जनवरी की ठंडी शाम थी, बाहर हल्की बारिश बूंदा-बांदी कर रही थी, समुद्र की नम हवा घर में घुसकर सबको छू रही थी, पंखे की हल्की गुनगुनाहट के साथ बारिश की टिप-टिप आवाज कानों में गूंज रही थी। मैं अपने कमरे में किताबों में डूबी थी, एसी बंद था, सिर्फ पंखा चल रहा था जो मेरी त्वचा पर ठंडी हवा बहा रहा था, निप्पल्स हल्के से सख्त हो रहे थे, जब अचानक वेरांडे से आई वो सांसें, भारी, रुक-रुक कर, और मेरा नाम मिला हुआ, “दीपांशी… स्स्स…”, दिल जोर से धड़क उठा, गला सूख गया। पहले लगा शायद मुझे बुला रहे हैं लेकिन आवाज में वो गाढ़ापन, वो ललचाहट, कुछ और था जो मेरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी, चूत में हल्की सी गर्मी महसूस हो रही थी। मैं चुपके से उठी, हॉल पार करके वेरांडे के दरवाजे तक पहुंची, पैरों की आहट न पड़े इसलिए धीरे-धीरे चली, दिल की धड़कन कानों में गूंज रही थी। दरवाजा आधा फुट खुला था। झिर्री से झांका और मेरी सांसें थम गईं, आंखें फैल गईं, शरीर में गर्म लहर दौड़ गई।
पापा पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर पीछे टेक लगाए बैठे थे, उनकी सांसें तेज थीं, पैंट और अंडरवियर घुटनों तक नीचे सरका हुआ था, हवा में उनके शरीर की गर्माहट महसूस हो रही थी। एक हाथ में उनका लंड था, पूरा 9 इंच लंबा, बेहद मोटा, नसें उभरी हुईं, बिल्कुल क्लीन शेव्ड, चमकदार सा, टिप पर प्रीकम की बूंदें चमक रही थीं जो देखकर मुंह में पानी आ गया। दूसरा हाथ फोन पकड़े था, जिसमें मेरी पिछले साल की पूजा वाली साड़ी में फोटो खुली हुई थी, फोटो में मेरी मुस्कान देखकर वो और उत्तेजित लग रहे थे। वो बहुत धीरे-धीरे मुठ मार रहे थे, मुट्ठी लंड की जड़ से सुपारे तक सरकाती, हर स्ट्रोक में हल्का सा रुकते, प्रीकम की चिपचिपी बूंदों को अंगूठे से फैलाते, जैसे अपनी हवस को और तड़पाना चाहते हों, लंड की गर्मी हवा में फैल रही थी। उनके शरीर से पसीने की हल्की मुस्की महक आ रही थी, वो मर्दाना गंध जो वेरांडे की नम हवा में मिलकर और तेज हो गई थी, मेरी नाक में घुसकर चूत को और गीला कर रही थी। हर झटके में उनका पेट सिकुड़ता, जांघें कांपतीं, और सांसें रुक-रुक कर आतीं, “स्स्स… आह्ह…” जैसी गीली सिसकारियां जो मेरे कानों में सीधे चूत तक पहुंच रही थीं।
मुंह से मेरे नाम की रट लगी हुई थी, “दीपांशी… आह बेटी… तेरी वो गुलाबी, टपकती चूत… पापा का ये फूलता लंड… कितना मोटा है, तुझे फाड़ देगा न… लेकिन तू मांगेगी और, है न मेरी परी…?”, उनकी आवाज में वो हवस जो मुझे अंदर तक भिगो रही थी। वो जल्दबाजी में नहीं थे, बहुत आराम से, बहुत लंबा खेल रहे थे, कभी स्पीड बढ़ाते, लंड का सुपारा खून जैसा लाल हो जाता, फिर रुककर सिर्फ जड़ दबाते, खुद को एज पर लाकर रोकते, जैसे मेरी कल्पना में मुझे भी तड़पा रहे हों, उनके चेहरे पर पसीना चमक रहा था, आंखें बंद, होंठ काटे जा रहे थे। आधा घंटा बीत गया, वो अभी भी चल रहे थे, उनकी सांसें और भारी होती जा रही थीं, पसीना अब गर्दन से छाती तक बह रहा था, छाती की उठान-गिरान देखकर मेरी सांसें भी तेज हो गईं।
मैं वहीं खड़ी थी, वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी, फोन झिर्री से अंदर, पूरा फोकस उनके लंड पर, हर डिटेल कैद हो रही थी, नसों की फड़कन, प्रीकम की चमक। मैंने जूम किया उनकी नसों पर, वो कैसे फड़क रही थीं, जैसे मेरे नाम से जीवित हो गई हों, देखकर मेरी चूत में खुजली होने लगी। मेरी चूत इतनी तर हो चुकी थी कि पैंटी पूरी गीली थी, जांघों से रस बह रहा था, निप्पल पत्थर जैसे सख्त होकर ब्रा में चुभ रहे थे। लेकिन हिल नहीं पा रही थी, बस देखती जा रही थी, हाथ खुद-ब-खुद जांघों पर चला गया, हल्का सा दबाया, “आह…” दबाकर सिसकारी निकली।
पैंतालीस मिनट बाद आखिरकार वो तेज हुए, स्ट्रोक्स छोटे-छोटे, तेज-तेज, मुट्ठी जोर से पकड़ी हुई, लंड फूलकर और मोटा लग रहा था। “दीपांशी… उफ्फ… ले बेटी… पापा का गाढ़ा माल… तेरी चूत में डाल दूं… भर दूं तुझे… आह्ह्ह…”, उनकी आवाज कांप रही थी। पहली बौछार इतनी जोर की थी कि हवा में दो फुट ऊपर उछली, फिर दूसरी, तीसरी, चौथी, गाढ़ा, सफेद, चिपचिपा वीर्य उनके पेट पर, छाती पर, मुट्ठी पर फैल गया, गंध और तेज हो गई। वो सिसकारी भरते रहे, “दीपांशीीीी… बेटी…” कहते हुए शरीर कांपता रहा, आखिरी बूंदें भी निकलीं, तब जाकर वो शांत हुए, सांसें अभी भी तेज थीं।
मैंने वीडियो बंद किया और चुपके से अपने कमरे में भाग आई, दरवाजा लॉक किया, सांसें मेरी भी तेज थीं, शरीर गर्म हो चुका था। मैंने सारे कपड़े उतारे, टी-शर्ट, ब्रा, पैंटी सब फेंक दिया, बिल्कुल नंगी हो गई, आईने में खुद को देखा, स्तन उभरे हुए, निप्पल्स लाल, चूत की फांकें गीली चमक रही थीं। मेरी चूत फूली हुई थी, क्लिट सख्त, अंदर तक तर, रस जांघों तक बह रहा था। मैंने बेड पर दो तकिए रखे, एक के ऊपर एक, और फोन को सामने प्रोप करके वीडियो प्ले किया, वॉल्यूम कम, लेकिन पापा की हर सांस, हर नाम की पुकार साफ सुनाई दे रही थी, आवाज सुनकर चूत में फिर सिहरन हुई।
पहले मैंने खुद को छुआ, उंगलियां स्तनों पर फिराई, निप्पल्स को मसला, “आह… पापा…”, सिसकारी निकली, त्वचा पर ठंडी हवा लग रही थी लेकिन अंदर आग लगी थी। फिर उंगलियां नीचे ले गई, चूत की फांकों को सहलाया, रस उंगलियों पर लगा, चिपचिपा, गर्म, उसे चखा, नमकीन-मीठा स्वाद मुंह में फैल गया, और उत्तेजित हो गई। क्लिट को हल्के से रगड़ा, शरीर में झुरझुरी दौड़ी, “ओह्ह… पापा का लंड…”, वीडियो देखते हुए धीरे-धीरे उंगली अंदर डाली, टाइट चूत में घुसी, गर्माहट महसूस हुई, धीरे-धीरे अंदर-बाहर की, सांसें तेज हो गईं। कई मिनट तक ऐसे ही खेली, उंगलियां गीली हो गईं, चूत से “चप-चप” की आवाज आने लगी, लेकिन अभी रुकना नहीं चाहती थी, हवस और बढ़ रही थी।
फिर तकिए पर सवार हो गई, पहले बहुत धीरे, चूत की फांकों को तकिए पर रगड़ा, हिप्स सर्कुलर मोशन में घुमाई, जैसे उनका लंड अंदर सरक रहा हो, तकिए की मुलायमाहट चूत को सहला रही थी। वीडियो में पापा का धीमा स्ट्रोक देखकर मैंने भी स्पीड धीमी रखी, आधा घंटा सिर्फ एजिंग की, ग्राइंड करती, फिर रुक जाती, क्लिट पर उंगलियां हल्की दबाती, अपना रस चखती, वो नमकीन-मीठा स्वाद जो और उत्तेजित करता, मेरी अपनी हवस की मादक गंध कमरे में फैल गई थी। मेरे स्तन भारी लग रहे थे, निप्पल्स को खुद ही चुटकी काट रही थी, बीच-बीच में फोन की स्क्रीन को चाटती, कल्पना में उनका प्रीकम चखते हुए, शरीर पसीने से चिपचिपा हो रहा था।
“पापा… आह पापा… तेरा लंड… इतना मोटा… मेरी चूत में घुसा दो… बेटी की हवस बुझाओ न… स्स्स… हां, ऐसे ही… मेरा नाम लेकर मुठ मारो… मैं भी तेरे लिए टपक रही हूं…”, मेरे मुंह से खुद-ब-खुद निकल रहा था, आवाज कमरे में गूंज रही थी। ये हवस शायद खून में ही है, पापा से मुझे मिली, मैं भी वैसी ही हूं, नाम लेकर तड़पती, ये सोचकर और गर्म हो गई।
फिर मैंने स्पीड बढ़ाई, हिप्स जोर-जोर से ऊपर-नीचे पटकती, तकिए पर चूत की फांकों से “चप-चप” की गीली आवाजें निकल रही थीं, जांघें जलने लगीं, पसीना टपक रहा था लेकिन रुकना नामुमकिन था। उल्टी सवार हो गई, रिवर्स स्टाइल, जैसे पापा पीछे से घुस रहे हों, उंगलियां क्लिट पर तेजी से रगड़ती, “आह्ह… ओह्ह पापा… और जोर से…”, सिसकारियां निकल रही थीं। पहला ऑर्गेज्म धीरे-धीरे आया, “आह्ह… इह्ह पापा…”, शरीर में कंपकंपी, चूत ने जोर से सिकुड़ी, स्क्विर्ट की बौछारें निकलीं, गर्म, चिपचिपा रस बेड पर फैल गया लेकिन रुकी नहीं, शरीर अभी भी गर्म था।
दोबारा शुरू किया, उंगलियां फिर अंदर डाली, इस बार दो उंगलियां, चूत को फैलाया, वीडियो में पापा का लंड देखकर कल्पना की वो अंदर है, धक्के लगाए, फिर तीसरा ऑर्गेज्म, “ऊईई… पापा… और…”, हर बार स्क्विर्ट, हर बार चीख दबाकर निकाली, शरीर थरथरा रहा था। पूरा एक घंटे तक खुद को खेला, कभी धीमा, कभी रफ, कभी रुककर सिर्फ वीडियो देखती और कल्पना करती, उंगलियां चूत से निकालकर चूसती, स्वाद लेती। आखिरी ऑर्गेज्म इतना इंटेंस था कि चूत ने जोर से सिकुड़ी, स्क्विर्ट की लंबी बौछारें निकलीं, “आअह्ह्ह… पापााा… ह्ह्ह… इह्ह…”, क्लिट इतनी संवेदनशील हो गई कि छूने से भी झुरझुरी आ जाती, पैर सुन्न हो गए, शरीर कई मिनटों तक कांपता रहा।
थककर मैं बेड पर लेट गई, शरीर पसीने और रस से तरबतर, सांसें अभी भी तेज, कमरे में मेरी हवस की गंध फैली हुई। तकिए पूरी तरह गीले हो चुके थे, बेडशीट पर दाग लग गए थे। वीडियो अभी भी लूप पर चल रहा था, पापा की सिसकारियां सुनकर फिर से हल्की सी उत्तेजना हो रही थी। बाहर बारिश तेज हो गई थी, खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी जो मेरी नंगी त्वचा को छू रही थी। मम्मी अभी तक नहीं आई थीं। घर में सिर्फ मेरी तेज सांसें और पापा की रिकॉर्डेड सिसकारियां गूंज रही थीं।
मैंने आंखें बंद कीं और मुस्कुराई, ये गलत है लेकिन कितना मजा आया, पापा का वो मोटा, लंबा, नसदार लंड, शायद एक दिन सच में चखूं।