Chubby bhabhi fuck sex story: मुझे शादीशुदा औरतें हमेशा से ही बहुत पसंद रही हैं, खासकर वो जो मोटी-मोटी हों, जिनके शरीर में वो भराव हो जो छूने पर हाथ डूब जाए। बड़े-बड़े बूब्स, कमर की नरम-नरम तहें, और वो गोल-मटोल गांड जो चलते वक्त हिलती-डुलती हो, बस देखते ही मन ललचा जाता है और लंड में हलचल मच जाती है। ये सब सोचकर ही रातों में नींद नहीं आती थी, हाथ खुद-ब-खुद लंड पर चला जाता और कल्पनाओं में डूब जाता। और ऐसी ही एक औरत है मेरी मौसी की बड़ी बहू, रजनी। रजनी भाभी की उम्र करीब 43 साल है, लेकिन वो दिखतीं हैं एकदम 30-32 की, जैसे समय ने उन्हें छुआ ही न हो। उनका शरीर ऐसा है कि बस नजर पड़ जाए तो हटती नहीं, भारी भरकम बूब्स जो ब्रा में कसकर बंधे रहते हैं और चलते वक्त थिरकते हैं, कमर में वो मोटी चर्बी जो पकड़ने पर मुट्ठी में आ जाती है और दबाने पर गर्माहट फैलाती है, और गांड इतनी मुलायम और बड़ी कि लगता है जैसे कोई नरम तकिया हो, छूने पर उंगलियां गहराई में उतरती चली जाएं। उनके दो बच्चे हैं, दोनों स्कूल जाते हैं, और भैया प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं, दिनभर बाहर रहते हैं जिससे भाभी घर में अकेली रहती हैं। मौसी का घर हमारे घर के ठीक बगल में है, इसलिए मैं वहाँ अक्सर आता-जाता रहता था, कभी मौसी से मिलने के बहाने, कभी बच्चों से खेलने के नाम पर। मौसी को घुटनों की प्रॉब्लम है, वो ऊपर के फ्लोर पर नहीं चढ़ पातीं, जो मेरे लिए एक तरह से फायदेमंद साबित हुआ क्योंकि ऊपर भाभी का डोमेन था जहां कोई डिस्टर्ब नहीं करता।
ये सब दो साल पहले की बात है। न्यू ईयर का दिन था, बाहर ठंडी हवा चल रही थी, घरों में पार्टी का माहौल था और लोग एक-दूसरे को विश कर रहे थे। मैं मौसी को विश करने के लिए उनके घर गया, दिल में थोड़ी उत्सुकता थी क्योंकि जानता था भाभी भी ऊपर होंगी। मौसी नीचे बैठी थीं, मैंने उन्हें गले लगाकर न्यू ईयर विश किया, वो खुश हुईं, थोड़ी बात की, चाय पिलाई और फिर मैंने कहा कि ऊपर भाभी को भी विश कर आऊँ। मौसी ने हँसकर कहा, “जा बेटा, वो ऊपर कपड़े इस्त्री कर रही है, उसे भी खुश कर दे।” मैं सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा, दिल थोड़ा तेज धड़क रहा था। भाभी किचन के बगल वाले कमरे में इस्त्री कर रही थीं, उन्होंने पीला सूट पहना था जो उनके शरीर पर चिपका हुआ था, सूट की सलवार थोड़ी टाइट थी जिससे उनकी गोरी-गोरी जांघें और कमर की मोटी लकीरें साफ झलक रही थीं, पसीने की वजह से सूट थोड़ा पारदर्शी हो गया था और ब्रा की स्ट्रैप्स हल्की दिख रही थीं। मैंने दरवाजे से ही कहा, “भाभी, न्यू ईयर मुबारक हो!” वो मुस्कुराईं, इस्त्री बोर्ड से सर उठाकर बोलीं, “तुम्हें भी प्रतीक, आओ अंदर आओ, बैठो।”
मैं अंदर गया, कमरे में इस्त्री की गर्मी से हल्की भाप थी, और भाभी के शरीर से आती पसीने की हल्की महक कमरे में फैली हुई थी। मैंने मजाक में कहा, “भाभी, पंजाबियों में तो किसी चीज को ऐसे विश नहीं करते, गले लगाकर करते हैं न?” भाभी की आँखों में एक पल के लिए चमक आई, जैसे वो मेरे मजाक को चुनौती मान रही हों, उनकी सांस थोड़ी तेज हुई। वो धीरे से मेरे पास सरक आईं, और बिना कुछ कहे मुझे जोर से गले लगा लिया। उफ्फ, क्या स्पर्श था वो, उनके भारी बूब्स मेरी छाती से पूरी तरह सट गए, इतने नरम और गर्म कि लग रहा था जैसे कोई गद्देदार तकिया दबा हो, उनकी छाती की ऊंचाई-नीचाई मेरी सांसों के साथ मिल रही थी। मैंने सांस ली, उनकी गर्दन से आती वो मीठी खुशबू, परफ्यूम की हल्की महक मिली हुई पसीने की नमकीन गंध से, सीधे मेरे दिमाग में चढ़ गई और शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई। मेरा दिल धक-धक करने लगा, जैसे कोई ड्रम बज रहा हो, लंड पैंट में तनकर खड़ा होने लगा और हल्का दर्द करने लगा। मैं दो मिनट तक सन्न खड़ा रहा, उनके शरीर की गर्मी मेरे पूरे बदन में फैल रही थी। भाभी ने मेरे कान के पास फुसफुसाया, “क्या हुआ प्रतीक, इतना चुप क्यों हो गए?” उनकी गर्म सांस मेरे कान को छू रही थी, जिससे शरीर में करंट दौड़ गया, कान गर्म हो गया।
मैंने हकलाते हुए कहा, “भाभी, मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़क रहा है, महसूस करके देखो।” वो हँस पड़ीं, लेकिन गले नहीं छोड़ा, बल्कि उनका हाथ मेरी छाती पर सरक गया और उन्होंने दबाकर महसूस किया। “हाँ रे, सच में बहुत तेज धड़क रहा है, लगता है तू डर गया मेरे गले लगने से।” मैंने मौका देखकर पूछा, “भाभी, क्या मैं आपको दोबारा गले लगा सकता हूँ? बस एक बार और, प्लीज।” वो चुप रहीं, लेकिन फिर से मुझे जकड़ लिया, इस बार थोड़ा ज्यादा जोर से। मैंने भी हिम्मत की, उनकी कमर से पकड़कर जोर से दबाया, उनकी मोटी कमर की चर्बी मेरी उंगलियों में दब गई, इतनी मुलायम कि लग रहा था मक्खन हो, गर्माहट सीधे मेरे लंड तक पहुँच रही थी। मेरा खड़ा लंड अब उनकी गांड के बीच में दब रहा था, और मुझे लगा भाभी को भी महसूस हो रहा है क्योंकि उनकी सांसें और तेज हो गईं, उनकी गांड हल्की सी हिली जैसे वो दबाव महसूस कर रही हों। वो थोड़ी देर ऐसे ही रहीं, उनकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, गर्म सांसें मेरी गर्दन पर लग रही थीं, और फिर धीरे से बोलीं, “बस अब छोड़ दे प्रतीक, नहीं तो मौसी नीचे से पुकार लेंगी, और क्या पता क्या सोचें।” मैंने अनमने मन से छोड़ा, लेकिन मन में आग लग चुकी थी, शरीर में एक अजीब सी जलन थी।
उस दिन के बाद मैं उनके घर जाने का कोई मौका नहीं छोड़ता। हर दो-तीन दिन में चला जाता, कभी बहाना मौसी से मिलने का, कभी बच्चों से खेलने का, लेकिन असल में भाभी से मिलने और उस स्पर्श को फिर महसूस करने। हर बार मिलते ही गले लगना जरूरी हो गया, और हर बार वो गले लगाना थोड़ा लंबा होता जाता। एक बार मैं गया तो भाभी बच्चों को पढ़ा रही थीं, मैंने गले लगाया, और इस बार थोड़ा ज्यादा समय तक पकड़े रखा, मेरे हाथ उनकी कमर पर सरक गए, चर्बी दबाई, भाभी ने हल्के से मेरी कमर पर हाथ फेरा, और फुसफुसाया, “प्रतीक, बच्चे देख रहे हैं, शरारत मत कर।” लेकिन उनकी आँखों में वो शरारत थी, जैसे वो खुद भी इंजॉय कर रही हों। मैं मन ही मन सोचता, ये भाभी कितनी भूखी लगती हैं, भैया शायद ध्यान नहीं देते, उनके शरीर की गर्मी बताती है कि अंदर आग सुलग रही है। रातों में मैं उनके बारे में सोचकर मुठ मारता, कल्पना करता कि उनकी मोटी कमर पकड़कर कैसे दबाऊँगा, उनके बूब्स कैसे चूसूँगा, उनकी चूत की गंध कैसी होगी, और लंड उनकी गांड में कैसे घुसेगा। ये कल्पनाएं मुझे पागल कर देतीं, और अगले दिन फिर उनके घर जाने का मन करता।
फिर एक दिन दोपहर में भाभी का फोन आया, आवाज में थोड़ी नरमी थी। “प्रतीक, बच्चों का होमवर्क निकालकर ला दे, मैंने फोन पर लिखवा दिया है, जल्दी आ जा।” मैं खुश हो गया, दोपहर 12 बजे का समय था, भैया ऑफिस में, बच्चे स्कूल में, मौसी नीचे, मौका परफेक्ट था। मैं होमवर्क लेकर पहुँचा, मौसी नीचे टीवी देख रही थीं, मैंने नमस्ते किया, हाल-चाल पूछा, वो बोलीं, “भाभी ऊपर है, जा ऊपर ही दे दे, मैं नहीं चढ़ सकती।” मैं सीढ़ियाँ चढ़ा, दिल तेज धड़क रहा था, जैसे कुछ होने वाला हो। ऊपर पहुँचा तो भाभी किचन में चाय बना रही थीं, वही पीला सूट, लेकिन अब पसीने से थोड़ा गीला, जिससे उनकी ब्रा की आउटलाइन साफ दिख रही थी, कमर की चर्बी सूट के नीचे लहरा रही थी, और वो झुककर चाय की केतली देख रही थीं, उनकी गांड बाहर की तरफ उभरी हुई थी। कमरे में चाय की खुशबू फैली थी, मिली हुई भाभी के शरीर की महक से। मैंने होमवर्क टेबल पर रखा, और सीधा किचन में जाकर उन्हें पीछे से गले लगा लिया, मेरे हाथ उनकी मोटी कमर पर कस गए, लंड सीधे उनकी गांड के बीच दब गया, गांड की मुलायम गर्मी लंड पर लगी। भाभी ने हल्के से सिसकी ली, लेकिन हटी नहीं, बल्कि थोड़ा पीछे सरक आईं जैसे दबाव बढ़ा रही हों। “क्या कर रहे हो प्रतीक? मौसी नीचे हैं,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, लेकिन उनकी आवाज में वो कराह थी, सांसें गर्म और तेज।
मैंने उनके कान के पास मुंह ले जाकर कहा, “भाभी, बस गले मिल रहा हूँ, आपकी खुशबू कितनी अच्छी है, सूंघने दो न।” मैंने गर्दन सूंघी, हल्की नमकीन महक, फिर धीरे से कान के लोब को होंठों से छुआ, जीभ निकालकर हल्का सा चाटा, नमकीन स्वाद मेरे मुँह में घुल गया, भाभी काँप उठीं, उनकी सांसें तेज हो गईं, शरीर में एक कंपन आया। मेरे हाथ पेट पर घूमने लगे, नाभि के आसपास चक्कर काटे, उंगली नाभि में डाली, घुमाई, तो वो ‘उफ्फ’ करके सिसक पड़ीं, उनकी जांघें आपस में रगड़ने लगीं जैसे चूत में खुजली हो। “प्रतीक, क्या कर रहा है रे? चाय जल जाएगी,” उन्होंने कहा, लेकिन स्टोव बंद नहीं किया, बल्कि हाथ मेरे हाथ पर रखकर दबाने लगीं। मैंने पूछा, “भाभी, क्या मैं आपकी पूरी बॉडी छू सकता हूँ? बस एक बार, आपकी कमर इतनी नरम है, सहलाने दो।” वो चुप रहीं, लेकिन उनके हाथ मेरे हाथों पर आ गए, और दबाने लगीं, जैसे हाँ कह रही हों। मैंने उन्हें दीवार की तरफ घुमाया, गालों पर किस किया, गाल गर्म और नरम थे, फिर होंठों पर होंठ रख दिए, जीभ अंदर डाली, वो मेरी जीभ को चूसने लगीं, जैसे भूखी हों, उनके मुँह का स्वाद मीठा-नमकीन था, सांसों की गर्मी मिल रही थी। एक हाथ से मैंने उनके बूब्स दबाए, ब्रा के ऊपर से निप्पल सख्त महसूस हुए, दबाने पर भाभी की सिसकी निकली।
भाभी ने सिसकते हुए कहा, “नहीं प्रतीक… कोई आ जाएगा… उफ्फ, मत कर रे… लेकिन कितना अच्छा लग रहा है, तेरे हाथों की गर्मी।” उनकी आवाज काँप रही थी, लेकिन शरीर मेरे और करीब सरक रहा था, जांघें मेरी जांघों से रगड़ रही थीं। मैंने कहा, “भाभी, बस थोड़ी देर… आपकी ये मोटी चूत मेरे लंड को पागल कर रही है, महसूस करो कितना खड़ा है, दब रहा है तुम्हारी गांड पर।” वो चुप हो गईं, लेकिन उनकी जांघें आपस में रगड़ने लगीं, चूत से गर्माहट महसूस हो रही थी। मैंने सूट के अंदर हाथ डाला, कमर की गर्म चर्बी सहलाई, त्वचा इतनी नरम कि उंगलियाँ डूब रही थीं, पसीने से चिपचिपी, फिर नीचे सरकाकर पेंटी के ऊपर से चूत रगड़ी, गीली महसूस हुई। भाभी की सिसकियां बढ़ गईं, “प्रतीक… उंगली मत डाल वहाँ… उफ्फ, लेकिन कर रे, थोड़ा और।” मैंने सूट ऊपर सरकाया, काली ब्रा में उनके भारी बूब्स बाहर उभरे हुए थे, ब्रा ऊपर खिसकाई, निप्पल गुलाबी और सख्त, मैं पागलों की तरह एक को चूसने लगा, जीभ से चक्कर काटा, हल्का काटा, स्वाद मीठा-नमकीन, दूसरे को मसलने लगा, भाभी मेरे सिर पर हाथ फेर रही थीं, “आह्ह… प्रतीक… और जोर से चूस… मेरे बूब्स दबा रे… उफ्फ, कितने सालों बाद ऐसा मजा मिल रहा है, भैया तो छूते भी नहीं अब।”
मैंने और समय लिया, बूब्स चूसते हुए उनके पेट पर किस किया, नाभि चाटी, नीचे सरककर जांघों पर हाथ फेरा, गोरी जांघें गर्म थीं, पसीने से चमक रही थीं। भाभी की सांसें तेज, “प्रतीक… नीचे मत जा… लेकिन जा रे, चाट मेरी जांघें।” मैंने सलवार का नाड़ा खींचा, एक झटके में खुल गया, सलवार नीचे सरक गई, लाल पेंटी गीली हो चुकी थी, चूत का शेप साफ दिख रहा था, महक फैल रही थी मुस्की और गीलेपन की। मैंने उन्हें उठाकर बेडरूम में ले गया, गेट लॉक किया, बेड पर लिटाया, सूट पूरी तरह ऊपर कर दिया। फिर बूब्स पर टूट पड़ा, चूसता रहा, मसलता रहा, एक हाथ पेंटी के अंदर डाला, मुलायम कूल्हे सहलाए, उंगली चूत के ऊपर रगड़ी, गीली और गर्म, क्लिट पर दबाया, भाभी कराह रही थीं, “प्रतीक… उंगली अंदर डाल… मेरी चूत गीली कर दे रे… आह्ह, कितनी खुजली हो रही है।” मैंने पेंटी नीचे सरकाई, चूत बिना बालों वाली, गुलाबी, चमक रही थी गीलापन से, मैंने उंगली अंदर डाली, घुमाई, गीला स्वाद चखा। भाभी की जांघें काँप रही थीं, “और… और गहरा डाल रे…”
मैंने जल्दी से अपनी पैंट और अंडरवियर उतारी, मेरा लंड तनकर बाहर आ गया, भाभी ने उठकर उसे पकड़ा, “उफ्फ, कितना मोटा और लंबा है तेरा लंड प्रतीक… भैया का तो आधा भी नहीं, चूसने दे मुझे।” और मुंह में ले लिया, उनकी गर्म जीभ लंड के सुपाड़े पर घूम रही थी, चूस रही थीं जैसे कोई आइसक्रीम हो, स्वाद लेते हुए, मैं जन्नत में पहुँच गया, उनके बूब्स दबाता रहा, निप्पल काटता रहा, लंड पर उनकी लार टपक रही थी। फिर भाभी ने मुझे बेड पर धकेला, खुद ऊपर चढ़ गईं, उनकी चूत मेरे मुंह के ठीक ऊपर, गीली और गर्म, मैंने जीभ डाली, चाटना शुरू किया, क्लिट पर चूसा, जीभ अंदर-बाहर की, स्वाद नमकीन-मीठा, बीच-बीच में गांड के गुलाबी छेद पर उंगली फेरी, हल्का अंदर डाला, भाभी चिल्लाईं, “आह्ह… प्रतीक… वहाँ मत डाल रे… उफ्फ, लेकिन कितना मजा आ रहा है… और कर… मेरी गांड सहला रे, उंगली घुमा।” उनकी गांड हिल रही थी, चूत से पानी टपक रहा था मेरे मुंह में, सिसकियां कमरे में गूँज रही थीं।
थोड़ी देर ऐसे ही चला, मैंने उनके कूल्हे पकड़े, गांड चाटी, छेद पर जीभ फेरी, भाभी पागल हो गईं, “प्रतीक… चाट मेरी गांड… उफ्फ, कितनी गंदी बात है लेकिन मजा आ रहा है।” फिर मैंने उन्हें नीचे लिटाया, उनकी टांगें अपने कंधों पर रखीं, लंड गांड के छेद पर सेट किया, हल्का धक्का दिया, सुपाड़ा अंदर चला गया, भाभी चिल्लाईं, “आह्ह… दर्द हो रहा है रे… निकाल… उफ्फ।” मैं रुका, उनके बूब्स दबाए, निप्पल चूसे, होंठ चूमे, दर्द कम होने पर फिर धक्का मारा, पूरा लंड अंदर घुस गया, वो फिर चिल्लाईं, आँखों में आंसू आ गए, गांड टाइट थी, गर्म और चिपचिपी। मैंने उनके होंठ चूमे, जीभ चूसकर शांत किया, धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा। अब दर्द कम हो गया, भाभी की गांड ढीली पड़ने लगी, मजा आने लगा। मैं साथ में चूत में उंगली डालकर घुमाता रहा, क्लिट रगड़ता रहा। भाभी कराहने लगीं, “प्रतीक… अब मजा आ रहा है… और जोर से चोद मेरी गांड को… फाड़ दे रे… तेरे मोटे लंड से मेरी गांड टाइट हो गई है, लेकिन कितनी गर्मी है।” मैंने स्पीड बढ़ाई, जोरदार धक्के मारे, कमरा थप-थप की आवाज से गूँज रहा था, गांड की गर्मी लंड पर लपेट रही थी। उनकी चूत से पानी निकलने लगा, वो बोलीं, “मैं गई रे… आह्ह्ह… प्रतीक मैं झड़ रही हूँ… उफ्फ।” उनकी गांड कस गई, लेकिन मैं रुका नहीं, पांच मिनट और धक्के मारे, फिर मैंने कहा, “भाभी, मेरा निकलने वाला है… कहाँ डालूँ?” वो कराहते हुए बोलीं, “अंदर ही डाल दे रे… अपनी सारी मलाई मेरी गांड में भर दे… उफ्फ, गर्म-गर्म महसूस करूँगी, तेरी भाभी की गांड तेरे लिए है।” मैंने आखिरी जोरदार धक्के मारे और सारा वीर्य उनकी गांड में छोड़ दिया, गर्म-गर्म बहता हुआ महसूस हुआ, हम दोनों थककर लेट गए, सांसें तेज चल रही थीं।
थोड़ी देर सांसें सामान्य हुईं, हमने खुद को साफ किया, भाभी मुस्कुराईं, “प्रतीक, ये मेरा पहला ऐसा अनुभव था… भैया कभी गांड नहीं मारते, कितना दर्द था लेकिन मजा भी आया।” मैं फिर तैयार हो गया, लंड फिर तन गया, इस बार मैंने लंड उनकी चूत पर रगड़ा, गीली थी पूरी, महक फैल रही थी। धीरे से अंदर घुसाया, “उफ्फ भाभी, कितनी गर्म और टाइट है आपकी चूत,” मैंने कहा। वो बोलीं, “चोद रे जोर से… मेरी चूत फाड़ दे… सालों की भूख है रे, तेरे लंड से भर दे।” मैंने जमकर धक्के मारे, बूब्स चूसते हुए, चूत की दीवारें लंड पर कस रही थीं, गीलापन चप-चप की आवाज पैदा कर रहा था। वो बार-बार झड़ रही थीं, “और… और जोर से… चोद मुझे प्रतीक… तेरी भाभी हूँ मैं, लेकिन अब तेरी रंडी बन गई, रोज चोदना मुझे।” दूसरी बार मैं उनकी चूत में झड़ा, वीर्य अंदर बहा, हम दोनों पसीने से तर हो गए।
उसके बाद हमने चाय पी, बातें की, भाभी ने कहा, “प्रतीक, ये राज सिर्फ हमारा रहेगा, मौसी को पता नहीं चलना चाहिए।” मैं घर आ गया, लेकिन अब जब भी मौका मिलता है, बच्चे स्कूल में, भैया बाहर, मैं चला जाता हूँ। मौसी नीचे, हम ऊपर छिपकर मजे लेते हैं, हर बार नया मजा आता है, नई पोजिशन, नई बातें, वो राज हमारा है और हमारी भूख कभी नहीं मिटती।