गांव की कमसिन लड़की को पटा कर पेला

Kamsin ladki ki chudai sex story – Village virgin girl sex story: उत्तर प्रदेश के एक छोटे से धूल भरे गांव में मानसून की बारिशें सब कुछ हरा-भरा कर देती हैं, लेकिन दिलों में आग भी लगा देती हैं। मैं, तनवीर, शहर से अपनी चचेरी बहन की शादी में आया था। शादी का माहौल पूरे गांव को एक महीने के उत्सव में डुबोए हुए था। हमारा संयुक्त परिवार बड़ा था, सब एक ही पुरानी हवेली में रहते, जहां दीवारें पतली और राज़ छुपाना मुश्किल।

वहां मेरी नजर पड़ी चाचा की अठारह साल की बेटी प्रिया पर। कमसिन, गोरी-चिट्टी, बड़ी-बड़ी मासूम आंखें जो शरारत छुपाती थीं, पतली कमर जो सलवार में लहराती, और कच्चे आम जैसे चुचे जो कुर्ती से बाहर झांकने को बेताब लगते। वो घर के कामों में लगी रहती, सुबह झाड़ू लगाती, रसोई में आटा गूंथती, शाम को आंगन में हंसती-खेलती। उसकी वो मुस्कान, वो चुपके से नजरें मिलाना, मन में आग लगा देता। मैं सोचता, ये कमसिन कितनी मादक है, चूत कितनी टाइट होगी, सोचकर ही लंड खड़ा हो जाता।

शादी की तैयारियां जोरों पर थीं, मेहंदी, संगीत, हल्दी, हर रस्म में मस्ती। पहली रात बिजली गुल हो गई, जैसा गांव में अक्सर होता है। सब आंगन में मोमबत्ती जलाकर बैठे, पुरानी कहानियां सुना रहे थे। मैं जानबूझकर प्रिया के पास सरक गया, हमारे घुटने छू रहे थे, अंधेरे में उसकी गर्माहट महसूस हो रही थी। मैंने कान में फुसफुसाया, “प्रिया, तेरी आंखें तो शहर की लड़कियों को मात देती हैं, और तेरी कमर… उफ्फ, छूने का जी करता है।” वो शरमा कर बोली, सांसें तेज, “भैया, क्या कह रहे हो… चुप रहो ना, कोई सुन लेगा।” लेकिन उसकी उंगलियां मेरी हथेली पर कस गईं, जैसे छोड़ना नहीं चाहतीं।

अगली सुबह मेहंदी लगाते वक्त मैं उसके पास बैठा, उसके हाथ पर रंग लगाने के बहाने उंगलियां फेरता रहा। “तेरे हाथ मखमल जैसे नरम हैं, प्रिया… चूमने का मन करता है।” वो लज्जा से लाल हो गई, लेकिन मुस्कुराई, “भैया, आप बहुत शरारती हो… लेकिन अच्छे लगते हो।” मन में सोचा, बस, पटना शुरू हो गया।

दिन बीतते गए, मैं हर मौके पर छेड़ता, रसोई में पीछे से कमर छूता, “ओय प्रिया, आज कितनी प्यारी लग रही है।” वो हंसती, लेकिन आंखों में चमक आ जाती, जैसे इंतजार कर रही हो।

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एक शाम हम छत पर थे, बादल घिर आए, बारिश की पहली बूंदें टपकने लगीं, हवा में मिट्टी की सोंधी महक फैल गई। सब नीचे भाग गए, लेकिन हम रुक गए। मैंने उसका हाथ पकड़ा, धीरे से दीवार से सटा दिया। उसकी सांसें तेज हो गईं, बारिश से कुर्ती चिपक गई, पतली फैब्रिक के नीचे निप्पल सख्त होकर उभर आए, मुझे ललचा रहे थे। मन में आग लगी, कमसिन साली की बॉडी कितनी गरम, चूत की हल्की मुस्क वाली महक अभी से नाक में चढ़ रही थी। मैंने उसके गाल पर होंठ रखे, गीली त्वचा का नमकीन स्वाद मुंह में घुल गया, वो कांप उठी। वो हिचकिचाई, “भैया, ये गलत है… हम रिश्तेदार हैं, चाचा जान लेंगे तो…” लेकिन मैंने उसके होंठ चूस लिए, जीभ अंदर सरका दी। उसकी जीभ पहले शर्म से पीछे हटी, फिर मेरी से उलझ गई, सांसें मिलकर आग बन गईं। वो मेरे गले लग गई, थरथराते हुए बोली, “भैया, नीचे अजीब सी गुदगुदी… गीला हो रहा है, जैसे कुछ पिघल रहा हो।” मैंने हाथ नीचे सरकाया, सलवार के ऊपर से चूत पर उंगलियां फेरीं, फैब्रिक चिपचिपा, गरम रस से भीगा। वो कमर अनजाने में उछाल रही थी। “देख प्रिया, तेरी चूत मेरे लिए बह रही है।” वो सिसकारी भरकर मेरी कमर पकड़ ली, “आह्ह… भैया, छोड़ो ना… लेकिन हटाओ मत, और दबाओ।”

होली का दिन आया, रंगों की मस्ती में सब डूबे थे। मैंने प्रिया को गन्ने के खेत में खींच लिया, जहां बारिश से कीचड़ था, कोई नहीं आता। रंग लगाते-लगाते मैंने उसके चुचों पर हाथ फेरा, कुर्ती गीली चिपक गई, निप्पल साफ उभरे। “प्रिया, तेरे ये कच्चे चुचे कितने टाइट, दबाने दे साली… सख्त हो गए हैं।” वो सांस फूलते बोली, “भैया, कोई आ जाएगा… मत करो ना, लेकिन… आह्ह!” मैंने कुर्ती ऊपर सरका दी, ब्रा खोलकर गुलाबी निप्पल मुंह में लिए, जोर से चूसा। वो कांप उठी, “आह्ह भैया… दर्द हो रहा लेकिन मजा… काटो ना, और चूसो मेरे चुचे, भैया की रंडी हूं मैं।” रंग लगाते उसका हाथ मेरे लंड पर लग गया, वो हंस पड़ी लेकिन रगड़ने लगी, “भैया, ये भी रंगीन हो गया… चूसकर साफ करूं?” मैंने लंड निकाला, उसने रंग चाटा, जीभ फेरी, “उफ्फ, नमकीन-मीठा स्वाद।” फिर मैंने दो उंगलियां उसकी चूत में डाली, अंदर-बाहर किया, वो झटके मारने लगी, “भैया… आह इह्ह ओह्ह… कुछ होने वाला… आअह्ह्ह!” झड़ गई, चूत से पानी की धार निकली, मेरे हाथ गीले हो गए।

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अगले दिन बारिश और तेज, दोपहर में सब सो रहे थे। मैंने इशारा किया, हम पुराने खंडहर बाड़े में चले गए, बारिश की आवाज सब कुछ छुपा रही थी। दरवाजा बंद किया, मैंने उसे दीवार से सटाया। “प्रिया, आज तुझे पूरा मजा दूंगा।” कुर्ती फाड़ दी, चुचे बाहर निकाले, जोर-जोर से दबाए, निप्पल काटे। वो रोई, “भैया… दर्द…” लेकिन मैं बोला, “दर्द में मजा है साली।” घुटनों पर बैठा, चूत पर मुंह लगाया, जीभ से चाटा, चूसा, उंगली से चोदा। वो पागल हो गई, “भैया… आह्ह… चूसो मेरी बुर… गंदी है लेकिन उफ्फ मजा… ह्ह्ह इह्ह!” महक मादक थी, नमकीन रस बह रहा था, दो बार झड़ी, पैर कांप रहे थे।

फिर मैंने जींस खोली, आठ इंच का मोटा लंड निकाला। वो डर गई, “भैया, इतना बड़ा… मेरी छोटी चूत फट जाएगी, दिल धड़क रहा है।” मन में उबाल, ये कुंवारी चूत फाड़ने का मजा अलग। उसे घुटनों पर बिठाया, सुपारा होंठों पर रगड़ा, उसकी गर्म सांसें लंड पर लगीं। मुंह में ठूंसा, वो अनाड़ी थी, पहले उबक आई, आंसू आए, लेकिन फिर चूसने लगी, “भैया… आपका लंड नमकीन-गरम… मुंह भर गया… ग्ग्ग्ग… गी.. गी.. गों..” बाल पकड़कर मुंह चोदा, स्लुर्प और गों गों की गीली आवाजें गूंजीं, लार जांघों पर टपकी।

चारपाई पर लिटाया, पैर फैलाए, उसकी चूत गुलाबी, रस से चमकती, मुस्क की महक कमरे में फैल गई। “प्रिया, अब तेरी सील तोड़ूंगा।” सुपारा रगड़ा, वो रोने लगी, “नहीं भैया… दर्द होगा, रुको प्लीज…” धक्का दिया, सील टूटी, तेज जलन, खून की बूंदें टपकीं, वो चीखी, “मां… मर गई भैया… निकालो, जल रहा!” आंसू बह रहे थे, नाखून मेरी पीठ में गड़े, लेकिन मैं रुका, निप्पल चूसे, किस किया, “शश… धीरे मजा आएगा, तेरी चूत अब मेरी।” दस मिनट रुक-रुक कर अंदर-बाहर किया, उसकी टाइट चूत लंड को निचोड़ रही थी, धीरे-धीरे रस बढ़ा। दर्द कम हुआ, वो कमर हिलाने लगी, पसीने से तर, “भैया… अब जलन गई… आपका लंड अंदर तक भर रहा… उफ्फ, जोर से चोदो, मेरी बुर फाड़ दो… आह ह ह ह ह्हीईई!”

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मैंने स्पीड बढ़ाई, मिशनरी में जोर के ठोके मारे, चारपाई चरमराई, चुचे उछले। वो चिल्लाई, “भैया… फाड़ दो चूत… कमाल का लंड… आह्ह्ह ओह्ह ओह!” तीन बार झड़ी, फुहारें निकलीं, बिस्तर गीला हो गया। फिर घोड़ी बनाया, पीछे से घुसाया, गांड के गाल थपथपाए, बाल पकड़े, पेला। वो हंसती-रोती, “भैया… चूत में लंड… उफ्फ जोर से… चाचा पता चला तो मार डालेंगे, लेकिन रोक नहीं पा रही… जैसे जादू हो गया!” बीस मिनट पेला, चूत में गर्म वीर्य भर दिया। वो थक कर गिर पड़ी, “भैया, मैं आपकी रंडी बन गई… रोज चोदना।”

बारिश थम चुकी थी, हम चुपके घर लौटे। रात को छत पर फिर मिले, नंगा किया, 69 में चोदा। वो लंड चूसती, मैं चूत, अचानक वो झड़ी, फुहार मेरे मुंह पर, वो nervous हंस पड़ी, “भैया… ये क्या फूटा… शर्म आ रही लेकिन मजा… आह्ह ऊईईई!” फिर खड़े-खड़े चोदा, दीवार से सटाकर, वो चीखती, “भैया… कोई सुन लेगा…” लेकिन कमर खुद हिला रही थी।

अगले दिन खेतों में, नदी किनारे, हर जगह पेला। शादी खत्म होने तक प्रिया की कमसिन चूत मेरी हो चुकी थी, वो मेरे बिना रह नहीं पाती थी। आज भी याद करता हूं तो लंड खड़ा हो जाता, वो गांव की मासूम लड़की मेरी वजह से जंगली रंडी बन गई थी।

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