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नई दुल्हन रज्जो साहब के लंड पर चढ़ी

मेरा नाम रज्जो है। मेरी अभी अभी शादी हुई है। मैं ब्याह के अपने पिया राजू के साथ आ गई।

मुझे रास्ते में मेरे पति ने बताया कि कैसे वो साहब के यहां काम पर लगा और अपने जीवन के पंद्रह साल बिताए।

राजू बोला घर में परिवार के सदस्य की तरह मेरे साहब मेरा पूरा ध्यान रखते हैं। तू मिलेगी तब तू भी उनको देखना कि कितना प्यार करते हैं मुझसे।

मैंने कहा ठीक है बाबा मैं मिलते ही देख लूंगी।

मैंने पूछा राजू कौन कौन है घर में।

राजू बोला मैं और मेरे साहब और कोई नहीं।

मैंने पूछा क्यों साहब की शादी नहीं हुई।

राजू बोला हुई थी ना। वो लड़ कर अपने मायके चली गई। चार साल हो गए। फिर लौट कर नहीं आई। साहब बुला बुला कर थक गए मगर वो नहीं मानी।

रास्ता कैसे कट गया पता नहीं चला और हम हवेली आ गए।

इतनी बड़ी हवेली मैंने तो अपने गांव में नहीं देखी थी। कितने नौकर चाकर। बहुत बड़े आदमी हैं हमारे साहब।

मैं अपने अटैची पकड़े राजू के साथ हवेली के अंदर चल पड़ी।

राजू अंदर से साहब को बुला लाया। साहब मेरी मेहरू है साहब।

साहब बोले कितनी सुन्दर है राजू।

राजू बोला साहब बस आप आशीर्वाद दे दें। और अब इनके रुकने का कमरा दे दें तो।

साहब बोले यह कोई कहने की बात है। अब तो तुम मेरे गेस्ट रूम में रह सकते हो। इससे सफाई और देखरेख दोनों हो जाएगी। क्यों ठीक है ना राजू।

राजू बोला जी जी साहब जैसा आप कहें।

मैंने आगे बढ़ कर साहब के पैर छुए। तभी मालिक ने मेरी दोनों बाहों को पकड़ कर ऊपर उठाया और मेरी चुची पर उनकी उंगली का दबाव महसूस किया मैंने। मैं शर्मा कर अलग हो गई और वो मुस्कुराने लगे।

मैं भी मुस्कुरा दी और राजू के साथ सामान लेकर गेस्ट रूम की ओर चल पड़ी।

मैंने जैसे ही खिड़की खोली देखा सामने कितने सुन्दर नजारा था।

तभी मेरी नजर साहब के कमरे की ओर पड़ी जो खिड़की के सामने ही था। मैं उन्हें साफ साफ देख सकती थी।

मेरी आज सुहागरात थी। मैं रात को सजकर तैयार अपने कमरे में घूम रही थी क्योंकि राजू अभी तक नहीं आया था। वो सामान के लिए शहर गया था।

तभी मैंने देखा राजू ने आवाज दी। मैं दौड़ कर गई और राजू ने मुझे अपनी बांहों में ले लिया। दोनों एक दूसरे को चूमने लगे और हम खिड़की के पास आ चुके थे।

राजू ने मेरे मम्मे को दबाना शुरू कर दिया था।

और फिर एक एक कपड़ा नीचे गिरने लगा। हम दोनों नंगे हो चुके थे और एक दूसरे के अंगों को छू छू कर मजा करने लगे।

कितना मजा आ रहा था। मानो अनुपम आनंद मिल रहा हो।

तभी मेरी नजर खिड़की में पड़ी जो अभी बंद नहीं हुई थी। साहब अपने कमरे में से खिड़की की ओर ही देख रहे थे।

मैं सकपका गई और दौड़ कर खिड़की के पास आ गई और खिड़की बंद कर रही थी। मेरा पूरा बदन बिना वस्त्र के नंगा था। पीछे की रोशनी से पूरा बदन साहब देख रहे थे।

मैंने झट खिड़की बंद कर दी।

राजू ने पूछा क्या यार इतनी देर लगा रही हो।

मैं आकर अपने पलंग में राजू के साथ सेक्स का मजा लेने लगी। यह मेरी पहली रात थी इसलिए इसे अच्छे से मनाना चाह कर उसके साथ हो ली।

वो मुझे किस करने लगा और मेरे हाथ में अपना लंड दे दिया जो गर्म डंडे की तरह कड़ा था। मैं उसे पकड़ कर अपनी चुत के पास लाकर घिसने की कोशिश कर रही थी कि उसने एक धक्का मार दिया।

मैं चिल्ला उठी। उसने मेरे मुंह पर अपना हाथ रख दिया और एक करारा धक्का मार दिया।

मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े और नीचे मेरी चुत फटने से निकला खून राजू के लंड में लग चुका था। उसने अपना लंड मेरी चुत से बाहर निकाला और साफ करके फिर डालने के लिए हुआ।

मैं दर्द को सहन नहीं कर पा रही थी और वो चुत में लंड डाल कर जोर जोर से चुदाई करने लगा।

मैं अब दर्द भूल चुकी थी और चुदाई में मजा लेने की कोशिश करने लगी।

तभी अचानक राजू ने हुंकार भरी और वो झड़ गया।

फिर वो मेरे से अलग हो गया। मैं अभी भी तृप्त नहीं हुई थी पर राजू अब सोने लगा।

मैं रात भर जागती रही। मन उदास होने लगा।

यही सिलसिला हफ्ते भर चला। मैं अब अधूरी चुदाई से दुखी हो चुकी थी।

एक सुबह मैं उठी और राजू भी उठ चुका था।

साहब ने कहा राजू आज शहर जा कर पेमेंट ले आना।

राजू बोला अच्छा साहब।

साहब बोले एक बात कहूं साहब रज्जो को कोई काम दे दो। साहब उसका समय कट जाएगा और मन लगेगा।

साहब बोले ठीक है आज से इस घर के काम कर देगी उसकी पगार भी ले लेना।

राजू बोला रज्जो काम करेगी साहब के घर का।

मैंने सर हिला दिया और राजू शहर के लिए निकल गया।

मैं अपना काम खत्म कर साहब के घर चली गई। साहब के कमरे में मैंने देखा तो दंग रह गई। जो सब चीजें जो मजे से जीवन जीने के लिए होती हैं सभी कुछ था।

मैं उनके घर की सफाई करने लगी।

साहब अंदर बाथरूम में चले गए।

मैं पूरे घर की सफाई करने लगी।

तभी साहब ने आवाज लगाई सुनो वो टॉवल देना जरा।

टॉवल देने के लिए मैंने बाथरूम की ओर हाथ किया। मेरी नजर साहब के ऊपर पड़ी। वो केवल एक अंडरवियर पहने हुए थे। पूरा बदन चांद की तरह चमक रहा था। गोरा गोरा बदन हट्टा कट्टा शरीर देख कर कोई भी फिसल जाए।

मैं खड़ी हो एक पल सोचने लगी काश मेरी शादी इससे होती तो आज मजे का जीवन जीती। राजू जैसे कई मेरे आदमी नौकर होते और ऐशोआराम मजे से जीवन बीतता।

साहब बोले रज्जो क्या सोच रही हो। टॉवल दो भाई।

मैंने कहा लो लो साहब।

मेरी नजरें अब साहब से हट नहीं रही थी। वो टॉवल से बदन पौंछ रहे थे। उनके फूला हुआ लंड अंडरवियर से बाहर निकलने लगा। वो तना हुआ और टाइट दिखने लगा।

मेरा मन कर रहा था क्यों न एक बार साहब मेरी चुदाई करते तो मजा आ जाता। हट्टा कट्टा भरा पूरा आदमी चुत को रगड़ कर शांत कर देता।

मगर कहते हुए शर्म आ रही थी।

मैं अपने काम में लग गई। साहब बराबर मेरे झुकने और उठने पर मेरे मम्मे देख रहे थे।

मैंने इतराते हुए कहा साहब आप बुरा तो नहीं मानोगे अगर मैं आपके बाथरूम में नहा लूं। काम से पसीने से लथपथ हो चुकी हूं।

साहब बोले क्यों नहीं जाओ नहा लो। मैं अपने काम निपटा लूं फिर बातें करेंगे।

मैंने कहा साहब मेरे कपड़े तो घर में हैं।

साहब बोले तो क्या हुआ मैं तुम्हें अपनी पत्नी के कपड़े दे देता हूं। जाओ नहा लो। मैं कपड़े ला रहा हूं।

मैं बाथरूम में चली गई। पहली बार फव्वारे में नहाने का मौका मिला। अपने पूरे कपड़े उतार डाले और केवल पेंटी पहने नहाने लगी। मेरे सारे कपड़े नीचे पड़े थे।

मैं अपने बदन में तेल और साबुन लगा ही रही थी कि दरवाजे पर किसी के खड़े होने का अंदाजा हुआ और जैसे ही मैं मुड़ी साहब सामने कपड़े लिए दरवाजे के पास खड़े थे।

मैं झट अपने हाथों से अपने मम्मे छुपाने लगी और पैरों को आपस में रगड़ रही थी। एक आवाज नहीं निकल पाई मेरे मुंह से।

मैंने देखा कि साहब धीरे धीरे मेरे पास आ चुके थे। मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर हटाने लगे।

मैं बोली साहब यह गलत है।

साहब बोले रज्जो जबसे तुम्हारा बदन देखा है मैं पागल हो चुका हूं। चाहो तो मैं तुम्हें वो सब दूंगा जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी तुमने।

मैंने कहा साहब वो राजू को पता चला तो मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी।

साहब बोले तो पगली मैं तुझसे दोबारा शादी कर लूंगा। एक बार सिर्फ एक बार।

मैं कुछ नहीं कह पाई। मेरा गला सूख गया और दिल जोर से धड़कने लगा।

साहब ने मुझे अपनी बाहों में ले लिया और रही सही पेंटी भी नीचे कर दी। उनकी गर्म उंगलियां मेरी कमर पर फिसलीं और पेंटी के किनारे को पकड़ कर नीचे खींच दिया। पेंटी गीली होकर मेरे घुटनों तक आ गई।

हम दोनों शॉवर के नीचे नहाने लगे। गर्म पानी की धारा हमारे बदन पर गिर रही थी। साहब के कपड़े भीगीले हो गए और शरीर से चिपक गए।

साहब ने अपने कपड़े उतार फेंके। उनका लंड देखकर मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। राजू के लंड से कहीं ज्यादा बड़ा और मोटा था। सुपाड़ा एकदम बैंगनी रंग का चमक रहा था और नसों से भरा हुआ खड़ा था।

मैं घुटनों के बल बैठ गई और उस बड़े लंड को हाथ में लिया। मेरी उंगलियां उस मोटे डंडे पर पूरी नहीं हो रही थीं। मुंह में ले कर चूसने लगी। गर्म सुपाड़ा मेरी जीभ पर रगड़ रहा था।

साहब ने मेरे बाल पकड़ कर धीरे धीरे आगे पीछे करने लगे। अहह रज्जो उम्म हां ऐसे ही चूस मेरी रानी।

थोड़ी देर में साहब की सांसें तेज हो गईं। उनकी कमर हिलने लगी और गले से गहरी आवाजें निकलने लगीं। उन्होंने हुंकार भरी और मेरे मुंह में झड़ गए। गाढ़ा गर्म रस मेरी जीभ और गले में भर गया। मैंने सारा रस पी लिया और गले से निगल लिया।

मैं निराश हो गई। सोचा ये भी राजू की तरह जल्दी झड़ गए। मगर देखा कि उनका लंड बिल्कुल नरम नहीं हुआ। वैसा ही तना हुआ खड़ा था और सुपाड़ा अभी भी बैंगनी चमक रहा था।

मैं फिर से चूसने लगी। कुछ मिनट बाद वह और भी सख्त हो गया। इतना कठोर कि मेरी उंगलियां उस पर फिसल रही थीं।

साहब ने मुझे घुमाया और नल को पकड़ने को कहा। मैं झुक कर खड़ी हो गई। उन्होंने पीछे से अपना बड़ा लंड मेरी चुत में घुसा दिया।

बाल पकड़ कर जोर जोर से धक्के मारने लगे। हर धक्के में मेरी चुत फटने जैसी लग रही थी। कुछ ही मिनट में मैं कराह उठी और जोर से झड़ गई। पैर कांपने लगे। मैं खड़ी नहीं रह पाई और फर्श पर बैठ गई।

साहब ने शॉवर बंद कर दिया। अपना लंड मेरे मुंह के पास कर दिया। मैं फिर चूसने लगी।

साहब बोले अभी तो शुरू हुआ है मेरी रानी। मुझे पता है तेरी सुहागरात पूरी नहीं हुई है। आज असली सुहागरात मनेगी।

उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया और बिस्तर पर ले गए। मैं उनके ऊपर लेट गई। उनका बड़ा लंड मेरे मुंह में था और वे मेरी चुत चाट रहे थे।

साहब मेरी चुत की तारीफ करते हुए उंगलियां घुमा रहे थे। एक उंगली मेरी गांड में भी डाल दी। मैं उनके लंड और भारी गोलों को चूस और चाट रही थी।

खूब चूसने चाटने के बाद साहब ने मुझे नीचे लिटाया और ऊपर से चढ़ कर चुदाई शुरू कर दी।

थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे फिर गोद में उठाया और छत पर ले गए। हवेली शहर में सबसे ऊंची थी और दीवारें बहुत ऊंची थीं। कोई देखने का डर नहीं था।

उन्होंने मुझे गोद में उठाए जोर जोर से चुदाई की। मैं सोच रही थी कितना मस्त मर्द है। पूरा फाड़ कर रख दिया।

फिर दीवार के सहारे खड़ा किया और पीछे से धक्के मारे। मैंने गिनती खो दी कि कितनी बार झड़ी।

जब साहब झड़ने वाले थे तो बोले मेरा माल चखना चाहोगी रानी।

मैंने कहा हां साहब मुझे अपना माल पिला दो। मैं घुटनों पर बैठ गई। अपने मम्मे मसलने लगी और मुंह खोल दिया।

साहब अपने लंड को मुट्ठी में लेकर आगे पीछे करने लगे। एक तेज धार मेरे मुंह में आई। मैं पी गई।

मैं उठने लगी तो साहब ने हाथ से दबा कर बैठाए रखा। मथना जारी रखा। करीब दो मिनट तक थोड़ा थोड़ा कर माल निकलता रहा। मेरे मम्मे और मुंह पर जम गया।

मैं हैरान थी कि किसी इंसान का माल इतना कैसे निकल सकता है। हाथ में लेकर पूरा पानी चाट लिया।

साहब ने मुझे उठाया और कमरे में ले गए। बाथरूम में साथ नहाए। उनका लंड फिर खड़ा होने लगा।

मैंने कहा साहब राजू आ सकता है कभी भी। मुझे जाने दो।

वे मान गए। बाहर लाकर मेरा बदन पोछा और कपड़े पहनाए। एक जोरदार चुंबन दिया।

बोले आज से तुम मेरी घर वाली हो रज्जो।

मैं शर्मा कर चली गई। उसके बाद से यही सिलसिला चलता रहा। साहब राजू को दूर दूर काम पर भेज देते और मुझे जम कर चोदते।

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⚠️ महत्वपूर्ण अस्वीकरण

ये सभी कहानियाँ केवल काल्पनिक हैं।
इनका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है।

सेक्स हमेशा सहमति पर आधारित होना चाहिए।
बिना सहमति के कोई भी कार्य गलत और दंडनीय है।

इन कहानियों से प्रेरित न हों।
बस पढ़ें, आनंद लें और भूल जाएं।