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पार्क में झाड़ियों के पीछे जवान लड़की की चुदाई

Jawan ladki ki chudai sex story, Park mein jhadiyon ke peeche sex story: मेरा नाम रवि डिमोंन है। मैं राजस्थान से हूँ, पर पिछले कुछ समय से मुंबई में रहता हूँ। बात आज से चार साल पहले की है। जब मुझे मुंबई में पहली बार नौकरी मिली थी। मैं यहाँ बिलकुल नया था। दोस्त बहुत कम थे, बल्कि कहें तो बस दो-चार लोग ही ऐसे थे जिनसे बात हो पाती थी। हर सुबह मैं भायंदर की लोकल ट्रेन पकड़ता, भीड़ में खुद को समेटकर खड़ा रहता और फिर स्टेशन से उतरकर ऑटो ले लेता। ऑफिस तक का रास्ता छोटा था, लेकिन उस भीड़भाड़ वाले मुंबई के सफर में हर दिन कुछ न कुछ नया लगता रहता।

सब कुछ सामान्य ही चल रहा था। दिन बीतते जा रहे थे। फिर एक सुबह, जैसा रोज होता था, मैं भायंदर स्टेशन से उतरा और ऑटो स्टैंड की तरफ बढ़ा। तभी मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी। वो एक ऑटो वाले से जोर-जोर से बहस कर रही थी। उसकी आवाज में गुस्सा था, लेकिन साथ ही बेचैनी भी। मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है। मैं थोड़ा और पास गया।

देखा तो पता चला कि लड़की बार-बार कुछ बोल रही थी, लेकिन ऑटो वाला समझ नहीं पा रहा था। वो सिर्फ सिर हिला रहा था और हाथ से इशारे कर रहा था। मैंने ध्यान से सुना। लड़की अंग्रेजी में बात कर रही थी, “Please, I need to go to this place, near the big building, why are you not understanding?” लेकिन ऑटो वाला हिंदी में ही जवाब दे रहा था, “बहन जी, मुझे नहीं पता वो जगह, आप बोला तो सही से।”

मुझे समझ आ गया। लड़की को हिंदी नहीं आती थी और ऑटो वाले को अंग्रेजी बिलकुल नहीं। दोनों एक-दूसरे की भाषा समझ नहीं पा रहे थे। मैंने बीच में कदम रखा। पहले ऑटो वाले से हिंदी में पूछा, “भाई साहब, क्या बात है? ये कहाँ जाना चाहती हैं?”

फिर लड़की की तरफ मुड़ा और अंग्रेजी में बोला, “Excuse me, do you need help? मैं आपकी मदद कर सकता हूँ।”

उसने राहत की सांस ली और जल्दी-जल्दी बताया कि उसे एक खास ऑफिस जाना है, जो मेरे ऑफिस से बस दो-तीन मिनट की दूरी पर था। उसने अपना फोन निकाला और लोकेशन दिखाई। मैंने देखा तो मुस्कुरा दिया। “अरे, ये तो मेरे ऑफिस के बिलकुल पास है। आप मेरे साथ चल सकती हैं। मैं उसी तरफ जा रहा हूँ।”

ऑटो वाले को मैंने समझाया कि अब कोई दिक्कत नहीं है। उसने हामी भरी और हम दोनों उसी ऑटो में बैठ गए। रास्ते में हल्की-फुल्की बात हुई। उसने बताया कि वो नई-नई मुंबई आई है, यहाँ एक कंपनी में जॉइन किया है और अभी लोकेशन समझने में दिक्कत हो रही है। मैंने भी अपना परिचय दिया। बताया कि मैं भी राजस्थान से हूँ और मुंबई में नया-नया हूँ।

ऑटो चलता रहा। सुबह की हल्की धूप, सड़क किनारे की भीड़, लोकल ट्रेनों की आवाज दूर से आती हुई। हम दोनों धीरे-धीरे सहज होते गए। जब ऑफिस के पास पहुँचे तो मैंने ऑटो रोका। उसने किराया दिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई। “Thank you so much, Ravi. You really helped me today.”

मैंने कहा, “No problem at all. Actually, हम दोनों एक ही तरफ जा रहे थे।”

फिर हम दोनों पैदल ही ऑफिस की तरफ बढ़े। पता चला कि उसका ऑफिस मेरे ऑफिस से बस एक गली छोड़कर था। ऐसे हमारी पहली मुलाकात हुई।

उसने मेरा फोन नंबर माँगा। मैंने बिना ज्यादा सोचे अपना नंबर दे दिया। हम दोनों ने अलविदा कहा और अपने-अपने ऑफिस चले गए। उसके बाद कई हफ्ते, कई महीने बीत गए। न उसका मैसेज आया, न मेरी तरफ से कोई कोशिश हुई। शायद हम दोनों ही इतने व्यस्त हो गए थे कि उस छोटी-सी मुलाकात को भूल ही गए थे। मुंबई की रफ्तार में ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं और फिर खो जाते हैं।

फिर एक शाम, अचानक मेरा फोन बजा। नंबर अनजान था। मैंने उठाया। दूसरी तरफ से एक लड़की की आवाज आई, जो बहुत कमजोर और परेशान लग रही थी। “हैलो… रवि? मैं प्रिया बोल रही हूँ… याद है? वो ऑटो वाली लड़की…”

मैंने एक पल सोचा और फिर याद आ गया। “हाँ-हाँ, प्रिया! बोलो, क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?”

उसकी आवाज काँप रही थी। उसने बताया कि वो कलकत्ता से है, मुंबई में अकेली रहती है। पिछले तीन दिनों से उसे तेज बुखार है, बहुत कमजोरी है, कुछ खा-पी नहीं पा रही। डॉक्टर के पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही क्योंकि अकेली है, और यहाँ उसे सिर्फ मेरा ही नंबर पता था। वो रोते हुए बोली, “प्लीज रवि, अगर तुम फ्री हो तो आ जाओ… मुझे बहुत डर लग रहा है।”

मुझे बहुत बुरा लगा। लेकिन ठीक उसी वक्त मैं शिर्डी गया हुआ था। परिवार के साथ था, वापस आने में अभी दो दिन लगने वाले थे। मैंने तुरंत अपने एक दोस्त को फोन किया। वो डॉक्टर है, अच्छा इंसान भी। मैंने पूरी बात बताई और कहा, “भाई, प्लीज उसके घर जाओ, देखो क्या हाल है। दवा-दारू जो भी चाहिए कर देना। मैं वहाँ नहीं हूँ, लेकिन तुम्हारे भरोसे हूँ।”

उसने हामी भरी और शाम को ही प्रिया के पास पहुँच गया। उसने मुझे बाद में बताया कि प्रिया को वायरल फीवर था, बहुत डिहाइड्रेशन हो गया था। उसने इंजेक्शन दिए, दवाइयाँ लिखीं और दो दिन तक रोज चेक करने गया। सबसे अच्छी बात ये कि उसने प्रिया से एक भी रुपया फीस नहीं लिया। बस कहा, “रवि का दोस्त हूँ, ये सब छोटी-मोटी बात है।”

जब प्रिया पूरी तरह ठीक हुई, तो उसने मुझे सबसे पहले फोन किया। उसकी आवाज में अब पहले वाली कमजोरी नहीं थी। वो बहुत खुश थी। “रवि, तुम्हारे दोस्त ने मेरी जान बचाई। तुमने भी इतनी मदद की… थैंक यू सो मच। मैं कभी नहीं भूलूँगी।”

उस दिन से हमारी बातचीत फिर शुरू हो गई। पहले तो बस हाल-चाल, काम की बातें, मुंबई की मुश्किलें। धीरे-धीरे बातें लंबी होने लगीं। रात को देर तक फोन पर हँसी-मजाक। छोटी-छोटी बातों में मजा आने लगा। फिर एक दिन बातें थोड़ी निजी हो गईं। मजाक में एक-दूसरे की तारीफ, फिर धीरे-धीरे फ्लर्टिंग। पता ही नहीं चला कि कब बातें सेक्सुअल होने लगीं। हम दोनों को अच्छा लगने लगा। फोन पर लंबी-लंबी बातें, कभी-कभी गर्म होती हुईं। वो मुझे अपनी फीलिंग्स बताती, मैं उसे। सब कुछ बहुत नैचुरल लग रहा था।

फिर एक दिन हम मिले। कैफे में बैठे थे। कॉफी पीते-पीते उसने अचानक कहा, “रवि, एक बात बतानी है।”

मैंने पूछा, “क्या हुआ?”

उसने आँखें नीची करके कहा, “मेरी सगाई हो चुकी है। परिवार ने तय की है। कुछ महीनों में शादी भी हो जाएगी।”

एक पल के लिए सब रुक सा गया। मैं चुप रहा। वो भी। दोनों के चेहरे पर उदासी छा गई।

पर उस ही समय उसने मुझे गाल पर चूम लिया और बोली, “मैं पहला सेक्स तुमसे चाहती हूँ।”

मैं यह सुनते ही इतना खुश हो गया कि बस उसे देखता रह गया। मेरी आँखें उसकी आँखों में टिकी रहीं, जैसे समय ठहर गया हो। मैं होश में तब आया जब उसने मुझे फिर से किस किया—इस बार होंठों पर। उसके नरम, गर्म होंठ मेरे होंठों से मिले और एक गहरी, लंबी चुंबन हुई। इस बार मैंने भी उसे जवाब दिया। मैंने उसके होंठों को हल्के से दबाया, जीभ से छुआ और धीरे-धीरे गहराई में चला गया। हम दोनों एक-दूसरे में खोते चले गए।

इस सबमें काफी देर हो चुकी थी। रात के करीब आठ बज चुके थे और पार्क में अब घना अंधेरा छा गया था। चारों तरफ सन्नाटा था, सिर्फ पत्तियों की सरसराहट और हमारी तेज़ साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। हम दोनों सेक्स की आग में पूरी तरह जल रहे थे। मेरे हाथ उसकी कमर पर फिसलते हुए नीचे की ओर गए। मैंने धीरे से उसकी सलवार के नाड़े में हाथ डाला। जैसे ही उँगलियाँ अंदर गईं, मुझे महसूस हुआ कि वो पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसकी गर्माहट और नमी मेरी उँगलियों पर चिपक गई।

उसने मेरी ओर देखा, आँखों में शरारत और चाहत भरी हुई थी। उसने पास की झाड़ियों की ओर इशारा किया और धीमी, काँपती आवाज़ में कहा, “वहाँ चलते हैं।” मैंने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और उसका हाथ पकड़ लिया। हम दोनों झाड़ियों की ओर बढ़े। वहाँ पहुँचते ही वो मुझ पर भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ी। उसने मेरे गले में बाँहें डालीं और मुझे जोरों से चूमने लगी। उसके होंठ मेरे होंठों, गालों, गर्दन पर फिरने लगे। वो मुझे नोंचने लगी, हल्के-हल्के काटने लगी। उसकी उँगलियाँ मेरी पीठ पर नाखून गड़ा रही थीं।

मैं भी अब अपना आपा खो चुका था। मैंने उसे कसकर पकड़ा और उसके होंठों को काटा, गर्दन पर दाँत गड़ाए। उसके दर्द भरे सिसकारों में मुझे अजीब-सा मजा आने लगा। मैंने उसकी कुर्ती को धीरे-धीरे ऊपर किया। उसकी ब्रा सामने से खुलने वाली थी। मैंने हुक खोला और ब्रा को हटाते ही उसके नंगे, मुलायम स्तन मेरे सामने आ गए। मैंने दोनों हाथों से उन्हें दबाया, मसलने लगा। फिर एक को मुँह में लिया और चूसने लगा। मेरी जीभ उसके निप्पल के चारों ओर घूम रही थी, हल्के से काट रही थी। वो काँप रही थी। उसके मुँह से कामुक सिसकारियाँ निकल रही थीं—“हम्म… म्म्म्म्म्… आह…” गहरी, लंबी साँसों के साथ।

मैंने उसके पेट पर जीभ फेरनी शुरू की। धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ता गया। उसकी कमर, नाभि—हर जगह चूमता, चाटता रहा। वो और ज़्यादा काँपने लगी। फिर मैंने उसकी सलवार का नाड़ा खोला और धीरे से नीचे सरका दिया। सलवार उसके घुटनों तक आ गई। उसने अधीर होकर कहा, “जल्दी करो… घर भी जाना है।”

मैंने उसे ज़मीन पर लिटाया। घास ठंडी थी, पर हमारी देहों की गर्मी सब कुछ भुला रही थी। मैंने अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे की। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा और सख्त हो चुका था। मैंने उसकी टाँगें थोड़ी फैलाईं। उसकी चूत अब पूरी तरह भीगी हुई, लाल और खुली हुई लग रही थी। मैंने अपना लंड उसकी चूत पर रखा और धीरे से दबाव डाला। पर पहली कोशिश में वो अंदर नहीं गया। वो बहुत टाइट थी।

उसने एक हाथ से मेरा लंड पकड़ा, अपनी चूत के मुहाने पर सेट किया और बोली, “अब धकेलो।” मैंने एक ज़ोरदार झटका मारा। उसका सिर पीछे को गया और वो जोर से चीख पड़ी—“उई… मआआआ…” चीख इतनी तेज़ थी कि एक पल के लिए मुझे लगा कहीं कोई सुन तो नहीं लेगा। मैंने तुरंत उसका मुँह अपने हाथ से दबा लिया और दूसरा झटका दिया। इस बार मेरा आधा लंड अंदर चला गया। मुझे भी लंड में तेज़ जलन और दर्द हुआ, पर वो दर्द अब सुख में बदल रहा था।

वो मुँह दबाए हुए सीत्कार रही थी—“मम्म्म्म्म्… अह्म्म्म्म्… आआह…” मैंने धीरे-धीरे और गहराई तक धकेलना शुरू किया। हर झटके के साथ वो थोड़ा और खुल रही थी। कुछ ही झटकों में मेरा पूरा लंड उसके अंदर था। अब मैं तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगा। उसकी चूत मेरे लंड को कसकर जकड़ रही थी। हम दोनों की साँसें एक हो चुकी थीं।

कुछ ही मिनटों में मैं चरम पर पहुँच गया। मैंने कहा, “मैं निकलने वाला हूँ…” उसने भी काँपते हुए कहा, “बाहर निकालना…” पर मैं इतना गहरा घुस चुका था कि रुक नहीं पाया। अगले ही पल मैंने पूरी ताकत से एक आखिरी झटका मारा और उसके अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य की धार उसके अंदर छूटती रही। मैं उसके ऊपर ही ढेर हो गया। हम दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।

ऐसे हमारा पहला सेक्स हुआ।

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