कहानी का पिछला भाग: मोटे लम्बे लंड से चूत चुदाई का डर – 2
वरुण ने अपना लण्ड बाहर निकाला और मैं पति की गोद में बैठी-बैठी सहम गई।
पड़ोसन ने बैंगन से जो नाप बताया था, वह आधा भी नहीं था। वरुण का लण्ड मोटा, भारी, नसों से फूला हुआ था। जड़ पर घना बाल, डंडी इतनी मोटी कि मेरी कलाई उससे पतली लग रही थी। लंबाई में वह मेरे पति के लण्ड से लगभग दुगना था। पति का लण्ड खड़ा होने पर भी पतला, छोटा, हथेली में आसानी से समा जाने वाला था। वरुण का लण्ड आधा खड़ा होकर भी नीचे झुक रहा था, सूपड़ा चौड़ा, गुलाबी-बैंगनी, चिकना और इतना बड़ा कि मेरी मुट्ठी उस पर पूरी नहीं पड़ रही थी। मैंने अनजाने में उसे देखा और समझ गई कि उसकी बीवी क्यों रोती थी। पहली रात ऐसे सूपड़े को बिना तैयारी के चूत में ठेलना चीरने जैसा है। वह डरती थी क्योंकि वह मना करती थी। मैं मना नहीं कर रही थी। मेरी चूत पहले से गीली थी, और मैं यही चाह रही थी कि यह मूसल मेरे अंदर जाए।
पति ने मेरी कमर थामी। “देख ले अच्छी तरह। आज यही लेने वाली है।”
वरुण पास आया। “भाभी, मना हो तो बोल दो।”
मैंने सिर हिलाया। “मना नहीं है। बस धीरे डालना। इतना मोटा है कि एक साथ नहीं जाएगा।”
उसने मुझे पलंग पर लिटाया। पति मेरे सिर की तरफ आ गया। वरुण मेरे पैरों की तरफ। कपड़े उतर चुके थे। तीनों नंगे। पति ने अपना पतला लण्ड मेरे होंठों पर रखा। मैंने सूपड़े को जीभ से चाटा और मुँह में लेकर धीरे चूसने लगी।
वरुण ने मेरी टाँगें कंधों पर चढ़ाईं और चूत के बिल्कुल पास मुँह ले आया। गर्म साँस बालों पर पड़ी। पहले अंदरूनी जाँघ चाटी, फिर चूत के बाहरी नरम होंठों को मुँह में भरा और धीरे खींचा। एक होंठ, फिर दूसरा। जीभ बीच की दरार में ऊपर से नीचे फिरी, अभी क्लिट को छुए बिना। चूत पहले से गीली थी। उसने थूक मिलाया और पूरे भगोष्ठ को चाटता रहा, जब तक दोनों होंठ सूजकर अलग नहीं हो गए।
दो उँगलियों से चूत के होंठ फैलाए। अंदर का गुलाबी हिस्सा खुल गया, छेद सिकुड़ रहा था, क्लिट ऊपर सूजी हुई। जीभ सीधे छेद में घुसा दी। अंदर घुमाई, दीवारों को चाटा, बाहर निकाली, फिर डाली। हर बार जीभ और गहरी। चूत से गाढ़ा पानी निकलकर उसकी जीभ पर आने लगा। वह उसे चाटता रहा, निगलता रहा, फिर से अंदर।
क्लिट पर जीभ की नोक रखी। धीरे गोल-गोल। फिर सपाट जीभ रखकर तेजी से हिलाई। क्लिट को होंठों में लिया और ज़ोर से चूसा, खींचा, छोड़ दिया, फिर चूसा। साथ में दो उँगलियाँ छेद में मोड़कर ऊपर की दीवार पर दबाईं और अंदर-बाहर करने लगा। मैं पति का लण्ड मुँह में लिए काँपने लगी। कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठ रही थी, चूत उसके मुँह पर रगड़ खा रही थी।
उसने मेरी कमर और ऊँची की। जीभ छेद से नीचे फिसली, गाँड के छेद तक। छेद के गिर्द कई बार घुमाई, थूक गिराया, नोक बनाकर अंदर दबाया। गाँड गीली हो गई। जीभ अंदर-बाहर हुई, फिर ऊपर लौटी। चूत चाटी, क्लिट चूसी, गाँड फिर चाटी। चूत का पानी टपककर गाँड पर गिर रहा था, वह दोनों जगह एक साथ चाट रहा था। तीन उँगलियाँ चूत में ठूँस दीं, मोड़कर तेजी से हिलाईं, मुँह क्लिट पर चिपका रहा।
पेट के अंदर कुछ सिकुड़ने लगा। टाँगें काँपने लगीं। मैंने पति का लण्ड मुँह से निकाला, नहीं तो दाँत लग जाते। साँस अटक रही थी। वरुण नहीं रुका। क्लिट को होंठों में भरकर लगातार चूसा, उँगलियाँ और तेज, और गहरी। गर्मी कमर से फटने लगी।
अचानक चूत के अंदर से एक झटका लगा। मैं चीख पड़ी। चूत सिकुड़ी, खुली, फिर सिकुड़ी, और छेद से एक तेज़ गर्म धार छूट गई। पहली बार। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पानी की तरह, गाढ़ा नहीं, साफ धार, उसके मुँह, नाक और छाती पर जा लगी। मैं खुद हैरान रह गई। टाँगें बंद करना चाहती थी, हो नहीं रहा था। धार रुककर फिर छूटी। चादर भीग गई।
वरुण हटा नहीं। धार के बीच भी क्लिट चूसता रहा, उँगलियाँ चलाता रहा। दूसरी बार पेट मरोड़ा और फिर पानी निकला, पहले से कम, पर रुक नहीं रहा था। मैं हाँफती रही, आँखें बंद, चूत बार-बार भींचती हुई। जब धार रुक गई, वह अभी भी नीचे था।
चूत चाटने के बाद उसकी जीभ धीरे नीचे फिसली। चूत के नीचे का नरम हिस्सा, फिर और नीचे, गाँड के छेद तक। दोनों हाथों से मेरे चूतड़ फैला दिए। छेद उसकी साँस से खुला। पहले जीभ छेद के गिर्द घुमाई, कई बार, धीरे। किनारे की सिलवटें गीली कीं। थूक गिराया, सीधे छेद पर। थूक को जीभ से फैलाया, फिर नोक बनाकर बीच में दबाया।
छेद सिकुड़ा, फिर ढीला पड़ा। जीभ की नोक अंदर घुस गई। गर्म, गीली, पतली। अंदर घुमाई। बाहर निकाली, फिर डाली, इस बार और अंदर। वह गाँड का छेद मुँह से चूस रहा था और जीभ अंदर-बाहर कर रहा था। हर बार थूक और लगाता, छेद को और गीला करता। जीभ पूरी की पूरी सिकुड़न के अंदर तक चली गई। मैं कमर हिला नहीं पा रही थी। चूत से अभी भी पानी टपककर गाँड पर आ रहा था, वह उसे भी चाटता हुआ फिर छेद में जीभ ठूँस देता।
एक उँगली चूत में रखी रही, मुड़ी हुई, और जीभ गाँड में। छेद उसकी जीभ पर भींच रहा था। वह रुकता नहीं था। चाटना, चूसना, अंदर घुमाना, फिर से थूककर गहरी जीभ। गाँड का छेद ढीला पड़ गया, गीला, खुला हुआ। आखिरी बार जीभ अंदर तक रखी, घुमाई, और धीरे बाहर निकाली।
त, छेद, गाँड, जाँघें, सब पर फैला पानी जीभ से समेटता रहा। उसकी जीभ धीमी नहीं पड़ी थी। चूत के भीगे होंठों को चाटता, नीचे गाँड के छेद पर लौटता, फिर जाँघों पर लगी बूँदें जुटाता रहा। मैं ढीली पड़ गई थी। साँस ऊपर-नीचे हो रही थी और टाँगें अब भी हल्की काँप रही थीं।
उसने आखिरी बार गाँड के छेद में जीभ डाली। नोक को अंदर घुसाया, गोल घुमाया, और किनारे को चूसकर बाहर निकाला। फिर सीधा हुआ। ठुड्डी, होंठ और छाती भीगी हुई थी। मुँह के आसपास मेरा पानी चमकीला लगा था।
मैंने उसके लण्ड को दोनों हाथों से पकड़ा। डंडी गर्म और कड़ी थी, नसें उभरी हुई। सूपड़ा मेरे होंठों से बड़ा था, चौड़ा और फूला हुआ। मैंने जीभ निकालकर सूपड़े के ऊपर फिराई। छेद पर थूक गिराया, अंगूठे से फैलाया, और जितना मुँह में समाया उतना अंदर लेकर चूसने लगी।
लण्ड का सूपड़ा मेरे गला छूते ही आँखों में पानी आ गया। जबड़ा अकड़ गया। पूरा नहीं जा रहा था। आधा सूपड़ा ही अंदर था, बाकी डंडी हाथों में रह गई। मैंने होंठ कसकर चूसा, जीभ नीचे से सहलाई, और साँस नाक से छोड़ी।
पति नीचे झुका और मेरी चूत चाटने लगा। उसकी जीभ छेद पर पड़ी, फिर अंदर घुसी। मैं वरुण का आधा लण्ड चूस रही थी, पति मेरी चूत में जीभ डाल रहा था। ऊपर मुँह भरा था, नीचे चूत फिर से गीली होने लगी थी। लार डंडी पर बहकर मेरी उँगलियों तक आ गई।
वरुण लेट गया। “आ जा भाभी, ऊपर।”
मैं उसके ऊपर उलटी हो गई। उसका मोटा लण्ड मेरे मुँह के सामने था, मेरी चूत उसके मुँह पर। 69 हो गई। मैं सूपड़े को चूसती रही, डंडी को दोनों हाथों से सहलाती रही, और वह मेरी चूत को मुँह से खाता रहा। उसकी जीभ छेद में घुस रही थी, क्लिट को होंठों से खींच रही थी। पति बगल में बैठकर मेरे मम्मे मसल रहा था। “आह… चूस अच्छे से। उम्म… देख कितना मोटा है। तेरी चूत में यही जाना है।”
वरुण उठा। मैं पीठ के बल लेट गई, टाँगें फैलाए। चूत अभी भी गीली थी, पर सूपड़ा देखकर साँस अटक गई।
पति मेरे सिर के पास बैठ गया और मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। वरुण ने हथेली पर थूक जमाया, सूपड़े पर मला, फिर सीधे छेद पर और थूक गिराया। अंगूठे से थूक को चूत के मुँह पर फैलाया और मोटा सूपड़ा सटा दिया। छेद पर दबाव पड़ा और सूपड़ा अटक गया। चौड़ाई इतनी थी कि किनारा ही अंदर नहीं फिसल रहा था।
“धक्का मार,” मैंने कहा।
उसने कमर आगे की। सूपड़ा छेद को खींचता रहा, पर अंदर नहीं गया। दर्द तेज़ उठा, जैसे कोई मोटा सिरा ज़बरदस्ती फैला रहा हो। मैं पति का हाथ भींच लिया।
“आह… रुक… उउह… बहुत मोटा है… सूपड़ा अटक गया…”
पति ने मेरे बाल सहलाए।
“साँस छोड़। ढीली छोड़। तू चाहती है न इसे।”
मैंने साँस छोड़ी। वरुण ने फिर थूक लगाया और धीरे दबाया। सूपड़े का एक किनारा फिसलकर अंदर गया। दर्द चीरता हुआ लगा। आँखें बंद हो गईं, दाँत भींच लिए।
“उउउ… निकाल… आह… आधा भी नहीं गया… रुक जा…”
पति नीचे झुका और क्लिट को उँगली से रगड़ने लगा।
“ले ले। मैं साथ हूँ। धीरे-धीरे।”
वरुण रुका नहीं। एक और धीमा धक्का मारा। सूपड़ा पूरा छेद पार कर गया। मैं चीख पड़ी और पति की छाती की तरफ मुड़ गई।
“आआह… निकाल दे… उउह… फट रही है… बस… बहुत हो गया…”
चूत जल रही थी, खिंची हुई, गर्म। डंडी का ज़्यादा हिस्सा अभी बाहर था। वरुण ने मेरी कमर पकड़ी और इंच-इंच ठेला। हर इंच पर मैं हाँफती, हाथ भींचती, और बीच-बीच में रोकने को कहती।
“और मत… आह… रुको… उउह… पेट तक जा रहा है… नहीं सह पाऊँगी…”
पति ने मेरा चेहरा पकड़ा।
“देख मुझे। साँस ले। थोड़ा और। निकलवाना हो तो बोल, अभी रुकवा देता हूँ।”
मैंने दाँत भींचकर सिर हिलाया।
“नहीं… आह… रहने दे… धीरे डाल… पर एक साथ मत ठेल…”
वरुण रुकता, थूक गिराता, फिर थोड़ा और अंदर करता। पूरा घुसने में देर लगी। जब जड़ चूत से जा लगी, मैं काँप रही थी। अंदर इतना भरा हुआ था कि पेट के ऊपर हल्की उठाव दिखने लगी। पति ने वहीं हथेली रख दी और सहलाने लगा। खिंचाव अब भी तेज़ था, पर रुकने के बाद जलन थोड़ी कम होने लगी। वरुण वहीं रुका रहा और मुझे साँस लेने दी। पति मेरी कलाइयाँ नहीं, उसी जगह को सहलाता रहा, जब तक मेरी पकड़ ढीली नहीं पड़ी।
“धीरे धीरे धक्के शुरू करो अब,” मैंने कहा। “धीरे।”
वह धीरे आगे-पीछे करने लगा। शुरू के धक्के दर्द देते रहे। हर बार जब वह जड़ तक आता, पेट के ऊपर उभार उठता और पति की हथेली से टकराता। पति वही हाथ रखे रहता, उभार को सहलाता, और क्लिट भी रगड़ता रहा।
“ले रही है तू पूरा। देख, ऊपर तक आ रहा है। उम्म… उसकी बीवी डरती है, तू ले रही है।”
धीरे दर्द घटने लगा। चूत ने उसे भींचना शुरू किया। गीली आवाज़ आने लगी। वरुण की रफ्तार बढ़ी। थप-थप। हर गहरे धक्के पर पेट फिर उठता, पति की उँगलियाँ उसी जगह दबी रहतीं।
“भाभी… आह… कितनी टाइट है… उउह… साली चूत ने लण्ड निचोड़ लिया।”
“चोद… आह… जोर से चोद… म्म… मैं डरती नहीं… डाल पूरे का पूरा…”
उसने मेरी दोनों टाँगें कंधे पर रखीं और गहराई से मारने लगा। हर धक्का जड़ तक। पेट के ऊपर उभार साफ दिखता रहा। पति ने हथेली वहीं जमा दी और सहलाता रहा, जबकि मेरे मम्मे चूस रहा था।
“हाँ ऐसे ही। आह… पूरा ले। यहाँ तक जा रहा है। बोल मजा आ रहा है।”
“आ रहा है… उउह… सूपड़ा अंदर रगड़ रहा है… और जोर… म्म…”
वरुण ने मुझे उलटा किया और पेट के बल लिटा दिया। मेरे घुटने चादर पर टिक गए और चूतड़ ऊपर उठ गए।
पीछे से सूपड़ा फिर छेद पर अटक गया। उसने थूक गिराया, सूपड़े को चूत के मुँह पर सटाया और धीरे दबाया। इस बार वह थोड़ा आसानी से फिसला, पर खिंचाव अभी भी बना रहा। सूपड़ा अंदर गया और डंडी इंच-इंच चढ़ती रही। जब जड़ चूत से जा लगी, तो पेट के नीचे फिर भारीपन आ गया। उसने मेरे बाल पकड़े और जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्के पर उसकी कमर मेरे चूतड़ों से टकराती रही और चूत से गीली आवाज़ निकलती रही।
“ले साली… आह… तेरी चूत इसी लायक है… उउह… पतले लण्ड से क्या होगा…”
पति सामने आ गया और अपना लण्ड मेरे मुँह में दे दिया। मैं उसे चूसती रही और लार ठुड्डी पर बहने लगी। पीछे वरुण ठोकता रहा। उसका मोटा लण्ड हर बार गहरा जाता रहा और मैं पति के लण्ड पर कराहती रही।
फिर वरुण लेट गया और मुझे अपनी गोद में बिठा लिया। मैं उसके लण्ड पर सवार हो गई। अपने हाथ से सूपड़े को चूत पर रखा और धीरे नीचे बैठने लगी। किनारा अटका और दर्द फिर उठ आया।
“उउह… रुक… आह… फिर फट रही है…”
आधा अंदर गया, फिर और नीचे चला गया। पूरा घुसते ही पेट के ऊपर हल्की उठाव दिख गई। पति ने वहीं हथेली रख दी। मैं वरुण की छाती पर हाथ रखकर ऊपर-नीचे होने लगी। हर बार बैठने पर वह उभार पति की हथेली से टकराता रहा। पति पीछे से मेरे कूल्हे थामकर नीचे दबा रहा था।
“बैठ जा पूरी। आह… जड़ तक ले।”
मैं जड़ तक बैठ गई और काँपते हुए झड़ गई। चूत सिकुड़ गई और माल बहने लगा। उसकी जड़ भीग गई। वरुण रुका नहीं।
उसने मुझे गोद में उठा लिया। मेरी टाँगें उसकी कमर से लिपट गईं और बाँहें उसकी गर्दन पर आ गईं। लण्ड अंदर ही रहा। वह खड़ा होकर मुझे अपनी बाँहों में थामे रहा और नीचे से जोर-जोर से ऊपर मारने लगा। हर धक्का जड़ तक लगा। मैं उछलती रही और उसके कंधे में मुँह छिपाकर चीखती रही।
“उउह… धीरे… आह… बहुत जोर है… म्म… फट जाएगी…”
वह धीमा नहीं हुआ। मुझे दीवार से सटाया और कमर और तेजी से हिलाने लगा। थप-थप की आवाज़ तेज़ हो गई। पति बगल में खड़ा देख रहा था। पेट हर गहरे धक्के पर ऊपर उठता रहा। मैं उसकी गर्दन भींचकर काँपती रही।
“ले… आह… पूरी ले… उउह… अब छोड़ने वाला हूँ…”
“अंदर छोड़… आह… भर दे…”
उसने आखिरी तेज़ धक्के मारे, जड़ तक घुसा और गर्म माल की धार छोड़ दी। मैं उसके अंदर स्पंदन महसूस कर रही थी। वह हाँफता हुआ मुझे थामे रहा, फिर धीरे पलंग पर लिटा दिया।
जब वह निकला, तो चूत से उसका माल रिसने लगा। पति तुरंत मेरे ऊपर आ गया। उसका पतला लण्ड वरुण के मोटे मूसल के बाद छोटा और हल्का लगा। उसने उसे आसानी से अंदर डाल दिया। फिसलन इतनी थी कि कोई रोक नहीं रही। पेट पर कोई उठाव नहीं आया।
“देख… कितना ढीला कर दिया इसने,” वह बोलता रहा और तेजी से हिलने लगा।
फर्क साफ था। वरुण भरता था, खींचता था और पेट तक जाता था। पति का लण्ड अंदर जाकर भी जगह छोड़ देता था।
उसका लण्ड अंदर आते ही फिसल गया। वरुण के बाद छेद ढीला पड़ा था, इसलिए न दर्द हुआ और न पेट पर उठाव आया। सिर्फ़ गीली गर्माहट महसूस हुई, वह भी ऊपर तक नहीं पहुँची। वह तेजी से हिलने लगा। धक्के लग रहे थे, पर अंदर खालीपन बना रहा। जहाँ वरुण का सूपड़ा रगड़कर जाता था, वहाँ पति का लण्ड छेद के पास ही रह जाता था। मैंने कमर उठाई, ताकि थोड़ा और गहरा जाए, पर फर्क नहीं पड़ा। मजा आ रहा था, हल्का सा। चूत भींचती रही, पर उसे निचोड़ नहीं पा रही थी। वह हाँफने लगा। दो-तीन मिनट में काँप गया और अंदर झड़ गया। धार छोटी लगी, वरुण जितनी भारी नहीं।
वह निकला। उँगली मेरी चूत में डाली और दोनों का मिला हुआ माल बाहर निकाला। गाढ़ा, सफेद और गरम था। उँगली मेरे होंठों पर रख दी।
“पी ले। दोनों का एक साथ है।”
मैंने उँगली मुँह में ली और चूस ली। माल नमकीन था। जीभ पर फैलते ही गाढ़ापन लगा। मैंने उँगली साफ चाट ली।
“और निकाल। मुँह में ही दे।”
पति ने फिर उँगली डाली और माल निकाला। मैं चूसती रही। आँखें आधी बंद थीं। चूत अभी भी खिंची हुई और भरी लगी।
“कैसा लगा?” उसने पूछा।
“तेरा तो फिसल गया। मजा आया, पर खाली खाली लगा। वरुण वाला पेट तक भर रहा था। दर्द भी हुआ, फिर मजा भी वही ज़्यादा आया।”
वरुण बगल में लेटा देख रहा था। मैं उसकी तरफ मुड़ी।
“अब समझ गई तेरी बीवी क्यों डरती है। मैं उसकी बीवी नहीं हूँ।”
वरुण हँसा।
“अगर मजा आया हो तो कल फिर से करें, भाभी जी?”
“कल फिर।”
मैं नशे और थकान में लेटी रही। चूत अभी भी फूलकर खुली पड़ी थी। हर साँस पर अंदर का दबाव याद आता था। जाँघों के बीच से गर्म माल धीरे-धीरे रिसकर चादर पर दाग छोड़ रहा था। थोड़ी देर बाद मैं नंगी ही उठकर बैठ गई। घुटने मोड़ लिए और दोनों को देखती रही।
“कल फिर तो हो जाएगा,” मैंने धीरे कहा। “पर असली बात ये है कि तुम्हारी बीवी लौटेगी, तो यह सब रुक जाएगा। वो तुम्हें छूने नहीं देती। और मेरे पति को मैं अकेले नहीं छोड़ सकती। दोनों तरफ से रास्ता निकालना पड़ेगा।”
वरुण सिगरेट सुलगाता रहा। धुआँ उसके मोटे, अभी ढीले पड़े लण्ड के ऊपर से गुज़रा।
“क्या रास्ता, भाभी?”
मैंने जाँघ पर सूखता सफेद दाग उँगली से मिटाया और उसे चाट लिया। दोनों की निगाहें वहीं अटक गईं।
“तुम्हारी बीवी मेरे पति से चुद जाए। फिर तुम मुझे चोदोगे, और वो मेरे पति से मजा लेगी। चारों का काम चल जाएगा। वरना तुम्हारा मोटा मूसल मुझे फिर नहीं मिल पाएगा। और तुम भी अपनी बीवी के पास पड़े-पड़े तड़पते रहोगे।”
पति हँसा। उसका पतला लण्ड जाँघ पर आधा सिकुड़कर पड़ा था। वरुण के सामने सच में पतले भंटे जैसा लग रहा था।
“वो मानेगी? तुझसे तो डरती है।”
“तुमसे नहीं डरेगी,” मैंने कहा। “तुम्हारा लंड उसे पसंद भी है। मैं मोबाइल में फोटो दिखा चुकी हूँ। देखकर काँप गई थी, बोली थी सामान प्यारा है। डर उसे सिर्फ वरुण जी के साइज से है। तुम्हारा पतला है, आराम से ले लेगी। बस थोड़ा उकसाना होगा।”
वरुण की भौंहें उठीं। सिगरेट होंठों पर रुकी।
“फोटो दिखा दी आपने, भाभी?”
“हाँ।” मैंने उसकी कलाई थाम ली, उँगलियाँ अपनी फांक पर दबाए। “और एक बात और सुन लो। वो बहुत तड़प रही थी, इसीलिए मैंने उसको दूधवाले से एक बार चुदवा भी दी है। मैंने देखा तो नहीं, पर दरवाजा बंद था, दीवार से सुना, और दूधवाले की बाइक बाहर ही खड़ी थी। कुंवारी वाली बात झूठ थी। वो शादी से पहले भी एक-दो बार चुदी थी, पर शादी के बाद से प्यासी ही थी। पति से नहीं चुदी थी, बाहर से पूरी खुल चुकी है। उसने लंड चूसा है, अंदर लिया है, और मजे से चिल्ला-चिल्ला कर चुदवाई है। अब मेरे पति से चुदने की बारी है।”
वरुण थोड़ी देर चुप रहा। फिर उसने मुझे कमर से पकड़कर सोफे पर घुटनों के बल कर दिया। मोटा टोपा गीली फांक पर सटा और एक ही धक्के में आधा अंदर घुस गया।
“उउह… आह्ह… वरुण जी…”
“साली मुझसे डरकर रोती है,” वह मुस्कुराया, कमर पकड़कर और गहरा धकेलते हुए, “और दूधवाले से चुद गई?”
“हाँ… म्म्ह… और बहुत मजे से चुदी।”
चादर मुट्ठी में आ गई। उसका टोपा अंदर की नरम जगह पर रगड़ खा रहा था।
“दीवार से सुना था… आह्ह… चिल्ला रही थी… डालो, जोर से…”
वरुण पूरा घुसाकर रुक गया। अंडकोश जाँघों से चिपक गए।
“मुझे भी यही चाहिए। वो मेरे लंड से भागती है। तेरा पति उसकी प्यासी चूत संभाल ले। मैं तुझे चोदुँगा। आह्ह… मेरे भारी लौड़े को तुम ही ले सकती हो।”
उसने धीरे बाहर खींचा और फिर गहरा मारा। गीली आवाज़ उठी। पीछे से उसका पेट गांड पर थपक रहा था।
“म्म्ह… बस वो यह न जान पाए कि तुम मुझे पहले ही चोद चुके हो। आह्ह… नहीं तो घबरा जाएगी। उसे लगना चाहिए कि वो खुद तुम्हें धोखा देकर मेरे पति से चुद रही है।”
पति पास आ गया। बाल मुट्ठी में लिए और पतला लंड होंठों पर टिका दिया। वरुण पीछे धीमी लय में ठोकता रहा।
“उम्म्ह… ले मुँह में। तेरी सहेली का हाल सुनकर मेरा भी खड़ा हो गया। दूधवाले से चिल्लाकर चुदी, वरुण के आगे रोती है। साली को मेरे लंड की आदत पड़नी चाहिए।”
मैंने टोपा चाटा और मुँह में ले लिया। पीछे हर धक्का पेट तक जा रहा था।
वरुण थोड़ी देर चुपचाप ठोकता रहा। फिर लय धीमी की, ताकि बात साफ सुनाई दे।
“जब वो लौटे, एक रात दारू रख देना। मैं शिकायत करके निकल जाऊँगा। तुम दोनों बैठे रहना। बाकी वो खुद समझ जाएगी।”
पति मेरे गाल पर हाथ फेरता रहा। मुँह में लंड धीरे अंदर-बाहर हो रहा था।
“म्म्ह…” मैंने मुँह खाली करके हाँफते कहा, “मैं उसे अपने पास बुला लूँगी। फोटो फिर दिखाऊँगी। बोलूँगी, यह डरने वाला नहीं है। एक रात ट्राई कर ले। वरुण जितना मोटा नहीं है।”
वरुण हँसा और दो जोर की ठोकरें मार दीं।
“साली की चूत खुल चुकी है, फिर भी मेरे से भागती है। आह्ह… तेरा पति उसे गोद में बैठाए। काँपे तो तू उसके मम्मे दबा देना। पहली बार पूरा मत ठूँसना, जब तक खुद कमर न उठाए। क्या माल है सोचकर भी कस रहा हूँ।”
पति ने सिर फिर अपने लंड पर झुका दिया।
“उउह… और मैं उस रात बाहर ही रहूँगा,” वरुण बोला, लय न छोड़ते हुए। “दस्तक नहीं दूँगा। जब वो ले ले, बता देना। सुबह तक नहीं आऊँगा। पूछूँगा भी नहीं। और इधर तुझे चोदता रहूँगा, जब वो तेरे पति के नीचे पड़ी होगी।”
उसकी हथेली कमर पर गड़ी हुई थी। हर धक्के पर जाँघें आपस में टकरा रही थीं।
“आह्ह… बात सिर्फ तीन में रहेगी। उसके सामने मुझे भाभी ही बोलना। आँख मत मारना। लौटने के अगले दिन मैं सब्जी लेकर आऊँगी, जब वो नहा रही हो। उसी वक्त तेरी बारी। आवाज़ कम रखना।”
पति ने ठुड्डी उठाई। मुँह से थूक की लकीर ठुड्डी तक लटकी थी। पीछे वरुण पूरा बाहर खींचकर एक ही धक्के में घुसा गया।
“उउह… पहले वो मेरे लंड की आदत डाले। फिर तू वरुण के मूसल की। दोनों को लगे कि बात उसी रात शुरू हुई। दूधवाला और आज की रात, दोनों दफन। क्या चूत है तेरी, पूरा निगल रही है।”
वरुण ने कमर जकड़ ली। ठोकरें बेतरतीब हो गईं।
“ठीक है। कल फिर मेरी बारी। बीवी के आने तक और खोल दे। आह्ह… कल चीख नहीं चाहिए। खुद पैर फैलाकर बोलना, डालो। उउह… ले, और गहरा…”
मैं नशे और धक्कों में हाँ में सिर हिला पाई। दीवार के उस पार कमरा खाली था, और इस पार राज खुल चुका था। वरुण आखिरी बार गहरा घुसा, गर्म माल अंदर छोड़ गया, और थोड़ी देर वहीं दबा रहा।
वह उठा। लुंगी कमर पर बाँधी। मूसल अभी आधा तना कपड़े के नीचे दबा रहा। दरवाजे पर रुककर पीछे देखा। जाँघों से उसका रस टपक रहा था।
“कल दोपहर। पति दुकान पर होगा। दरवाजा लगा देना। सीधे बिस्तर पर आऊँगा।”
पति ने मुझे चादर पर लिटा दिया। जाँघें खुली थीं, चूत से बूँद टपक रही थी। उसने अपना लंड उस भरी फांक पर रगड़ा, अंदर नहीं डाला।
“सो जा। कल और ढीली करनी है। जब बीवी लौटे, आज की रात मुँह से नहीं निकलनी चाहिए। उसकी चूत मेरे हवाले। वरुण का मूसल तेरा।”
मैं आँखें बंद करके लेटी रही। बाहर गली में वरुण की चप्पल की आवाज़ धीमी पड़ गई। अंदर पेट में अभी भी उसका दबाव याद था, और आगे की रातों का हिसाब तीनों के बीच बाँट चुका था।
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