं कमर हिलाकर गले तक पेल रहा था, “चाची… लो… पूरा मुंह में…”

मेरा शरीर कांपने लगा। लंड फड़फड़ाया। मैंने जोर से धक्का मारा और सारा माल उनके मुंह में गिरा दिया। गरम-गरम वीर्य की धारें एक के बाद एक निकलीं। चाची ने गले की हरकत से सब निगल लिया, कुछ बूंदें होंठों के किनारे से बह गईं। उन्होंने जीभ से चाटकर साफ किया। फिर मुस्कुराकर बोलीं, “मजा आया… इतना गाढ़ा माल…” मैं थककर बिस्तर पर गिर पड़ा।

रात में कई बार जगाकर चोदा। कभी चूत में, कभी गांड में, कभी मुंह में। चाची हर बार साथ देती रहीं, सिसकारियां भरती रहीं। सुबह तक दोनों थककर सो गए। अब चाचा चोदें या न चोदें, चाची को मैं रोज अपना लंड खिलाता हूं। उनकी चूत और गांड मेरे लिए ही हैं।

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