मेरा नाम नबीला है और मैं 24 साल की एक शादीशुदा औरत हूं। हम लोग कराची के रहने वाले हैं। मैं अपनी तारीफ तो नहीं कर सकती मगर चूंकि हमारे मजहब में गोरे रंग को ही खूबसूरती का मापदंड समझा जाता है, इसलिए मेरा रंग गोरा होने की वजह से देखने वाले कहते हैं कि मैं एक खूबसूरत लड़की हूं।
खासकर मेरी आंखों, उभरे हुए मम्मों और हिप्स ने मुझे ऐसा बना दिया था। मेरी कॉलेज की सहेलियां मेरा शुमार एक खूबसूरत और सेक्सी लड़कियों में करती थीं। मुझे कॉलेज से फारिग हुए अभी चंद महीने ही हुए थे कि मेरे घरवालों ने मेरी शादी जमाल नाम के एक शख्स से कर दी।
मेरे शौहर जमाल हमारी कोई रिश्तेदारी में से नहीं हैं। बस एक शादी में उनकी बहन और बहनोई ने मुझे देख लिया था और मैं उनको पसंद आ गई। हमारे मुल्क के अक्सर लोग बाहर रहने वाले पाकिस्तानियों से बिला वजह ही प्रभावित रहते हैं। चूंकि मेरे शौहर अमेरिका में रहते हैं, इसलिए ज्यों ही उनके घरवाले उनका रिश्ता लेकर हमारे घर आए, तो मेरे घरवालों ने कुछ ज्यादा छानबीन नहीं की और फौरन हां कर दी।
जमाल एक अच्छे इंसान और आम से लड़के हैं। वो मुझे बेहद पसंद करते हैं और मैं भी उनसे प्यार करती हूं। मेरे ससुराल वाले भी बहुत ही अच्छे लोग हैं। खास तौर पर मेरी सास और ससुर तो बहुत ही शफीक और मुहब्बत करने वाले हैं और मेरा बहुत खयाल रखते हैं। मेरी सास और ससुर ने अपनी सगी बेटी और मुझमें कभी कोई फर्क नहीं होने दिया।
मेरे ससुराल वालों का नर्सरी के इलाके में बहुत बड़ा बंगला है, जिसमें सास-ससुर के अलावा उनकी बेटी और उसका शौहर घर दामाद बनकर उनके साथ ही रहते हैं। मुझे शादी के बाद अपने ससुराल में हर तरह का आराम ओ सुकून था, लेकिन परेशानी अगर थी तो बस ये कि मेरे शौहर शादी के बाद कुछ महीने मेरे साथ गुजार कर वापस चले गए।
अब मेरी शादी को दो साल बीत चुके थे, लेकिन अभी तक मेरे अपने शौहर के पास अमेरिका जाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। इस दौरान जमाल हर साल एक महीने के लिए आ जाते हैं, मगर साल के बाकी महीने उनके बगैर दिल नहीं लगता है। एक दिन जब अपने शौहर से दूरी मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त हो गई, तो मैंने फोन पर जमाल से अमेरिका आने के लिए अपना विजिट वीजा अप्लाई करने का मशवरा किया।
जमाल ने मुझे मना किया कि मैं अभी विजिट वीजा अप्लाई न करूं और वो जल्द ही मेरे ग्रीन कार्ड के लिए पेपर्स इमिग्रेशन में जमा करवा देंगे। लेकिन उनके समझाने के बावजूद मैंने इसरार किया कि ट्राई करने में क्या हर्ज है। आखिरकार मेरी जिद के आगे हार मानते हुए जमाल ने मुझे विजिट वीजा अप्लाई करने की इजाजत दे दी।
वीजा अप्लाई करने के एक महीने बाद मुझे अमेरिकन एम्बेसी इस्लामाबाद से इंटरव्यू की कॉल आ गई। मैंने अपने ससुर, जिनको मैं एहतराम से अब्बा कहती हूं, से बात करके इस्लामाबाद जाने का प्रोग्राम बना लिया। प्रोग्राम के मुताबिक मेरे ससुर और मैंने इंटरव्यू वाली सुबह की पहली फ्लाइट से इस्लामाबाद जाना और फिर उसी दिन शाम की फ्लाइट से वापस कराची चले आना था।
फिर अपने प्रोग्राम के मुताबिक मेरे इंटरव्यू वाले दिन मैं और अब्बा दोनों एयर से इस्लामाबाद पहुंच गए। चूंकि हमारा इरादा तो उसी शाम ही को वापस कराची आने का था, इसलिए हमने अपने साथ किसी किस्म का कोई सामान या बैग लाना मुनासिब नहीं समझा। हम एयरपोर्ट से टैक्सी लेकर सीधे एम्बेसी आए और मैं इंटरव्यू के लिए एम्बेसी के अंदर चली गई।
जबकि अब्बा बाहर बैठकर मेरे वापस आने का इंतजार करने लगे। मुझे बहुत ही उम्मीद थी कि आज जरूर मुझे विजिट वीजा मिल जाएगा और मैं जल्द ही हवाओं में उड़कर अपने शौहर की बाहों में पहुंच जाऊंगी। मगर सोई किस्मत कि इंटरव्यू के बाद वीजा ऑफिसर ने मुझे वीजा देने से इनकार कर दिया।
वीजा ऑफिसर के इनकार ने मेरे दिल की आरजू को तहस-नहस कर दिया और मैं रोने लगी कि एक उम्मीद थी वो भी खत्म हो गई थी। मगर अब क्या हो सकता था, इसलिए मैं अफसुर्दा अंदाज में बोझिल कदमों से चलती हुई एम्बेसी के गेट से बाहर निकल आई।
एम्बेसी से बाहर निकली तो एक नई मुसीबत मेरी मुन्तजिर थी। सुबह जब इंटरव्यू के लिए मैं एम्बेसी में एंटर हुई थी, उस वक्त तक तो मौसम ठीक था, मगर जब बाहर निकली तो देखा कि बाहर तो गजब की बारिश हो रही है। एम्बेसी के सामने काफी लेडीज और जेंट्स खड़े भीग रहे थे।
शायद उनके लोग अभी अंदर ही थे, इसलिए उनके इंतजार में वो लोग बाहर बारिश में ही खड़े होने पर मजबूर थे। उनके साथ-साथ अब्बा भी बुरी तरह से भीगे हुए थे। मैं तो वीजा न मिलने की वजह से पहले ही परेशान थी और अब एक नई मुसीबत बारिश की शक्ल में मेरी मुन्तजिर थी।
अब्बा ने मुझसे कहा कि चलो एयरपोर्ट चलते हैं, वहीं बैठकर शाम की फ्लाइट का इंतजार करेंगे। मैं बाहर आई तो मूसलाधार बारिश की वजह से मैं भी फौरन ही खूब भीग गई। मैंने गर्मी की वजह से व्हाइट कलर के लॉन के कपड़े पहने हुए थे और सोने पर सुहागा कि मैं आज सुबह जल्दी-जल्दी में सफेद कपड़ों के नीचे काले रंग का ब्रेजियर पहनकर आई थी।
इसलिए ज्यों ही बारिश के पानी ने बारीक कपड़ों में मलबूस मेरे जिस्म को भिगोया, तो ना सिर्फ मेरे जिस्म का अंग-अंग नीम नुमाया होने लगा, बल्कि सफेद कपड़ों के नीचे मेरे काले रंग के ब्रेजियर में कैद मेरे बड़े-बड़े मम्मे और भी उभरकर नुमाया होने लगे।
मैं बारिश में भीगते हुए अपने इर्द-गिर्द खड़े मर्दों की गर्म निगाहों को अपने उघड़े हुए जिस्म के आर-पार होता हुआ महसूस कर रही थी। अब्बा भी शायद लोगों की मुझ पर पड़ती हुई बेबाक निगाहों को समझ रहे थे, इसी लिए उन्होंने मुझे थोड़ा गुस्से में कहा, नबीला बेटी मैं इसी लिए तुमको कहता हूं कि घर से बाहर हमेशा चादर लेकर निकला करो मगर तुम नहीं मानती।
अपने ससुर की बात सुनकर मुझे और शर्मिंदगी हुई, मगर अब हो भी क्या सकता था, इसलिए बेबसी की हालत में अपनी निगाहें जमीन पर गाड़े मैं चुपचाप खड़ी बारिश में भीगती रही। एम्बेसी के सामने दो-तीन टैक्सी खड़ी तो थीं, मगर उन सबने उस वक्त एयरपोर्ट जाने से इनकार कर दिया।
इसकी वजह ये थी कि उनको करीब के पैसेंजर मिल रहे थे, इसलिए शायद वो कम वक्त में ज्यादा पैसे बनाने को तरजीह दे रहे थे। जब अब्बा ने देखा कि इस वक्त कोई भी टैक्सी वाला हमें एयरपोर्ट ले जाने को तैयार नहीं, तो उन्होंने मुझे कहा कि हम करीब के एक होटल में चले जाते हैं और फिर शाम को वहां से ही एयरपोर्ट चले जाएंगे।
मैं तो पहले ही अपने नीम दिखते जिस्म पर पड़ने वाली लोगों की भूखी नजरों से तंग थी, इसलिए मैंने फौरन हां कर दी और यूं हम लोग टैक्सी में बैठकर एक करीबी होटल में चले आए। कमरे में पहुंचकर मैं भीगी ही हालत में कमरे के सोफे पर बैठ गई, जबकि अब्बा ने एयरपोर्ट फ्लाइट की इन्फॉर्मेशन के लिए फोन मिला लिया।
फोन की लाइन मिलने पर एयरपोर्ट इंक्वायरी से मालूम हुआ कि चांस पर होने की वजह से शाम की फ्लाइट पर हमारी सीट्स कन्फर्म नहीं हैं। इस पर अब्बा ने कहा कि वो बुकिंग ऑफिस जाकर सीट कन्फर्म करवा लेते हैं और वापसी पर हम दोनों के लिए बाजार से एक-एक जोड़ा कपड़ों का भी लेते आएंगे।
ये कहकर अब्बा ने रूम सर्विस से मेरे लिए कुछ खाने का ऑर्डर दिया और फिर वो पीआईए ऑफिस जाने के लिए कमरे से निकल गए। अब्बा के जाने के थोड़ी देर बाद होटल का वेटर मेरे लिए समोसे और चाय वगैरह ले आया। मैं अभी समोसे खाने में मसरूफ थी कि उसी वक्त जमाल के मोबाइल पर फोन आ गया और मैंने उनको सारी तफसील बता दी कि वीजा रिजेक्ट हो गया है।
जमाल ने मुझे तसल्ली दी तो मेरा दिल थोड़ा हल्का हो गया। जमाल से बात खत्म होने के बाद मैं सोचने लगी कि मैं कब तक इन भीगे हुए कपड़ों में ही लिपटी बैठी रहूंगी। फिर मैंने सोचा कि अभी-अभी तो अब्बा गए हैं, उनको लौटने में अभी देर है तो क्यों ना मैं अपने कपड़े उतारकर उनको अच्छी तरह से सुखा लूं।
ताकि अगर अब्बा के लाए हुए कपड़े मुझे पूरे न आएं तो मैं अपने इन्हीं कपड़ों को दुबारा पहन सकूंगी। ये सोचकर मैंने अपने कपड़े उतार दिए और उन्हें खूब अच्छी तरह निचोड़कर सोफे पर फैला दिया ताकि सूख जाएं। मैं बेड पर ब्लैंकेट ओढ़कर नंगी ही लेट गई। मेरा इरादा था कि अब्बा के वापस आने से पहले-पहले मैं दुबारा अपने कपड़े पहन लूंगी।
एक तो सुबह सवेरे जल्दी उठने की वजह, ऊपर से वीजा न मिलने की मायूसी और फिर ठंडे जिस्म को कंबल की गर्मी ने मेरे जिस्म को वो राहत पहुंचाई कि मुझ पर एक उनींदी सी छाने लगी। पता नहीं मैं कितनी देर इसी तरह सोती रही। फिर अचानक मेरी आंख खुली तो मुझे महसूस हुआ कि मैं बेड की एक साइड पर करवट लिए सो रही थी।
अभी मेरी आंखें पूरी तरह खुली भी नहीं थीं कि मुझे ये अहसास हुआ कि मैं बेड पर अकेली नहीं बल्कि कोई और भी मेरे जिस्म के पीछे लेटा हुआ है और वो जो कोई भी है उसका एक हाथ मेरे नंगे मम्मों को सहला रहा था। एक लम्हे के लिए तो मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि ये क्या हो रहा है।
और फिर मैं जैसे ही नींद के खुमार से बाहर आई तो अपने मम्मों पर फिसलते हुए किसी के हाथ को महसूस करके मेरी तो जान ही निकल गई। मैं समझी कि शायद ये आदमी मेरे कमरे में समोसे और चाय लाने वाला वेटर हो सकता है, क्योंकि मैंने नोट किया था कि जब वो मुझे ट्रे पकड़ाते वक्त वो बड़े गौर से मेरे जिस्म का जायजा ले रहा था।
मैं एकदम चीखते हुए उठ बैठी और अपने पीछे लेटे हुए शख्स को बेड से धकेलने लगी। धक्का देते वक्त ज्यों ही मेरी नजर उस शख्स के चेहरे पर पड़ी तो मेरा रंग फक हो गया, क्योंकि वो शख्स होटल का वेटर नहीं बल्कि मेरे अपने ससुर अब्बा जी मेरे साथ एक बेड पर पूरी तरह नंगे लेटे हुए थे।
मैं अब्बा को अपने साथ इस हालत में देखकर दम बखुद हो गई। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि अब्बा अपनी उस बहू के साथ जिसको वो अपनी बेटी कहते नहीं थकते थे, वो उसके साथ आज इस तरह बिल्कुल नंगे लेटे हुए थे और उनके चेहरे पर शर्म नाम की कोई चीज भी नहीं थी।
मैं अपना जिस्म ब्लैंकेट से छुपाने लगी तो जलील अब्बा ने मेरा हाथ थाम लिया और मुझे जबरदस्ती अपने साथ लिटाने लगे। अब्बा मैं आपकी बेटी हूं, आप क्यों मेरे साथ ये जुल्म कर रहे हैं, कहते हुए मैंने अपने आप को अपने ससुर की कैद से छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन अब्बा ने मेरी बात को अनसुनी करते हुए मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरे जिस्म को अपने बाजुओं में भर लिया।
मैंने कहा, हट जाइए वरना मैं शोर मचा दूंगी, आपको शर्म आनी चाहिए। लेकिन अब्बा को तो जैसे किसी बात का असर नहीं हो रहा था। उन्होंने मुझे बेड पर सीधा लिटाया और खुद फौरन मेरे जिस्म के ऊपर आ गए। जब मैंने देखा कि अब्बा पर मेरी किसी बात का असर नहीं हो रहा है, तो मैंने जोर-जोर से चीखना शुरू कर दिया, बचाओ बचाओ।
लेकिन लगता था कि होटल का कमरा एयर कंडीशन होने के साथ-साथ साउंड प्रूफ और चीख प्रूफ भी था। शायद इसी लिए मेरी चीखें कमरे से बाहर किसी और को सुनाई न दीं। अब मैं नंगी बिस्तर पर चित लेटी हुई थी, जबकि अब्बा मेरी टांगों के बीच में बैठे हुए थे।
उन्होंने अब मेरी दोनों टांगों को अपने दोनों हाथों से फैला दिया, जिसकी वजह से मेरी फुद्दी पहली बार मेरे अपने ससुर के सामने बिल्कुल खुल गई। अपनी जवान बहू की सॉफ शफाफ और फूली हुई चूत को देखकर अब्बा की आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई।
जाहिर सी बात है एक 60 साला बूढ़े आदमी को जब एक 24 साला जवान चूत नजर आ जाए तो उसकी तो जैसे लॉटरी ही निकल आती है। अब्बा भी मेरी जवान गर्म चूत को देखकर मचलने लगे। 60 साल की उम्र के होने के बावजूद उनका लंड मेरी चूत और मुझे देखकर तन गया था और अब वो मेरे अंदर घुसने के लिए बेकरार होकर उछल-कूद में मसरूफ था।
अब्बा मेरे ऊपर लेट गए और उनका लंड मेरी चूत की दीवारों के ऊपर रगड़ खाने लगा। मैंने एक बार फिर अपने दोनों हाथों से अब्बा के सीने पर रखकर उनको अपने ऊपर से धकेलने की कोशिश की, मगर एक मर्द होने के नाते अब्बा में मुझसे ज्यादा ताकत थी।
और अब्बा ने अपने लंड को मेरी चूत के ऊपर टिकाकर एक धक्का मारा, तो उनका बूढ़ा लंड मेरी जवान चूत की दीवारों को चीरता हुआ मेरी फुद्दी में दाखिल होने में कामयाब हो गया। अपने ससुर के लंड को अपनी चूत के अंदर जाता हुआ महसूस करके मेरी जान ही निकल गई और बेसाख्ता मेरे मुंह से अपने ससुर के लिए गालियां निकलने लगीं।
जलील, कुत्ते, कमीने इंसान हट जाओ मेरे ऊपर से, मैं तुम्हारी असलियत सबको बताऊंगी चाहे कुछ भी हो जाए, मैं चीख रही थी। लेकिन अफसोस है बेगैरती और जलील अब्बा पर कि वो कुछ न बोले बस चुपचाप अपना लंड मेरी चूत के अंदर-बाहर करते रहे।
नीचे से अपना लंड मेरी फुद्दी में डालने के बाद ऊपर से अब्बा ने अपना मुंह आगे बढ़ाकर अपने बूढ़े गलीज होंठों को मेरे नादान-ओ-मुलायम होंठों पर रखकर मुझे किस करने की कोशिश की। ज्यों ही अब्बा अपना मुंह मेरे मुंह के करीब लाए तो मैंने उनको किस देने की बजाए उनके मुंह पर थूक दिया और कहा कि अपनी बेटियों से भी यही करता है कुत्ते।
मैं अब्बा को गालियां देती रही और रोती रही, मगर ऐसा लगता था कि अब्बा तो अंधे और बहरे बनकर बेज्जती प्रूफ हो चुके थे। उन पर मेरी किसी बात और गाली का असर नहीं हो रहा था। अब्बा ने जब देखा कि मैं उनको अपने होंठों से किस नहीं दे रही, तो उन्होंने मेरे गाल, गर्दन और चुचियों को अपने नापाक होंठों से चूमना-चाटना शुरू कर दिया।
वो मेरे मम्मों को अपने मनहूस होंठों से चाट रहे थे और मैं चुपचाप आंसू बहा रही थी। साथ ही साथ उनका लंड मेरी फुद्दी में बिना रोक-टोक अंदर-बाहर होने में मसरूफ था। आह.. ह्ह.. इह्ह.. ऊऊ.. ऊउइ.. ऊई.. उईईई.. मैं रोते हुए सिसक रही थी, लेकिन अब्बा की हरकतें बढ़ती जा रही थीं।
हालांकि शादी के बाद मैं अपने शौहर से चुदवाते वक्त बहुत एंजॉय करती और मस्ती और जोश में मेरे मुंह से निकलने वाली सिसकारियां पूरे कमरे में गूंजकर मेरे शौहर को मजीद जोश में लाती थीं, मगर अब्बा से सख्त नफरत और उन पर बेपनाह गुस्सा आने की वजह से लगता था कि मेरी फुद्दी वाला हिस्सा जैसे सुन्न हो गया था।
इसी लिए मैं उस वक्त अपनी चूत और निचले धड़ में कुछ भी महसूस करने से कासिर हो चुकी थी। अब्बा काफी देर तक मुझे चोदते रहे, आह ह ह ह ह्हीईई आअह्ह्ह्ह, वो मेरे मम्मों को चूसते हुए धक्के मार रहे थे और फिर वो जलील इंसान मेरे अंदर ही डिसचार्ज हो गया।
अपने लंड का पानी मेरी चूत में गिराने के बाद अब्बा ने अपने कपड़े समेटे और वॉशरूम में चले गए। जबकि मैं ब्लैंकेट में लिपटी हुई हिचकियां लेते हुए रोती रही। थोड़ी देर बाद वो वॉशरूम से बाहर आए तो उन्होंने कपड़े पहने हुए थे। मुझे अभी तक कंबल में लेटे देखा तो बोले, बेटी उठो कपड़े बदल लो फ्लाइट सीट कन्फर्म हो गई है हमे जल्दी एयरपोर्ट चलना है।
बेटी कहने पर मैंने उनको नफरत से देखा और गुस्से में चिल्लाते हुए बोली, खबरदार अगर मुझे अब बेटी कहा बेगैरत इंसान। अब्बा ने मेरे गुस्से का कोई असर नहीं लिया बल्कि वो मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर निकल गए। उनके जाने के बाद मैं ब्लैंकेट लपेटकर उठ गई और शावर में जाकर अब्बा के लाए हुए दूसरे कपड़े बदल लिए।
जहाज में अब्बा मेरे साथ ही बैठे हुए थे और उनकी बेशर्मी की हद ये थी कि सीट पर ऐसे पुरसुकून सोते हुए खर्राटे ले रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जबकि मेरे दिल-ओ-दिमाग में एक तूफान बरपा हुआ था कि आज मैं अपने उस ससुर के हाथों ही बेआबरू हो चुकी थी, जिस ससुर को मैंने दिल की गहराइयों से अपने बाप का मुकाम दिया था।
जब मैं कराची वापस अपने ससुराल पहुंची तो अपनी सास को देखते ही मैं अपनी सास को बताना तो चाहती थी कि उनके शौहर ने किस तरह होटल के कमरे में मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ा दीं हैं, मगर चाहने के बावजूद मेरी जुबान ने मेरा साथ देने से इनकार कर दिया और मैं अपना मुंह खोलने की बजाए उनसे लिपटकर बुरी तरह रोने लगी।
अब्बा ने मुझे रोते देखा तो अम्मी से कहने लगे कि हमारी बेटी को वीजा न मिलने का बहुत दुख है, इसलिए ये सारे रास्ते रोती ही रही है। जिस पर मेरी सास मुझे तसल्ली देने लगीं और अब्बा अपने नवासों-नवासियों से खेलने में मसरूफ हो गए। अब्बा पूरे खानदान में एक शरीफ आदमी मशहूर थे और मुझ समेत अपनी बेटी को चादर ओढ़ने और बारीक कपड़े न पहनने का हुक्म देते थे।
लेकिन मैं नहीं जानती थी कि न जाने कब से वो अपनी ही बहू की चादर उतारने का मंसूबा बनाए बैठे थे। मैंने फैसला कर लिया था कि कुछ भी हो जमाल को जरूर बताऊंगी और मुझे तो अब अपनी ससुराल के हर मर्द से नफरत हो गई थी। रात को जमाल का फोन आया तो मैं टूट-टूटकर रोने लगी और कहा कि आपके अब्बा सही आदमी नहीं हैं।
मैंने सोचा अगर जमाल को एकदम सारी बात बताऊंगी तो उन पर कयामत टूट पड़ेगी, इसलिए मैं अपने शौहर से खुलकर बात करने की बजाए उनको इशारे में अपनी बात समझाना चाहती थी। मेरी बात सुनकर जमाल हंसते हुए कहने लगे कि क्या कह दिया मेरे अब्बा ने। तो मैंने फिर भी पूरी बात तफसील से बताने की बजाय कहा कि वो मुझे गलत नजरों से देखते हैं।
मेरा इतना कहने की देर थी कि जमाल चीख उठे और मुझ पर चिल्लाते हुए बोले, मेरे खानदान के सब लोग सही कहते थे कि खानदान से बाहर शादी न करो, आज तुम मेरे बाप की नजरों पर इल्जाम लगा रही हो कल ये भी कह देना कि वो तुमसे सेक्स करना चाहते हैं।
अपने शौहर को इस तरह गुस्से में आता देखकर मैंने उनको अपनी पूरी कहानी बयान करने की एक और कोशिश की तो मेरी बात स्टार्ट होते ही जमाल ने दुबारा फोन पर गुस्से में चिल्लाते हुए मुझे अपनी जुबान बंद करने का कहा, आज तो ये बात कह दी है अगर फिर कभी ऐसी जलील बात की तो मैं अभी तलाक देने को तैयार हूं, कल मेरी बहनों और बहनोइयों पर भी इल्जाम दे देना, और धक्के में फोन रख दिया।
मुझे जमाल की बातों पर जरा बराबर भी अफसोस न हुआ क्योंकि अपनी इज्जत अपने ही ससुर के हाथों लूटने के बाद जमाल की बातों की अब क्या हैसियत थी। मैं समझ गई कि एक बेटा होने के नाते जमाल अपने जाहिरा शरीफ नजर आने वाले अब्बा के बारे में मेरी किसी बात का यकीन नहीं करेंगे।
इसलिए अपना बसा-बसाया घर उजड़ने की बजाए इस वाकये को एक भयानक ख्वाब समझकर भूल जाना ही मेरे लिए बेहतर बात है। इसलिए मैं खामोश हो गई और फिर जमाल को फोन किया और माफी मांगने लगी। जमाल ने मेरी बात को एक गलती समझकर इस शर्त पर मुझे माफ किया कि मैं दुबारा कभी उनके अब्बा पर किसी किस्म के इल्जाम तराशी नहीं करूंगी।
हालांकि अगर मेरा शौहर ठंडे दिल से मेरी पूरी बात सुन लेता तो शायद उनको ये अंदाजा हो जाता कि जिस बात को वो इल्जाम तराशी कह रहे हैं वो असल में हकीकत है। अपने शौहर की तरफ से इस तरह का रिएक्शन आने के बाद मैंने अपने दिल में पक्का फैसला कर लिया था कि मैं इस तरह अपनी जिंदगी नहीं गुजारूंगी।
लेकिन एक मसलहत के तहत थोड़ी मुद्दत के लिए मैंने बिल्कुल खामोशी इख्तियार कर ली। इसकी वजह ये थी कि उन्हीं दिनों मेरा भाई और मेरी अम्मी हमारे सब से बड़े भाई के पास दुबई गए हुए थे। इसलिए मैं अब उनकी वापसी की मुन्तजिर थी कि ज्यों ही मेरा भाई और अम्मी पाकिस्तान वापस आएंगे तो मैं अपना ससुराल छोड़कर अपने मैके में अपनी अम्मी के पास चली जाऊंगी।
इसी दौरान इस्लामाबाद से वापस के कुछ दिनों तक तो अब्बा मुझसे थोड़े दूर-दूर ही रहे। उसकी वजह शायद ये हो सकती थी कि वो फोन पर अपने बेटे जमाल की बातचीत से इस बात का अंदाजा लगा रहे होंगे कि मैंने अपने शौहर को उनकी हरकत के मुतल्लिक बता दिया है कि नहीं।
फिर जब अब्बा को अंदाजा हो गया कि मैंने उनके बेटे जमाल से उस वाकये के बारे में कोई बात नहीं की, तो उनका हौसला और बुलंद हो गया। अब अब्बा का जब दिल चाहता वो रात को चोरी-छुपे मेरे कमरे में घुस आते और अपनी गंदी हवस पूरी कर लेते और मैं एक बेजान लाश की तरह कुछ भी नहीं कर सकती।
मेरी ननद और उसका शौहर घर के ऊपर वाली मंजिल में रहते थे, इसलिए वो लोग रात को एक दफा ऊपर की मंजिल पर जाने के बाद सुबह तक दुबारा नीचे नहीं आते थे। जबकि मेरी सास अपने इलाज के लिए जो दवाई इस्तेमाल कर रही थीं, उनमें नींद की दवा शामिल होती थी।
इसलिए जब मेरी सास रात को अपने कमरे में जातीं तो वो बिस्तर पर लेटते ही नींद की आगोश में चली जातीं और फिर अगली सुबह ही उनकी आंख खुलती थी। जिस वजह से रात की तन्हाई में अब्बा मेरे कमरे में बिना किसी खौफ के चले आते और मुझे चोदकर अपने लंड की तसल्ली कर लेते।
वो मुझे चोदते वक्त अक्सर कमरे की लाइट ऑन नहीं करते थे। मुझे अब्बा से इस कदर नफरत थी कि जब भी उसने मुझे चोदा तो चुदाई के दौरान मैं जज्बात से बिल्कुल अलग रहती, सिर्फ ये ही महसूस करती कि कोई चीज मेरे जिस्म के अंदर-बाहर हो रही है।
मैं बस एक बेजान बुत बनकर उसके धक्कों को अपनी चूत के ऊपर बर्दाश्त करती और ये ही दुआ करती कि ये गलीज इंसान जल्द से जल्द अपने लंड का पानी निकाले और मेरी जान छोड़े। अब्बा का मुझसे अपना गंदा खेल खेलते दो महीने हो चले थे कि एक रात को जब वो मुझे चोदने लगे।
तो अपनी चूत के अंदर जाता हुआ अब्बा का लंड मुझे पहले की निस्बत काफी सख्त महसूस हुआ। फिर जब अब्बा ने मेरी चूत में लंड डालकर मुझे जोर-जोर से चोदना शुरू किया, तो मुझे उनके अंदाजे चुदाई और धक्कों की रफ्तार में पहले से काफी तेजी महसूस हुई।
ना जाने मेरे दिल के किसी कोने से ये आवाज बुलंद हुई कि लगता है कि आज मेरे ऊपर चढ़ा हुआ शख्स अब्बा नहीं। ये खयाल आते ही चुदाई के दौरान मैंने हाथ बढ़ाकर बेड के पास वाले टेबल लैंप को ऑन किया तो मेरे ऊपर चढ़े आदमी का चेहरा देखकर खौफ और शर्म के मारे मेरा रंग फक हो गया।
में: खालिद भाई अप्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प? मेरे अंदर अपना लंड डाले और मुझे जोश से चोदने में मसरूफ वो आदमी अब्बा नहीं बल्कि खालिद था, अब्बा का घर दामाद।
मैं चीख उठी कि खालिद भाई ये मैं हूं, आप क्या कर रहे हैं। तो खालिद बेशर्मी से हंसा और कहने लगा कि अब्बा कर सकते तो क्या मुझमें कांटे लगे हुए हैं। तुम शोर करोगी तो सब जाग जाएंगे और फिर मैं भी सबको बता दूंगा कि तुमने खुद मुझे अपने कमरे में बुलाया था।
मुझे अंदाजा नहीं था कि खालिद ये राज जान चुका था कि अब्बा मुझे अपनी हवस का निशाना बना रहे हैं। सब घरवालों और खानदान वालों की नजर में खालिद भी एक निहायत ही शरीफ और सच्चा शख्स मशहूर था। इसलिए मुझे पता था कि अगर मैं शोर करूंगी तो वाकई ही कोई भी मेरी इस बात को कबूल नहीं करेगा कि खालिद खुद मेरे कमरे में आया है।
बल्कि इसके बजाय सब खालिद की कही हुई बात का यकीन करेंगे कि मैंने ही उसे अपने पास अपनी चूत की प्यास बुझाने के लिए बुलाया होगा। यूं खालिद भाई की धमकी काम कर गई और मैं चुपचाप लेटी उनसे चुदती रही। कमरे में जलते बल्ब की वजह से मेरा पूरा कमरा रोशन हो गया था।
और इस रोशनी में खालिद अपना लंड बहुत ही आराम से मेरी फुद्दी के अंदर-बाहर करने लगा। खालिद ने मेरी टांगें उठाकर अपने कंधे पर रखीं। उसके झटके बहुत ही आहिस्ता और गहरे थे। खालिद मुझे चोदते-चोदते आगे बढ़ा और मेरे होंठों पर अपने मोटे होंठ रख दिए।
उसकी जुबान मेरे होंठों को एक-दूसरे से अलग कर मेरे मुंह में समा गई। वो मेरे होंठों को चूसते-चूसते अपनी जुबान भी मेरे मुंह के अंदर डालने में कामयाब हो गया। उसकी जुबान मेरे मुंह का हर कोने में ऐसे फेरने लगी जैसे वो शालीमार बाग की सैर करने निकली हो।
साथ ही साथ खालिद एक हाथ से मेरे बदन को अपने सीने पर भींचे हुए था और दूसरे हाथ को वो मेरी पीठ पर फेर रहा था। इसी तरह करते हुए उसने अचानक मेरे चूतड़ों को पकड़कर अपना लंड इतने जोर से मेरी फुद्दी में पेला कि मेरे मुंह से एक चीख निकल गई, हाआआआआआईयइ।
छोड़ो मुझे खालिद भाई, मैंने अपने आप को खालिद के चंगुल से छुड़ाने की एक नाकाम कोशिश की। तू मुझे छोड़ने का कह रही है, जबकि तेरी ये मस्त और तंग चूत को चोदने के बाद मैं तो सारी जिंदगी तुझे अपनी रंडी बनाकर रखने का सोच रहा हूं, कहते हुए खालिद भाई ने मेरी एक चूंची को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया।
मेरे मम्मों को चूसने के साथ-साथ नीचे से खालिद का लंड अपनी पूरी रफ्तार के साथ मेरी चूत की चुदाई में मसरूफ था। फिर मेरी चुदाई करते-करते खालिद एकदम रुका और उसने अपने लंड को मेरी फुद्दी से पूरा बाहर निकाला और मेरे मुंह के सामने ले आया। खालिद के लंड पर मेरी चूत के सफेद पानी के कतरे लगे साफ नजर आ रहे थे।
खालिद ने अपने लंड को मेरे होंठों पर फेरते हुए कहा, नबीला खोल अपना मुंह और मेरे लंड को चाटकर साफ कर। मैंने नफरत से आंखें बंद कर लीं। मगर वो मानने वाला नहीं था। जब खालिद ने देखा कि मैं अपना मुंह नहीं खोल रही, तो उसने मेरे मुंह पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद किया।
दर्द से हाईईईईईईईईईईईईई चिल्लाते हुए ज्यों ही मैंने बेइख्तियार अपना मुंह थोड़ा सा खोला, तो खालिद ने अपने लंड को मेरे मुंह में डाल दिया और मेरे सिर को पकड़कर अपने लंड को अंदर तक पेल दिया। ग्ग्ग्ग.. ग्ग्ग्ग.. गी.. गी.. गी.. गों.. गों.. गोग, मैं गोंगते हुए उसका लंड चूसने लगी।
मुझे उसके लंड से बहुत ही तीखी और गंदी सी स्मेल आई, जिससे मुझे घिन सी आने लगी। खालिद का यूं मुझसे वहशियाना सलूक देखकर मुझे साफ नजर आ रहा था कि आज मेरी हालत बहुत ही बुरी होने वाली है। अगर खालिद इसी तरह मुझे जबरदस्ती चोदता और मारता रहा तो पता नहीं सुबह तक मेरी क्या हालत हो जाएगी।
खालिद अब मेरे मुंह में धका-धक अपना लंड अंदर-बाहर कर रहा था और ना चाहते हुए भी मुझे उसके लंड पर लगे अपनी चूत के पानी को अपनी जुबान से चाटकर साफ करना पड़ा। कुछ देर इस तरह मेरे मुंह को चोदने के बाद उसने अपना लंड बाहर निकाला। अब उसने मुझे उलटा होकर घोड़ी बनने को कहा।
खालिद क्यों मुझे जलील करने पर तुले हो, खुदा के लिए मेरी जान छोड़ो अब, मैंने एक दफा फिर उसकी मिन्नत की। जान तो मैं अब तुम्हारी उस वक्त तक नहीं छोड़ूंगा जब तक तुम्हें दिल भर के चोद न लूं, अब नखरे मत करो और जल्दी से उल्टी होकर लेट जाओ, खालिद ने गुस्से में फुंकारते हुए कहा।
मरती क्या न करती, मैं मजबूरन उल्टी होकर अपने बिस्तर पर लेट गई। मेरे उल्टी होकर लेटते ही खालिद मेरे पीछे आन खड़ा हुआ। उसने थू करके अपने मुंह से ढेर सारा थूक निकाला और कुछ थूक अपने लंड पर और कुछ मेरी चूत पर लगाकर उसने अपना लौड़ा मेरी फुद्दी के सुराख पर रखकर धक्का दिया और उसका लंड अंदर चला गया।
अब खालिद मुझे फिर किसी कुतिया की तरह चोदने लगा। उसके तेज-तेज झटकों की बदौलत जब उसका लंड मेरी चूत के अंदर जाता तो मेरी फुद्दी के साथ उसके टट्टे टकराने के साथ-साथ उसकी टांगें भी पीछे से मेरे मोटे हिप्स से जा टकरातीं। इस तरह ना सिर्फ कमरे में थप थप की आवाज गूंजती बल्कि उसके हर झटके की वजह से मेरे मोटे मम्मे भी हिलने शुरू हो जाते।
खालिद कमरे की दीवार से लगे शीशे में मेरे हिलते हुए मम्मों को देखकर और जोर से मुझे चोदने लगा और इसके साथ-साथ वो अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेरी मम्मों को मसलने लगा। उसके झटकों की रफ्तार अब पहले से बहुत ही तेज हो गई थी।
में आआआआआआईयईईई ईईईईईईईईईईईईईईई ऊऊऊऊऊऊऊऊऊँ म्म्म्म मममममममाआअ एयाया मुझे छोड़ दूऊऊऊओ जैसे अल्फाज से खालिद अभी तक इस काम से रोकने की कोशिश करने में लगी हुई थी, मगर उसी दौरान खालिद ने एक जोरदार झटके के साथ ही अपना सारा वीर्य मेरी फुद्दी में उड़ेल दिया।
खालिद ने अपनी दरिंदगी पूरी की और चला गया, जबकि उसके लंड का पानी काफी देर तक चूत से बाहर निकलकर मेरी टांगों से होता हुआ बिस्तर पर गिरता रहा। मैं खालिद की वहशियाना चुदाई से थक गई थी, इसलिए उसके जाने के कुछ देर बाद मुझे भी नींद ने अपनी आगोश में ले लिया और मैं नंगी ही सो गई।
मैं सुबह काफी देर तक सोती रही। फिर जब सुबह मेरी आंख खुली तो बिस्तर पर से उठते वक्त मेरी नजर सामने लगे शीशे पर पड़ी। मैंने देखा कि मेरे दोनों मम्मों पर खालिद के दांतों के निशान अभी तक बाकी थे और मेरे निपल्स भी सूजे हुए थे।
जबकि नीचे मेरी चूत भी सूजकर और मोटी हो गई थी, जबकि मेरे जिस्म का अंग-अंग अभी तक दर्द कर रहा था। मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि यहां तो मैं मर जाऊंगी। ना मेरा अमेरिका का बुलावा आएगा और ना मैं इस जहन्नुम से निकल पाऊंगी। आखिर मैं कब तक दामाद और ससुर की रखैल बनकर रहूंगी।
मैं जेहनी तौर पर इतनी परेशान थी और खुद अपनी ही नजरों में गिर गई थी। दिल चाहता था कि खुदकुशी कर लूं या सारे ससुराल वालों को जमा करूं और चीख-चीखकर कहूं कि कोई और है तो आ जाए मुझसे चुदाई करने।
उसी दिन अम्मी का दुबई से फोन आया कि वो और बिलाल भाई आज शाम की फ्लाइट से पाकिस्तान वापस लौट रहे हैं। मुझे तो इसी खबर का इंतजार था, क्योंकि मैंने इस्लामाबाद से वापसी पर ही ये तय कर लिया था कि अपने ससुर के हाथों बेआबरू होकर मैं अब मजीद अपने ससुराल में नहीं रह सकती थी।
फिर आज खालिद भाई के साथ रात वाले वाकये के बाद मेरे लिए अब एक लम्हा इधर रुकना मुहाल था। इसलिए उसी रात मैं अपनी सास से इजाजत लेकर अपनी अम्मी के घर चली आई।
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