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बच्चे खिड़की से देखते रहे मां की चुदाई

Aunty forced sex story, Landlord fuck aunty sex story, Rent free chudai sex story: मेरा नाम अंकेश है। तब मैं २० साल का था। मैं पढ़ाई के लिए अक्सर अपने दोस्त के घर जाता था। हम दोनों मिलकर पढ़ाई करते थे। उसके घर में वो, उसकी मां, छोटी बहन रिद्धिमा और पापा रहते थे। उसकी बड़ी बहन की शादी दो महीने पहले हो गई थी। उसके पापा ड्राइवर थे, किसी बड़ी कंपनी में गाड़ियां चलाते थे, लेकिन घर का खर्चा मुश्किल से चलता था। उनका घर किराए का था, जिसमें दो बेडरूम थे। एक में मां-पापा सोते थे, दूसरे में दोस्त और रिद्धिमा। हम लोग उसी बेडरूम में पढ़ाई करते और सो भी जाते थे।

एक रविवार को दिन में हम पढ़ाई कर रहे थे। तभी मकान मालिक आया और किराए की बात करने लगा। आंटी ने कहा, “प्लीज आप थोड़े दिन और रुक जाइए, मैं कोई काम ढूंढ रही हूं। जैसे ही काम मिलेगा, आपको किराया दे दूंगी।”

मकान मालिक बोला, “अभी तक तीन महीने का किराया बाकी है। इतना पैसा कहां से लाओगी?”

आंटी बोलीं, “प्लीज मुझे थोड़ा समय दे दीजिए, मैं सब दे दूंगी।”

वो नहीं माना। आंटी बोलीं, “मैं आपको थोड़ी देर बाद घर आकर पैसे दे दूंगी।” वो चला गया। हम बाहर आए और आंटी से पूछा कि अब क्या होगा, पैसे कहां से आएंगे। आंटी बोलीं, “मैं कहीं से करके देती हूं।” हम लोग खेलने निकल गए। थोड़ी देर बाद वापस आए तो रास्ते में आंटी को मकान मालिक के घर जाते देखा। हम चाबी लेने के बहाने उनके पीछे गए। वो अंदर गईं और दरवाजा बंद हो गया।

हम एक खिड़की से अंदर देखने लगे। मकान मालिक उन्हें बेडरूम में ले गया। दोनों बात कर रहे थे। हम चाबी मांगने वाले थे कि मकान मालिक बोला, “मैं आपका सारा पिछला किराया छोड़ दूंगा, लेकिन आपको मेरा एक काम करना होगा।”

आंटी खुश होकर बोलीं, “बताइए क्या काम है?”

मकान मालिक: “आओ मेरे साथ बेड पर सो जाओ।”

आंटी: “क्या बात कर रहे हैं आप?”

हम बाहर गुस्से से भर गए।

मकान मालिक: “जो सुना वो सही है। और इसके बाद मैं आपको काम भी दूंगा।”

आंटी: “कैसा काम?”

मकान मालिक: “मेरे सभी मकानों का किराया वसूलना और हिसाब देना।”

आंटी: “यह काम तो ठीक है, लेकिन बेड पर नहीं सो सकती।”

मकान मालिक: “तो मैं मदद नहीं कर सकता। किराया दो या शाम तक घर खाली कर दो।”

आंटी: “मैं बच्चों को लेकर कहां जाऊंगी? प्लीज मुझ पर रहम करो।”

मकान मालिक: “नहीं, जो कहा मान लो या घर खाली करो।”

आंटी चुप होकर सोचने लगीं। उनका चेहरा टेंशन से भरा था। हम खिड़की से देख रहे थे। हमने रिद्धिमा को घर जाने को कहा, लेकिन वो बोली, “नहीं, मुझे भी देखना है।” हम समझाते रहे लेकिन वो नहीं मानी।

बहुत देर बाद आंटी ने गहरी सांस ली। उनकी आंखें नीची थीं, होंठ कांप रहे थे। उन्होंने धीमी, लगभग फुसफुसाती आवाज में कहा, “ठीक है… आप जैसा कहेंगे… मैं करने को तैयार हूं।”

हम दोनों दोस्त खिड़की के पास सांस रोके खड़े थे। एक-दूसरे का मुंह देखा। आंखों में यकीन नहीं आ रहा था। दिल की धड़कनें इतनी तेज थीं कि कान में गूंज रही थीं। रिद्धिमा ने भी हमारी तरफ देखा, उसकी आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं। हम चुपचाप खड़े रहे, जैसे सांस लेना भी भूल गए हों।

मकान मालिक की आंखों में चमक थी। वो धीरे से मुस्कुराया, जैसे जीत गया हो। बोला, “बहुत अच्छा फैसला। तो अब काम शुरू करते हैं।”

आंटी ने घबराहट से चारों तरफ नजर दौड़ाई। फिर पूछा, “घर पर सच में कोई और नहीं है न? कोई नौकरानी या बच्चे?”

मकान मालिक ने पक्का यकीन दिलाते हुए कहा, “बिल्कुल अकेला हूं। बीवी गुजर गईं दो साल पहले, बच्चे स्कूल गए हैं। कोई नहीं आएगा। कोई डर नहीं।”

आंटी ने एक पल रुककर, फिर बोलीं, “हां… फिर ठीक है। लेकिन प्लीज दरवाजा अच्छे से बंद कर दो। बच्चे बाहर खेल रहे हैं। अगर घर का ताला देखा तो सीधे यहीं आ जाएंगे। मुझे बहुत डर लग रहा है।”

मकान मालिक ने तुरंत बेडरूम के दरवाजे पर जाकर कुंडी लगाई, चाबी घुमाई, फिर वापस लौटकर बोला, “हो गया। अब कोई नहीं आएगा। आज सिर्फ एक बार ही करेंगे। लेकिन रात को जरूर आना। तब बिना किसी टेंशन के अच्छे से, आराम से मजे लेंगे।”

आंटी ने हैरानी से भौंहें चढ़ाईं। बोलीं, “क्यों? आज सिर्फ एक बार? बार-बार तो करना पड़ेगा न? ये सब कितनी बार…?”

मकान मालिक ने हंसते हुए कहा, “आज से तुम मेरे काम पर हो। महीने में सिर्फ एक दिन काम करना होगा – किराया वसूलना, हिसाब रखना। बाकी दिन तो बस मजे-मस्ती के लिए हैं न।”

आंटी ने सिर हिलाया, लेकिन बोलीं, “नहीं… मैं रोज नहीं कर सकती। ये बहुत ज्यादा है। मैं ये नहीं कर सकती हर दिन।”

मकान मालिक का चेहरा अचानक सख्त हो गया। वो डराने लगा, “अच्छा? तो फिर तीन महीने का किराया अभी दो। नहीं तो शाम तक घर खाली करो। पुलिस बुलाऊंगा। बच्चों को सड़क पर देखना चाहती हो?”

आंटी का चेहरा सफेद पड़ गया। आंखों में आंसू छलक आए। हाथ कांपने लगे। वो डर के मारे जल्दी से बोलीं, “ठीक है… ठीक है। लेकिन सिर्फ दिन में एक बार। रात में नहीं आऊंगी। प्लीज ये मान लो।”

मकान मालिक ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया। बोला, “ठीक है। बस यही काफी है। अब शुरू करते हैं।”

आंटी ने धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू ऊपर उठाना शुरू किया। उनके हाथ इतने कांप रहे थे कि पल्लू बार-बार फिसल रहा था। चेहरा शर्म, डर और मजबूरी से लाल हो गया था।

मकान मालिक ने तुरंत रोक दिया। बोला, “अरे ऐसे नहीं। पूरे कपड़े निकालकर ही मजे लेंगे। आधा-अधूरा नहीं चलेगा।”

आंटी की आंखें भर आईं। वो रोते हुए, कांपती आवाज में बोलीं, “प्लीज… रहम करो। मैंने आज तक अपने पति के सिवा किसी के सामने कपड़े नहीं खोले। बहुत शर्म आएगी। मेरी इज्जत… प्लीज।”

मकान मालिक ने मजाक उड़ाते हुए कहा, “तो क्या हुआ? मैं अभी तुमसे शादी कर लेता हूं। अब तो मैं ही तुम्हारा पति हूं। शरमाने की क्या बात है?”

आंटी ने सिर झुकाकर, आंसू पोछते हुए कहा, “नहीं… ऐसा जुल्म मत करो। जैसा आप कहेंगे, वैसा ही करेंगे। लेकिन प्लीज जल्दी खत्म कर दो।”

मकान मालिक ने सख्ती से कहा, “जल्दी से सारे कपड़े खोल दो। समय बर्बाद मत करो।”

आंटी शरमाते हुए साड़ी उतारने लगीं। मकान मालिक आगे बढ़ा। बोला, “शरमाओ मत। समझ लो मैं ही तुम्हारा पति हूं अब। चलो, मैं ही निकालता हूं।” उसने आंटी के पल्लू को मजबूती से पकड़ा। धीरे-धीरे पूरी साड़ी खींचकर उतार दी। साड़ी फर्श पर गिर गई। फिर ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए। हर हुक खुलते ही आंटी का सीना तेज-तेज ऊपर-नीचे हो रहा था। आंटी अब सिर्फ सफेद ब्रा, पेटीकोट और पेंटी में खड़ी थीं। उनकी सांसें तेज थीं, छाती हिल रही थी।

मकान मालिक ने ब्रा के ऊपर से ही आंटी के भरे हुए, गोरे बूब्स को दोनों हाथों से जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया। अंगूठे से निप्पल्स को दबाया। साथ में उनके होंठों पर अपने होंठ रखकर गहरा किस करने लगा। जीभ अंदर डालकर चूसने लगा। आंटी पहले तो सख्त थीं, शरीर कड़ा था। लेकिन धीरे-धीरे उनका शरीर ढीला पड़ने लगा। सांसें तेज हो गईं। छोटी-छोटी सिसकियां निकलने लगीं। हम खिड़की से सब कुछ देख रहे थे। हमारे लंड पैंट में कसकर तन गए, दर्द होने लगा। रिद्धिमा भी बार-बार हमारी तरफ देख रही थी। उसकी नजर हमारा उभरा हुआ लंड पर टिकी थी।

फिर मकान मालिक ने आंटी के पेटीकोट का नाड़ा एक तेज झटके में खींच दिया। पेटीकोट नीचे गिर गया। ब्रा का हुक पीछे से खोला। ब्रा भी उतार दी। आंटी के गोरे, भरे हुए बूब्स बाहर आ गए। निप्पल्स सख्त और खड़े हो चुके थे। आखिर में पेंटी भी धीरे-धीरे खींचकर निकाल दी। आंटी अब पूरी तरह नंगी खड़ी थीं। उनका शरीर सुंदर था – गोरी चिकनी त्वचा, गोल-भरे बूब्स, पतली कमर, चौड़ी कमर और मटोल, गोल गांड।

मकान मालिक ने भी जल्दी से अपनी शर्ट उतारी, पैंट खोली, अंडरवियर नीचे किया। उसका लंड पूरी तरह खड़ा और मोटा था। सिर लाल, नसें उभरी हुईं। हम दोनों देखकर हैरान रह गए। आंटी ने भी उसे देखा। डरते हुए, हैरानी से बोलीं, “हे भगवान… कितना लंबा और मोटा लंड है। कम से कम ८-९ इंच तो होगा। इतना बड़ा मेरी चूत में कैसे जाएगा? दर्द होगा बहुत…”

मकान मालिक ने हंसकर कहा, “तेरे पति का तो जाता है न?”

आंटी ने शरमाते हुए, आंखें नीची करके कहा, “हां… लेकिन उसका इतना बड़ा नहीं है। पतला और छोटा है।”

मकान मालिक: “तो कितना बड़ा है? क्या सिर्फ ५ इंच का?”

वो आंटी के करीब आया। बोला, “पहली बार थोड़ी तकलीफ होगी। लेकिन रात में आराम से जाएगा। मैं धीरे-धीरे करूंगा।”

उसने आंटी को बेड पर लिटा दिया। बगल से तेल की बोतल उठाई। हाथ में भरपूर तेल लिया। आंटी की चूत पर मलने लगा। उंगलियों से चूत के होंठों को फैलाकर तेल अंदर तक डाला। क्लिटोरिस पर उंगली घुमाई। फिर जीभ निकालकर चूत चाटने लगा। जीभ से क्लिटोरिस को चाटा, चूसना शुरू किया। होंठों को चूसा। आंटी सिहर उठीं। उनके मुंह से निकला, “आह्ह… ओह्ह… क्या कर रहे हो… उफ्फ… इतना मत करो… आह्ह…”

काफी देर तक वो चूत चाटता रहा। जीभ अंदर-बाहर करता रहा। आंटी की सांसें तेज हो गईं। चूत पूरी गीली होकर चमकने लगी। रस बहने लगा। आंटी की कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी।

फिर वो उठ खड़ा हुआ। बोला, “अब मेरा लंड चूसो।”

आंटी मजबूर थीं। वो उठकर बेड पर बैठ गईं। कांपते हाथों से उसका मोटा लंड पकड़ा। डरते-डरते मुंह में लिया। धीरे-धीरे चूसने लगीं। होंठों से लंड को अंदर-बाहर किया। मकान मालिक ने सही मौका देखकर कमर पकड़ी और लंड गले तक धकेल दिया। आंटी के मुंह से गग्ग… गी… गों… गोग… जैसी आवाजें निकलने लगीं। वो घुट रही थीं, आंसू बह रहे थे लेकिन रुक नहीं पा रही थीं। १०-१५ मिनट तक वो ऐसा ही करता रहा। लंड पूरी तरह लार से भीगा हुआ था।

आखिर में लंड बाहर निकाला। आंटी की सांस फूल रही थी। उसने आंटी को फिर लिटाया। लंड चूत के मुंह पर सेट किया। धीरे से दबाया। फिर एक जोरदार झटके से पूरा अंदर घुसा दिया। आंटी तेज चीखीं, “आआह्ह्ह… मां… धीरे… मेरी चूत फट जाएगी… उह्ह्ह… बहुत दर्द हो रहा है… निकालो प्लीज…”

मकान मालिक ने कहा, “सहन कर लो। थोड़ी देर में मजा आएगा। चूत ढीली हो जाएगी।” वो धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। फिर रफ्तार बढ़ाई। जोर-जोर से धक्के मारने लगा। आंटी की सिसकियां निकल रही थीं, “आह्ह… ओह्ह… ह्ह्ह… इह्ह… धीरे… आह्ह…”

धीरे-धीरे दर्द कम हुआ। आंटी भी साथ देने लगीं। कमर हिलाने लगीं। हम तीनों खिड़की से देख रहे थे। हमने अपनी पैंट की जिप खोली, लंड बाहर निकाला। रिद्धिमा ने दोनों लंड पकड़ लिए और जोर-जोर से हिलाने लगी। हमने उसके कपड़ों के अंदर हाथ डाला। उसकी चूत में उंगलियां डालकर सहलाने लगे। वो भी पूरी तरह गरम हो गई, सिसकियां लेने लगी।

उधर मकान मालिक आंटी को जोरों से चोद रहा था। आंटी अब मजे ले रही थीं। वो बोलीं, “आह्ह… हां… ऐसे ही… ओह्ह… और जोर से… आह्ह…” वो खुद घोड़ी बन गईं। मकान मालिक ने पीछे से पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। आंटी की चूत से रस बह रहा था। चटक-चटक, फच-फच की आवाजें आ रही थीं। आंटी चिल्लाईं, “आह्ह… ऊं… ऊई… ऊउइ… चोदो मुझे… जोर से… आह्ह…”

करीब ४० मिनट तक ये सिलसिला चलता रहा। आखिर में मकान मालिक तेज-तेज धक्के मारकर झड़ने लगा। उसने सारा वीर्य आंटी की चूत के अंदर ही छोड़ दिया। आंटी की चूत से वीर्य बाहर निकलने लगा। हम दोनों पहले ही झड़ चुके थे। रिद्धिमा अभी भी मस्ती में थी।

वो आंटी पर पूरी तरह लेट गया। उसका भारी, पसीने से तर शरीर आंटी के नंगे बदन पर दबा हुआ था। दोनों की सांसें अभी भी तेज चल रही थीं, सीने ऊपर-नीचे हो रहे थे। मकान मालिक का लंड अभी भी आंटी की चूत के अंदर था, धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। आंटी की चूत से गर्म वीर्य धीरे-धीरे बाहर रिस रहा था, बेडशीट पर गीला धब्बा बन रहा था। वो आंटी के गले में मुंह छुपाकर हल्के से चूम रहा था, एक हाथ से उनके बूब्स को आलस में दबाता रहा। आंटी चुपचाप लेटी रहीं, आंखें बंद, सांसें नियंत्रित करने की कोशिश करती हुईं। उनका शरीर अभी भी थरथरा रहा था, चूत में हल्की जलन और सुन्नपन महसूस हो रहा था।

करीब १० मिनट बाद मकान मालिक ने आखिरकार खुद को ऊपर उठाया। लंड बाहर निकला तो एक छोटी सी चटक की आवाज आई। चूत से वीर्य की मोटी धारा बाहर निकली, जांघों पर बहने लगी। आंटी ने धीरे से उठकर बैठने की कोशिश की। उनकी कमर में हल्का दर्द था, चूत सूजी हुई लग रही थी। उन्होंने चादर से चूत को पोंछने की कोशिश की, लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। चिंतित और थकी आवाज में बोलीं, “तुमने अंदर ही छोड़ दिया… अगर कुछ हो गया तो? अगर प्रेग्नेंसी हो गई तो क्या करूंगी मैं? बच्चे छोटे हैं…”

मकान मालिक ने बेड पर लेटे-लेटे ही लापरवाही से हंसते हुए कहा, “अरे चिंता मत करो। इतना डरने की क्या बात है? बस जाते-जाते फार्मेसी से एक आई-पिल या कंट्रासेप्टिव गोली खा लेना। ७२ घंटे के अंदर ले लोगी तो सब ठीक हो जाएगा। मैं कई बार कर चुका हूं, कोई प्रॉब्लम नहीं होती।”

आंटी ने एक गहरी, थकी हुई सांस ली। बोलीं, “ठीक है… अब जाती हूं। बहुत देर हो गई। बच्चे घर पर ताला देखकर परेशान हो रहे होंगे। रात को आऊंगी।” उनकी आवाज में थकान और मजबूरी साफ झलक रही थी।

आंटी बेड से उतरीं। पहले पेंटी उठाई। चूत अभी भी गीली और चिपचिपी थी, वीर्य से सनी हुई। पेंटी पहनते वक्त थोड़ा दर्द हुआ, लेकिन उन्होंने दांत भींचकर पहन ली। फिर ब्रा उठाई, दोनों बूब्स को अंदर डाला और हुक पीछे से लगाए। पेटीकोट पहनकर नाड़ा कसकर बांधा। ब्लाउज के हुक एक-एक करके बंद किए। आखिर में साड़ी उठाई, पल्लू कंधे पर डाला और धीरे-धीरे लपेटने लगीं। साड़ी में कुछ जगहें गीली हो गई थीं, लेकिन अब क्या करते। मकान मालिक अभी भी नंगा बेड पर बैठा, टांगें फैलाए उन्हें घूर रहा था। उसकी आंखों में अभी भी भूख बाकी थी, जैसे अभी और चाहता हो।

जैसे ही आंटी दरवाजे की तरफ बढ़ीं, वो बोला, “रुक जाओ जरा। चूत से मेरे लंड का पानी धो तो लो। ऐसे चिपचिपी होकर मत जाओ, गंद लगेगा।”

आंटी ने मुड़कर थके हुए स्वर में कहा, “नहीं… अब जाने दो। घर जाकर अच्छे से नहाऊंगी, सब साफ कर लूंगी। बहुत देर हो गई है, प्लीज।”

मकान मालिक ने फिर कहा, “अच्छा, कम से कम एक किस तो दो। इतनी जल्दी मत जाओ, थोड़ा और रुक जाओ।”

आंटी रुक गईं। मकान मालिक बेड से उठा, नंगा ही उनके पास आया। दोनों के होंठ फिर मिल गए। गहरा लिप किस शुरू हो गया। उसने आंटी की कमर मजबूती से पकड़ी, एक हाथ ब्लाउज के अंदर डालकर बूब्स को सीधे दबाने लगा। निप्पल्स को अंगूठे से रगड़ा। आंटी पहले तो विरोध करती रहीं, हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे उनका शरीर फिर गरम हो गया। सांसें तेज हो गईं, छोटी-छोटी आहें मुंह से निकलने लगीं, “उफ्फ… बस… अब जाने दो…”

मकान मालिक ने आंटी की साड़ी का पल्लू ऊपर किया, कमर से पकड़कर घुमाया। बोला, “चलो, एक बार और घोड़ी बन जाओ। बस जल्दी से, दो मिनट में खत्म।”

आंटी ने हाथ जोड़ते हुए, आंसू भरी आंखों से कहा, “अभी नहीं… प्लीज। रात में जितना चाहे कर लेना। अभी जाने दो। बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। बहुत थक गई हूं।”

मकान मालिक ने एक आखिरी बार उनके होंठ जोर से चूसे, जीभ अंदर डालकर चाटा। फिर छोड़ दिया। आंटी ने जल्दी से साड़ी ठीक की, पल्लू संभाला और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गईं। उनके कदम लड़खड़ा रहे थे, चाल में हल्की लंगड़ाहट थी।

उधर हम तीनों खिड़की के पास अभी भी छिपे हुए खड़े थे। आंटी की ये सब हरकतें देखकर हमारा खून फिर उबलने लगा। रिद्धिमा ने हम दोनों के लंड फिर से पकड़ लिए। एक हाथ में मेरा, दूसरे में मेरे दोस्त का। वो जोर-जोर से मुठ मारने लगी, ऊपर-नीचे तेजी से। उसकी उंगलियां लंड की नसों पर दबाव डाल रही थीं, सुपारी को घुमा रही थी। हमने उसके पायजामा के नाड़े को ढीला किया, अंदर हाथ डाला। उसकी चूत पहले से ही गीली और गरम थी। हमने उंगलियां अंदर डालीं, अंदर-बाहर करने लगे। क्लिटोरिस पर अंगूठे से गोल-गोल घुमाने लगे। रिद्धिमा सिसकियां ले रही थी, “आह्ह… हां… ऐसे ही… और तेज… उफ्फ… अंदर तक…” उसकी कमर खुद-ब-खुद आगे-पीछे हिल रही थी, चूत से रस बहकर हमारी उंगलियों पर चिपक रहा था। वो हम दोनों के लंड को एक साथ हिला रही थी, कभी तेज, कभी धीरे, जैसे खुद को भी मजा दे रही हो।

करीब ५ मिनट बाद हम दोनों फिर से झड़ गए। गर्म वीर्य रिद्धिमा के हाथों पर, उसकी हथेली पर गिरा। कुछ बूंदें उसके पायजामा पर भी छलक गईं। रिद्धिमा भी कांपकर शांत हो गई, अपनी चूत पर हाथ रखे हुए, उंगलियां अभी भी अंदर थीं। वो हांफ रही थी, चेहरा लाल, आंखें बंद। हमने जल्दी से कपड़े ठीक किए, जिप बंद की और वहां से चुपचाप निकल गए। थोड़ी देर बाद आंटी घर पहुंचीं। उनका चेहरा थका हुआ, आंखें लाल, बाल बिखरे हुए थे। लेकिन चेहरे पर कुछ अजीब सी चमक थी, जैसे कोई राज छुपा हो। हम सब चुपचाप अंदर चले गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। आंटी ने बस कहा, “चाबी मिल गई, अब पढ़ाई करो।” और कमरे में चली गईं।

दोस्तों, कैसी लगी यह मजबूरी वाली चुदाई की कहानी? क्या आप भी ऐसी मजबूरी में फंस चुके हैं या चाहते हैं? कमेंट में बताएं।

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