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चोदा चोदी का खेल पड़ोसी दादा जी के साथ

हाय दोस्तो, मेरा नाम पूर्वी है। मैं 19 साल की हूँ, रंग गोरा, कद 5 फीट 4 इंच, और फिगर 34-28-36। मेरे बाल लंबे, काले और घने हैं, जो मेरी कमर तक लहराते हैं। मेरी आँखें भूरी और चेहरा नाज़ुक, पर मेरी मुस्कान में एक शरारती ठसक है। मैं 12वीं कक्षा में पढ़ती हूँ, और मेरी ज़िंदगी किताबों, दोस्तों और थोड़े-बहुत सपनों के बीच घूमती है। लेकिन सच कहूँ, मेरे अंदर एक छुपी हुई आग है, जो औरत बनने की उमंग और मस्ती से भरी है।

हमारे पड़ोस में एक परिवार रहता है, जिनके साथ हमारा रिश्ता बहुत गहरा है। उनके दादा जी, जिन्हें मैं दादा जी बुलाती हूँ, मेरी पढ़ाई में बहुत मदद करते हैं। उनका नाम रामलाल है, उम्र 55 साल, लेकिन बदन ऐसा कि जवान मर्द को भी मात दे दें। कद 5 फीट 10 इंच, चौड़ा सीना, और बाजुओं में गजब की ताकत। उनके बाल अब सफेद हो चुके हैं, लेकिन चेहरा अभी भी रौबदार है, और उनकी आँखों में एक गहरी चमक है। उनकी पत्नी का देहांत 5 साल पहले हो गया, और तब से वो अकेले हैं। गाँव में उनकी पहलवानी की कहानियाँ मशहूर हैं, और वो अभी भी सुबह-सुबह खेतों में टहलते हैं। उनके पास एक अजीब सा आकर्षण है, जो मुझे हमेशा खींचता था।

हम लखनऊ के पास एक छोटे से गाँव में रहते हैं। हमारा घर पुराने ज़माने का है, मिट्टी की दीवारें, लकड़ी का दरवाज़ा, और आंगन में तुलसी का पौधा। पड़ोस में दादा जी का घर भी ऐसा ही है, लेकिन उनका आंगन बड़ा है, और पीछे एक छोटा सा बगीचा। हमारे परिवार आपस में इतने घुले-मिल हैं कि लगता है एक ही खानदान हैं।

एक दिन मैं स्कूल से लौटी, तो देखा कि घर के सामने एक गाड़ी खड़ी थी। मम्मी-पापा और बाकी लोग तैयार होकर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। गाड़ी में जगह ही नहीं थी। मम्मी बोलीं- जल्दी बैठ, आज पिकनिक जा रहे हैं, रात तक वापस आएंगे। मैंने बस्ता रखा, लेकिन सीट खाली नहीं थी। मम्मी ने कहा- तू दादा जी की गोद में आगे बैठ जा, बाद में पीछे मेरे पास आ जाना।

मुझे अजीब लगा, लेकिन मन मारकर मैं दादा जी की गोद में बैठ गई। उनकी जांघें सख्त थीं, और उनकी सांसों की गर्मी मेरी पीठ पर महसूस हो रही थी। गाड़ी जैसे ही चली, गड्ढों की वजह से धक्के लगने लगे। मैं गिरने को हुई, तो दादा जी ने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया। उनके हाथ मेरे सीने पर थे, और मेरी सांसें तेज़ हो गईं। मैंने अपनी शर्ट के नीचे उनके हाथों की गर्मी महसूस की। गड्ढों में गाड़ी हिल रही थी, और हर धक्के के साथ दादा जी का लंड मेरी गांड के नीचे रगड़ रहा था। मैं हक्की-बक्की थी, लेकिन मन ही मन मस्ती भी चढ़ रही थी। मुझे चुदाई का खेल मालूम था, और अब उसकी गर्मी मेरे बदन में दौड़ने लगी।

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ठंड बढ़ रही थी, और दादा जी के हाथ मेरी शर्ट के ऊपर से मेरे मम्मों को सहलाने लगे। मैंने सिर झुका लिया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। मेरी गांड की दरार में उनका लंड फंस गया था, और वो धीरे-धीरे हिल रहे थे। उनका लंड अब मेरी चूत की ओर बढ़ रहा था। मेरे मुँह से हल्की सी सिसकारी निकली- उह… हु…। मैं जानबूझकर चुप रही, लेकिन मेरी चूत गीली होने लगी थी।

थोड़ी देर में हम पिकनिक स्पॉट पर पहुँचे। वहाँ खूब मस्ती हुई, खाना खाया, खेल खेले। लेकिन मेरा दिमाग दादा जी के लंड की उस रगड़ में अटक गया था। वापसी में मम्मी ने पूछा- पीछे आएगी? मैंने कहा- नहीं, यहीं ठीक हूँ।

सब लोग टॉयलेट करने गए। मैंने भी पेशाब किया और चुपके से अपनी पैंटी उतारकर स्कर्ट की जेब में रख ली। फिर दादा जी की गोद में बैठ गई। रात हो चुकी थी, और गाड़ी में अंधेरा था। ड्राइवर ने लाइट बंद कर दी। इस बार दादा जी की पैंट की चेन खुली थी, और उनका लंड सीधा मेरी गांड से टच हो रहा था। मैंने उनकी ओर देखा, तो वो मुस्कुराए और मेरे मम्मों को सहलाने लगे। मैं समझ गई कि आज चुदाई पक्की है।

दादा जी ने मेरे चूतड़ उठाए, और मैं थोड़ा ऊपर हुई। उन्होंने अपना लंड चड्डी से निकाला और मेरी स्कर्ट ऊपर करके मेरी गांड के छेद पर रगड़ने लगे। जब उन्हें पता चला कि मैंने पैंटी नहीं पहनी, उनकी आँखें चमक उठीं। उन्होंने मेरे गाल चूम लिए। मैंने अपनी गांड को बचाने के लिए उनका लंड चूत की ओर कर दिया और उनके सीने से सट गई। अब उनका लंड मेरी चूत की फांकों में रगड़ रहा था। मेरी चूत इतनी गीली थी कि रस टपक रहा था। दादा जी का लंड भी गर्म हो चुका था, जैसे बस चूत में घुसने को बेताब हो। लेकिन गाड़ी में चुदाई मुमकिन नहीं थी। बस मस्ती करते-करते हम घर पहुँच गए।

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उस दिन के बाद मेरा मन बदल गया। मैं जब मौका मिलता, दादा जी के पास जाती और उनके बदन से सटकर मस्ती करती। पढ़ाई के बहाने घंटों उनके साथ बिताती। दादा जी को चुदाई का गज़ब का अनुभव था। वो मेरी चूत को अपनी उंगलियों से चोदकर शांत कर देते। मैं भी कभी-कभी उनके लंड को मुँह में लेकर चूस लेती। हम दोनों अपनी आग बुझाने में लग गए।

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एक दिन उनके घरवाले एक हफ्ते के लिए बाहर गए। मम्मी से कहा गया कि मैं दादा जी का ख्याल रखूँ। मैंने मम्मी से कहा- आज स्कूल नहीं जाऊँगी। मम्मी बोलीं- ठीक है, दादा जी के पास जाकर पढ़ाई कर ले। मैं तैयार होकर उनके घर गई।

थोड़ी देर पढ़ाई के बाद मैंने उनकी पैंट के ऊपर से उनके लंड पर हाथ रखा। वो मुस्कुराए और लंड निकालकर मेरे हाथ में दे दिया। मैं उसे सहलाने लगी। धीरे-धीरे दादा जी ने मेरी शर्ट और स्कर्ट उतार दी, और मैंने भी उनके कपड़े खींचकर फेंक दिए। अब हम दोनों नंगे थे, और मस्ती का आलम शुरू हो गया।

दादा जी मुझे अपने कमरे में ले गए और बेड पर लिटा दिया। मैंने मस्ती में अपनी टांगें फैला दीं, और मेरी चूत उनके सामने खुल गई। उनकी आँखें मेरी गुलाबी चूत पर टिक गईं। उन्होंने अपना लंड मेरी चूत की फांकों पर रगड़ा। मेरी चूत रस से लबालब थी, और उनकी सांसें तेज़ हो रही थीं। मैंने उनका लंड पकड़ा और चूत के छेद पर रख दिया।

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दादा जी ने मेरी ओर देखा, और मैंने आँख मार दी। उन्होंने धीरे से लंड मेरी चूत में पेला। दर्द हुआ, लेकिन उनकी उंगलियों ने मेरी चूत को पहले ही इतना ढीला कर दिया था कि मैं दर्द सह गई। फिर उन्होंने एक ज़ोरदार झटका मारा, और उनका पूरा लंड मेरी चूत में समा गया। मैं चीखने को हुई, लेकिन दादा जी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए, और मेरी चीख दब गई। मेरी आँखों से आंसू निकल आए, लेकिन दादा जी रुके नहीं।

थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड बाहर निकाला। उस पर खून लगा था। मेरी सील टूट चुकी थी। दादा जी ने मुझे चूमा, मेरे मम्मे सहलाए, और फिर धीरे-धीरे चोदना शुरू किया। इस बार दर्द कम था, और मज़ा बढ़ रहा था। वो मेरे चूचे चूसते हुए ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगे। मैं सिसकारियाँ ले रही थी- आह… उह… और तेज़…। मज़ा इतना था कि मैं दुनिया भूल गई।

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कुछ देर बाद मैं झड़ गई। मेरी चूत की गर्मी से दादा जी भी पिघल गए। उन्होंने लंड निकाला और मेरे चेहरे पर अपनी मलाई छोड़ दी। मैंने उनकी मलाई चाट ली, और वो मुझे अपनी बाहों में भरकर प्यार करने लगे।

उस दिन के बाद मेरी चूत मानो दादा जी के लंड की दीवानी हो गई। जब भी मौका मिलता, वो मुझे चोदते, और हम दोनों मस्ती में डूब जाते।

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