टेलीग्राम चैनल जॉइन करें - रोज़ाना नई कहानी अपडेट के लिए

चंपक लाल ने अपनी बहू को पेला

TMKUC – Gokuldham fantasy sex story: शाम का वक्त था, और गोकुलधाम सोसाइटी का माहौल बारिश की फुहारों से भरा हुआ था। आसमान में काले बादल छाए थे, और कभी-कभी बिजली की गड़गड़ाहट पूरे मोहल्ले को हिलाकर रख देती थी। चंपक लाल, उम्र करीब 60 साल, गठीला बदन, सफेद कुर्ता-पायजामा पहने, अपने घर के छोटे से लिविंग रूम में टीवी के सामने बैठे थे। उनकी आँखें टीवी पर टिकी थीं, लेकिन दिमाग कहीं और भटक रहा था। उनकी बहू दया, 32 साल की, गोरी-चिट्टी, भरा हुआ बदन, नीली साड़ी में लिपटी हुई, किचन में खाना बना रही थी। दया की साड़ी उसकी कमर को इस तरह लपेटे थी कि उसकी चिकनी, गोरी कमर बार-बार झलक रही थी। जेठालाल, दया का पति, काम के सिलसिले में शहर से बाहर गया था, और टप्पू अपने दोस्त के घर रुका हुआ था। घर में सिर्फ चंपक लाल और दया ही थे।

दया ने किचन में गर्मागर्म रोटियाँ बनाईं, दाल का तड़का लगाया, और सब्जी को थाली में सजाकर डाइनिंग टेबल पर ले आई। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था, और उसकी गहरी नाभि चंपक लाल की नजरों में चुभ रही थी। टीवी पर एक पुरानी फिल्म का रोमांटिक गाना चल रहा था, जिसमें हीरो-हिरोइन बारिश में भीगते हुए एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। चंपक लाल का ध्यान अब टीवी से हटकर दया की कमर पर टिक गया। उसकी नीली साड़ी बारिश की ठंडक में और भी कामुक लग रही थी। दया की हल्की-सी चाल, उसकी कमर का लचकना, और उसकी साड़ी का गीला पल्लू चंपक लाल के मन में आग लगा रहा था। उसका लंड धीरे-धीरे तनने लगा, और उसने अपनी टाँगें मोड़कर अपनी उत्तेजना को छिपाने की कोशिश की।

दया ने टेबल पर खाना सजाते हुए पुकारा, “बापूजी, खाना तैयार है! आइए, बैठ जाइए!” उसकी आवाज में वही मासूमियत थी, जो हमेशा चंपक लाल को अपनी ओर खींचती थी। चंपक ने रिमोट उठाकर टीवी बंद किया और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ा। उसने दया को भी साथ बैठने को कहा, “अरे बहू, तू भी बैठ! अकेले क्या खाऊँगा?” दया ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया और उसके सामने बैठ गई। दोनों ने चुपचाप खाना खाया, लेकिन चंपक लाल की नजरें बार-बार दया की साड़ी के किनारे से झाँकती उसकी चिकनी कमर और गहरे ब्लाउज में दबे हुए चूचों पर जा रही थीं। खाना खत्म होने के बाद चंपक अपने कमरे में चले गए, और दया ने बर्तन साफ किए।

रात गहराने लगी थी। दया को अचानक याद आया कि बापूजी ने अपनी दवाई नहीं ली। उसने एक गिलास पानी लिया और चंपक लाल के कमरे की ओर बढ़ी। कमरे का दरवाजा हल्का-सा खुला था। उसने जैसे ही दरवाजा धकेला, उसकी साँसें थम गईं। कमरे की मद्धिम रोशनी में चंपक लाल बिस्तर पर लेटे हुए थे, उनका सफेद पायजामा घुटनों तक नीचे सरका हुआ था, और उनका मोटा, काला, नसों से भरा लंड उनके दाहिने हाथ में कसकर पकड़ा हुआ था। वे जोर-जोर से मुठ मार रहे थे, हाथ ऊपर-नीचे तेजी से चल रहा था, और उनके दूसरे हाथ में एक तस्वीर थी जिसे वे बार-बार निहार रहे थे। दया की आँखें फटी की फटी रह गईं, उसका चेहरा लाल हो गया, और उसने झट से दरवाजा बाहर की तरफ खींचकर बंद कर दिया। वह बाहर दीवार से सटकर खड़ी हो गई, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, साँसें तेज हो गई थीं। उसने मन ही मन सोचा, “हे माँ माता जी… बापूजी ये क्या कर रहे हैं? और वो तस्वीर… वो तस्वीर किसकी थी?” उसका दिमाग पूरी तरह उलझन में पड़ गया, पैर काँप रहे थे, और चेहरा गर्म हो रहा था।

कुछ देर तक वह वहीं खड़ी रही, साँसें संभालने की कोशिश करती हुई। फिर उसने हिम्मत जुटाई, हाथ काँपते हुए दरवाजे पर हल्की दस्तक दी, “बापूजी!” अंदर से जल्दबाजी की आवाज आई, चादर सरसराई, तकिए के नीचे कुछ छिपाने की हलचल हुई। चंपक लाल ने तस्वीर को तकिए के नीचे दबाया, चादर से अपने अभी भी खड़े और सख्त लंड को ढक लिया, और सामान्य आवाज में बोले, “आ जा बहू, दरवाजा खुला है!” दया ने धीरे से दरवाजा खोला, अंदर कदम रखा, लेकिन उसकी नजरें बापूजी से मिलने से बच रही थीं। वह धीरे-धीरे उनके पास पहुंची, गिलास आगे बढ़ाते हुए बोली, “बापूजी, आपकी दवाई!” उसकी आवाज में हल्की कंपकंपी थी। चंपक ने दवाई ली, पानी पिया, और गिलास वापस दया को थमा दिया। तभी अचानक बिजली गुल हो गई, और कमरे में घुप्प अंधेरा छा गया।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

“अरे रे, ये लाइट कैसे चली गई?” चंपक ने झुंझलाते हुए कहा, उनकी आवाज में हल्की बेचैनी थी। फिर उन्होंने दया से कहा, “बहू, थोड़ी देर यहीं बैठ जा। अंधेरे में कैसे जाएगी?” दया का मन बिल्कुल नहीं था, लेकिन बापूजी को मना करना उसे ठीक नहीं लगा। वह बेमन से बिस्तर के किनारे बैठ गई, साड़ी को ठीक करती हुई, दिल अभी भी तेज धड़क रहा था। अंधेरे में चंपक को लगा कि शायद दया चली गई। “बहू, यहीं हो ना?” उन्होंने पूछा। “जी बापूजी, यहीं हूँ,” दया ने धीमी, काँपती आवाज में जवाब दिया। चंपक ने हल्के से हँसते हुए कहा, “अरे, तो चुपचाप क्यों बैठी है? कुछ बात तो कर!”

दया के दिमाग में अभी भी वही सीन बार-बार घूम रहा था—बापूजी का मोटा, काला लंड जो हाथ में पकड़ा था, उनकी तेज मुठ मारने की हरकतें, और वो तस्वीर जिसे वे इतने ध्यान से देख रहे थे। वह सोच रही थी कि आखिर वो तस्वीर किसकी थी। शायद सासू माँ की? या किसी और की? उसका मन बेचैन था, शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी, और वह खुद को समझ नहीं पा रही थी। चंपक भी दया की खामोशी से परेशान हो गए। “क्या हुआ बहू? इतनी चुप क्यों है? कुछ परेशानी है?” दया ने हड़बड़ाते हुए कहा, “नहीं बापूजी, बस थोड़ी थकान है। नींद आ रही है।” उसकी आवाज में झिझक थी। चंपक ने तुरंत कहा, “अरे, नींद आ रही है तो यहीं सो जा! लाइट आएगी तो मैं जगा दूँगा।”

दया को अपनी बात पर तुरंत पछतावा हुआ। उसने मन ही मन सोचा, “हे भगवान, मैंने ये क्या कह दिया?” लेकिन अब पीछे हटना मुश्किल था। चंपक ने फिर जोर दिया, “सो जा बहू, शरमाने की क्या बात है?” उनका हाथ अब धीरे से दया के कंधे पर रखा गया, हल्का सा दबाव डालते हुए। दया ने मन ही मन सोचा, “शायद मैं ज्यादा सोच रही हूँ। बापूजी को सासू माँ की याद आई होगी। मुठ मारने में क्या बुराई है? जेठालाल भी तो कभी-कभी ऐसा करते हैं।” उसने खुद को समझाया, दिल की धड़कन थोड़ी शांत की, और बिस्तर पर लेट गई। “बापूजी, अगर लाइट आ जाए तो मुझे जगा देना,” उसने करवट लेते हुए कहा, अपनी साड़ी को ठीक करते हुए, और आँखें बंद कर लीं।

चंपक को यकीन नहीं था कि दया इतनी आसानी से मान जाएगी। वह बिस्तर पर लेटी थी, और उसकी साड़ी का पल्लू हल्का-सा सरक गया था, जिससे उसकी गोरी कमर और गहरी नाभि चंपक की आँखों के सामने साफ दिख रही थी। दया सचमुच दिन भर की थकान से चूर थी। बिस्तर पर लेटते ही उसकी पलकें भारी हो गईं, सांसें गहरी और नियमित होने लगीं, और कुछ ही पलों में वह गहरी नींद में डूब गई। लेकिन चंपक को नींद कहाँ आने वाली थी? उनका लंड अभी भी पूरी तरह तना हुआ था, और पास में सोती दया का नजदीक होना उनकी उत्तेजना को और भड़का रहा था।

उनका दायाँ हाथ धीरे से अपने पायजामा के अंदर चला गया, मोटे, सख्त लंड को पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगा। पहले तो थोड़ा मजा आया, लेकिन जल्दी ही लगा कि अब सिर्फ मुठ मारने से काम नहीं चलेगा। मन में ख्याल आया, “क्यों न दया के पीछे लेट जाऊँ और उसके जिस्म की गर्मी महसूस करते हुए हिलाऊँ?” सोचते ही वे बिस्तर पर धीरे-धीरे खिसके, दया के ठीक पीछे लेट गए। जैसे ही वे करीब आए, उनका हाथ अनजाने में दया की गांड पर जा टकराया। दया की साड़ी पहले से ही थोड़ी ऊपर सरकी हुई थी, और उसकी नरम, गोल, भरी हुई गांड की गर्मी ने चंपक के पूरे जिस्म में बिजली-सी दौड़ा दी। वे एक पल के लिए सन्न रह गए, फिर जल्दी से हाथ हटा लिया और थोड़ा पीछे खिसककर लेट गए, सांसें तेज हो गईं।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

तभी अचानक लाइट आ गई। कमरे में पीली रोशनी फैल गई। चंपक ने फौरन देखा – दया का मुँह दूसरी तरफ था, आँखें पूरी तरह बंद, सांसें गहरी और नियमित, वह अब भी गहरी नींद में थी। चंपक का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उन्होंने धीरे से बिस्तर से उठकर स्विच की ओर देखा, फिर वापस लौटकर लाइट बंद कर दी। कमरा फिर से अंधेरे में डूब गया, सिर्फ बाहर से आती हल्की बारिश की आवाज और कभी-कभार बिजली की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी।

अंधेरे में चंपक फिर से दया के ठीक पीछे लेट गए। अब उनका लंड और भी सख्त हो चुका था। उन्होंने फिर से हाथ लंड पर रखा और धीरे-धीरे हिलाने लगे, लेकिन अब दिमाग में सिर्फ दया ही थी – उसकी चिकनी कमर, भारी-भरकम गांड, मुलायम जाँघें, और वो नरम जिस्म जो इतने करीब था। उत्तेजना चरम पर पहुँच चुकी थी। उनका बायाँ हाथ धीरे-धीरे दया की पीठ पर चला गया। साड़ी का पल्लू पूरी तरह सरक चुका था, पीठ का गोरा हिस्सा खुला हुआ था। चंपक ने उंगलियों से पीठ को सहलाया, फिर धीरे से अपनी गर्म जीभ पीठ पर फेर दी। जीभ की नमी और गर्मी से दया की त्वचा पर हल्की सी सिहरन हुई, लेकिन उसकी नींद इतनी गहरी थी कि उसे कुछ पता नहीं चला।

चंपक की हिम्मत अब और बढ़ गई। उन्होंने दाहिने हाथ से धीरे-धीरे दया के ब्लाउज के ऊपर से उसके भारी चूचों को छुआ। ब्लाउज के कपड़े के नीचे से भी चूचे इतने मुलायम और भरे हुए लग रहे थे कि चंपक के हाथ काँपने लगे। उन्होंने हल्के से दबाया – चूचे हाथों में दब गए, निप्पल कपड़े के ऊपर से ही सख्त महसूस हुए। चंपक का सांस तेज हो गया। अब उनका बायाँ हाथ दया की साड़ी को और ऊपर सरकाने लगा। साड़ी धीरे-धीरे जाँघों तक ऊपर चढ़ गई, और चंपक ने चिकनी, गर्म जाँघों को सहलाना शुरू किया। जाँघों की मुलायम त्वचा को छूते ही उनका लंड और सख्त हो गया, लंड की नसें फूल रही थीं।

धीरे-धीरे उनकी उँगलियाँ जाँघों के बीच की ओर बढ़ीं। दया की चूत पहले से ही गीली थी – पैंटी के ऊपर से भी गीलापन महसूस हो रहा था। चंपक ने पैंटी के किनारे से उंगली अंदर डाली, और चूत की गीली, गर्म त्वचा को छुआ। “ओह्ह… ये तो पूरी तरह तर है,” चंपक ने मन ही मन सोचा, उनकी सांसें और तेज हो गईं। उन्होंने उंगली को धीरे-धीरे चूत के होंठों पर फेरा, फिर हल्के से क्लिटोरिस को छुआ – दया का जिस्म हल्का सा काँपा, लेकिन नींद में ही।

तभी चंपक ने खुद को और करीब किया। उनका मोटा लंड अब दया की गांड के बीच में रगड़ने लगा। वे धीरे-धीरे कमर हिलाने लगे, लंड गांड की दरार में फिसल रहा था। साथ ही उन्होंने दया की गर्दन पर होंठ रख दिए, धीरे-धीरे चूमने लगे। गर्दन की नरम त्वचा, हल्की महक – सब कुछ उन्हें पागल कर रहा था। “आह्ह… कितनी मुलायम है ये… कितनी गर्म…” चंपक धीमी, काँपती आवाज में बड़बड़ाए।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

दया को अचानक गांड के बीच कुछ मोटा, गर्म रगड़ता हुआ महसूस हुआ। उसकी नींद टूट गई। आँखें खुलीं, लेकिन अंधेरा था, कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। उसे समझ आ गया कि बापूजी उसके पीछे लेटे हैं, उनका लंड उसकी गांड पर रगड़ रहा है, और गर्दन पर गर्म साँसें महसूस हो रही हैं। दया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। गुस्सा भी आया, लेकिन साथ ही जिस्म में एक अजीब सी गर्मी फैल गई। उसकी चूत और गीली हो गई, पानी धीरे-धीरे बहने लगा। उसने फैसला किया कि चुप रहेगी, कुछ बोलेगी नहीं। सिसकारियाँ रोकने के लिए उसने होंठ जोर से दबा लिए, लेकिन छोटी-छोटी “उम्म… ह्म्म…” जैसी आवाजें निकल ही रही थीं।

चंपक ने अब दया की साड़ी पूरी तरह खोल दी। साड़ी फर्श पर गिर गई, और अब दया का सिर्फ गहरा ब्लाउज और पेटीकोट बचा था, जो उसकी गोरी कमर और भारी चूतड़ों को मुश्किल से ढक पा रहा था। चंपक ने धीरे से दया को पलटा और उसे पेट के बल लिटा दिया। दया की नींद अभी भी गहरी लग रही थी, लेकिन उसका जिस्म हल्का-सा कांप रहा था। चंपक ने अपनी पैंट पूरी तरह उतार दी, उनका मोटा, काला, नसों से भरा लंड पूरी तरह खड़ा और चमकदार था, सुपारा पहले से ही गीला हो चुका था।

उन्होंने दया की गांड के दोनों गोल चूतड़ों को दोनों हाथों से फैलाया, उसकी टाइट गांड का छोटा-सा गुलाबी छेद साफ दिख रहा था। चंपक ने अपना लंड दया की गांड की दरार में रखा और धीरे-धीरे रगड़ना शुरू किया। लंड का गर्म सुपारा छेद पर दबाव डाल रहा था। “उफ्फ… कितनी टाइट है ये… जन्नत जैसी टाइट गांड,” चंपक ने मन ही मन सोचा, उनकी सांसें तेज हो गईं। उन्होंने थोड़ा थूक अपने लंड पर लगाया ताकि और आसानी हो, फिर सुपारे को छेद पर टिकाकर धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया।

धीरे-से, बहुत धीरे, चंपक ने अपना मोटा लंड दया की गांड में प्रवेश कराना शुरू किया। सुपारा अंदर घुसते ही दया के मुँह से हल्की-सी सिसकारी निकली, “आह्ह… ओह्ह…” लेकिन उसने तुरंत होंठ दबाकर आवाज दबा ली। दर्द की वजह से उसकी गांड अनजाने में सिकुड़ गई, जिससे चंपक को और मजा आया। “ओह्ह… कितनी जोर से कस रही है,” उन्होंने सोचा। उन्होंने एक हाथ दया की कमर पर रखा और दूसरे से लंड को पकड़कर और गहराई तक धकेला। आधा लंड अंदर चला गया, दया का शरीर हल्का-सा कांपा, लेकिन वह चुप रही।

चंपक ने अब धीरे-धीरे झटके देना शुरू किया। पहले हल्के, छोटे झटके, सिर्फ सुपारा अंदर-बाहर। “फच… फच…” हल्की आवाज कमरे में गूँजने लगी। हर झटके के साथ दया की गांड थोड़ी और खुल रही थी, लेकिन दर्द अभी भी था। जेठालाल ने कभी उसकी गांड नहीं मारी थी, और चंपक का लंड मोटा, लंबा और सख्त था – पूरी तरह अलग अनुभव। दया ने मन ही मन सोचा, “आह्ह… बापूजी… धीरे… ये बहुत मोटा है… दर्द हो रहा है,” लेकिन मुंह से कुछ नहीं बोली, बस सिसकारियाँ दबाती रही।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

धीरे-धीरे चंपक की रफ्तार बढ़ने लगी। अब लंड आधे से ज्यादा अंदर जा रहा था, और बाहर निकलते वक्त दया की गांड के छेद को फैलाता हुआ। “फच… फच… फच…” आवाजें तेज और गीली हो गईं। चंपक पूरी तरह खो चुके थे, उनकी कमर तेजी से हिल रही थी, लंड अब पूरी लंबाई तक अंदर-बाहर हो रहा था। दया की सिसकारियाँ भी तेज हो गईं, “उह्ह… आह्ह… उफ्फ…” वह अपने होंठ काट रही थी ताकि जोर से चीख न पड़े। उसकी आँखों से आंसू निकल आए थे दर्द से, लेकिन साथ ही चूत से रस टपक रहा था – दर्द और उत्तेजना का अजीब मिश्रण।

चंपक का एक हाथ अब दया की कमर से हटकर उसके चूतड़ों पर चला गया, उन्हें मसलते हुए और जोर से धक्के देने लगा। “आह्ह… दया… तेरी गांड तो कमाल है… कितनी गरम… कितनी टाइट…” उन्होंने धीमी, हांफती आवाज में बड़बड़ाया। दया का शरीर हर धक्के के साथ हिल रहा था, उसके भारी चूचे ब्लाउज में दबकर लहरा रहे थे। चंपक की सांसें बहुत तेज हो गईं, पसीना उनकी पीठ पर बह रहा था। लंड अब बिना रुके तेजी से अंदर-बाहर हो रहा था, गांड का छेद अब पूरी तरह खुल चुका था, लंड आसानी से घुस-निकल रहा था।

कुछ देर बाद चंपक को झटका लगा – उनका माल निकलने वाला था। “ओह्ह… बहू… तू तो जन्नत है… आह्ह…” उन्होंने धीमी लेकिन उत्तेजित आवाज में कहा। उन्होंने आखिरी कुछ जोरदार धक्के मारे, लंड पूरी तरह अंदर डालकर रुक गए। फिर उनका गर्म वीर्य दया की गांड के अंदर छूटने लगा, लेकिन चंपक ने लंड बाहर खींच लिया और बाकी वीर्य दया के चूतड़ों पर पिचकारी की तरह गिरा। गर्म, चिपचिपा वीर्य दया की गांड की दरार में बहता हुआ नीचे गिर रहा था। “आह्ह…” चंपक हांफते हुए पीछे लेट गए, उनका लंड अभी भी हल्का-हल्का फड़क रहा था।

दया को अब थोड़ी राहत मिली। दर्द कम हो रहा था, लेकिन गांड में जलन थी। उसने मन ही मन सोचा, “अच्छा हुआ, बापूजी का माल निकल गया। वरना पता नहीं मैं कब तक चिल्लाने से रोक पाती।” लेकिन उसकी चूत अभी भी पूरी तरह गीली थी, क्लिटोरिस सख्त होकर तड़प रही थी, और पूरा जिस्म गर्म था।

चंपक को अब डर लगने लगा। “अगर बहू को पता चल गया तो? अगर उसने जेठालाल को बता दिया?” उन्होंने सोचा। उन्होंने फैसला किया कि वह दया की गांड से अपना वीर्य साफ करेंगे और उसे कपड़े पहना देंगे। जैसे ही उन्होंने लाइट जलाई, दया ने अपनी आँखें तुरंत बंद कर लीं। वह अभी भी पीठ करके लेटी थी, मानो उसे कुछ पता ही न हो। चंपक ने धीरे-से अपना रुमाल निकाला और दया के चूतड़ों को साफ करना शुरू किया। वीर्य को पोंछते हुए उनकी उंगलियां दया की गांड के छेद पर फिर से गईं, हल्का-सा दबाव डाला, लेकिन दया चुप रही। लेकिन उनकी नजरें दया के नंगे जिस्म पर टिक गईं। उसका गोरा बदन चमक रहा था, गहरे ब्लाउज में दबे भारी चूचे ऊपर-नीचे हो रहे थे, चिकनी जाँघें फैली हुई थीं। देखते ही चंपक का लंड फिर से खड़ा होने लगा।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

चंपक ने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन नहीं रोक पाए। उन्होंने फिर से अपना लंड हाथ में लिया और दया की मुलायम जाँघों पर रगड़ने लगे। लंड की गर्मी दया की जांघों पर महसूस हो रही थी। उनकी उंगली धीरे से दया की चूत पर गई – चूत पहले से ही पूरी तरह गीली थी, होंठ फूले हुए, क्लिटोरिस उभरी हुई। “उफ्फ… ये तो पूरी तरह तैयार है,” चंपक ने सोचा। उन्होंने दो उंगलियां दया की चूत में डालीं, अंदर-बाहर करने लगे, चूत का रस उनकी उंगलियों पर चिपक रहा था। साथ ही दूसरे हाथ से दया के ब्लाउज के ऊपर से चूचों को जोर-जोर से मसला, निप्पल को पकड़कर मरोड़ा। दया की सांसें तेज हो गईं, लेकिन वह चुप रही।

चंपक का लंड अब फिर से झड़ने को तैयार था। इस बार उन्होंने अपना लंड दया के चेहरे के पास ले जाकर मुठ मारना शुरू किया। लंड का सुपारा दया के गाल से छू रहा था। कुछ ही झटकों में उनका वीर्य फिर से निकला – गर्म धाराएं दया के गाल पर गिरीं, कुछ होंठों तक बह गईं, एक-दो बूंदें उसकी नाक पर भी लगीं। “आह्ह…” चंपक फिर से हांफते हुए लेट गए।

दया ने चुपके से अपनी जीभ निकाली और बापूजी के वीर्य को गाल से चाट लिया। गाढ़ा, नमकीन स्वाद मुंह में फैला – अजीब लेकिन बहुत उत्तेजक लगा। चंपक ने उठकर दया का मुँह रुमाल से साफ किया, फिर ब्लाउज और पेटीकोट ठीक किया और साड़ी धीरे-धीरे पहना दी। वह दया के जिस्म को एक बार फिर निहारते हुए देख रहे थे। फिर उन्होंने लाइट बंद की और सो गए। लेकिन दया की नींद उड़ चुकी थी। वह बापूजी के वीर्य का स्वाद जीभ पर ले रही थी, और उसकी चूत में आग लगी हुई थी। उसने धीरे से अपनी उंगलियां अपनी चूत में डालीं – दो उंगलियां अंदर करके तेजी से अंदर-बाहर करने लगीं। “आह्ह… उह्ह…” उसकी सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं। क्लिटोरिस को अंगूठे से रगड़ते हुए वह जल्दी ही झड़ गई, पूरा जिस्म कांप उठा। कुछ देर बाद वह थककर सो गई।

अगली सुबह दया बेन उठी। उसकी आँखें अभी भी थकी हुई थीं, लेकिन रात की यादें ताज़ा थीं। वह धीरे-धीरे बिस्तर से उठी और कमरे से बाहर जाने लगी। तभी उसकी नजर बापूजी के तकिए के नीचे दबी हुई तस्वीर पर पड़ी। उसने रुककर हाथ बढ़ाया, तकिया थोड़ा उठाया और तस्वीर निकाली।

जैसे ही उसने तस्वीर देखी, उसकी साँसें एक पल के लिए थम गईं। ये उसकी अपनी तस्वीर थी – वो तस्वीर जिसमें वो नीली साड़ी पहने मुस्कुरा रही थी, वही साड़ी जो कल रात बापूजी ने उतारी थी। उसके चेहरे पर पहले हैरानी आई, फिर धीरे-धीरे एक हल्की-सी, शरमाती हुई मुस्कान फैल गई। “हे माँ माता जी… बापूजी… मेरी तस्वीर?” उसने मन ही मन बड़बड़ाया। दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई, लेकिन गुस्सा नहीं आया। बल्कि अजीब सी गर्मी फिर से शरीर में दौड़ने लगी।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

वह तस्वीर को धीरे से वापस उसी जगह रखकर चुपचाप अपने बेडरूम में चली गई। दरवाजा बंद किया, सीधे बाथरूम में घुसी। जैसे ही दरवाजा लॉक हुआ, उसने साड़ी का पल्लू कंधे से सरकाया। साड़ी धीरे-धीरे फर्श पर गिर गई। फिर ब्लाउज के हुक खोले, ब्रा उतारी। भारी, गोरे चूचे आज़ाद हो गए, निप्पल अभी भी हल्के सख्त थे रात की याद से। पेटीकोट का नाड़ा खींचा, वो भी नीचे गिर गया। अब वो पूरी नंगी थी।

शावर का नॉब घुमाया, गुनगुना पानी उसके जिस्म पर बरसने लगा। वो बापूजी की गंध को मिटाना चाहती थी – उनकी उंगलियों की छुअन, उनके मोटे लंड की गर्मी, उनके वीर्य की चिपचिपाहट जो कल रात उसके गाल और होंठों पर फैली थी। लेकिन जितना वो साबुन लगाकर रगड़ रही थी, उतनी ही वो यादें तेज हो रही थीं।

उसकी चूत अभी भी गीली थी। रात भर की उत्तेजना खत्म नहीं हुई थी। पानी की धार उसके चूचों से होकर नीचे बह रही थी, नाभि में रुक रही थी, फिर चूत की ओर जा रही थी। दया बेन ने आँखें बंद कीं। बापूजी का चेहरा दिमाग में घूम रहा था – उनका मोटा, काला लंड, जो कल रात उसकी गांड में धीरे-धीरे घुसा था, फच-फच की आवाज़, उनकी हाँफती साँसें, “दया बेन… तू तो जन्नत छे…” वाली बात।

उसका दायाँ हाथ धीरे से उसकी चूत पर गया। उंगलियों से होंठों को छुआ, वो पहले से ही गीले थे। “आह्ह…” एक हल्की सिसकारी निकली। वो शावर की दीवार से पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। बायाँ हाथ चूचे पर गया, निप्पल को पिंच किया। “उह्ह… बापूजी…” मन ही मन बोली।

अब दायीं उंगली चूत के अंदर सरक गई। अंदर गर्म, गीला था। वो धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगी। “आह्ह… हे माँ… बापूजी का लंड… कितना मोटा था…” उसकी सिसकारियाँ बढ़ने लगीं। दूसरी उंगली भी शामिल हो गई। अब दो उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं, चूत का रस पानी के साथ मिलकर बह रहा था।

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

वो बापूजी के लंड को याद कर रही थी – कैसे वो पहले उसकी गांड के छेद पर रगड़ा था, फिर धीरे से अंदर घुसा था, दर्द के साथ मजा मिला था। “आह्ह… ऊँह… बापूजी… धीरे… आह्ह…” उसकी कमर लचकने लगी। उंगलियाँ तेज हो गईं। क्लिटोरिस पर अँगूठे से दबाव डाला। “ओह्ह… इह्ह… हे माँ माता जी…”

उसकी साँसें तेज हो गईं। पैर काँपने लगे। वो शावर की दीवार पर हाथ टिका रही थी ताकि गिर न जाए। उंगलियाँ अब और गहराई में जा रही थीं, चूत की दीवारों को रगड़ रही थीं। “आह्ह… बापूजी… आपका लंड… मेरी गांड में… आह्ह… फिर से…” उसकी सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं।

अचानक शरीर में एक तेज झटका आया। “आआह्ह्ह… ऊँह्ह… ओह्ह…” वो जोर से सिसकारी, चूत सिकुड़ गई, रस की धार निकली। पैर कमजोर पड़ गए, वो धीरे से नीचे बैठ गई। पानी अभी भी उसके जिस्म पर बरस रहा था।

कुछ देर तक वो ऐसे ही बैठी रही, साँसें संभाल रही थी। फिर धीरे से उठी, शावर बंद किया। तौलिया लिया, जिस्म पोंछा। लेकिन मन में अभी भी बापूजी की याद थी। वो मुस्कुराई, “हे माँ… क्या हो रहा है ये सब…”

दोस्तो, ये कहानी आपको कैसी लगी? अगर आपके कमेंट्स अच्छे आए तो इसकी अगली कड़ी में और मसाला डालकर लिखूँगा। अपनी राय जरूर बताएँ!

आप यह Sasur Bahu Chudai Kahani - ससुर बहू की चुदाई हमारी वेबसाइट फ्री सेक्स कहानी डॉट इन पर पढ़ रहे है।

टेलीग्राम चैनल जॉइन करें - रोज़ाना नई कहानी अपडेट के लिए