Maa beta chudai sex story – Mother son incest hindi sex story: मेरा नाम कंचन यादव है। उम्र ठीक 36 साल। वड़ोदरा की एक नामी सोसाइटी में रहती हूँ अपने पति अतुल और 18 साल के बेटे हिमांशु के साथ। मैं पूरा दिन घर संभालती हूँ, हाउसवाइफ। अतुल टूरिस्ट डिपार्टमेंट में हैं, 40 के करीब। हिमांशु 11वीं में पढ़ता है। ये कहानी उस दिन की है जब मेरी ममता धीरे-धीरे चुदाई की भूख में बदल गई।
हमारे घर में रिश्ते बहुत खुले थे। अतुल और हिमांशु बाप-बेटे कम, दोस्त ज्यादा लगते थे। सुबह-शाम साथ वॉक पर जाते, मोहल्ले की लड़कियों की बातें करते। अतुल तो इतने खुले विचारों वाले थे कि अपनी कजिन की गांड-चूचियों की बातें भी हिमांशु से शेयर कर देते। मैं सुनकर हंसती रहती, लेकिन अंदर ही अंदर कुछ गुदगुदी होती थी।
एक दिन अतुल ने मुझे अलग कमरे में बुलाकर कहा, “कंचन, कई दिनों से देख रहा हूँ। जब तुम किचन में झुकती हो तो हिमांशु तुम्हारी गांड और चूचियों को ऐसे देखता है जैसे कोई भूखा शेर मांस देख रहा हो।” मैं गुस्से से कांप उठी। “ये क्या बकवास है? वो मेरा बेटा है!” लेकिन अतुल ने समझाया, “जवानी है उसकी। नई-नई उम्र है। ऐसी नजरें आना नॉर्मल है। तुम उसे कुछ मत कहना, मैं खुद संभाल लूंगा।”
कुछ दिन बाद हम शिमला घूमने गए। वहाँ भी हिमांशु की नजरें होटल की लड़कियों पर टिकी रहतीं। उनकी टाइट टॉप्स में उभरी चूचियां, छोटी स्कर्ट में झांकती गांड—वो सब देखकर उसकी आंखें चमक उठतीं। अतुल ने मुझे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “देखा? सिर्फ तुम्हें ही नहीं, हर अच्छी बॉडी वाली औरत को वैसे ही देखता है।”
घर लौटकर बातें और खुल गईं। अब बाप-बेटे चूत-लंड की बातें बिना झिझक किए करते। मैंने अतुल को कई बार डांटा, “तुम इसे सिर चढ़ा रहे हो। कल को कोई गड़बड़ हुई तो?” वो हंसते हुए बोले, “डियर, बेटा बड़ा हो रहा है। अगर मैं पिता बनकर पूछूंगा तो कुछ नहीं बोलेगा। दोस्त बनकर सब बाहर निकाल रहा हूँ।”
एक दिन सफाई करते हुए मुझे एक कागज मिला। उसमें अतुल के सवाल और हिमांशु के जवाब लिखे थे। अतुल: तुम्हें माँ अच्छी लगती है? हिमांशु: बहुत ज्यादा। अतुल: शरीर का कौन सा हिस्सा? हिमांशु: माँ की मोटी गांड और भारी चूचियां। अतुल: अकेले में माँ के साथ रहना चाहोगे? हिमांशु: हाँ, पति बनकर उसकी देखभाल करूंगा। अतुल: अगर माँ मना कर दे? हिमांशु: तो भी चोदूंगा। प्यार से नहीं तो जबरदस्ती। मुझे तो बस अपनी चूत में अपना गरम लावा भरना है।
ये पढ़कर मेरे बदन में आग लग गई। गुस्सा भी था, लेकिन अजीब सी सिहरन भी। शाम को मैंने दोनों को जमकर डांटा। “आगे से मेरे सामने ऐसी कोई बात नहीं!” दोनों चुप हो गए, लेकिन मैं जानती थी—अंदर से वो जल रहे थे।
कुछ दिन बाद अतुल ने सुझाव दिया, “हिमांशु को हमारे साथ ही सुलाओ। अलग कमरे में अकेला छोड़ोगी तो कोई गलत हरकत कर बैठेगा।” मुझे अजीब लगा, लेकिन सोचा—ठीक है, माँ हूँ ना, संभाल लूंगी। पहली रात हिमांशु हमारे बिस्तर पर सोया। आधी रात उसे नींद नहीं आई। वो चुपके से उठकर अपने कमरे में चला गया।
हम दोनों जागे। कमरे में गए तो देखा—हिमांशु आंखें बंद किए मेरा नाम लेकर मुठ मार रहा था। “आह्ह कंचन… आई लव यू… अपनी चूत में मेरा लंड ले ले… चोदने दे मुझे…” उसका 5 इंच का लंड तना हुआ, लाल-लाल, सिरे से चमकता हुआ प्रीकम निकल रहा था। वो जोर से झड़ गया—ढेर सारा सफेद माल फर्श पर गिरा। इतना माल मैंने अतुल का भी कभी नहीं देखा था।
मैं चुपचाप दरवाजे पर खड़ी रही। मेरी सांसें तेज हो गईं। मैंने देखा कि मेरी एक उंगली अनजाने में अपनी साड़ी के नीचे सरक गई थी। चूत पर हल्का दबाव दिया तो गीलापन महसूस हुआ। मैं सोच रही थी—“ये मेरा बेटा है… लेकिन ये लंड… इतना गरम, इतना भूखा… क्या मैं सच में चाहती हूँ इसे?”
उस रात से मेरा मन बदलने लगा। जब अतुल से सेक्स होता, मन हिमांशु की तरफ भागता। उसका चेहरा, उसका तना लंड—सब दिमाग में घूमता।
फिर वो दिन आया। अतुल दो दिन के लिए बाहर गए। स्कूल बंद था। सुबह हिमांशु बाथरूम में नहा रहा था। आवाज आई, “माँ, साबुन खत्म हो गया।” मैंने साबुन लेकर दरवाजा खोला। उसी पल पैर फिसले। हम दोनों शावर के नीचे गिर पड़े।
मेरी साड़ी, ब्लाउज सब भीगकर शरीर से चिपक गए। मेरी भारी चूचियां साफ उभर आईं। निप्पल सख्त होकर कपड़े से बाहर झांक रहे थे। हिमांशु मेरे ऊपर था। उसकी सांसें मेरे गालों पर पड़ रही थीं। उसकी आंखें मेरी चूचियों पर टिक गईं। कुछ पल हम ऐसे ही रहे—गरम पानी हम दोनों पर बरस रहा था, बदन आपस में सटे हुए।
उसने धीरे से पूछा, “माँ… चोट तो नहीं लगी?” उसका हाथ मेरी कमर पर था। गीले बदन पर उसकी उंगलियां इतनी गरम लग रही थीं कि मेरी चूत में खुजली शुरू हो गई।
मैंने फैसला कर लिया। धीरे-धीरे साड़ी खोली। ब्लाउज के बटन खोले। पेटीकोट उतारा। सब कुछ फर्श पर गिरा। मैं पूरी नंगी उसके सामने खड़ी थी। मेरी चूचियां भारी, निप्पल सख्त। चूत के बाल गीले होकर चिपके हुए।
हिमांशु की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका लंड एक झटके में खड़ा हो गया—लाल, मोटा, धड़कता हुआ। वो बोला, “माँ… ये क्या कर रही हो? तेरी ये बॉडी… मैं पागल हो जाऊंगा।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “कपड़े भीग गए ना। सोचा नहा लूँ। तू मेरा बेटा है, मुझसे क्या शरमाना? बचपन में तो रोज मेरे स्तन पीता था। आज तू बड़ा हो गया… लेकिन मेरी चूत वही है… बस अब थोड़ी ज्यादा गीली हो गई है।”
उसने साबुन लिया। मेरी पीठ पर लगाना शुरू किया। उसकी हथेलियां फिसलती हुई मेरी रीढ़ पर सरक रही थीं। गरम पानी की धार, साबुन की झाग, उसकी उंगलियां—सब मिलकर मेरे बदन में आग लगा रहे थे। वो मेरी कमर से ऊपर चढ़ा। चूचियों के नीचे से हाथ गुजारा। हल्के से दबाया। मैं सिहर गई। “आह्ह… हिमांशु…”
मैंने पलटकर कहा, “आगे भी लगा… पूरी तरह साफ कर दे।” वो मेरी चूचियों पर साबुन मलने लगा। उंगलियां निप्पलों के चारों ओर घूम रही थीं। हल्के से चुटकी काटता, फिर छोड़ देता। मेरी सांसें तेज। मैंने उसकी गर्दन पकड़ी, होंठ उसके होंठों पर रख दिए। पहला चुंबन—गहरा, गरम। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। मुंह में लार मिल रही थी।
फिर मैंने उसका लंड पकड़ा। गरम, सख्त, धड़कता हुआ। मैंने धीरे-धीरे हिलाया। सिरे से प्रीकम निकल रहा था। मैंने जीभ से चाटा—नमकीन, मादक। फिर पूरा मुंह में ले लिया। जीभ से सिरे पर घुमाया। वो मेरे बालों में उंगलियां फेरते हुए कराहा, “माँ… आह्ह… तेरी जीभ… कितनी गरम है… चूस… और जोर से…”
मैं घुटनों पर बैठ गई। लंबे समय तक चूसा। कभी तेज, कभी धीरे। एक हाथ से उसके अंडे दबाए। वो थरथरा रहा था। मैंने उसे दीवार से सटाया। मुंह में लंड लेकर जोर-जोर से चूसा। वो मेरे सिर को पकड़कर धक्के देने लगा। मेरी सांसें रुकने लगीं। मैंने इशारा किया—रुक। लेकिन वो पागल हो चुका था। अचानक जोर से झड़ गया। पूरा गरम वीर्य मेरे गले में उतर गया। मैं खांसने लगी।
वो घबरा गया। “माँ… माफ कर दो… मैं जानबूझकर नहीं किया…”
मैंने थोड़ा रुककर कहा, “आज तो मार ही डालते मुझे। इतना वहशीपन भी नहीं होता।” फिर उदास होकर बोली, “एक शर्त पर माफ करूंगी।”
“क्या माँ?”
“बिस्तर पर मेरे साथ पूरा सेक्स करेगा… तब माफ करूंगी।”
उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। उसने मुझे गोद में उठाया। बेडरूम में ले जाकर बिस्तर पर पटका। खुद ऊपर चढ़ गया।
अब असली खेल शुरू हुआ। उसने मेरे माथे पर चुंबन किया। फिर आंखों पर, नाक पर, गालों पर। गर्दन को चाटा, हल्के से काटा। मैं सिहर रही थी। उसने मेरी चूचियां दोनों हाथों से पकड़ीं। दबाईं। निप्पल को जीभ से घुमाया। मैं कराह रही थी। “हिमांशु… आह्ह… और जोर से चूस… माँ की चूचियां तेरे लिए ही हैं आज…”
उसने एक चूची मुंह में ली। जोर से चूसी। दांतों से हल्का काटा। दूसरी को उंगलियों से मसला। मैं तड़प रही थी। फिर उसने मेरी पेटली पर जीभ फेरी। नाभि में जीभ डाली। मैंने कमर उठाई। वो नीचे सरका। मेरी टांगें फैलाईं। मेरी चूत पहले से टपक रही थी। उसने पहले उंगलियों से बाहर-भीतर किया। फिर जीभ रखी। क्लिटोरिस पर जीभ घुमाई। मैं चीख पड़ी। “आह्ह… हिमांशु… बस… अब डाल दे…”
वो मुस्कुराया। “अभी नहीं माँ… पहले तुझे पूरा तड़पाऊंगा।” उसने जीभ अंदर डाली। चाटा। चूसा। मेरा रस उसके मुंह में। वो पी रहा था। मैं उसकी पीठ पर नाखून गाड़ रही थी। खून निकल आया।
फिर वो ऊपर आया। अपना गरम लंड मेरी चूत पर रखा। हल्का झटका—आधा अंदर। मैंने आह भरी। वो रुका। धीरे-धीरे हिलाया। मैं कगार पर थी। फिर पीछे हट गया। मैं तड़पी। “डाल ना… चोद मुझे…”
दूसरा झटका। पूरा लंड मेरी चूत में। वो पागलों की तरह धक्के मारने लगा। हमारी सांसें मिल रही थीं। पसीने की गंध। चिपचिपी आवाजें। मैंने उसकी पीठ पर नाखून गाड़े। वो दर्द से कराहा, लेकिन रुका नहीं।
मैं कई बार कगार पर पहुंची। वो रुक जाता। आखिर हम एक साथ झड़ गए। उसका गरम वीर्य मेरी चूत में भरता हुआ। जैसे आग बुझ रही हो।
वो मेरे ऊपर गिर पड़ा। हम दोनों हांफ रहे थे। काफी देर लिपटे रहे। फिर दोबारा नहाए। उस दिन मैंने अपने बेटे के लंड का पूरा मजा लिया।
और ये सिर्फ शुरुआत थी…